शिक्षा में जाट की धाक

करण दयो ने किम्मे ,ये सारे भाप्पे ,बाणीये पब्लिसिटी की-ए ऩा खावण लागरे सें |




मुझे तो अपनों ने मारा ,गेरों में कहाँ दम था ,
मेरी कश्ती वहीँ डूबी जहां पानी कम था |

Ram Ram Bhai Ji,

Ham ke rokkei sain par
ya publicity chhore ne naa kar rakhi dikkti yo bhi kisse baniya/bhappe ka e kaam dikhe sa.

Dhanyawad sahit.
 
करण दयो ने किम्मे ,ये सारे भाप्पे ,बाणीये पब्लिसिटी की-ए ऩा खावण लागरे सें |



मुझे तो अपनों ने मारा ,गेरों में कहाँ दम था ,
मेरी कश्ती वहीँ डूबी जहां पानी कम था |

गलत बात.
अगर नक्कल ही करनी है, तो कम से कम अच्छी बात की तो कर लो..
 
गलत बात.
अगर नक्कल ही करनी है, तो कम से कम अच्छी बात की तो कर लो..

कपिल भाई , जट्टां में भतेरी अच्छाइयां सें ,दुसर्यां में ते १०%भी कोणी | फेर भी भुंड म्हारे-ए बंधे स | इन् भाप्पे ,बाणीये ,रिफुजियाँ नु ने समझाओ ऩा अक माड़ी मोटि अच्छाइयां म्हारे पे भी ले ले |
 
कपिल भाई , जट्टां में भतेरी अच्छाइयां सें ,दुसर्यां में ते १०%भी कोणी | फेर भी भुंड म्हारे-ए बंधे स | इन् भाप्पे ,बाणीये ,रिफुजियाँ नु ने समझाओ ऩा अक माड़ी मोटि अच्छाइयां म्हारे पे भी ले ले |


भलाई तो इसी में है की अपनी बुराई हम खुद देख लें और दूसरों से अच्छाई सुनने की ज़रुरत हमें महसूस न हो. आत्म-विश्वास का ये मूल सिद्धांत है. किसी किताब में पढ़ा था - एक जाट किरदार पे लेखक ने कहा था की उसमें ऐसा आत्म-विश्वास था जैसा की कई पीढ़ियों तक खेत जोतने से ही आ सकता है.

वैसे सवाल सिर्फ एक लड़के पे उठा है - जाटों पर नहीं. यहाँ सवाल उठाने वाले सब जाट ही हैं. यह और किसी जात का होता, तो भी यही सवाल उठ-ता. सिर्फ जात के नाम पे गलती दबा जाएँ, इतने अनैतिक तो जाट कभी न थे. अब हम बेशक इस बात को कोई भी रंग दे सकते हैं....
 
भलाई तो इसी में है की अपनी बुराई हम खुद देख लें और दूसरों से अच्छाई सुनने की ज़रुरत हमें महसूस न हो. आत्म-विश्वास का ये मूल सिद्धांत है. किसी किताब में पढ़ा था - एक जाट किरदार पे लेखक ने कहा था की उसमें ऐसा आत्म-विश्वास था जैसा की कई पीढ़ियों तक खेत जोतने से ही आ सकता है.

वैसे सवाल सिर्फ एक लड़के पे उठा है - जाटों पर नहीं. यहाँ सवाल उठाने वाले सब जाट ही हैं. यह और किसी जात का होता, तो भी यही सवाल उठ-ता. सिर्फ जात के नाम पे गलती दबा जाएँ, इतने अनैतिक तो जाट कभी न थे. अब हम बेशक इस बात को कोई भी रंग दे सकते हैं....

भाई कपिल जिस लेखक का तन्ने जकर क़र्या स वो पहलम तें-ए भेदभाव पूरण लेखन करण लाग्र्या था | उह तें न्यू बुझनी चाहिए अक आत्म-विस्वाश और क्यूकर आणा चाहिए | उहने न्यू कोणी लिखी अक कई हजार साल तें बन्दुक अर तलवार चला के आया होड़ आत्म-विशवास लागे स | ये सब पिसे ले के ने लिखनिये बन्दे सें | एक काम कर आज काल के सीरियल देख अर फेर उन् में जो किरदार सें उनके नाम जो-जो धर राखे सें वे देख | उनके जो लेखक सें अर चलावानिये सें उनके नाम देख | सारे अरोड़ा ,मल्होत्रा ,मेहता नाम के किरदार बढ़िया मानस का रोल करदे पावेंगे अर राम सिंह ,मलखान सिंह ,चोधरी साब नाम के किरदार भुन्ड़े माणस का रोल करदे पावेंगे | कदे इन् पे भी सोच के देख अक न्यू क्यूँ क़र्या जावण लागर्या स |
 
भाई ये सारी बात हमने गिरान ताही होरी सै हमने ही इस्से लोगो के खिलाफ किम ना किम करना ही पङेगा।
 
गलत बात.
अगर नक्कल ही करनी है, तो कम से कम अच्छी बात की तो कर लो..

आछ्या भाई इब्ब न्यू और बता दे अक इन् की कुणसी-कुणसी आछी बात की नक़ल करां आपां |
 
इनमे बस एक ही आछी बात हे. ये पंजाबी पुत्र दुसरे पंजाबी की पूरी मदद करे हे आगे बडन में. पंजाबी पंजाबी की बनायोड़ी चीज़ खरीदे हे पार आपरले दुसरे की बिकन भी न दे कदे सुसरा मेरे त आगे न कड जे. आपने आलान ने खुद की तरकी त इतना मतलब नहीं हे जितना दुसरे जाट भाई की. या बात गुज्रातियाँ में भी होवे हे पंजबियाँ आली.
 
भाई कपिल जिस लेखक का तन्ने जकर क़र्या स वो पहलम तें-ए भेदभाव पूरण लेखन करण लाग्र्या था | उह तें न्यू बुझनी चाहिए अक आत्म-विस्वाश और क्यूकर आणा चाहिए | उहने न्यू कोणी लिखी अक कई हजार साल तें बन्दुक अर तलवार चला के आया होड़ आत्म-विशवास लागे स | ये सब पिसे ले के ने लिखनिये बन्दे सें | एक काम कर आज काल के सीरियल देख अर फेर उन् में जो किरदार सें उनके नाम जो-जो धर राखे सें वे देख | उनके जो लेखक सें अर चलावानिये सें उनके नाम देख | सारे अरोड़ा ,मल्होत्रा ,मेहता नाम के किरदार बढ़िया मानस का रोल करदे पावेंगे अर राम सिंह ,मलखान सिंह ,चोधरी साब नाम के किरदार भुन्ड़े माणस का रोल करदे पावेंगे | कदे इन् पे भी सोच के देख अक न्यू क्यूँ क़र्या जावण लागर्या स |

आपको पता है मैंने कौनसे लेखक का ज़िक्र किया है? मैं तो सिर्फ एक उदहारण दे रहा था की जाट अपने आत्मा विश्वास के लिए मशहूर हैं. आप उसमें भी खोट निकाल रहे हैं. क्या आप कहना चाहते हैं की जाट अरसों से खेती-बाड़ी नहीं कर रहे हैं? या फिर ये की खेती से आत्मविश्वास नहीं आ सकता - सिर्फ तलवार और बन्दूक से आ सकता है? मुझे बात समझ नहीं आई....

सीरियल में देखता नहीं, और न ही किसी को देखने की सलाह दूंगा...
 
बात कहाँ की कहाँ पंहुचा दी है. एक गलत समाचार पे कुछ लोगों ने टिपण्णी दी तो कुछ और लोगों ने उसका यह तात्पर्य निकाल दिया की जाट बहुत ही विश्वासघाती कौम है. की एक जाट अपने ही लोगों का भला नहीं देख सकता. ज्यूकर गलत खबर की अंधाधुन्द पुब्लिसिटी से यो छोरा कलेक्टर लाग जाता....अभी पर्दा फाश होने पे यही मीडिया इसको सरे आम नंगा करती..

सिर्फ इतना ही नहीं, कुछ एक ने तो यह भी सार निकला है की जाट इतनी नीचता पे उतर जाएगा की एक दुसरे जाट का नुक्सान करने पे आमादा हो जाए..? मेरा ऐसा तजुर्बा नहीं रहा है की मैं अपने लोगों को इतना घटिया समझ पाऊँ, पर कुछ भाइयों की टिप्पणी से तो ऐसा लग रहा है की वोह तो जाटों के ही बहुत सताए हुए हैं...
 
आपको पता है मैंने कौनसे लेखक का ज़िक्र किया है? मैं तो सिर्फ एक उदहारण दे रहा था की जाट अपने आत्मा विश्वास के लिए मशहूर हैं. आप उसमें भी खोट निकाल रहे हैं. क्या आप कहना चाहते हैं की जाट अरसों से खेती-बाड़ी नहीं कर रहे हैं? या फिर ये की खेती से आत्मविश्वास नहीं आ सकता - सिर्फ तलवार और बन्दूक से आ सकता है? मुझे बात समझ नहीं आई....

सीरियल में देखता नहीं, और न ही किसी को देखने की सलाह दूंगा...

बातां माहं तें बात ते लिकडया -ए करें ,पर तू गलत ले गा इह बात ने कपिल | मेरा ते बस एक सार्थक बहस करण का इरादा था |
 
भाई ये सारी बात हमने गिरान ताही होरी सै हमने ही इस्से लोगो के खिलाफ किम ना किम करना ही पङेगा।

best is to ignore such gossips and carry on with one's work.
 
बात कहाँ की कहाँ पंहुचा दी है. एक गलत समाचार पे कुछ लोगों ने टिपण्णी दी तो कुछ और लोगों ने उसका यह तात्पर्य निकाल दिया की जाट बहुत ही विश्वासघाती कौम है. की एक जाट अपने ही लोगों का भला नहीं देख सकता. ज्यूकर गलत खबर की अंधाधुन्द पुब्लिसिटी से यो छोरा कलेक्टर लाग जाता....अभी पर्दा फाश होने पे यही मीडिया इसको सरे आम नंगा करती..

सिर्फ इतना ही नहीं, कुछ एक ने तो यह भी सार निकला है की जाट इतनी नीचता पे उतर जाएगा की एक दुसरे जाट का नुक्सान करने पे आमादा हो जाए..? मेरा ऐसा तजुर्बा नहीं रहा है की मैं अपने लोगों को इतना घटिया समझ पाऊँ, पर कुछ भाइयों की टिप्पणी से तो ऐसा लग रहा है की वोह तो जाटों के ही बहुत सताए हुए हैं...


ha ha ha ha ha ha!!!! good one!
 
कुछ एक ने तो यह भी सार निकला है की जाट इतनी नीचता पे उतर जाएगा की एक दुसरे जाट का नुक्सान करने पे आमादा हो जाए..? मेरा ऐसा तजुर्बा नहीं रहा है की मैं अपने लोगों को इतना घटिया समझ पाऊँ, पर कुछ भाइयों की टिप्पणी से तो ऐसा लग रहा है की वोह तो जाटों के ही बहुत सताए हुए हैं...

Dude you need to relax sometimes. Dont jump on conclusions too quickly.

में सिर्फ रविन्दर भाई की नीचे लिखी बात का जवाब दे रहा था जिसमे उन्होंने पूछा था के इनकी कौनसी बात की नक़ल हमे करनी चाहिए. तो भाई ये एक बात थी जिसकी नक़ल में चाहूँगा जाट भाई करे और सीखे पंजाबी और गुजरती कौम से.


आछ्या भाई इब्ब न्यू और बता दे अक इन् की कुणसी-कुणसी आछी बात की नक़ल करां आपां |

में जाटों का सताया हुआ नहीं हूँ हाँ मुझे हमेसा जाटों की भलाई करने के बदले में भलाई नहीं मिली कई बार बुराई भी मिली हे फिर भी मुझे उसका दुख नहीं हे कौनकी उसमे मेरा सवार्थ था में अपनी कौम की भलाई चाहता था.

में बस ये चाहता हूँ के जाट भाई सिर्फ एक बात को समझ ले के दुसरे जाट की भलाई करके वो अपनी ही भलाई कर रहे हे उससे इर्षा न करे बल्कि उसे बढावा दे. कौनकी एक जाट की तरकी का मतलब कौम की तरकी और कौम की तरकी होगी तो तुम्हारी तरकी अपने आप हो जाएगी.

इस मसले में हमें दूसरी जातियों से थोडा सिखाना चाहइए.

आपने नीचता वगरह सबद इस्तेमाल किये जक्बी ऐसा कुछ लिखा नहीं गया था में इशारा सिर्फ इस इर्षा भावना की तरफ कर रहा था जो हममे होती हे और ये मेरे में भी हे
 
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भाई कपिल जिस लेखक का तन्ने जकर क़र्या स वो पहलम तें-ए भेदभाव पूरण लेखन करण लाग्र्या था | उह तें न्यू बुझनी चाहिए अक आत्म-विस्वाश और क्यूकर आणा चाहिए | उहने न्यू कोणी लिखी अक कई हजार साल तें बन्दुक अर तलवार चला के आया होड़ आत्म-विशवास लागे स | ये सब पिसे ले के ने लिखनिये बन्दे सें | एक काम कर आज काल के सीरियल देख अर फेर उन् में जो किरदार सें उनके नाम जो-जो धर राखे सें वे देख | उनके जो लेखक सें अर चलावानिये सें उनके नाम देख | सारे अरोड़ा ,मल्होत्रा ,मेहता नाम के किरदार बढ़िया मानस का रोल करदे पावेंगे अर राम सिंह ,मलखान सिंह ,चोधरी साब नाम के किरदार भुन्ड़े माणस का रोल करदे पावेंगे | कदे इन् पे भी सोच के देख अक न्यू क्यूँ क़र्या जावण लागर्या स |

Bhai Jattan ke haath pair kihh nai bandh rakhe sain..Jaat bhi la lo haanga serial mai,, movies mai...Pher jattan ke naam bhi aan laag jaawenge badiya kirdaar mai..arr ek idea aur sai..Start villain tai ho sakai sai..pehlya panjabiyaan ke serial mai villain ka role kar lo :cool: arr thode tame pacche hero ka..arr jai panjaabi aapne serial mai entry nahi dewai tai apne shuru kar lo serial villain aale..kimme to thao fedda publicity ka :livid:
 
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Bhai Jattan ke haath pair kihh nai bandh rakhe sain..Jaat bhi la lo haanga serial mai,, movies mai...Pher jattan ke naam bhi aan laag jaawenge badiya kirdaar mai..arr ek idea aur sai..Start villain tai ho sakai sai..pehlya panjabiyaan ke serial mai villain ka role kar lo :cool: arr thode tame pacche hero ka..arr jai panjaabi aapne serial mai entry nahi dewai tai apne shuru kar lo serial villain aale..kimme to thao fedda publicity ka :livid:

i think the powerful decides the where the battle ground would be. who is anybody to say o.k it is in the "serial/movies" section that you must prove you are better than me ? there are better avenues also - like in education, research, politics, business etc etc instead of the low level t.v serials etc.
 
there are better avenues also - like in education, research, politics, business etc etc instead of the low level t.v serials etc.
I think, to become famous overnight 'movies/serials' is the way to go. Reason : they reach wider audience. Not everyone is fond of reading, politics me "naam kamaane" me poori umar nikal jaati hai insaan ki, business te manne jata ke bas ki baat lagti nahi. Ask the youth, who they know better Anushka Sharma or Amartya Sen? You will get the answer. dhaak dhook kimme na se, nokri na laage to saari dhaak dhari ki dhari reh ja se.
 
i think the powerful decides the where the battle ground would be. who is anybody to say o.k it is in the "serial/movies" section that you must prove you are better than me ? there are better avenues also - like in education, research, politics, business etc etc instead of the low level t.v serials etc.


How did you decide that education,research, politics, business etc are better avenues than tv serials/Cinema? Do you think any comparison of superiority exist in any of these? BTW acting in tv serials/movies could be a business too.
 
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