phoolkumar
New member
मुझे देश की डेवलपमेंट के लिए अनाज बोना है, क&a
मुझे देश की डेवलपमेंट के लिए अनाज बोना है, क्या आप अपनी फैक्ट्री को हटाएंगे यहां से?:
समाज में आजीविका के मुख्य संसाधन चार रहे हैं, 1. धर्म, 2. प्राइमरी व्यापार (यानी कि खेती, जो कि अभी तक आधिकारिक तौर पर व्यापार घोषित नहीं है, परन्तु अब इसको ऐसा घोषित करवाने का वक्त आ गया है), 3. सेकेंडरी व्यापार (किरयाने और कॉर्पोरेट का व्यापार) और 4. दिहाड़ी-मजदूरी-नौकरी (इंफ्रास्ट्रक्चर व् फोर्थ-थर्ड क्लास ह्यूमन सर्विसेज करने वाला गैर-सरकारी वर्ग व् तमाम तरह की सरकारी नौकरी करने वाला सरकारी वर्ग)।
देश के व्यक्ति का पेट भरेगा तो वो देश की अन्यथा डेवलपमेंट करने की सोचेगा या करेगा, यानी डेवलपमेंट का बेस आदमी का पेट भरना है, जिसके लिए कि खेती-योग्य भूमि का बचा रहना बहुत जरूरी है|
"डेवलपमेंट" ही एक वर्ड है जो सारे बवाल मचा रहा है; तो किसान भी अब इसी वर्ड का सहारा ले के नए "संसोधित भूमि अधिग्रहण कानून" का विरोध करें| "डेवलपमेंट" का असली ठेका तो कॉर्पोरेट से पहले किसानों के पास है| कॉर्पोरेट तो सेकेंडरी डेवलपमेंट करता है भूखा पेट भरे जाने के बाद की, जबकि किसान तो प्राइमरी डेवलपमेंट करता है इंसान का पेट भरने की|
कहा गया है कि भूखे पेट देशभक्ति नहीं होती और "डेवलपमेंट" को देशभक्ति से भी जोड़ा जा रहा है| तो प्राइमरी डेवलपमेंट जब तक नहीं होती रहेगी या होती रहनी सुनिश्चित नही रहेगी, तब तक सेकंडरी डेवलपमेंट ना तो डवलपमेंट हो सकती और ना ही इसको किसी भी प्रकार की देशभक्ति से जोड़ा जा सकता|
या फिर किसानों के लिए अब खेती को व्यापारिक कारोबार बनाने की मांग करने का समय आ गया है| क्योंकि जिस तरीके का यह बिल है इतना क्रूर तो 1894 वाला बिल भी नहीं था| तो ऐसे में या तो सम्पूर्ण किसान जगत मिलके दिल्ली के वोट क्लब जैसी जगह पे जा के धरना दे के इस नए अध्यादेश को वापिस मुंडवाए अन्यथा अपनी-अपनी जमीन को कारोबारी यानी व्यापार की श्रेणी में दर्ज करवा ले| परन्तु उसके लिए भी पहले खेती को व्यापार घोषित करवाने हेतु शायद एक नया संघर्ष छेड़ना पड़े| यह घोषित हो गया तो ठीक, क्योंकि सबकी जमीनें बिना किसी "ऑफ़ लैंड यूज़" (clu) की लागत के व्यापार की श्रेणी में चढ़ जाएँगी| लेकिन नहीं हुआ तो हालाँकि clu में लागत तो आएगी, परन्तु सेकेंडरी डेवलपमेंट वालों द्वारा उनके मनमाफिक आपकी जमीन हड़पी जाए इससे तो सुरक्षा मिल जाएगी| परन्तु समस्या वही, कि वर्तमान कानूनों के तहत सिर्फ खेती करने के नाम पे आप अपनी जमीन के लिए व्यापारिक स्टेटस ले सकते हैं कि नहीं? अब अनाज पैदा करके भूखे लोगों का पेट भरना व्यापार भी है, प्राइमरी डेवलपमेंट भी और देशभक्ति तो फिर है ही| तो शायद यह कारण जोड़ के किसान जगत खेती को व्यापार की श्रेणी में डलवाने की कोशिश करे तो क्यों नहीं होगा|
इसलिए अगर यह अध्यादेश वापिस नहीं होता है तो किसान खेती को प्राइमरी बिज़नेस की केटेगरी में डलवा के, व्यापारिक स्टेटस लेवें और अपनी जमीनें बचाने के साथ-साथ आपके प्राइमरी प्रोडक्ट से सेकेंडरी प्रोडक्ट का व्यापार सीधा खेतों से कैसे शुरू किया जावे, इस सोच पर नई पीढ़ी को डालें| वैसे भी नई पीढ़ी फेसबुक वगैरह पे बहुत है किसानों की तो इनको खेती के प्राइमरी प्रोडक्ट से सेकेंडरी प्रोडक्ट कैसे बनते हैं, इनकी जानकारी जरूर होगी|
सो नौकरी अथवा पढाई के साथ-साथ "सोशल रिस्पांसिबिलिटी" निभाते हुए सोशल मीडिया पर बैठा हर किसान का लड़का/लड़की अपने घरवालों-रिश्तेदार किसानों को इन चीजों की जानकारी दें और उनको इसके लिए प्रेरित करें व् साथ ही शहरों में बस चुकी किसानी जातियों के परिवारों से भी अपील है कि आपको दान-चैरिटी या किसी भी तरह की सोशल रिस्पांसिबिलिटी निभानी है तो गांव में पीछे छूट चुके अपने भाई-बंधुओं को बताएं कि अगर आप सेकेंडरी प्रोडक्ट बना के दोगे तो हम किसी अन्य के बनाये हुए की अपेक्षा उसको ज्यादा खरीदेंगे| खैर फ़िलहाल तो यह विचार एक स्वपन सा लगता है, परन्तु सोशल मीडिया पर बैठी नई किसान-युवा पीढ़ी व् शहरों में पसरी किसान जातियों की मार्किट आपस में मिल जाएँ तो सब कुछ हो सकता है|
और अगर ऐसा हुआ तो जो आज हालात आन खड़े हुए हैं कि डेवलपमेंट के नाम पर (यहां तक कि प्रिवेट स्कूल और अस्पताल बनाने के लिए भी) कोई भी आपको जमीन से बेदखल कर सकता है, कल को आप भी उसको कहने की अवस्था में आ जायेंगे कि "मुझे देश की "प्राइमरी डेवलपमेंट" के लिए अनाज बोना है, क्या आप अपनी "सेकेंडरी डेवलपमेंट" की फैक्ट्री को हटाएंगे यहां से?
और ऐसा होने से एक फायदा और होगा और वो होगा आपकी राजनैतिक ताकत और हैसियत का स्वत: ही और मजबूत व् सुदृढ़ हो जाना|
एक और बात सरकार को यह अध्यादेश वापिस लेने अथवा मनाने का एक जरिया यह भी हो सकता है कि अब शहरों में बसी किसानी जातियां, किरयानों-शॉपिंग मालों से सामान लेना बंद कर दें, ताकि व्यापारियों की कमाई ना हो और उनको समझ आये कि समाज में "डेवलपमेंट" को डेवलपमेंट के लिए ही प्रयोग करो, किसी के मानसिक व् आर्थिक दोहन अथवा शोषण हेतु नहीं| आखिर इस नए बिल का ग्रास तो आप शहरों में बसने वाली किसान जातियों की जमीनें भी बनेंगी, सही कहा ना? तो अब वक्त है आपकी शहर तक की पहुँच और अपने ग्रामीण भाईयों की एकता की संगठित ताकत को दिखाने और उसका सही इस्तेमाल करने का|
जाते-जाते जो ना समझें हों उनको बता दूँ कि मैंने धर्म को आजीविका की श्रेणी में इसलिए रखा है क्योंकि मुझे अभी तक कोई भी किसी भी धर्म का धर्मगुरु-शंकराचार्य-मौलवी-पादरी-ग्रंथी नए "संसोधित भूमि अधिग्रहण बिल" के विरोध में नजर नहीं आया है, जैसे कि अब जब किसान की बात आई तो सबकी "एकता-बराबरी" वाली पीपनी में किसी ने "तिनका" (हरियाणवी में डीकड़ा) फंसा दिया हो| आप सब में से हर किसी के अनुसार मौखिक वक्तयों में तो आपके अपने-अपने धर्मों की सभी जाति-वर्ग के लोग "एक और बराबर" हैं परन्तु आपकी व्यवहारिकता में ऐसा कुछ भी नहीं| आपकी मौखिक भाषा में तो सबकी मान-मर्यादा-प्रतिष्ठा बराबर है और आप ऐसा जताते और विश्वास भी दिखाते हैं कि आप उसी को कायम रखने के लिए खड़े हैं; परन्तु कहाँ खड़े हैं मुझे तो कोई नजर नहीं आया अभी तक| कोई एक भी आ जाए तो मैं धर्म को "आजीविका" की श्रेणी से निकाल के समाज के कल्याण व् उद्दार की श्रेणी में डाल देता, पर काश ऐसा होता|
ओ मेरे धर्म वालो आज आपके एक किसान वर्ग की प्रतिष्ठा-मान-मर्यादा आपकी सरकारों ने दांव पर लगाई है, सुना है आजकल आपकी सरकार सुनती भी बहुत है तो क्या आप ऐसे चुप बैठे रहेंगे, क्या वो "एकता और बराबरी" के बाण नहीं कचोटते आपको जो आप अक्सर छोड़ते हो? काश! इन बाणों की मूर्छा से जनता ही जाग जाए| - फूल मलिक
मुझे देश की डेवलपमेंट के लिए अनाज बोना है, क्या आप अपनी फैक्ट्री को हटाएंगे यहां से?:
समाज में आजीविका के मुख्य संसाधन चार रहे हैं, 1. धर्म, 2. प्राइमरी व्यापार (यानी कि खेती, जो कि अभी तक आधिकारिक तौर पर व्यापार घोषित नहीं है, परन्तु अब इसको ऐसा घोषित करवाने का वक्त आ गया है), 3. सेकेंडरी व्यापार (किरयाने और कॉर्पोरेट का व्यापार) और 4. दिहाड़ी-मजदूरी-नौकरी (इंफ्रास्ट्रक्चर व् फोर्थ-थर्ड क्लास ह्यूमन सर्विसेज करने वाला गैर-सरकारी वर्ग व् तमाम तरह की सरकारी नौकरी करने वाला सरकारी वर्ग)।
देश के व्यक्ति का पेट भरेगा तो वो देश की अन्यथा डेवलपमेंट करने की सोचेगा या करेगा, यानी डेवलपमेंट का बेस आदमी का पेट भरना है, जिसके लिए कि खेती-योग्य भूमि का बचा रहना बहुत जरूरी है|
"डेवलपमेंट" ही एक वर्ड है जो सारे बवाल मचा रहा है; तो किसान भी अब इसी वर्ड का सहारा ले के नए "संसोधित भूमि अधिग्रहण कानून" का विरोध करें| "डेवलपमेंट" का असली ठेका तो कॉर्पोरेट से पहले किसानों के पास है| कॉर्पोरेट तो सेकेंडरी डेवलपमेंट करता है भूखा पेट भरे जाने के बाद की, जबकि किसान तो प्राइमरी डेवलपमेंट करता है इंसान का पेट भरने की|
कहा गया है कि भूखे पेट देशभक्ति नहीं होती और "डेवलपमेंट" को देशभक्ति से भी जोड़ा जा रहा है| तो प्राइमरी डेवलपमेंट जब तक नहीं होती रहेगी या होती रहनी सुनिश्चित नही रहेगी, तब तक सेकंडरी डेवलपमेंट ना तो डवलपमेंट हो सकती और ना ही इसको किसी भी प्रकार की देशभक्ति से जोड़ा जा सकता|
या फिर किसानों के लिए अब खेती को व्यापारिक कारोबार बनाने की मांग करने का समय आ गया है| क्योंकि जिस तरीके का यह बिल है इतना क्रूर तो 1894 वाला बिल भी नहीं था| तो ऐसे में या तो सम्पूर्ण किसान जगत मिलके दिल्ली के वोट क्लब जैसी जगह पे जा के धरना दे के इस नए अध्यादेश को वापिस मुंडवाए अन्यथा अपनी-अपनी जमीन को कारोबारी यानी व्यापार की श्रेणी में दर्ज करवा ले| परन्तु उसके लिए भी पहले खेती को व्यापार घोषित करवाने हेतु शायद एक नया संघर्ष छेड़ना पड़े| यह घोषित हो गया तो ठीक, क्योंकि सबकी जमीनें बिना किसी "ऑफ़ लैंड यूज़" (clu) की लागत के व्यापार की श्रेणी में चढ़ जाएँगी| लेकिन नहीं हुआ तो हालाँकि clu में लागत तो आएगी, परन्तु सेकेंडरी डेवलपमेंट वालों द्वारा उनके मनमाफिक आपकी जमीन हड़पी जाए इससे तो सुरक्षा मिल जाएगी| परन्तु समस्या वही, कि वर्तमान कानूनों के तहत सिर्फ खेती करने के नाम पे आप अपनी जमीन के लिए व्यापारिक स्टेटस ले सकते हैं कि नहीं? अब अनाज पैदा करके भूखे लोगों का पेट भरना व्यापार भी है, प्राइमरी डेवलपमेंट भी और देशभक्ति तो फिर है ही| तो शायद यह कारण जोड़ के किसान जगत खेती को व्यापार की श्रेणी में डलवाने की कोशिश करे तो क्यों नहीं होगा|
इसलिए अगर यह अध्यादेश वापिस नहीं होता है तो किसान खेती को प्राइमरी बिज़नेस की केटेगरी में डलवा के, व्यापारिक स्टेटस लेवें और अपनी जमीनें बचाने के साथ-साथ आपके प्राइमरी प्रोडक्ट से सेकेंडरी प्रोडक्ट का व्यापार सीधा खेतों से कैसे शुरू किया जावे, इस सोच पर नई पीढ़ी को डालें| वैसे भी नई पीढ़ी फेसबुक वगैरह पे बहुत है किसानों की तो इनको खेती के प्राइमरी प्रोडक्ट से सेकेंडरी प्रोडक्ट कैसे बनते हैं, इनकी जानकारी जरूर होगी|
सो नौकरी अथवा पढाई के साथ-साथ "सोशल रिस्पांसिबिलिटी" निभाते हुए सोशल मीडिया पर बैठा हर किसान का लड़का/लड़की अपने घरवालों-रिश्तेदार किसानों को इन चीजों की जानकारी दें और उनको इसके लिए प्रेरित करें व् साथ ही शहरों में बस चुकी किसानी जातियों के परिवारों से भी अपील है कि आपको दान-चैरिटी या किसी भी तरह की सोशल रिस्पांसिबिलिटी निभानी है तो गांव में पीछे छूट चुके अपने भाई-बंधुओं को बताएं कि अगर आप सेकेंडरी प्रोडक्ट बना के दोगे तो हम किसी अन्य के बनाये हुए की अपेक्षा उसको ज्यादा खरीदेंगे| खैर फ़िलहाल तो यह विचार एक स्वपन सा लगता है, परन्तु सोशल मीडिया पर बैठी नई किसान-युवा पीढ़ी व् शहरों में पसरी किसान जातियों की मार्किट आपस में मिल जाएँ तो सब कुछ हो सकता है|
और अगर ऐसा हुआ तो जो आज हालात आन खड़े हुए हैं कि डेवलपमेंट के नाम पर (यहां तक कि प्रिवेट स्कूल और अस्पताल बनाने के लिए भी) कोई भी आपको जमीन से बेदखल कर सकता है, कल को आप भी उसको कहने की अवस्था में आ जायेंगे कि "मुझे देश की "प्राइमरी डेवलपमेंट" के लिए अनाज बोना है, क्या आप अपनी "सेकेंडरी डेवलपमेंट" की फैक्ट्री को हटाएंगे यहां से?
और ऐसा होने से एक फायदा और होगा और वो होगा आपकी राजनैतिक ताकत और हैसियत का स्वत: ही और मजबूत व् सुदृढ़ हो जाना|
एक और बात सरकार को यह अध्यादेश वापिस लेने अथवा मनाने का एक जरिया यह भी हो सकता है कि अब शहरों में बसी किसानी जातियां, किरयानों-शॉपिंग मालों से सामान लेना बंद कर दें, ताकि व्यापारियों की कमाई ना हो और उनको समझ आये कि समाज में "डेवलपमेंट" को डेवलपमेंट के लिए ही प्रयोग करो, किसी के मानसिक व् आर्थिक दोहन अथवा शोषण हेतु नहीं| आखिर इस नए बिल का ग्रास तो आप शहरों में बसने वाली किसान जातियों की जमीनें भी बनेंगी, सही कहा ना? तो अब वक्त है आपकी शहर तक की पहुँच और अपने ग्रामीण भाईयों की एकता की संगठित ताकत को दिखाने और उसका सही इस्तेमाल करने का|
जाते-जाते जो ना समझें हों उनको बता दूँ कि मैंने धर्म को आजीविका की श्रेणी में इसलिए रखा है क्योंकि मुझे अभी तक कोई भी किसी भी धर्म का धर्मगुरु-शंकराचार्य-मौलवी-पादरी-ग्रंथी नए "संसोधित भूमि अधिग्रहण बिल" के विरोध में नजर नहीं आया है, जैसे कि अब जब किसान की बात आई तो सबकी "एकता-बराबरी" वाली पीपनी में किसी ने "तिनका" (हरियाणवी में डीकड़ा) फंसा दिया हो| आप सब में से हर किसी के अनुसार मौखिक वक्तयों में तो आपके अपने-अपने धर्मों की सभी जाति-वर्ग के लोग "एक और बराबर" हैं परन्तु आपकी व्यवहारिकता में ऐसा कुछ भी नहीं| आपकी मौखिक भाषा में तो सबकी मान-मर्यादा-प्रतिष्ठा बराबर है और आप ऐसा जताते और विश्वास भी दिखाते हैं कि आप उसी को कायम रखने के लिए खड़े हैं; परन्तु कहाँ खड़े हैं मुझे तो कोई नजर नहीं आया अभी तक| कोई एक भी आ जाए तो मैं धर्म को "आजीविका" की श्रेणी से निकाल के समाज के कल्याण व् उद्दार की श्रेणी में डाल देता, पर काश ऐसा होता|
ओ मेरे धर्म वालो आज आपके एक किसान वर्ग की प्रतिष्ठा-मान-मर्यादा आपकी सरकारों ने दांव पर लगाई है, सुना है आजकल आपकी सरकार सुनती भी बहुत है तो क्या आप ऐसे चुप बैठे रहेंगे, क्या वो "एकता और बराबरी" के बाण नहीं कचोटते आपको जो आप अक्सर छोड़ते हो? काश! इन बाणों की मूर्छा से जनता ही जाग जाए| - फूल मलिक
Last edited: