यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।-अथर्ववेद
जिस कुल में नारियों कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण, दिव्य भोग और उत्तम संतान होती हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं।
आज से दस हजार वर्ष पहले आर्य अथवा कहें कि वैदिक काल में नारी की स्थिति क्या थी यह सभी के लिए विचारणीय हो सकता है। नारी की स्थिति से समाज और देश के सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर का पता चलता है। यदि नारी को धर्म, समाज और पुरुष के नियमों में बांधकर रखा गया है तो उसकी स्थिति निकृष्ट ही मानी जा सकती है।
किंतु जिन्होंने वेद-गीता पढ़े हैं वे अच्छी प्रकार हैं कि दस हजार वर्ष पूर्व जबकि मानव जंगली था, आर्य पूर्णत: एक सभ्य समाज में बदल चुके थे। तभी तो वेदों में जो नारी की स्थिति का वर्णन है उससे पता चलता है कि उनकी स्थिति आज के समाज से कहीं अधिक आदरणीय और स्वतंत्रतापूर्ण थी।
नारी की स्थिति :-
1.वैदिक काल में कोई भी धार्मिक कार्य नारी की उपस्थिति के बिना प्रारम्भ नहीं होता था। उक्त काल में यज्ञ और धार्मिक प्रार्थना में यज्ञकर्ता अथवा प्रार्थनाकर्ता की पत्नी का होना आवश्यक माना जाता था।
2.नारियों को धर्म, शिक्षा और राजनीति में भी पुरुष के समान ही समानता प्राप्त थी। वे वेद पढ़ती थीं और पढ़ाती भी थीं। मैत्रेयी, गार्गी जैसी नारियाँ इसका उदाहरण है। ऋग्वेद की ऋचाओं में लगभग 414 ऋषियों के नाम मिलते हैं जिनमें से 30 नाम महिला ऋषियों के हैं। यही नहीं नारियां युद्ध कला में भी पारंगत होकर राजपाट भी संभालती थीं।
3.'शतपथ ब्राह्मण' में कहा गया है कि नारी नर की आत्मा का आधा भाग है। नारी के बिना नर का जीवन अधूरा है इस अधूरेपन को दूर करने और सँसार को आगे चलाने के लिए नारी का होना अत्यंत आवश्यक है। नारी को वैदिक युग में देवी की उपाधि प्राप्त थी।
4.ऋग्वेद में वैदिक काल में नारियां बहुत विदुषी और नियम पूर्वक अपने पति के साथ मिलकर कार्य करने वाली और पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली होती थीं। पति भी पत्नी की इच्छा और स्वतंत्रता का सम्मान करता था।
5.वैदिक काल में वर तलाश करने के लिए वधु की इच्छा सर्वोपरि होती थी। फिर भी कन्या पिता की इच्छा को भी महत्व देती थी। यदि पिता को कन्या के योग्यवर नहीं लगता था तो वह पिता की इच्छा को भी स्वीकार करती थीं।
6.बहुत-सी नारियां यदि अविवाहित रहना चाहती थीं तो अपने पिता के घर में सम्मान पूर्वक रहती थी। वह घर परिवार के हर कार्य में साथ देती थी। पिता की संम्पति में उनका भी भाग होता था।
7.सनातन वैदिक हिन्दू धर्म में जहां पुरुष के रूप में देवता और भगवानों की पूजा-प्रार्थना होती थी वहीं देवी के रूप में माँ सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा का वर्णन मिलता है। वैदिक काल में नारियाँ माँ, देवी, साध्वी, गृहिणी, पत्नी और पुत्री के रूप में ससम्मान पूजनीय मानी जाती थीं।
8.बाल विवाह की प्रथा तब नहीं थी। नारी को पूर्ण रूप से शिक्षित किया जाता था। उसे हर वह विद्या सिखाई जाती थी जो पुरुष सीखता था- जैसे वेद ज्ञान, धनुर्विद्या, नृत्य, संगीत शास्त्र आदि। नारी को सभी कलाओं में दक्ष किया जाता था उसके पश्चात ही उसके विवाह के संबंध में सोचा जाता था। इसके कई उदाहरण मिल जाएंगे।
ऐसे हुआ नारी का पतन :-
महाभारत युद्ध के पश्चात नारी का पतन होना आरम्भ हुआ। इस युद्ध के पश्चात समाज बिखर गया, राष्ट्र राजनीतिक शून्य हो गया था और धर्म का पतन भी हो चला था। युद्ध में मारे गए पुरुषों की स्त्रियाँ विधवा होकर बुरे दौर में फंस गई थी।
राजनीतिक शून्यता के चलते राज्य असुरक्षित होने लगे। असुरक्षित राज्य में अराजकता और मनमानी बढ़ गई। इसके चलते नारियाँ सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक शोषण की शिकार होने लगीं। फिर भी यह दौर नारियों के लिए उतना बुरा नहीं था जितना कि मध्य काल रहा।
पुराने समय में पुरुष के साथ चलने वाली नारी मध्य काल में पुरुष की सम्पति की तरह समझी जाने लगी। इसी सोच के चलते नारियों की स्वतंत्रता समाप्त हो गई। मध्य काल में नए-नए जन्मे तथाकथित धर्मों ने नारी को धार्मिक तौर पर दबाना और शोषण करना प्रारम्भ किया।
धर्म और समाज के जंगली नियमों ने नारी को पुरुष से नीचा और निम्न घोषित कर उसे उपभोग की वस्तु बनाकर रख दिया। वैदिक युग की नारी शनैः-शनैः अपने देवीय पद से नीचे खिसकर मध्यकाल के सामन्तवादी युग में दुर्बल होकर शोषण का शिकार होने लगी।
तथाकथित मध्यकालीन धर्म ने नारी को पुरुर्षों पर निर्भर बनाने के लिए उसे सामूहिक रूप से पतित अनधिकारी बताया गया। उसके मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगाकर पुरुष को हर स्थान पर श्रेष्ठ बताकर नारी के अवचेन में शक्तिहीन होने का आभास जगाया गया जिसके चलते उसे सरलता से विद्याहीन, साहसहीन कर दिया जाए। समाज, देश और धर्म के *नारी को अनुपयोगी बनाया गया जिससे कि वह अपने जीवन यापन, सम्मान एवँ आत्मरक्षा के लिए पूर्णत: पुरुष पर निर्भर हो जाए।
इस सभी तरह के भय और भयानक वातावरण के चलते हिन्दुओं में भी पर्दाप्रथा, बाल विवाह प्रथा और नारियों को शिक्षा से दूर रखने का चलन बढ़ गया।
"हे नारी! तू स्वयं को पहचान। तू शेरनी है, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करने वाली है, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर।
हे नारी! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली है, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर।
हे नारी! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करने वाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर।"--यजुर्वेद 5/10 -शतायु