Aftermath of reservation agitation in Haryana

More than that and those who are framed are either caught sitting on dharnas or moving on roads with sticks in hand


जो जाट फसते तो मिडिया आले माइक खा जाते

ध्यान से देखिये इन रक्त पिपासू बलातकारी लुटेरे वहशत के दरिंदों को
 
Bhaiyon meri to ek baat samjh nahi aa rahi ki ham log aapas me kyo lad rahe hai. Koi bhai keh raha hai apna dharam badal lo, koi keh raha hai apne non jaat bhaiyon se meljol tod lo aur koi kuch. En sab se hasil kya hoga? Aur kyo badloon mai apna dharam. Musalmaan bhi aapas mai ladte reh hai sari duniya me. Koi Sunni Siya k naam par, koi ahmadiya k maan par, koi devbandi k naam par, koi wahabi ke naam par. Mai to bhai Hindu paida hua tha aur Hindu hi marunga. Aur en sab se Samaj ka to batwara hi hoga. Maine to bachpan se ek chedz padhi thi ki Angrez aur Musalmano ne ham par jo itne saal raaj kiya wo sirf hame aapas me ladwa kar hi kiya tha. Ab wahi devinde and rule wala game ye politicians khel rahe hain. Aur ham inke hathon ki kathputali bane hue hai. Ye neta, ye sarkar to aani jani hai. Aapsi prem pyar banaye rakha hama zimmedari hai aur ye zimmedari hame hi uthani padegi. Agar koi bhai ham jaat bhaiyon se kisi galat fehmi me aakar naaraz hai to iska matlab ye to nahi ki ham usko bhi gaali dena shuru kar den. Prem pyar se samjhao usko. Mai to khud yahi kar raha hoon apne non jaat bhaiyon aur doston k sath,


Rahi baat reservation ki to bhai mera manna to bhai yahi hai ki iska to ek hi solution hai. Cast base sara reservation khatam karo. Aur koi naya system banao jisme sare jaruratmando ko reservation mile chahe wo kisi bhi cast ka ho.
 
Guys, we are getting a lot of hate comments on FB and other social media is not because people hated Jat Community from beginning. This is because all the news media is presenting Jats as villein. People are believing these news. So, we need to clear this to them without hating them back.
 
https://www.facebook.com/Feku-Pandit...28014/?fref=nf
Check the top post on this page .
Most of the articles in news media and so many Facebook and twitter post against Jats have one thing common that is Sikhs. Go to any article and read comments and the most hated comments against Jats are from Sikhs. Those witness also are Sikhs. First News paper to publish this fake murthal news was Tribune. The hatred is because of 1966 partition, Chandigrah and Delhi riots. Also, as Haryana is more prosperous than Punjab which is full of drugs and not getting any Industries has flamed this hatred even more. Moreover, they hates that to keep contacted to rest of India they have to travel through Haryana. Whenever Jats sits on Dharna and do blockades it affects Punjab life too much. They have so many reasons to hates Jats and Haryana.

A lot of sikhs from Punjab and delhi are not like this. They are supportive to Jats.
 
धर्म बदलने की जरुरत नहीं है, न ही अपने हिन्दू होने का स्पष्टीकरण किसी दूसरी कौम वाले को देने की जरुरत है .जाट सबसे बहादुर हिन्दू कौम है , जिसने देश और धर्म दोनों के मान में वृद्धि करी है . जब महमूद गजनी सोमनाथ का मंदिर लूट के ले जा रहा था तब जाटो ने ही उसे लूटा था तब कहाँ थे वीर मराठे गुज्जर राजपूत यादव ब्राह्मण . मुग़ल शासन काल में किसी हिन्दू जाती द्वारा पहला विद्रोह जाटो ने ही किया था वो भी दिल्ली की नाक तले मथुरा में जब राजपूत मुग़लों के तलवे चाट रहे थे . there is no need to be either apologetic or in a self crtical mode.धर्म बदलने से समस्या सुलझ जाया करती तो हम आज हिन्दू होते ही नहीं यह धर्म बदलने का नेक काम हमारे पूर्वज पहले ही कर चुके होते
 
Last edited:
That's why I named Mayawati.

29% Jat + 20% dalit + 7% muslims

ये बड़ा ही सशक्त विचार है, इसका प्रभाव ना सिर्फ हरियाणा बल्कि समूचे उत्तर भारत पर पड़ेगा । और तभी जनता के हालात सुधरेंगे ।
 
धर्म बदलने की जरुरत नहीं है, न ही अपने हिन्दू होने का स्पष्टीकरण किसी दूसरी कौम वाले को देने की जरुरत है .जाट सबसे बहादुर हिन्दू कौम है , जिसने देश और धर्म दोनों के मान में वृद्धि करी है . जब महमूद गजनी सोमनाथ का मंदिर लूट के ले जा रहा था तब जाटो ने ही उसे लूटा था तब कहाँ थे वीर मराठे गुज्जर राजपूत यादव ब्राह्मण . मुग़ल शासन काल में किसी हिन्दू जाती द्वारा पहला विद्रोह जाटो ने ही किया था वो भी दिल्ली की नाक तले मथुरा में जब राजपूत मुग़लों के तलवे चाट रहे थे . there is no need to be either apologetic or in a self crtical mode.धर्म बदलने से समस्या सुलझ जाया करती तो हम आज हिन्दू होते ही नहीं यह धर्म बदलने का नेक काम हमारे पूर्वज पहले ही कर चुके होते

बोझा ढोने की मानसिकता आसानी से नहीं जाती, खासकर के जब दूसरे ने ऊपर लादा हो ।
 
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• 71% जाट HCS है
• 60% जाट IAS है
• 69% जाट IPS है
• 58% जाट ALLIED OFFICER है
• 71% जाट OTHER GOVT. EMPLOYE
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आरक्षण का मूल स्वरूप जब मंडल आयोग का गठन हुआ था उस समय के विचार से अब तक काफी बदल चुका है । तब एक धारणा थी चुंकि देश भी हाल ही में औपनिवेशवाद से मुक्त हुआ है तो आर्थिक विकास की राह सभी के लिए राहत प्रदान करेगी । इसलिए आप देखो कि प्रारंभ के पंचवर्षीय योजना में औद्योगिकरण व कृषि विकास पर बल दिया गया । इसका सामाजिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ा और निश्चय ही जाट जाति को आजादी के बाद आर्थिक नीतियों का विशेष लाभ रहा । परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि नीति इस प्रकार से बनायी गयीं की जाटों को लाभ मिले । लाभ सबके लिए था पर जाट कुशल रहे और अग्रणी रहे । उदारीकरण के बाद कृषि और औद्योगिकरण का भारत में ह्रास हुआ है । और अब इस बार जाटों को नुकसान के पाले में बैठना पड़ा । यह वैश्विकरण के चलते रोजगारों का सेवा के क्षेत्र में सिमटने के कारण हुआ है । जाहिर है वे उच्च जातियां जो मानसिक श्रम करती रहीं है वे ही उदारीकरण में सबसे लाभांवित हुई हैं । जाटों को अपने पिछड़ने के सही कारणों को इंगित करना होगा । हमारा कंपीटीशन सह-कृषक जातियों से नहीं है । यह बात आपस में जाटों को समझनी है और जो नॉन-जाट नामकी नयी शब्दावली मीडिया ने ईजाद की है उनको भी समझानी है ।
आरक्षण की मांग से रोजगार का अब कोई संबंध नहीं रह गया है । सरकार के पास नौकरियां रही कहां है और जाट जनसंख्या के हिसाब से कभी भी केवल सरकारी नौकरी पर नहीं निर्भर रह सकते । तो फिर आखिर आरक्षण को किस रूप मे लिया जाना चाहिए, यह सवाल बनता है । आरक्षण एक राजनैतिक हिस्सेदारी का प्रतीक है । यह हिस्सेदारी राज्य के संदर्भ में एक सामरिक सुरक्षा के प्रतीक के रूप में उभरा है । यह क्यों है इसका जवाब भी राजनैतिक दलों की उदारीकरण की चुनौती के लिए दिशा देने में विफलता को ही माना जा सकता है ।
यहां से आगे दो दिशा हैं एक तो निराशाजनक मोड़ हो सकता है जहां और संशय की स्थिति बने या फिर जाट समाज फिर से अपने आप को सभी बिरादरी के साथ मिलकर महापंचायत कर कोई ऐसा फैसला ले जोकि सर्व समाज मान्य हो और फिर हरियाणा मुख्यमंत्री के सामने पेश किया जाए । सरकार को इस मामले में अपने पंगुपन का एहसास है और जो समाधान हरियाणा की जनता देगी उसी को तरजीह दे पाएगी ।
 
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अम्ब्रीश जी बात आपने सही कही है के केवल सरकारी नौकरी के भरोसे जाट नहीं बैठ सकते। सरकारी नौकरी, प्राइवेट नौकरियों से काफी कम हैं. जाटों को मेरे ख्याल से प्राइवेट सेक्टर की तरफ भी इसी जोश से आगे बढ़ना होगा। वैसे कृषि का योगदान भारतीय अर्थव्यवस्था में आगे घटता जाएगा। जिससे कृषि पे निर्धारित लोगो को अभी से दुसरे उद्योगो और सेक्टर की तरफ रूझान करना होगा। हम यह पश्चिमी देशो से सीख सकते है की कैसे वह लोग कृषि से औद्योगिक रोजगार की तरफ गए. इस पूरे संसार में बहुत से लोग सिर्फ बोलने का खा रहे हैं. और हममे इसी से शिक्षा लेनी होगी के कैसे हम दूसरी भाषाओ पर पकड़ बना सकते हैं और मुख्यतः इसमें अंग्रेजी सबसे अनिवार्य है. यदि जाट बोलना सीख गए तो समझो हमारी शुरू की समस्या का काफी समाधान हो सकता है. क्योंकि बहुत से जाट बोलने में पीछे रह जाते है. आज के दिन मीडिया में जाटों की संख्या बेहद ही कम है. उसकी वजह हमारी अंग्रेजी पर कम पकड़ होना है. हमे इससे सुधारना होगा। उसके अलावा हमे उद्योग करने का कौशल भी सीखना होगा। उद्योगिक क्षेत्र में हम दूसरी बिरादरियों से काफी पीछे हैं. कृषि से जुड़े औद्योग से शुरुआत की जा सकती है. लेकिन फ़िलहाल सबसे अहम जरूरत मेरे हिसाब से अंग्रेजी पर पकड़ है. यदि हम इस पर पकड़ कर लेते हैं तो हमारे रोज़गार के अवसर काफी बढ़ सकते हैं. आज के ज़माने में इंटरनेट पे सभी कुछ उपलब्ध है. जरूरत है केवल जागरूकता की और पहल की . एक बार ये सामान्यता बन जाती है तो अपने आप लोग आगे बढ़ सकते हैं.
 
डट जाओ उदारवादियो मुस्लमान कितना भी सीधा क्यों ना हो उसनै लोग जिस नजर तैं देखै हैं सबनै बेरा है हाल कमोबेश यू ए म्हारा है


वक्त सिर्फ और सिर्फ ये कह रहा है कि भाईचारे के चक्कर मै खुद की औरफजीती करवाण की बजाए वो सोचो कि बकवास करने वालों के मुंह कैसे बंद किए जांए और रही बात हिंदु वाली तो हम शत्रीय से शुदर् बना दिए
और आने वाले वक्त मे 1984 के सिखों जैसी हालात होने का इंतजार करो शायद फेर इस बोले जाट की बात समझ आ जावै
 
सीधी सी बात है ,
धर्म हमारा जाट है।
- Maj Kulwant Singh

डट जाओ उदारवादियो मुस्लमान कितना भी सीधा क्यों ना हो उसनै लोग जिस नजर तैं देखै हैं सबनै बेरा है हाल कमोबेश यू ए म्हारा है


वक्त सिर्फ और सिर्फ ये कह रहा है कि भाईचारे के चक्कर मै खुद की औरफजीती करवाण की बजाए वो सोचो कि बकवास करने वालों के मुंह कैसे बंद किए जांए और रही बात हिंदु वाली तो हम शत्रीय से शुदर् बना दिए
और आने वाले वक्त मे 1984 के सिखों जैसी हालात होने का इंतजार करो शायद फेर इस बोले जाट की बात समझ आ जावै
 
डट जाओ उदारवादियो मुस्लमान कितना भी सीधा क्यों ना हो उसनै लोग जिस नजर तैं देखै हैं सबनै बेरा है हाल कमोबेश यू ए म्हारा है


वक्त सिर्फ और सिर्फ ये कह रहा है कि भाईचारे के चक्कर मै खुद की औरफजीती करवाण की बजाए वो सोचो कि बकवास करने वालों के मुंह कैसे बंद किए जांए और रही बात हिंदु वाली तो हम शत्रीय से शुदर् बना दिए
और आने वाले वक्त मे 1984 के सिखों जैसी हालात होने का इंतजार करो शायद फेर इस बोले जाट की बात समझ आ जावै

rakesh Ji yahan mai aapki baat se puri traah sahamat nahi hoon. Ye baat sahi hai ki hame apna paksh aur majbut karna hoga lekin bhaichara bhi bana k rakhna hoga. Kyonki Aag ko aag se kabhi nahi bhujaya ja sakta. Aag to pani se hi bhujti hai.
 
Why don't people like KP Singh start English medium schools in villages. They can at least do so in the name of social service, if they feel ashamed of being Jats.
Our responsible Jat bhai Virendra Sehwag has opened the school named Sehwag International School in Jhajjar.
It is bitter truth that people who have no knowledge of English , are considered uneducated in our country.
 
बोझा ढोने की मानसिकता आसानी से नहीं जाती, खासकर के जब दूसरे ने ऊपर लादा हो ।
भाईसाब मानसिकता का करंट स्टेटस बताने के लिए धन्यवाद . केवल दो तर्क इसलिए प्रस्तुत किये यह इंगित करने के लिए की किसी और से ज्यादा ही किया है हमने देश धर्म के लिए इसलिए शर्मिंदा महसूस करने की जरुरत नहीं है . प्रायः मानसिकता का बोझ झूठे एवं विरूपित तथ्यों पे ढोया जाता है मेरे कोनसे तथ्य झूट की सीमा रेखा में आते हैं कृपया बताने की कृपा करें .आप किसी तर्क से असहमत हो सकते हैं वितर्क कर सकते हैं परन्तु मानसिकता को ही चुनोती दे डालना ?आशा है मुझ अल्प शिक्षित का मार्गदर्शन करेंगे
 
भाईसाब मानसिकता का करंट स्टेटस बताने के लिए धन्यवाद . केवल दो तर्क इसलिए प्रस्तुत किये यह इंगित करने के लिए की किसी और से ज्यादा ही किया है हमने देश धर्म के लिए इसलिए शर्मिंदा महसूस करने की जरुरत नहीं है . प्रायः मानसिकता का बोझ झूठे एवं विरूपित तथ्यों पे ढोया जाता है मेरे कोनसे तथ्य झूट की सीमा रेखा में आते हैं कृपया बताने की कृपा करें .आप किसी तर्क से असहमत हो सकते हैं वितर्क कर सकते हैं परन्तु मानसिकता को ही चुनोती दे डालना ?आशा है मुझ अल्प शिक्षित का मार्गदर्शन करेंगे

वैयक्तिक विचार नहीं है आप आहत ना हो, जाटों ने बौद्ध धर्म व इस्लाम को भी कालांतर में अपनाया था । जो कि सामाजिक विपरीत परिस्थितियों की तरफ इशारा करता है ।
 
वैयक्तिक विचार नहीं है आप आहत ना हो, जाटों ने बौद्ध धर्म व इस्लाम को भी कालांतर में अपनाया था । जो कि सामाजिक विपरीत परिस्थितियों की तरफ इशारा करता है ।
मतलब यह आईडिया कालांतर में भी स्थायी हल न दे पाने के कारण फ़ैल हो चूका है जिसके परिणामस्वरूप आज आप और मैं न तो बोध है न मुसलमान .
 
Our main concern should be how to move our community forward. Why are we discussing religion here ?? It had a very important role for upliftment of any community in medieval and ancient time but it can hardly play any role in modern era. We need to focus on some points-

1. We have to abolish all kind of social evils like dowry and improve sex ratio, stop sqaundering in marriages.
2. These Brahmins Banias are forward classes because of their flexibility to changing time and we suffer because of our traditional rigidity.
3. A Jat never cares about his negative points, it helps him to be confident but the other side is he fails to improve himself.
4. Quality Education is the most important thing. As Amit Budasar ji said we need to focus on English education, It is essential in all government Jobs like SSC, Banks, Civil services and in private sector also.
5. We know all about above mentioned points, there is nothing new but we need to make plans and work on it.

It is irrelevant to discuss religion here. Religion is the most discussed issue on JL. There are many good threads for it.
We should also file a case against media for distorting facts. Delhi(868) and Chandigarh(818) have lower sex ratio than Haryana (879)..
Delhi is the capital of rapes and worst place for women on earth.
These media channels should also know the caste of rapists in Nirbhya gang rape case, now they are calling Jat agitators as rapists.
 
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