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godarajaat

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बीकानेर नगर की स्थापना के पीछे एक ताना ही था जिसका जवाब देने के लिए बीकानेर एक राज्य बन गया। इतिहास में उल्लेखित घटना इस बात का प्रमाण है कि एक बार जोधपुर नरेश जोधा सिंह अपने दरबार में बैठे थे। उन्होंने राजकुमार बीका को अपने काका कांधल से कानाफूसी करते और मुस्कराते देखा तो उन्होंने ताना देते हुए कहा कि काका भतीजा दोनों ऐसे मुस्करा रहे हैं जैसे कोई नया गढ़ बसाने जा रहे हों, फिर क्या था राजपूती खून तैश में आ गया और बीका सिंह राजपूती शान से जोधपुर नरेश के सामने गर्व से बोले कि क्या मुश्किल है। बीका तो नया राज बसा के ही दिखायेगा।

नापा सांखला जो पहले जांगल प्रदेश के शासक थे, जिन्हें बलुचियों ने वहां से हटा दिया था वह दरबार में उपस्थित थे, उन्होंने भी व्यंग्य का जवाब दिया- बीका जंगलू जीते। नया प्रदेश जीतने की दृढ़ इच्छा के साथ राव बीका अपने चाचा कांधल और नापा सांखला के साथ 30 सितम्बर 1435 को मारवाड़ से रवाना हुए। इस समय बीका के साथ एक सौ सवार और 500 पैदल सैनिक थे। राव बीका ने अपनी शूर वीरता और साहस से आसपास के जाटों सांखलो और भाटियों को हरा कर इस रेगिस्तानी भू-भाग का काफी क्षेत्र अपने अधिकार में ले लिया। वह देशनोक पहुंचे, वहां करणी माता मंदिर में अपनी श्रध्दा अर्पित की।

कहा जाता है कि बाद में राव बीका अपने काफिले सहित कोडमदेसर गांव पहुंचे। वहां नेरिया जाट अपनी भेड़ बकरियां चरा रहा था। गडरिए को राव बीका ने अपना मंतव्य बताया। गडरिए ने स्पष्ट कहा कि मैं आपको वो स्थान बता सकता हूं जो नए राज्य की स्थापना के लिए बेहतरीन है लेकिन नए राज्य के साथ आपको मेरा नाम भी जोड़ना होगा। राव बीका ने उसकी शर्त मान ली। नेरिया बीका जी के साथ राती घाटी पहुंचा और एक स्थान पर जाकर कहा कि यही वह उपयुक्त स्थल है। गडरिए ने इस पर अपना स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि वह यहां भेड़ बकरियां चराने आया करता है। एक दिन उसके रेवड़ से एक भेड़ बिछुड़ कर यहां रह गई और रात्रि में उसी भेड़ ने इसी स्थान पर एक केर के वृक्ष के पास बच्चे जन्मे, उस रात भेड़ियों ने आक्रमण कर उसके बच्चों को खाना चाहा। परंतु उस भेड़ ने भेड़ियों का सामना इतनी दृढ़ता से किया कि भेड़िए आखिर भाग गये। प्रात: काल गडरिया जब अपनी भेड़ को ढूंढ़ता हुआ यहां पहुंचा तो लहुलूहान भेड़ को अपने बच्चों की सुरक्षा करते हुए पाया। गडरिए ने कहा कि जिस स्थान पर भेड़ जैसे डरपोक जानवर में इतनी शक्ति आ जाए वह स्थान भला राज्य के लिए कैसे उपयुक्त नहीं होगा। यही वो भूमि है। राव बीका ने गडरिए की बात को तुरंत मान लिया और उसी स्थान पर बीकानेर स्थापना के आदेश दे दिए और राज्य के नाम के आगे प्रथम दो अक्षर स्वयं के नाम के और बाद के दो अक्षर नेरिया के नाम से मिलाकर वैसाख मास शुक्ल पक्ष की द्वितीया विक्रम सम्वत 1545 से बीकानेर राज्य की स्थापना हुई। कहा भी जाता है :
पनरे सौ पैतालवे सुद वैसाख सुमेर,
थावर वीच थरपियों बीको बीकानेर।
राव बीका की विक्रम संवत 1561 में मृत्यु के बाद उसके दस बेटों में राव नरू ने बीकानेर की राजगद्दी प्राप्त की। लेकिन अपने पांच महीनों के ही अल्प शासनकाल मे उन्होंने राव बीका की ओर से तलवार की शक्ति से जीती गई भूमि के अनेक भागाें पर अपना अधिकार खो दिया। राजगद्दी प्राप्त होने के पांच माह बाद ही राव नरू का देहान्त हो गया। जब राव नरू का छोटा भाई राव लूणकरण उत्ताराधिकारी बना। लेकिन राज्य के विस्तार की लालसा में नारनोल के नवाब से युध्द की घोषणा कर दी। नारनोल के नवाब की मदद के लिए जैसलमेर राव आए। युध्द के दौरान लूणकरण वीर गति को प्राप्त हुआ। 1570 ई. में राज्य की उभरती साम्राज्यवादी मुगल शक्ति के साथ संधि हुई। मुगल शक्ति के सरंक्षण में यहां के शासकों ने विशेषकर राजा रामसिंह ने न केवल विद्रोही सामन्तों की शक्ति को कुचला बल्कि अधीनस्थ शक्तियों का भी पूरी तरह से दमन किया। उस काल में न केवल रामसिंह ने नए दुर्ग का निर्माण किया बल्कि साहित्य और कला के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। रामसिंह की ओर से सम्वत 1630 में बनाया गया मैदानी दुर्ग जूनागढ़ आज भी अपनी शान शौकत से अतीत की कहानी कह रहा है। बीकानेर एक अर्से से इस क्षेत्र की रियासतों में अग्रणी रहा है।



यहां के महाराजा चाहे वह डूंगरसिंह रहे हों या गंगासिंह या फिर सार्दुलसिंह सभी ने इस रियासत को सजाने, संवारने एवं प्रभावशाली रियासत बनाने का हर सम्भव प्रयास किया। बीकानेर में महाराजा गंगासिंह का शासनकाल स्वर्णकाल माना गया। उनके अथक प्रयासों से बीकानेर में नए युग का सूत्रपात हुआ। गंगासिंह एक कुशल प्रशासक और श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ थे, उनके अथक प्रयासो से बीकानेर विश्व के मानचित्र पर आ गया। उन्होंने न केवल इम्पीरियल बार कान्फ्रेंस और पेरिस शांति सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया बल्कि राष्ट्र संघ में उनकी जोरदार अपील के नतीजतन भारत को स्थान मिला। बीकानेर स्थापना दिवस को बीकानेर वासी बड़े धूमधाम से मनाते हैं। राव बीकाजी संस्थान और जिला प्रशासन की ओर से संयुक्त रूप से राव बीकाजी की टेकरी पर उनके मल्लयार्पण के साथ रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं।
बीकानेर के ही एक वासी विश्वविद्यालय रोजगार सूचना एवं मार्गदर्शन केन्द्र के कलाकार नगेन्द्र किराडूकहते हैं बीकानेर स्थापना दिवस की खुशी में इस दिन घर की छतों पर जबदरस्त पंतगबाजी होती है। एक तरह से मानो तो आखाबीज व आखातीज को पूरा बीकानेर ‘आसमा’ या यूं कहें कि घर की छतों पर होता है। दौराने इस घर-घर में खीचड़ा बनाया जाता है और इमली का पानी ‘इम्लानी’ खाकर-पीकर खुशी का इजहार किया जाता है।
 
Bikaner

The story regarding the founding of the kingdom of Bikaner related above underlines the role of an ordinary Jat Neria in the effort. But history is witness to the utter neglect of ordinary farmers surrounding the city in all walks of life. Even in indepenant India the crass backwardness, especially in the field of education for the girl child continued to stimise the simple folk of rural areas. Affordable quality education has been a long felt need. The Surajmal Memorial Education Society, under the enlightened leadership of Shri Ram Niwas Mirdha, rose to the occasion and ecided a couple of yeas back to set up a senior secondary school in Bikaner. The effort came to fruition in early 2009. Maharani Kishori Devi Public School has started functioning in a state of the art four storey building of its own (with a cost of nearly four crores) has already started functioning w.e.fthe current session2009-10. Pans for construction of a hostel are under way.Girls from the rural areas will have better acces to education.
 
:)
Thanks for writing such an imformative article.

Does anybody know that why Bikaner Mishthan Bhandar is so famous and is found in many places other than rajasthan?
 
:)
Thanks for writing such an imformative article.

Does anybody know that why Bikaner Mishthan Bhandar is so famous and is found in many places other than rajasthan?

Cum'on dear,.................though the information shared above is very interesting but there is no specific reason for opening Bikaner Misthan Bhandar in different regions of the country. It is just like we find Haldiram after few miles because of its speciality, standard or quality.
 
कहा जाता है कि बाद में राव बीका अपने काफिले सहित कोडमदेसर गांव पहुंचे। वहां नेरिया जाट अपनी भेड़ बकरियां चरा रहा था। गडरिए को राव बीका ने अपना मंतव्य बताया। गडरिए ने स्पष्ट कहा कि मैं आपको वो स्थान बता सकता हूं जो नए राज्य की स्थापना के लिए बेहतरीन है लेकिन नए राज्य के साथ आपको मेरा नाम भी जोड़ना होगा। राव बीका ने उसकी शर्त मान ली। नेरिया बीका जी के साथ राती घाटी पहुंचा और एक स्थान पर जाकर कहा कि यही वह उपयुक्त स्थल है।
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सुभाष जी आपने अच्छी जानकारी दी है परन्तु नेहरा जाट को आप ने नेरिया जाट कहके छोटा करने की कोशिश की है. जब हम खुद ही छोटे नाम से लिखेंगे तो सामंत तो इससे भी छोटा कर देते. उनका क्या दोष था. इस सम्बन्ध में अपने पास जेम्स टोड की किताब जाट लैंड विकी पर है वह यहाँ देख सकते हैं. उसने नेहरा जाट का सम्मान से उल्लेख किया है.


http://www.jatland.com/home/Tod

ANNALS OF BlKANER Page 141 - "Moreover, the spot which he selected for his capital, was the birthright of a Jit, who would only concede it for this purpose on the condition that his name should be linked in perpetuity with its surrender. Naira, or Nera, was the name of the proprietor, which Beeka added to his own, thus composing that of the future capital, Bikaner."

Regards,
 
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धन्यवाद सुभाष जी
यहाँ अपन इतिहास की गलती सुधारने का ही काम कर रहे हैं. आगे से कहीं नेहरिया लिखा मिले तो भी नेहरा लिखलें.
 
bikaner ke 'rasgule'- 'bhujiya- namkin is very tasty .... people is following t name bikaner...... . . .

:)
Thanks for writing such an imformative article.

Does anybody know that why Bikaner Mishthan Bhandar is so famous and is found in many places other than rajasthan?
 
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