Bihar Assembly Elections 2015

Bihar Assembly Election 2015 outcome - A Guess


  • Total voters
    17
  • Poll closed .
गयी कछाधारियो की गाय पानी में ! ;)

नास में दम कर राखा था पुरे देश क !
Brother it will be hard for them to pull out cow from the water after they have trousers on ;) :applause:(RSS is planning to replace Khakhi Chaddi with Trousers :sentimental:)
 
If elections are held today in Haryana, I would not be surprised if BJP gets the same drubbing as they had in Delhi and now in Bihar!!
 
If elections are held today in Haryana, I would not be surprised if BJP gets the same drubbing as they had in Delhi and now in Bihar!!

Khud modi bhi election lade tho bhi nhi jaatege haryana main. chalo bihar main har k baad haryana pe ye jayda attention dege. kuch to kaam hoga 5-10%.
 
Delhi main bjp haari ab bihar haari, bahut achha hua. Puree taqat lagai bihar election main, helicoper, tv, media sab. Bjp ney vikas ka nara diya jo ki dhookha nikla. Vikas to adani ka hoga, public jai bhaad main. Sab key sab state main bjp ki sarkar ki ichha hai modi ji ki. Modi ki har baat main chal kapat dikhata hai. Kisaan ki zameen ko woh adani ko dena chahata hai kuyoki adani ka karz chukana hai. Modi ji please batao agar zameen gai to desh ki 70% public kahan jyagee. Congress rule for 60 years, bjp rule will be over in the next lok sabha election. Haryana main jats ko bolta hai modi ki cm jaat hoga, ambala main bolta tha punjabi hoga, heerwati main bolta tha aheer cm hoga, others ko bolta tha cm non jat hoga. Dogli niti mat karo modi ji, aap ko public pasand karti thi but public ko samjho, public ko mat samajhao. Public bahut ki samajhdaar hai. Jo aapka filmi style hai states ko package deney ka bahut hi galat hai. Zayada tv par mat aao, videsh ki sair kam karo. Jyada public agriculture par nirbhar hai. Niryat kam hua hai phir bhi mahangai badhi hai. Main bahut hi simple public ka aadmi hoon. Modi ji, agar kutch galat likha hai to mujey maaf karna. Bhai logo aap bhi mujey maaf karna, lekin apna suggestion jaroor dena. Modi ji, adani ko aap ki chai pasand thi, aap ko khattar ki chai pasand thi lekin public ko aap ki chai pasand nahi. Ram ram jai shri ram, jai kisaan, jai jawan & jai vikas.
 
If elections are held today in Haryana, I would not be surprised if BJP gets the same drubbing as they had in Delhi and now in Bihar!!

In Haryana election are not held between political parties , election are fought against the predictable JAT CM candidates. BJP thought that same strategy may work in Bihar. BJP does not have root level leaders. Even a Bihari who voted in Bihar for Lalu and living in Faridabad or Gurgaon will never vote for a JAT candidate. Bihari living in Haryana will vote for BJP. Now to make a balance in central jobs only best solution is to give JATS as OBC status . They can only bring a balance in central jobs. Yadav are making maximum use of OBC . Even Patel in Gujarat should be given OBC. In that case there will be friction between Yadav and Kurmi in Bihar. Patels are part of Kurmi community.
 
बिहार की जनता ने अपना message दे दिया है | अब पढ़ने वाले पर निर्भर करता है वो इसे किस प्रकार decode करता है |
 
प्राचीन भारत के एक शाशक अभिमान सिंह के उत्थान और पतन की कहानी - लेखक 'मासूम ' (Relevant in the present context.)

महाराज अभिमान सिंह के सिंहासन पर आसीन होने के कुछ महीनों पश्चात ही उनकी सलाहकार-मंडली के कुछ पुरोहित, साहूकार और सूबेदारों का छद्म-राष्ट्रवाद (pseudo- nationalism) कुलांचे भरने लगा और अभिमान की ऊंचाइयों को छूने लगा I शायद वे राजसी ठाठ-बाठ और निरंकुशता के आदि नहीं थे I साम्राज्य में सदियों से भूख और दरिद्रता की मार झेल रही रियाया (subjects) आये दिन के अर्थहीन फ़रमानों से भीतर ही भीतर कुढ़ रही थी मगर चुप थी I भयभीत थी क्योंकि शाही कारिंदों की जुबां से निकला हुआ एक एक शब्द राष्ट्रवाद और धर्म का पैगाम था I हालांकि महाराज अभिमान सिंह की शाही मोहर एक भी फरमान पर नहीं होती थी मगर उनकी चुप्पी प्रजा की के लिए किसी शाही मोहर से कम ना थी I कभी बकरी का मांस न खाने का फरमान तो कभी शास्त्रों की दुहाई देकर लहसुन का सेवन वर्जित I लोगों के चूल्हे और रसोई की तलाशियों ने प्रजा के मन में पल रही शंका और आक्रोश की अग्नि को हवा देनी प्रारम्भ कर दी थी I धर्म-भीरु प्रजा को धर्म शास्त्र और कर्म कांड की बातों से बहलाने के प्रयत्न भी विफल होने लगे I एक दो सूबों में प्रजा ने बगावत की और महाराज के सिपहसालारों को शिकस्त देकर आम प्रजा में से ही एक को सूबेदार चुन कर गद्दी नशीन कर दिया था I यह बात और थी कि महाराज की कोतवाली ने उनका शाशन चलाना दूभर कर रखा था और आये दिन किसी न किसी कारिंदे या वज़ीर को हथकड़ी जड़ दी जाती थी I


उधर पाटलीपुत्र रियासत में भी रण-भेरी (bugle) बज चुकी थी I कभी महाराजा अभिमान सिंह के विश्वास पात्र समझे जाने वाले स्थानीय सूबेदार सुशासन कुमार ने भी बहुत पहले बगावत का पैगाम भिजवा कर बड़ी गद्दी को ललकारने का दुस्साहस दिखा दिया था I जंग की तैयारियां हुई I महाराज ने अपने सबसे अधिक निपुण और विश्वशनीय सेनापति दुर्जन सिँह साहूकार को पाटलिपुत्र जीतने का जिम्मा सौंपा I सरकारी ख़ज़ाने के मुंह खोल दिए गए I रियासत के सभी नामी गिरामी सामंतों और साहूकारों ने दिल ख़ोल कर महाराज को युद्ध कोष के लिए माल असबाब दिया I हाथी, घोड़े, रथ, यहाँ तक कि उड़न खटोले भी दिए I सुशाशन कुमार की सेना से अच्छे सिपहसालार तक ख़रीदने की बातें सुनने में आई मगर सबूत कोई नहीं था क्योंकि इस कला में दुर्जन सिंह पारंगत थे I धार्मिक विष में बुझे हुए तीरों का भी प्रयोग बड़े पैमाने पर हुआ I संख्या और बल में सुशाशन कुमार की सेना महाराज की सेना के सामने बहुत ही दुर्बल दिखाई दे रही थी I परन्तु उनका मनोबल और सूबे के प्रति समर्पण ही शायद उनकी सबसे बड़ी ताकत थी I एक एक करके दुर्जन सिंह के सभी हथियार और रणनीति निष्प्रभावी हो रहे थे I बड़े बड़े हाथी और उनपर बैठे भारी-भरकम सिपहसालार यों धाराशायी हो रहे थे जैसे पका हुआ आम पेड़ से टूटकर ज़मीन पर ढह पड़ता है I अंततः सुशाशन कुमार की सेनाओं ने दुर्जन सिंह की महाकाय सेना को परास्त कर दिया I युद्द के हार के कारणों के लिए मंथन समिति बनी I अपने मुख्यालय उल्लाहसपुर में राजकीय आचार्य ने सभी सेनापतियों को तलब किया I समिति के कुछ संवेदनशील सदस्यों का मत था कि सभी चारण, भाट और धर्म के नाम पर मिथ्या प्रचार करने वाले साधु सन्यासियों, तथाकथित धर्म प्रचारकों और गैर सरकारी कोतवालों को चुप रहने का फरमान जारी किया जाये I
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Disclaimer: All the characters of this story are fictitious


नोट: इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं I थोड़ी बहुत समरूपता यदि समकालीन शाशन प्रणाली से है तो यह केवल एक संयोग है I लेखक की इच्छा किसी प्राणी को मानसिक पीड़ा पहुँचाने की बिलकुल नहीं है I लेकिन अपनी अनुभूतियों को मानस पटल पर उतारने के लिए किसी माध्यम की तो आवश्यकता पड़ती है जिसकी कल्पना हमारे आस पास के परिवेश से ही की जा सकती है I मगर 'मासूम' लेखक की मूल भावना कहानी लेखन का अभ्यास करना ही रही है I I
 
Last edited:
प्राचीन भारत के एक शाशक अभिमान सिंह के उत्थान और पतन की कहानी - लेखक 'मासूम ' (Relevant in the present context.)

महाराज अभिमान सिंह के सिंहासन पर आसीन होने के कुछ महीनों पश्चात ही उनकी सलाहकार-मंडली के कुछ पुरोहित, साहूकार और सूबेदारों का छद्म-राष्ट्रवाद (pseudo- nationalism) कुलांचे भरने लगा और अभिमान की ऊंचाइयों को छूने लगा I शायद वे राजसी ठाठ-बाठ और निरंकुशता के आदि नहीं थे I साम्राज्य में सदियों से भूख और दरिद्रता की मार झेल रही रियाया (subjects) आये दिन के अर्थहीन फ़रमानों से भीतर ही भीतर कुढ़ रही थी मगर चुप थी I भयभीत थी क्योंकि शाही कारिंदों की जुबां से निकला हुआ एक एक शब्द राष्ट्रवाद और धर्म का पैगाम था I हालांकि महाराज अभिमान सिंह की शाही मोहर एक भी फरमान पर नहीं होती थी मगर उनकी चुप्पी प्रजा की के लिए किसी शाही मोहर से कम ना थी I कभी बकरी का मांस न खाने का फरमान तो कभी शास्त्रों की दुहाई देकर लहसुन का सेवन वर्जित I लोगों के चूल्हे और रसोई की तलाशियों ने प्रजा के मन में पल रही शंका और आक्रोश की अग्नि को हवा देनी प्रारम्भ कर दी थी I धर्म-भीरु प्रजा को धर्म शास्त्र और कर्म कांड की बातों से बहलाने के प्रयत्न भी विफल होने लगे I एक दो सूबों में प्रजा ने बगावत की और महाराज के सिपहसालारों को शिकस्त देकर आम प्रजा में से ही एक को सूबेदार चुन कर गद्दी नशीन कर दिया था I यह बात और थी कि महाराज की कोतवाली ने उनका शाशन चलाना दूभर कर रखा था और आये दिन किसी न किसी कारिंदे या वज़ीर को हथकड़ी जड़ दी जाती थी I


उधर पाटलीपुत्र रियासत में भी रण-भेरी (bugle) बज चुकी थी I कभी महाराजा अभिमान सिंह के विश्वास पात्र समझे जाने वाले स्थानीय सूबेदार सुशासन कुमार ने भी बहुत पहले बगावत का पैगाम भिजवा कर बड़ी गद्दी को ललकारने का दुस्साहस दिखा दिया था I जंग की तैयारियां हुई I महाराज ने अपने सबसे अधिक निपुण और विश्वशनीय सेनापति दुर्जन सिँह साहूकार को पाटलिपुत्र जीतने का जिम्मा सौंपा I सरकारी ख़ज़ाने के मुंह खोल दिए गए I रियासत के सभी नामी गिरामी सामंतों और साहूकारों ने दिल ख़ोल कर महाराज को युद्ध कोष के लिए माल असबाब दिया I हाथी, घोड़े, रथ, यहाँ तक कि उड़न खटोले भी दिए I सुशाशन कुमार की सेना से अच्छे सिपहसालार तक ख़रीदने की बातें सुनने में आई मगर सबूत कोई नहीं था क्योंकि इस कला में दुर्जन सिंह पारंगत थे I धार्मिक विष में बुझे हुए तीरों का भी प्रयोग बड़े पैमाने पर हुआ I संख्या और बल में सुशाशन कुमार की सेना महाराज की सेना के सामने बहुत ही दुर्बल दिखाई दे रही थी I परन्तु उनका मनोबल और सूबे के प्रति समर्पण ही शायद उनकी सबसे बड़ी ताकत थी I एक एक करके दुर्जन सिंह के सभी हथियार और रणनीति निष्प्रभावी हो रहे थे I बड़े बड़े हाथी और उनपर बैठे भारी-भरकम सिपहसालार यों धाराशायी हो रहे थे जैसे पका हुआ आम पेड़ से टूटकर ज़मीन पर ढह पड़ता है I अंततः सुशाशन कुमार की सेनाओं ने दुर्जन सिंह की महाकाय सेना को परास्त कर दिया I युद्द के हार के कारणों के लिए मंथन समिति बनी I अपने मुख्यालय उल्लाहसपुर में राजकीय आचार्य ने सभी सेनापतियों को तलब किया I समिति के कुछ संवेदनशील सदस्यों का मत था कि सभी चारण, भाट और धर्म के नाम पर मिथ्या प्रचार करने वाले साधु सन्यासियों, तथाकथित धर्म प्रचारकों और गैर सरकारी कोतवालों को चुप रहने का फरमान जारी किया जाये I
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Disclaimer: All the characters of this story are fictitious


नोट: इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं I थोड़ी बहुत समरूपता यदि समकालीन शाशन प्रणाली से है तो यह केवल एक संयोग है I लेखक की इच्छा किसी प्राणी को मानसिक पीड़ा पहुँचाने की बिलकुल नहीं है I लेकिन अपनी अनुभूतियों को मानस पटल पर उतारने के लिए किसी माध्यम की तो आवश्यकता पड़ती है जिसकी कल्पना हमारे आस पास के परिवेश से ही की जा सकती है I मगर 'मासूम' लेखक की मूल भावना कहानी लेखन का अभ्यास करना ही रही है I I
Sir ji, too good!! OMG! Hassa hassa ke maar diya ! Very succinct and crisp reply to pseudo nationalist people. Thanks for such a wonderful post. Appreciate it!!
 
प्राचीन भारत के एक शाशक अभिमान सिंह के उत्थान और पतन की कहानी - लेखक 'मासूम ' (Relevant in the present context.)
I
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Disclaimer: All the characters of this story are fictitious


I

धनखड साहेब ,

उत्तम लेख ! कहीं 'मासूम' की रचनात्मकता पर दुर्जन सिंह और उसके ऑन
लाइन अंधभक्त सिपाहियों की कुद्रष्टि ना पड़ जाए !;)
 
Bihar happens coz all non BJP Alliances got together .

Same could be repeated in UP / Haryana if non bjp alliances got together .

This trial was a success.........

*******Happy Diwali to all of you and your loved ones *************
 
Bihar happens coz all non BJP Alliances got together .

Same could be repeated in UP / Haryana if non bjp alliances got together .

This trial was a success.........

*******Happy Diwali to all of you and your loved ones *************
Such Success will be repeated further! Divide and rule concept won't work for long specially when you have so much media around! BJP vote percentage has been very less in earlier wins. BJP took advantage of division of votes earlier among different parties. So it makes sense if coalition with similar ideologies come together and contest elections. That can defeat divisive forces easily! I am sure it will be repeated in the future elections after successful trial of coalition!
 
Opposition alliance against the ruling party have long history of winning the elections but failing in governance for full time.

Let us hope that Bihar would change it to complete its defined tenure of five years.
 

धनखड साहेब ,

उत्तम लेख ! कहीं 'मासूम' की रचनात्मकता पर दुर्जन सिंह और उसके ऑन
लाइन अंधभक्त सिपाहियों की कुद्रष्टि ना पड़ जाए !;)
Durjan singh and his gang ideologue don't have a sustainable long term vision for their survival. Their politics fundamentals are weak which was exploited by Kezriwal earlier and now by Lalu and Nitish. So such drama gang won't last for long!
 
Opposition alliance against the ruling party have long history of winning the elections but failing in governance for full time.

Let us hope that Bihar would change it to complete its defined tenure of five years.
If thats a case then Nitish and his party should have lost. Generally its anti-incumbency. But opposite happened. Nitish has recorded third constitutive win. That means people are happy with work. And he got awarded another term for his tremendous inclusive development work!
 
During last two constitutive wins, Nitish teamed up with BJP against Lalu and Congress. This time Nitish teamed up with Lalu and Congress against BJP. That's purely politically calculated steps taken by Nitish and proves him a smart politician. The term 'Happy with his work' hardly make any sense otherwise Nitish would have gone alone for the elections instead of making alliances with the parties he was always against.

End of the day, Lalu Yadav emerged out as the biggest winner in this game.
 
During last two constitutive wins, Nitish teamed up with BJP against Lalu and Congress. This time Nitish teamed up with Lalu and Congress against BJP. That's purely politically calculated steps taken by Nitish and proves him a smart politician. The term 'Happy with his work' hardly make any sense otherwise Nitish would have gone alone for the elections instead of making alliances with the parties he was always against.

End of the day, Lalu Yadav emerged out as the biggest winner in this game.

Politics is politics. There is no friend or enemy in politics forever. Around the world that's how it is! BJP does that by allying with parties against which it fought elections before. BJP also tried to play Caste card as well by including Manjhi who fought against BJP in Loksabha elections.

People are certainly happy with Nitish work if one compare Nitish's performance in General elections in 2014. Constituency wise in 2014 General Election, JDU got only 18 seats. But in assembly elections, JDU won 71 seats which is 58 more seats than last elections. That shows how people have restored their faith into Nitish. One the other hand BJP lost majority of its gains it had during Loksabha elections. What does it imply? Within in one and half year, BJP lost so much ground. People have already evaluated BJP's performance and gave their verdict.
 
" failing in governance for full time.

In agreement , abhi ministry ka bantwara .....hisse ka bantwara .....blah blah .....

So far Nitish has clean governance image and for Lalu Gundaraj is back......Good Going Bihar well deserve
 
कई दिनो की मसरूफ़ियत के बाद आज आख़िरकार मैं पूरे दिन खाली रहने वाला था| सोचा आज बगल की लाइब्रेरी में ही झाँक आऊँ| कुछ पल तो सुकून से गुजरेंगे| खैर काफ़ी जद्दोजहद के बाद मैं मोटा चश्मा आँखो पर चढ़ाये हुए लाइब्रेरी में दाखिल हुआ| लेकिन भीतर का नज़ारा तो कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहा था| किंडल फायर और ई-बुक के ज़माने में भी अच्छी ख़ासी तादाद में लोग कुर्सियो पर पसरे हुए थे| मैने संभलते हुए अपनी नज़र चारो तरफ दौड़ाई तो माज़रा समझ आया| दरअसल यह पार्को की मोरल पुलिसिंग से आज़िज़ आ चुके आशिको की भीड़ थी| जिनके लिए लाइब्रेरी मुहब्बत का नया ताजमहल है| शमा-परवानो के इस नज़ारे को देखकर मुझे अपनी किस्मत से रश्क होने लगा|

खैर खिड़की के पास के एक कोने में खाली पड़ी कुर्सी को देखकर में तेज़ी से लपका| कुर्सी पर अपनी तशरीफ़ टिकाते हुए मुझे एहसास हुआ मानो दिल्ली का तख्तोताज मिल गया हो| अब बारी किसी अच्छी सी किताब को ढूँढने की थी| निशानी के तौर पर मैने अपने बस्ता कुर्सी पर रखा और पास की किताबो की कतार में प्रेमचंद को ढूँढने लगा| काफ़ी उथल-पुथल करने के बावज़ूद कुछ भी हाथ ना लगा| शायद प्रेमचंद भी धूल का लबादा ओढकर मुझसे आँख-मिचौली खेल रहे थे| वैसे भी आज तो मैं घर से ही ठानकर आया था क़ि कुछ असल जिंदगी से जुड़ी हुई किताब ही पढ़ूंगा|
मेरी मेहनत यूँ ही ज़ाया नही जाने वाली थी| तमाम कोशिशो के बाद मुझे किसी "नामालूम" की लिखी हुई एक किताब मिली जिस पर सुर्ख लफ्जो में लिखा था "कुटिल कुमार का तरकश"

मैने जिल्द के ऊपर जमी धूल की परतो को झाड़ते हुए फिर से अपनी कुर्सी का रूख़ किया| थोड़ी दूर खड़े छोटू को चाय के लिए बोला तो उसने जैसे अनसुना कर दिया| वो दूसरी टेबल पर ऑर्डर लेने में मसरूफ़ था| मुझे लगा शायद आज मैं ही दुनिया का सबसे ज़्यादा खाली इंसान हूँ| खैर अपने अंदर की कुढन को काबू करते हुए मैने उसे दूर से ही चाय के लिए बोल दिया| टेबल पर रखी किताब के पन्ने पलटने शुरू किए तो लाइब्रेरी के झरोखो से आती सूरज की रोशनी ने किताब के पन्नो में बसी नमी को माहौल में घोल दिया| यह सोंधी सी महक अब जेहन में बसने लगी थी|

अभी तो मैंने एक-आध पन्ने ही पलटे थे कि मुझे एहसास हुआ कि मेरे अगल बगल से गुजरने वाले लोग एक दबी सी हसी के साथ मुझे देखते हुए जा रहे थे|
शायद आजकल के चेतन भगत और अरुंधती रॉय के ज़माने में ऐसी किताब पढने वाला कोई खूसट ही होता है या कोई रिटायर्ड| मैं परवाह न करते हुए और ज्यादा तल्लीनता से किताब के मजमून में गुम हो गया|

“उत्तर भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रो में अब राष्ट्रवाद की भावना जोर पकड़ रही थी| सैकड़ो वर्षो के मुस्लिम आक्रंताओ के बेरहम शासन से त्रस्त प्रजा अब किसी हिंदूवादी राजा को सिंहासन पर देखना चाहती थी| लेकिन कुछ जयचंदों के कारण यह सफल नहीं हो पा रहा था| इन्द्रप्रस्थ का शासन अभी रोळ सिंह के हाथ में था जिसने सिवाय भ्रष्टाचार फैलाने के कुछ नहीं किया था| कहने को तो वह एक हिन्दू था लेकिन उसकी सरपरस्ती मुस्लिमो के साथ थी|

बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा को यह नागवार गुजर रहा था| इस वक्त दो रियासते थी जिन पर सभी की निगाहे टिकी हुई थी| एक सौराष्ट्र और दूसरा मगध| प्रजा चाहती थी कि इन्ही दो रियासतों में से किसी एक का मुखिया इन्द्रप्रस्थ की गद्दी पर बैठे| सौराष्ट्र के सुल्तान मोटा भाई जो एक हिन्दू राष्ट्रवादी थे प्रजा की पहली पसंद थे| वही मगध नरेश कुटिल कुमार भी कम न थे| लेकिंन वह रियासत चलाने के तजुर्बे में मोटा भाई से कही कमतर थे| इन सबके बावजूद कुटिल कुमार की हसरत किसी भी कीमत पर इन्द्रप्रस्थ की गद्दी हथियाने की थी|

मोटा भाई वैसे थोडा जिद्दी थे| शायद इसके लिए वो हालात जिम्मेदार थे जिसमे वो पले-बढ़े| बचपन में घोर गरीबी से गुजरने वाले मोटा भाई किसी वक्त रेहड़ी लगाते थे और छोटा-मोटा सामान बेचकर अपना गुजारा किया करते थे|
इस कठोर बचपन और तंगहाल जिंदगी ने उन्हें हालातो से लड़ना सिखा दिया| अपने बूते उन्होंने राजनीति का ककहरा सीखा और अपनी लगन के बलबूते ही एक दिन सौराष्ट्र के मुखिया चुने गए| अपनी माटी के लिए कुछ करने के जज्बे में उन्होंने घर-बार भी छोड़ दिया| अब बस उनका दिन रात एक ही सपना था कि प्रजा के लिए कुछ किया जाये|

वैसे मोटा भाई हमेशा कुलीनवर्ग कि आँखों कि किरकिरी बने रहते थे| इसकी एक बड़ी वज़ह उनकी साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि और किसी शाही खानदान से जुड़ा न होना था| लेकिन वह इससे बेखबर आम प्रजा का विश्वास जीतने में लगे रहते थे|

वही दूसरी और कुटिल कुमार भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके थे| मगध का शासन उन्होंने मोटा भाई के साथ मिलकर लाल सिंह को हराकर हासिल किया था| वह रियासत की सियासत में काफी वक़्त से सक्रिय थे| और रियासत की सभी जातियों पर उनकी खासी पकड़ थी| लेकिन उनके जेहन में इन्द्रप्रस्थ की गद्दी पर बैठने कि हसरत हर वक़्त अंगडाई लेती रहती थी|

इसी बीच घोषणा हुई कि मोटा भाई के कठिन परिश्रम और अनुभव को देखते हुए रोळ सिंह कि सल्तनत को वही चुनौती देंगे| यह बात कुटिल कुमार के लिए नाकाबिलेबर्दाश्त थी| बरसो की हसरत एक पल में कैसे टूटकर बिखर सकती थी| कुटिल कुमार ने मित्रता को शर्मसार करते हुए मोटा भाई के विरुद्ध खुलेआम बगावत का एलान कर दिया| शायद कुटिल कुमार को इस बात का गुमान था कि बिना उसकी मदद के मोटा भाई इन्द्रप्रस्थ की गद्दी तक नहीं पहुच सकता| मोटा भाई की पीठ में बेवफाई और दगाबाजी का खंजर भौकने के बाद कुटिल कुमार अपनी रियासत में सिमटकर रह गया|

सारे कयासों पर पानी फेरते हुए प्रजा ने भारी समर्थन से मोटा भाई को इन्द्रप्रस्थ की गद्दी पर बैठा दिया| चारो तरफ उल्लास का माहौल था| सिवाय एक रियासत को छोड़कर, मगध|

कुटिल कुमार भी इतनी जल्दी हार नहीं मानने वाला था| मगध की प्रजा की हमदर्दी हासिल करने के लिए उसने एक शातिर चाल चली| उसने जोर-शोर से मगध की गद्दी छोड़ने का एलान कर दिया और एक बेहद ही गरीब और पिछड़े व्यक्ति मीणा सिंह को मगध का नया नरेश नियुक्त कर दिया| कुटिल कुमार की चाल उसे एक प्यादे के तरह इस्तेमाल करने की थी| परदे के पीछे असली शासक वही बने रहना चाहता था| लेकिन उसकी यह कोशिश उलटी पड़ गयी| मोटा भाई के व्यक्तित्व से प्रभावित मीणा सिंह कुटिल कुमार की बिछाई शतरंज का वजीर साबित हुआ| बाज़ी हाथ से निकलते देख कुटिल कुमार ने फ़ौरन मीणा सिंह को बर्खास्त करने का फरमान जारी कर दिया| ऐसे मुश्किल वक्त में मीणा सिंह ने मोटा भाई का दामन थाम लिया और कुटिल कुमार को चुनौती देने कि घोषणा कर दी| उधर कुटिल कुमार ने फिर से खुद गद्दी संभाली और रियासत में नया नरेश चुनने कि प्रक्रिया शुरू करने की रणभेरी बजा दी|

तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच अब यह कुटिल कुमार के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका था| कुटिल कुमार में कुटिलता कूट-कूट कर भरी हुई थी| उसके तरकश में अभी कई तीर थे| आखिर यह कहावत सच होने वाली थी कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है| उसने अपने दूतो के जरिये लाल सिंह और रोळ सिंह के पास अपना सन्देश भिजवा दिया| मोटा भाई को परास्त करने के लिए तीनो मगध में मिल गये| अब मोटा भाई को हराने की रणनीति बनानी शुरू कर दी गयी| लाल सिंह जो अब बूढा हो चला था अपने बेटो के साथ मैदान में उतरा था| वही रोळ सिंह को तो जो मिल जाये वही बहुत था| प्रजा को गुमराह किया जाने लगा| मोटा भाई के लिए नफरत के बीज बोये जाने लगे| उसे बाहरी घोषित कर दिया गया| ऐसी बिसात बिछायी गयी जिसका कोई तोड़ नहीं था|

आखिरकार मोटा भाई तीनो के बनाये चक्रव्यूह को नहीं भेद पाए| रियासत की प्रजा कुटिल कुमार की चाल ना समझ सकी| एक बार फिर कुटिल कुमार को मगध नरेश चुन लिया गया| लेकिन इस बार लाल सिंह की बैशाखी के सहारे जिसे उसके महत्वाकांक्षी पुत्र कभी भी खीच सकते थे|

पूरा मगध एक धूर्त अट्ठाहस से गूँज उठा|”

तभी मुझे छोटू की जोर-जोर से हसने की आवाज सुनाई दी तो मैं किताब से बाहर निकला| उसने टेबल पर रखे चाय के प्याले के तरफ इशारा किया| मैंने देखा तो उसमे चार-पांच मक्खियाँ तैर रही थी|
“साब इतनी देर से टेबल पर रखी हुई है” छोटू बोला| मैंने अपने माथे पर हाथ रखकर पूछा कितने पैसे हुए| “सात रूपये साब” वो बोला|
मैंने दस का नोट उसके हाथ में थमाते हुए वहाँ से रूखसत होने में ही खैरियत समझी| कुर्सी से उठते हुए चाय के प्याले मैं तैरती हुई मक्खियों को देखते हुए ख्याल आया शायद ये भी किसी कुटिल कुमार की बेवफाई से तंग आकर ख़ुदकुशी कर बैठी है|

बाहर निकला तो देखा चारो तरफ दीवाली की धूम है| हर तरफ मिठाई से सजी दुकाने और आतिशबाजी है| एक मिठाई वाले की दुकान पर रूककर पेठे की मिठाई लेने की सोची| दुकानदार को पेठा तौलने के लिए बोलकर बरबस ही मेरे मुंह से निकल पड़ा कि कैसी बिक्री है अबकी बार?
बस ठीक है असली दिवाली तो नितेशे की है हम तो जैसे-तैसे गुजर-बसर कर रहे है| उसके बोलने के अंदाज ने मुझे बता दिया कि यह तो पाटलिपुत्र का बाशिंदा है|
मेरा ध्यान उसकी बातो से ज्यादा तराजू के कांटे पर था| मैं किसी हालत में खतरा मोल नहीं लेना चाहता था| सौ रूपये का नोट उसके हाथ में थमाने लगा तो बोला साब दस का खुल्ला नहीं है| ऐसा करता हूँ कि पचास ग्राम और तौल देता हूँ| मैंने हामीं में सर हिलाया और पैसे देकर वहां से रवाना हुआ|

रास्ते भर आते-जाते लोगो में कुटिल कुमार और मोटा भाई का अक्स देखते रहा| क्या वाकई बुराई पर अच्छाई की जीत होती है| दीवाली की आतिशबाजी से ध्यान भंग हुआ तो देखा कि घर आ चुका है|
 
This is unfortunate for country like India where election main issue is Beef rather than development.
RSS like organisation will always do it. Why not this RSS brings up scientific innovation to the fore. Western world is thriving on innovation and development and poor us who are debating Beef etc here. Thanks to organisation like RSS who are mainly focusing on religion and deviating nation's energy on petty issues. Just a disgrace!
 
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