वर्षा

parvyug

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वर्षा


उज्जवल पल्लव तरुओं के हो जाते
जब आती है वर्षा
तो यह सकल सरोवर भर जाते
खग मृदुल कलरव करते
नभ मैं चंचलता भरते
नभ नील कमल सम खिल जाता
​
जीवन चिर उर पर गाता
पूर्व के निर्मल मुख पर
सूर्य रश्मियाँ बना rahi इन्दरधनुष
वह परीलोक के द्वार सा लगता
नया नया सा जग हो जाता
जाने किस अनजान देश से
यह समीर सुरभि लाता
​
जब जब आये यह वर्षा​
निर्मल यह परिकर हो जाये
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