Aise hote hain pita

Being exclusively*caring and possessive for HER own children, not of neighbors or relatives is not a true motherhood… Especially not acceptable and understandable feature in human species at least for me….I wonder how a mother can be partial with other children in the same family… If any mother shows and feels love and care exclusively for own children and not concern for other children those r living together in joint families must introspect herself and understand she is lacking somewhere, its part of lower mentality and one day she will loose respect in eyes of her own children ...provided her children would be able to think out of box and have clear vision to understand and have unconditional love for his/her cousin.

हमारी नादान माताएं कभी कभी ममतावश अपने ही बच्चों में भी भेदभाव कर देती हैं I अक्शर छोटे बच्चों को और लड़कियों को माँ का ज्यादा प्यार मिलता है I और लड़के की शादी के बाद लड़कों के प्रति प्यार में थोड़ी सी कमी आ जाती है - खास कर जाट परिवारों में तो यह अवधारणा है की शादी के बाद छोरा बहू का ऐ हो जाता है I छोरा बेचारा बीच में पिस जाता है सास बहू की तकरार में I यह घर घर की कहानी है I हमारे बड़े बूढों को शायद counselling की सख्त आवशयक्ता है I
 
......................... हमारे बड़े बूढों को शायद counselling की सख्त आवशयक्ता है I

सर उनकी काउंसलिंग करने वाला शायद ही कामयाब हो.... ज्यादातर बुजुर्ग ये कहते नजर आयेंगे -"हम ने थम पाल पोस के इतने बड़े कर दिए... एब हम ने मत सिखाओ...." . बदलते परिवेश में अपने आप को ढाल पाना बहुत कम बुजुर्गों को आता है ........ लेकिन जो ढाल पाते हैं वो खुश रहते हैं ......आदरनिये तो सभी हैं लेकिन भगवान् ऐसे माता पिता सब को दे जो अपने बच्चों के साथ साथ न सिर्फ रहे परन्तु उनके वक़्त में आये बदलाव को भी हर संभव ढंग से अपनाने से न हीचकिचाएं.... चाहे वह बदलाव खान-पान का हो... रहन-सहन का.. या फिर पालन-पोषण के तरीके का ...

साथ ही साथ बच्चों को भी चाहिए की कोई बिलकुल नयी चीज़ अपने बुजुर्गों पर ना थोपे....... एब कोए अपनी ग्रामीण परिवेश में रही अपनी दादी ने 'जींस की पेंट' पहरन पे मजबूर करेगा या फेर दादा ने 'पास्ता' खान की कह्वेगा तो शायद उनको अच्छा ना लगे.......

Balance bana ke rakha jaroori hai !!....
.
 
Last edited:
View attachment 10576View attachment 10575
सर उनकी काउंसलिंग करने वाला शायद ही कामयाब हो.... ज्यादातर बुजुर्ग ये कहते नजर आयेंगे -"हम ने थम पाल पोस के इतने बड़े कर दिए... एब हम ने मत सिखाओ...." . बदलते परिवेश में अपने आप को ढाल पाना बहुत कम बुजुर्गों को आता है ........ लेकिन जो ढाल पाते हैं वो खुश रहते हैं ......आदरनिये तो सभी हैं लेकिन भगवान् ऐसे माता पिता सब को दे जो अपने बच्चों के साथ साथ न सिर्फ रहे परन्तु उनके वक़्त में आये बदलाव को भी हर संभव ढंग से अपनाने से न हीचकिचाएं.... चाहे वह बदलाव खान-पान का हो... रहन-सहन का.. या फिर पालन-पोषण के तरीके का ...

साथ ही साथ बच्चों को भी चाहिए की कोई बिलकुल नयी चीज़ अपने बुजुर्गों पर ना थोपे....... एब कोए अपनी ग्रामीण परिवेश में रही अपनी दादी ने 'जींस की पेंट' पहरन पे मजबूर करेगा या फेर दादा ने 'पास्ता' खान की कह्वेगा तो शायद उनको अच्छा ना लगे.......

Balance bana ke rakha jaroori hai !!....
.

Wow.......... ExpectationsView attachment 10577
 
सर उनकी काउंसलिंग करने वाला शायद ही कामयाब हो.... ज्यादातर बुजुर्ग ये कहते नजर आयेंगे -"हम ने थम पाल पोस के इतने बड़े कर दिए... एब हम ने मत सिखाओ...." . बदलते परिवेश में अपने आप को ढाल पाना बहुत कम बुजुर्गों को आता है ........ लेकिन जो ढाल पाते हैं वो खुश रहते हैं ......आदरनिये तो सभी हैं लेकिन भगवान् ऐसे माता पिता सब को दे जो अपने बच्चों के साथ साथ न सिर्फ रहे परन्तु उनके वक़्त में आये बदलाव को भी हर संभव ढंग से अपनाने से न हीचकिचाएं.... चाहे वह बदलाव खान-पान का हो... रहन-सहन का.. या फिर पालन-पोषण के तरीके का ...

साथ ही साथ बच्चों को भी चाहिए की कोई बिलकुल नयी चीज़ अपने बुजुर्गों पर ना थोपे....... एब कोए अपनी ग्रामीण परिवेश में रही अपनी दादी ने 'जींस की पेंट' पहरन पे मजबूर करेगा या फेर दादा ने 'पास्ता' खान की कह्वेगा तो शायद उनको अच्छा ना लगे.......

Balance bana ke rakha jaroori hai !!....
.

Spot On !! I 'concur' with you bro.
 
सर उनकी काउंसलिंग करने वाला शायद ही कामयाब हो.... ज्यादातर बुजुर्ग ये कहते नजर आयेंगे -"हम ने थम पाल पोस के इतने बड़े कर दिए... एब हम ने मत सिखाओ...." . बदलते परिवेश में अपने आप को ढाल पाना बहुत कम बुजुर्गों को आता है ........ लेकिन जो ढाल पाते हैं वो खुश रहते हैं ......आदरनिये तो सभी हैं लेकिन भगवान् ऐसे माता पिता सब को दे जो अपने बच्चों के साथ साथ न सिर्फ रहे परन्तु उनके वक़्त में आये बदलाव को भी हर संभव ढंग से अपनाने से न हीचकिचाएं.... चाहे वह बदलाव खान-पान का हो... रहन-सहन का.. या फिर पालन-पोषण के तरीके का ...

साथ ही साथ बच्चों को भी चाहिए की कोई बिलकुल नयी चीज़ अपने बुजुर्गों पर ना थोपे....... एब कोए अपनी ग्रामीण परिवेश में रही अपनी दादी ने 'जींस की पेंट' पहरन पे मजबूर करेगा या फेर दादा ने 'पास्ता' खान की कह्वेगा तो शायद उनको अच्छा ना लगे.......

Balance bana ke rakha jaroori hai !!....
.

Very true, Anil. Majority of our elderly people are not receptive to counseling by the youngsters. You are right we should not thrust upon them Italian porridge (Pasta) and the cowboy outfit (jeans). But once they will realize comforts of jeans, they will discard dhoti for ever. पास्ता तो शायद ना पसन्द आवै इनकै पर एक बार पिज़्जा ओर कोक मुह लाग गे तो फेर लास्सी रोटी खाना छोड देगे.
 
In the crap of humanity motherhood is an overblown virtue and propagated as such for centuaries with the help of mythological sermons and would be. A mother is *exclusively*caring and possesive for HER own children, not of neighbours or relatives and this trait it primarily exhibited by most of the female species of Kingdom Animalia at planet earth.

Yup, Motherhood is a bit overblown and claiming parental instincts as something 'universal' is wrong as there exists plenty of species where mothers eat their offsprings! :-)

So, i don't find it surprising when a mother kills her infant daughter/son (or likewise-patricide-matricide-incidents). Push anyone to the 'limits' and his/her survival-instincts (by that I mean: not just staying-alive but maintaining a level of 'well-off' status) will kick-in; parental-instincts in these cases are nothing more than the charity (which by the way does NOT start at home/family but start with own-self).
 
But once they will realize comforts of jeans, they will discard dhoti for ever. .

सर धोती में जो मजा आवे स बुढयां ने वो जींस में कोणी..... धोती में तो हवा के सरपेटे चुगर्दे के लागें .... ज्ञान सा आ ज्या स खासकर गर्मी में...... लेकिन जींस में ये सुवाद कोणी.......

एर बुढे आदमी की जींस की जिप emergency में खुले न खुले.....साका हो ज्या बेचार्याँ ने............इसे टेम में धोती तो आसान सौद्दा स उन खातिर....बस लंगड़ ढीला करया एर काम बनया.................

लेकिन हाँ.... धोती को धोना सुखाना और प्रेस करना टेढ़ा काम हो स.... .....आजकाल के फ्लैट-आ में इतनी जगह भी कोणी होती आक धोती सूखा ले आराम तें बालकोनी में..........गाम में इ मजा स इस बात का तो... .

एर उपर तें,... म्हारे जिस्याँ ने तो धोती बांधनी भी ना आती.... जे क्यूकर अडास सी लगा के बाँध भी लें ......... के बेरा कित खुल ज्या लान्गड़ एर इज्जत रोड पे आ ज्या...... यो भी रिस्क स...... हा हा हा हा हा हा हा ....... :rock :rock
 
Last edited:
सर धोती में जो मजा आवे स बुढयां ने वो जींस में कोणी..... धोती में तो हवा के सरपेटे चुगर्दे के लागें .... ज्ञान सा आ ज्या स खासकर गर्मी में...... लेकिन जींस में ये सुवाद कोणी.......

एर बुढे आदमी की जींस की जिप emergency में खुले न खुले.....साका हो ज्या बेचार्याँ ने............इसे टेम में धोती तो आसान सौद्दा स उन खातिर....बस लंगड़ ढीला करया एर काम बनया.................

लेकिन हाँ.... धोती को धोना सुखाना और प्रेस करना टेढ़ा काम हो स.... .....आजकाल के फ्लैट-आ में इतनी जगह भी कोणी होती आक धोती सूखा ले आराम तें बालकोनी में..........गाम में इ मजा स इस बात का तो... .

एर उपर तें,... म्हारे जिस्याँ ने तो धोती बांधनी भी ना आती.... जे क्यूकर अडास सी लगा के बाँध भी लें ......... के बेरा कित खुल ज्या लान्गड़ एर इज्जत रोड पे आ ज्या...... यो भी रिस्क स...... हा हा हा हा हा हा हा ....... :rock :rock


Hahahahahahahaha..........good humour.......Laughed out loud........
 
Yup, Motherhood is a bit overblown and claiming parental instincts as something 'universal' is wrong as there exists plenty of species where mothers eat their offsprings! :-)

So, i don't find it surprising when a mother kills her infant daughter/son (or likewise-patricide-matricide-incidents). Push anyone to the 'limits' and his/her survival-instincts (by that I mean: not just staying-alive but maintaining a level of 'well-off' status) will kick-in; parental-instincts in these cases are nothing more than the charity (which by the way does NOT start at home/family but start with own-self).

ना भाई सुनील, समर , वि पि सिंह जी
में आप लोगों से सहमत नहीं
पुत्रहन्ता, पुत्रीहन्ता कुमाता अपवाद ही होती हैं! और फिर इस तरह का घृणित और निकृष्ट कर्म एक पिता भी कर सकता है, पुत्र भी और पुत्री भी !
ऐसा कर्म किसी भी वर्ग, समाज , काल में अपवाद ही होगा, आम नहीं ! खास कर मां ऐसा घृणित कर्म स्वस्थ मनोदशा में कदापि नहीं करेगी !
खैर, माता पिता में तुलना ही गलत है ! दोनों का हमारे जीवन में योगदान अतुलनीय है !
कृपया बाबा रामदेव की इस वीडियो को जरूर देखिये !
बाबा एक जगह कहते हैं, मेरे जीवन में नियम और मर्यादा के प्रति कठोरता वह पिता से आई है ! ममता, करुना और प्रेम माता से आया है !

http://www.youtube.com/watch?v=2zrN7wr88h0


सत्यपाल
 
Last edited:
ना भाई सुनील, समर , वि पि सिंह जी
में आप लोगों से सहमत नहीं
पुत्रहन्ता, पुत्रीहन्ता कुमाता अपवाद ही होती हैं! और फिर इस तरह का घृणित और निकृष्ट कर्म एक पिता भी कर सकता है, पुत्र भी और पुत्री भी !
ऐसा कर्म किसी भी वर्ग, समाज , काल में अपवाद ही होगा, आम नहीं ! खास कर मां ऐसा घृणित कर्म स्वस्थ मनोदशा में कदापि नहीं करेगी !
खैर, माता पिता में तुलना ही गलत है ! दोनों का हमारे जीवन में योगदान अतुलनीय है !
कृपया बाबा रामदेव की इस वीडियो को जरूर देखिये !
बाबा एक जगह कहते हैं, मेरे जीवन में नियम और मर्यादा के प्रति कठोरता वह पिता से आई है ! ममता, करुना और प्रेम माता से आया है !


सत्यपाल


देशवाल सर,
मेरे कहने का ये मतलब नहीं था पुत्रिहंता (कुमाताएं) घर-घर में है पर आप इस बात को नकार नहीं सकते की गाहे-बगाहे ऐसे उधाहरण सामने आते ही रहते हैं |

मैंने अपनी पिछली पोस्ट में दो पहलुओं पर जोर देने की कोशिश की है :

१. मैंने कई जगह पढ़ा-सुना है की "पैतृक-प्रवृत्ति" जानवरों में भी होती है और कोई भी माँ अपने बच्चों को दुःख नहीं पहुंचा सकती है; अपने बच्चों की रक्षा के लिए एक माँ अपनी जान पर भी खेल जाती है| मुझे इस बात पर बिलकुल भी संदेह नहीं है की ऐसाकई जगह होता है| कई बार टटीरीही खेतों के बीचों-बीच अंडे दे देती है; खेत की बुहाई करते वकत भी वहां से नहीं उठती, चाहे ट्रेक्टर कितना ही करीब ना आ जाये|
लेकिन इस तरह का व्यवहार हमेशा सामने नहीं आता|
हमारी धरती पर बहुत सारी ऐसी प्रजाति हैं जिन में माँ अपने ही बच्चों को खा लेती है (कई बार चरम विपरीत परिस्थितियों में और कई बार 'just for a change')|इस तरह का व्यवहार केवल छोटे-मोटे कीड़ो-मकोड़ों और बैक्टीरिया तक ही सीमित नहीं है बल्कि कई विकसित प्रजातियों में भी देखने को मिलता है जैसे की: polar bears, burying beetles, hamsters, wolf spiders, rodents, some wild African dogs, Baboons, many fishes etc. (In fact, लगभग सभी प्रकार की प्रजाति-समूह में ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं)|
तो ये कहना की माएं हमेशा बच्चों के हित को अपने से ऊपर रखती हैं, गलत होगा!

२. जहाँ तक बात इंसानों की आती है, ये बात सही की जानवरों की अपेक्षा में मनुष्य सामाजिक और मानसिक रूप से बहुत ज्यादा विकसित है पर 'कुमाताएं' (और कुपिता भी) यहाँ भी देखने को मिलती हैं|
माता और पुत्र-पुत्री का सम्बन्ध स्नेहपूर्वक है पर एक दायरे तक ही| जैसा कि मैंने पिछली पोस्ट में कहा कि जब परिस्थिति विपरीत हो तो एक माँ अपने बच्चे को 'नुकशान' पहुँचाने में नहीं हिचकिचाती|

यदि माँ-बच्चे का रिश्ता हमेशा पवित्र और शुद्ध है, तो आप भ्रूण-हत्या को कैसे explain करेंगे? To have a perfect family, people don't hesitate to commit such crimes!!

आंकड़े दिखाते हैं की लड़कों से अधिक लडकियां कुपोषण के कारण ५ साल की उम्र से पहले मारी जाती हैं| क्या इसमें माता-पिता दोषी नहीं हैं? कहाँ चला जाता है माता-पिता की पवित्र प्यार?

आये दिन पेपर में पढने को मिलता है: नवजात शिशु कूड़े-कचरे के ढेर में मिला, किसने फेंका पता नहीं? कारण साफ़ होता है: अविवाहित और गर्भवती लड़की (लड़का भी समान रूप से जिम्मेदार है)| ये कौन सा रूप है माँ का? आप अब भी कहेंगे की माँ हमेशा ममता, करुना और प्रेम का रूप होती है?

जब बात सामाज में 'अपनी' हैसयीत की आती है तो 'parental-hormones' पिच्छे की सीट ले लेते हैं|
 
ना भाई सुनील, समर , वि पि सिंह जी
में आप लोगों से सहमत नहीं
पुत्रहन्ता, पुत्रीहन्ता कुमाता अपवाद ही होती हैं! और फिर इस तरह का घृणित और निकृष्ट कर्म एक पिता भी कर सकता है, पुत्र भी और पुत्री भी !
ऐसा कर्म किसी भी वर्ग, समाज , काल में अपवाद ही होगा, आम नहीं ! खास कर मां ऐसा घृणित कर्म स्वस्थ मनोदशा में कदापि नहीं करेगी !
खैर, माता पिता में तुलना ही गलत है ! दोनों का हमारे जीवन में योगदान अतुलनीय है !
कृपया बाबा रामदेव की इस वीडियो को जरूर देखिये !
बाबा एक जगह कहते हैं, मेरे जीवन में नियम और मर्यादा के प्रति कठोरता वह पिता से आई है ! ममता, करुना और प्रेम माता से आया है !

http://www.youtube.com/watch?v=2zrN7wr88h0




सत्यपाल
iss daaku ne bhi tamgaa mil gya......isk ebhi example diye jaan lage....hadd ho li katai.............
 
ना भाई सुनील, समर , वि पि सिंह जी
में आप लोगों से सहमत नहीं
पुत्रहन्ता, पुत्रीहन्ता कुमाता अपवाद ही होती हैं! और फिर इस तरह का घृणित और निकृष्ट कर्म एक पिता भी कर सकता है, पुत्र भी और पुत्री भी !
ऐसा कर्म किसी भी वर्ग, समाज , काल में अपवाद ही होगा, आम नहीं ! खास कर मां ऐसा घृणित कर्म स्वस्थ मनोदशा में कदापि नहीं करेगी !
खैर, माता पिता में तुलना ही गलत है ! दोनों का हमारे जीवन में योगदान अतुलनीय है !
कृपया बाबा रामदेव की इस वीडियो को जरूर देखिये !
बाबा एक जगह कहते हैं, मेरे जीवन में नियम और मर्यादा के प्रति कठोरता वह पिता से आई है ! ममता, करुना और प्रेम माता से आया है !

http://www.youtube.com/watch?v=2zrN7wr88h0


सत्यपाल
देशवाल साहब,
यह बात तो आपकी बिलकुल सही है कि खराबी पुत्र, पुत्री, माँ एवं बाप किसी में भी हो सकती है और पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं होती I इसलिए इन सभी रिश्तों के बारे में एक निश्चित और सर्वमान्य मत नहीं हो सकता कि इनमे से कौन सा रिश्ता सर्वाधिक प्रिय या आदरणीय है I सभी का अपने-अपने स्थान पर बराबर महत्व है यदि ये सभी अपनी-अपनी मर्यादा की कसौटी पर खरे उतरते हैं तो I इसके अतिरिक्त प्रत्येक परिवार कि परिस्थितियाँ एक दूसरे से भिन्न होती हैं जो आपसी रिश्तों के निर्वाह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं I जहाँ तक बात रामदेव जी की है तो मेरा ये मानना है के अगर वे प्रणय-सूत्र में बंधे होते तो उनके ह्रदय में जो माँ के प्रति अगाध प्रेम का सागर हिलोरें मार रहा है उसकी लहरों की ऊंचाई शायद इतनी नहीं होती I उनकी माताश्री के वात्सल्य प्रेम की गहराई भी शायद इतनी नहीं होती क्योंकि एक wampire बीच में आकर स्नेह का जायका जो बिगाड़ देती I यह एक त्रासदी है कि सास भूल जाती है कि वो भी कभी बहू थी और बहू यह भूल जाती है कि उसने भी कभी सास बनना है I मानव इतिहास में न जाने कितने ही परिवार, विशेषकर (जाट-बहुल इलाकों में) सास-बहू , ननद-भावज आदि रिश्तों के शीत-युद्ध का शिकार होकर अपनी शांति और समृध्दी खो चुके हैं I निश्कर्ष यह है कि माँ और बाप दोनों ही का रिश्ता अत्यंत महत्त्वपूर्ण , अदित्विय एवं संवेदनशील होता है और हमें हर कीमत पर इन्हें निभाना चाहिए I संतान का यह धरम हैI
 
एक माँ का रिश्ता ही शयद अभी तक्क बचा हुआ था इस तर्क वितर्क और आलोचना से.माँ तो माँ ही होती है अब वो एक अच्छी इंसान अगर नहीं है है तो उससे मातर्तत्व का उसका हक़ कम
नहीं हो जाता.माँ के लिए अप्पने सब बच्चे बराबर होत्ते है.मेरे हिसाब से हमे इस रिश्ते को अपपनी माँ से हमारा कैसा रिश्ता है और हम खुद कैसी माँ है उस हिसाब से ही आंकना चाहिए
.बाकी आपने हालातो के हिसाब से कोण माँ कैसे बर्ताव करती है ये उसका अपना निर्णय है.मेरे लिए मेरे माँ भगवन से पहले है और अपने बच्चे के लिए में अपनी जान दे भी सकती हु और किसी की ले भी सकती हु.मेरे सभी दोस्तों ,बहन भाई और देवरानी के बच्चो को में दिल से प्यार करती हु.सुनी सुनाई और किताब्बो बातो से प्रेरित होके इस पवित्र रिश्ते पे प्रशनचिन्नह लग्गाने से बेहतर है इसकी महता
को बननाए रखना नहीं तो ये रिश्ता भी अगर बेमानी हो गया था तो सब रिश्ते हिल जायेगे...
 
एक माँ का रिश्ता ही शयद अभी तक्क बचा हुआ था इस तर्क वितर्क और आलोचना से.माँ तो माँ ही होती है अब वो एक अच्छी इंसान अगर नहीं है है तो उससे मातर्तत्व का उसका हक़ कम
नहीं हो जाता.माँ के लिए अप्पने सब बच्चे बराबर होत्ते है.मेरे हिसाब से हमे इस रिश्ते को अपपनी माँ से हमारा कैसा रिश्ता है और हम खुद कैसी माँ है उस हिसाब से ही आंकना चाहिए
.बाकी आपने हालातो के हिसाब से कोण माँ कैसे बर्ताव करती है ये उसका अपना निर्णय है.मेरे लिए मेरे माँ भगवन से पहले है और अपने बच्चे के लिए में अपनी जान दे भी सकती हु और किसी की ले भी सकती हु.मेरे सभी दोस्तों ,बहन भाई और देवरानी के बच्चो को में दिल से प्यार करती हु.सुनी सुनाई और किताब्बो बातो से प्रेरित होके इस पवित्र रिश्ते पे प्रशनचिन्नह लग्गाने से बेहतर है इसकी महता
को बननाए रखना नहीं तो ये रिश्ता भी अगर बेमानी हो गया था तो सब रिश्ते हिल जायेगे...


ritu ji aapki baat padhke mere dil me to ek hi baat aa rahi hain vo yeh hain ki mods pls close this threadddddddddddddddddddddddddddddd
 
Yes, that is what I am trying to say. All relations are important and we must live upto them. As far as leaving this world is concerned, we all are in the queue.

VPSingh ji, what you have qouted is an excetption. Recently, in Melbourne, a revengeful father drowned his three young sons. In another dreadful case, a filthy beast was produced in court for keeping his own daughter imprisoned for years and fathered three kids. These are the rare cases commited by not normal but sick and abnormal people. We can't and shouldn't be using them as examples to discuss a heavenly relationship between a mother and her childern.

खैर, में भी कोनसा नार्मल आदमी हूँ, बल्कि बहुत भावुक और पागल इंसान हूँ !
मुझे फ़िल्मी और किताबी बातें भी बहुत विचलित कर देती हैं, उदुलित कर देती हैं !
थोड़ी देर पहले फिल्म रंग दे बसंती का ये गीत सुना, भाव विभोर हो गया !
मां बेटे के अनंत प्रेम के प्रवाह में उलझाती, भरमाती ये पंक्तिया आप भी पढ़िए, सुनिए और महशुश कीजिये इस दिव्य प्रेम को !

लुका छुपी बहुत हुयी सामने आ जा ना
कहाँ कहाँ ढूँढा तुझे
थक गयी है अब तेरी माँ!

आ जा सांझ हुई मुझे तेरी फिकर
धुंधला गयी देख मेरी नज़र आ जा ना!

http://www.youtube.com/watch?v=b70zbqpuDno&feature=related
http://www.youtube.com/watch?v=k5qhBM3KJY8&feature=fvw


सत्यपाल
 
Deshwal Sir and Mr Singh,

My point was - Motherhood is an overblown virtue because a Mother is *only* exclusively angelic towards *Her* children not towards all kids around. Any animal species mother would go to protect Her kids alike Human mother. It is a Primal Instinct not some divine virtue equally present around us. (Exceptions present only proves this ) .A female mother moneky carry her chimp glued to her breast even after kid's death.

Mr Singh - It is applicable to all human being irrespective of JAT or NON Jat. Kindly don't use Jat families ^repeatitively^.

Mother and Father are as equal as there is 12 hours each in Day and Night and at the same time as different as presence or absence of sunlight. So how can one draw a conclusion between equal and different.
 
Last edited:
to carry a life for nine months inside you is so special.some moms even risk their lives to be mom.only a female can understand this .all relationships are important ,so what if this relation has got extra credit.its not harming anybody (except in the relationship of motherin law and daughter in law hehe)
Deshwal Sir and Mr Singh,

My point was - Motherhood is an overblown virtue because a Mother is *only* exclusively angelic towards *Her* children not towards all kids around. Any animal species mother would go to protect Her kids alike Human mother. It is a Primal Instinct not some divine virtue equally present around us. (Exceptions present only proves this ) .A female mother moneky carry her chimp glued to her breast even after kid's death.

Mr Singh - It is applicable to all human being irrespective of JAT or NON Jat. Kindly don't use Jat families ^repeatitively^.

Mother and Father are as equal as there is 12 hours each in Day and Night and at the same time as different as presence or absence of sunlight. So how can one draw a conclusion between equal and different.
 
Deshwal Sir and Mr Singh,

My point was - Motherhood is an overblown virtue because a Mother is *only* exclusively angelic towards *Her* children not towards all kids around. Any animal species mother would go to protect Her kids alike Human mother. It is a Primal Instinct not some divine virtue equally present around us. (Exceptions present only proves this ) .A female mother moneky carry her chimp glued to her breast even after kid's death.

Mr Singh - It is applicable to all human being irrespective of JAT or NON Jat. Kindly don't use Jat families ^repeatitively^.

Mother and Father are as equal as there is 12 hours each in Day and Night and at the same time as different as presence or absence of sunlight. So how can one draw a conclusion between equal and different.

समर भाई

यानिकि, आप कहना चाहते हैं कि, मातृभाव व् मातृत्व व्यर्थ में महिमा मंडित किये जाने वाले गुणवाचक शब्द हैं और माताएं इतने सम्मान कि अधिकारिणी नहीं हैं!
क्योंकि, आपका मानना है कि एक माता का वह उत्कृष्ट भाव, अनुराग व् समर्पण केवल उसके बच्चों के लिए होता है और उस्सी तरह का प्रेमभाव व् निष्ठां वह दुसरे बचों के लिए नहीं रखती !
आपके अनुसार सभी माताएं, मानव हों या पशु , प्राकृतिक व् स्वाभाविक प्रवृति के वशीभूत ऐसा आचरण करती हैं !यानिकि, मां केवल, बच्चे कि शारीरिक सरंचना को ही प्रतिष्ठित नहीं करती है बल्कि उसका उत्कृष्ट मातृभाव व् ममत्व भी माँ को प्राकृतिक विराशत में ही मिला है ! अब जब प्रकृति ने माता को श्रेष्ठ दर्जा दिया है फिर आपको इससे सविकारने में संकोच क्यों ? इसलिए , में दृढ मत से कह सकता हूँ कि मानव ही क्यों, पशु पक्षियों कि दुनिया में भी माता का स्थान श्रेष्ठ है !

नीलम जी का इस चर्चा को शुरू करने का अभिप्राय, हमारे जीवन में मातापिता के स्थान का तुलनात्मक विश्लेषण करना कदाचित नहीं रहा होगा !
पिता भी हमारे जीवन में बहुत अहम् स्थान रखते हैं ! अहम् केवल इसलिए नहीं कि वह हमारे जनक हैं बल्कि हमारे जीवन को एक निश्चित दिशा भी देते हैं !
में भी एक पिता हूँ और बखूबी समझता हूँ कि मेरे आचरण का बहुत विशिष्ट प्रभाव मेरे बेटे के वयवहार में झलकता है ! कभी २ में हैरान रह जाता हूँ यह सोच कर कि कैसे उसने मेरे बारीक़ से बारीक़ गुणदोष अपने जीवन में समाहित कर लिये हैं और मुझे इसका कभी अहसाह भी नहीं हुआ ! इसीलिए मेरा मानना है कि एक पिता न केवल अपने बच्चो पालन पोषण का उतरदायित्व उठता है बल्कि उनके आचरण का प्रभाव, प्रयत्क्ष व् अप्रयत्क्ष रूप से उनकी संतान के व्यक्तित्व को बहुत प्रभावित करता है !

सत्यपाल
 
Last edited:
Back
Top