ऐसा कहा जाता है कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जी का देहांत १८ अगस्त १९४५ को एक विमान दुर्घटना में हुआ था, जबकि यह कदापि सत्य नहीं है, फिर भी आज हम सब उन्हें इस कविता के माध्यम से याद कर सकते हैं -
घोर अंधकार है, उजास मांगता है देश,
पतझर छाया, मधुमास मांगता है देश
कुर्बानियों का अहसास मांगता है देश,
एक बार फिर से सुभाष मांगता है देश
चंद काले पन्ने फाड़े गए हैं किताब से,
इतिहास को सजाया खादी ओ गुलाब से
पूछता हूँ क्यों सुभाष का कोई पता नहीं,
कैसे कहूँ बीती सत्ता की कोई खता नहीं
एकाएक वो सुभाष जाने कहाँ खो गए,
और सारे कर्णधार मीठी नींद सो गए
मानो या न मानो फर्क है साजिश ओ भूल में,
कोई षड़यंत्र छुपा है समय की धूल में
ढाल ओ खडग बिन गाथा को गढ़ा गया,
आजादी का स्वर्ण ताज खादी से मढ़ा गया
लालकिले में लगा दी क्यारियां गुलाब की,
तारे जाकर बैठे हैं जगह पे आफ़ताब की
आजादी की नींव को लहू से था भरा गया,
मिली नहीं भीख में, आजादी को वरा गया
कितने जांबाज बाज धरती में गड़ गए,
किन्तु सारे श्रेय को लेके कपोत उड़ गए
ऐसे अनुबंध छिपे कागजों की पर्त में,
जिनमे सुभाष बिके आजादी की शर्त में
मौन दस्तावेजों की वो स्याही चीखती रही,
उन्हें पास आती मात्र सत्ता दीखती रही
नींव की जो शख्स ईंट बुनियादी हो गया,
आजादी मिली तो युद्ध अपराधी हो गया
जिसके मुकाबले में आसमान बोना था,
अपराधी हुआ जिसे राष्ट्रपिता होना था
अनुबंध के वो पृष्ठ फाड़े जाने थे तभी,
आँखों में गौरों की पेन गाड़े जाने थे तभी
बोला होता बेटन से नेहरु जी ने डांट कर,
देखा जो सुभाष को तो रख देंगे काट कर
शर्म से वो कागज़ भी आंख मीचता रहा,
किन्तु उन्हें दिल्ली वाला तख्त खींचता रहा
ऐसे शासकों का वनवास मांगता है देश,
एक बार फिर से सुभाष मांगता है देश
माँगा नहीं दिल्ली वाला राज भी सुभाष ने,
चाहा नहीं मोतियों का ताज भी सुभाष ने
नेता जी का सपना था बेडियों को तोड़ना,
भारत के नाम को स्वाधीनता से जोड़ना
भारती के आंसुओं से आँख जिसकी खारी थी,
माँ की हर चोट जिसकी आत्मा पे भारी थी
बोस एक नाम है, अंधेरों में चिराग का,
गुलामी के आंसुओं में दबी हुई आग का
कहते हो बैठे थे सुभाष जिस विमान में,
हो गया है ध्वस्त वो विमान ताइवान में
सूर्य के समक्ष वक्ष तान घटा छा गई,
भाग्य की कलम स्याही से कहर ढा गई
दिव्य क्रांति-ज्योत को अँधेरा छल गया,
बोलते हो सूर्यपुत्र चिंगारी से जल गया
आज वो जली हुई लाश मांगता है देश,
एक बार फिर से सुभाष मांगता है देश