ना भाई सुनील, समर , वि पि सिंह जी
में आप लोगों से सहमत नहीं
पुत्रहन्ता, पुत्रीहन्ता कुमाता अपवाद ही होती हैं! और फिर इस तरह का घृणित और निकृष्ट कर्म एक पिता भी कर सकता है, पुत्र भी और पुत्री भी !
ऐसा कर्म किसी भी वर्ग, समाज , काल में अपवाद ही होगा, आम नहीं ! खास कर मां ऐसा घृणित कर्म स्वस्थ मनोदशा में कदापि नहीं करेगी !
खैर, माता पिता में तुलना ही गलत है ! दोनों का हमारे जीवन में योगदान अतुलनीय है !
कृपया बाबा रामदेव की इस वीडियो को जरूर देखिये !
बाबा एक जगह कहते हैं, मेरे जीवन में नियम और मर्यादा के प्रति कठोरता वह पिता से आई है ! ममता, करुना और प्रेम माता से आया है !
सत्यपाल
देशवाल सर,
मेरे कहने का ये मतलब नहीं था पुत्रिहंता (कुमाताएं) घर-घर में है पर आप इस बात को नकार नहीं सकते की गाहे-बगाहे ऐसे उधाहरण सामने आते ही रहते हैं |
मैंने अपनी पिछली पोस्ट में दो पहलुओं पर जोर देने की कोशिश की है :
१. मैंने कई जगह पढ़ा-सुना है की "पैतृक-प्रवृत्ति" जानवरों में भी होती है और
कोई भी माँ अपने बच्चों को दुःख नहीं पहुंचा सकती है; अपने बच्चों की रक्षा के लिए एक माँ अपनी जान पर भी खेल जाती है| मुझे इस बात पर बिलकुल भी संदेह नहीं है की ऐसा
कई जगह होता है| कई बार टटीरीही खेतों के बीचों-बीच अंडे दे देती है; खेत की बुहाई करते वकत भी वहां से नहीं उठती, चाहे ट्रेक्टर कितना ही करीब ना आ जाये|
लेकिन इस तरह का व्यवहार
हमेशा सामने नहीं आता|
हमारी धरती पर बहुत सारी ऐसी प्रजाति हैं जिन में माँ अपने ही बच्चों को खा लेती है (कई बार चरम विपरीत परिस्थितियों में और कई बार 'just for a change')|इस तरह का व्यवहार केवल छोटे-मोटे कीड़ो-मकोड़ों और बैक्टीरिया तक ही सीमित नहीं है बल्कि कई विकसित प्रजातियों में भी देखने को मिलता है जैसे की: polar bears, burying beetles, hamsters, wolf spiders, rodents, some wild African dogs, Baboons, many fishes etc. (In fact, लगभग सभी प्रकार की प्रजाति-समूह में ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं)|
तो ये कहना की माएं हमेशा बच्चों के हित को अपने से ऊपर रखती हैं, गलत होगा!
२. जहाँ तक बात इंसानों की आती है, ये बात सही की जानवरों की अपेक्षा में मनुष्य सामाजिक और मानसिक रूप से बहुत ज्यादा विकसित है पर 'कुमाताएं' (और कुपिता भी) यहाँ भी देखने को मिलती हैं|
माता और पुत्र-पुत्री का सम्बन्ध
स्नेहपूर्वक है पर एक दायरे तक ही| जैसा कि मैंने पिछली पोस्ट में कहा कि जब परिस्थिति विपरीत हो तो एक माँ अपने बच्चे को 'नुकशान' पहुँचाने में नहीं हिचकिचाती|
यदि माँ-बच्चे का रिश्ता हमेशा पवित्र और शुद्ध है, तो आप भ्रूण-हत्या को कैसे explain करेंगे? To have a
perfect family, people don't hesitate to commit such crimes!!
आंकड़े दिखाते हैं की लड़कों से अधिक लडकियां कुपोषण के कारण ५ साल की उम्र से पहले मारी जाती हैं| क्या इसमें माता-पिता दोषी नहीं हैं? कहाँ चला जाता है माता-पिता की पवित्र प्यार?
आये दिन पेपर में पढने को मिलता है: नवजात शिशु कूड़े-कचरे के ढेर में मिला, किसने फेंका पता नहीं? कारण साफ़ होता है: अविवाहित और गर्भवती लड़की (लड़का भी समान रूप से जिम्मेदार है)| ये कौन सा रूप है माँ का? आप अब भी कहेंगे की माँ हमेशा ममता, करुना और प्रेम का रूप होती है?
जब बात सामाज में '
अपनी' हैसयीत की आती है तो 'parental-hormones' पिच्छे की सीट ले लेते हैं|