Central Zamindars’ Association, Punjab

raka

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सौ साल में क्या बदला है?

एक सदी पुरानी यह तस्वीरऔर इस तस्वीर के पीछे का इतिहास आम जाट (हिंदू, सिख) को शायद ही पता होगा। ये हमारे वो जाट बुजुर्ग थे, जिन्होने जाट कौम के भविष्य की बुनियाद रखी थी। गौरतलब बात ये है कि तब जब ये हिंदू सिख जाट एक हुए थे, तब भी बहुतों को मिर्ची लगी थी, जैसे अब भी किसान आंदोलन के बाद से बहुतों को मिर्ची लग रही है। अफसोस ये है कि अब हमारे कुछ मूरख भी विरोधियों के साथ शामिल हो रखें हैं। तब जब यह संगठन बना था और ये हमारे बुजुर्ग दिल्ली में वायसराय से मिलकर आए थे, तब लायल गजट के संपादक को बड़ी मिर्ची लगी थी। संपादक कौन था, वह पूरी पोस्ट पढ़ेंगे तो समझ आ जाएगा। इस लायल गजट के संपादक ने हिंदू सिख जाट एकता को तोड़ने के लिए लेख लिखे और लेखों में उसने सिख जाटों को टार्गेट किया, सिख जाटों को अनपढ़ बताने की शरारत की। सिख जाटों के पक्ष में और लायल गजट के संपादक की इस शरारत का जवाब चौधरी छोटूराम ने "जाट गजट" में दो लेखों (1.जाट गजट, 18 दिसम्बर 1917, मंगलवार, पृ. 7) (2.जाट गजट, 25 दिसम्बर 1917, मंगलवार, पृ. 7) के जरिए दिया था। चौधरी छोटूराम का यह लेख पढ़कर बताएं कि सौ सालों में क्या बदला है? और हमने इतिहास से क्या सबक लिया है?

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लायल गजट का फिर भाऊ भड़का
मैं 'जाट गजट' के पिछले दो अंकों में 'लायल गजट' के पहले नोट का जिसमें उसने माननीय चौधरी लालचन्द और उनके दोस्तों पर आक्रमण किया था, का पूरा उत्तर दे चुका हूं। आज मैं ‘लायल गजट' का दूसरे नोट "हमारी फूट से लाभ उठाने का प्रयास'' के पहले भाग का उत्तर दूंगा। उस नोट के आरम्भ में लायल गजट लिखता है : "देव समाजी और आर्य समाजी जाट इस सोच में हैं कि जाट सिखों को सिखों से अलग करके हिन्दू जाट बना दिया जाए।" इस वाक्य से 'लायल गजट' की नीति का पता लगता है और इसी से उसकी सच्चाई का भी अनुमान लगाया जा सकता है।

'लायल गजट' की नीति की आलोचना
देव समाजी, आर्यसमाजी तथा जाट सिखों व सिखों पर गैर-जिम्मेदाराना बयान प्रथम तो चौधरी लालचन्द देव समाजी नहीं और अगर बहस करने के लिए मान भी लिया जाए कि वह देव समाजी हैं तो इस दिमाग के पुतले से कोई यह पूछे कि अगर सिख जाट दूसरे सिखों से अलग होकर हिन्दू जाट बन जाएं तो देव समाजी और आर्यसमाजी जाटों को भला क्या लाभ होगा? मगर दिमाग से पैदल होने में 'लायल गजट' का स्टाफ नमूना है। इस अक्ल के ठेकरे को इतना ढंग कहां कि यह अनुमान कर सके कि जो कुछ उसकी कलम से निकल रहा है, विवाद वाले विषय से उसका कोई सम्बन्ध है या नहीं। इसके विरोधी कौमीयत के आधार पर सिख और हिन्दू जाटों की एकता की बात करते हैं। इसका तो साहब के पास कोई उत्तर नहीं है, फौरन धर्म का सहारा लिया और बेकार की हांकने लगे। पहले तो अपने विरोधियों पर धार्मिक आदेशों की योजनाओं के इरादों का इल्जाम लगाया। मगर इस इरादे ने एक तो देव समाजी स्वयं के ही कथनानुसार और दूसरे सिख जाट को एक कर दिया। कोई दिमाग का अन्धा ही ऐसा कह सकता है कि धर्म को फैलाने की खातिर देव समाजी और आर्यसमाजी एक हो सके। देव समाजी और आर्यसमाजी जाटों का लक्ष्य क्या है ? जाट सिखों को सिखों से अलग करके एक बनाया जाए। इन बातों पर सोचने के बाद यही कहना पड़ रहा है कि अगर आज अरस्तु और प्लेटो जिन्दा होते तो लायल गजट के चेला बनने के लिए उसके कार्यालय में खड़े होते। उसके आगे वाले वाक्य में इस बे- अकली ने क्या लिखा है, "जाट पंजाब में आठ-दस लाख के आसपास हैं और उनकी एक-दो पलटनें हैं, लेकिन अगर जाट सिखों को सिखों से अलग करके जाट बना लें तो एक तो सिखों की एकता भंग होगी और सिख धर्म के जिस खतरे से हिन्दू धर्म को मुकाबला करना पड़ रहा है, उससे छुटकारा मिल जाएगा। दूसरे आर्यसमाजी जाटों की संख्या में वृद्धि हो जाएगी और वह इस वृद्धि का लाभ खुद उठाएंगे।" पाठकों को याद रहे कि पंजाब में हिन्दू जाटों की संख्या लगभग बारह लाख है मगर 'लायल गजट' केवल आठ-दस लाख बतला रहा है।

'लायल गजट' को तथ्यों की पूरी जानकारी नहीं
बाकी कहां गए मैं तो उत्तर में ही कह सकता हूं कि शायद 'लायल गजट' के बद दिमागी की गुफा में उतर गए होंगे। संभव है कि 'लायल गजट' यह बहाना करे कि उसे जानकारी नहीं और कोई अजब नहीं कि 'लायल गजट' की अज्ञानता का समुद्र बहुत बड़ा है। हिन्दू जाटों की पलटनों को भी 'लायल गजट' एक-दो ही बताता है, उसकी यह गलती क्षमा योग्य है। अगर कोई अरोड़ा तलवार की काट के बारे में बातचीत करने की हिम्मत करे तो उससे बकवास बातों के अलावा और क्या आशा की जा सकती है। 'लायल गजट' को फौजी मामलों की जानकारी कैसी और उनके साथ नक सान उनका क्या काम ?
मण्डी, लेन-देन, नमक, मिर्च, हल्दी, मसाला आदि चीजों के बारे में तो उसकी जानकारी कमाल की है और इसी तरह की जानकारी की आशा भी उससे की जा सकती है। मगर पलटन, रिसाला, तोपखाना आदि के बारे में जानकारी वह नहीं रख सकता। एक-दो पलटनों को कहने में भी 'लायल गजट' का कलेजा निकल गया होगा। फिर भी मैं 'लायल गजट' की जानकारी के लिए उन पलटनों का नाम लिखता
हूं जिनमें से कई जाटों की हैं और बाकियों में आधा या उससे ज्यादा है:
1. दिल्ली रेजीमेन्ट
3.1/10 जाट
2. 1/12 पायोनीयर
3. 35 सिख
4. 47 सिख
5. 1/76 पंजाबी
6. 5 जाट लाइट इन्फेन्ट्री
7. 2/10 जाट
8. 3/12 पायोनियर
9. 36 सिख
10. 40 पायोनियर
11. 82 पंजाबी
12. 2/76 पंजाबी
13. 94 इन्फैन्ट्री
14. 96 इन्फैन्ट्री
15. 87 पंजाबी
16. 97 इन्फैन्ट्री
17. 99 इन्फैन्ट्री
18. 104 ग्रीनेडर
19. 106 हजारा
20. 104 इन्फैन्ट्री
21. 1/112 इन्फैन्ट्री
22. 1/113 इन्फैन्ट्री
23. 121 पायोनिर
24. 2/123 पायोनिर
25. 2/112 इन्फैन्ट्री
26. 2/113 इन्फैन्ट्री
27. 1/123 पायोनियर
28. 125 पायोनियर
29. 107 इन्फैन्ट्री

'लायल गजट' की रिपोर्ट की कॉपी रखने की नसीहत
इसी तरह से रिसाला 14 हिन्दू जाटों का है और रिसालों में 2,3,4,5,6,7,8,15, 16,20,26,27,28,29,30,31,32,33 में जाटों का अनुपात लगभग आधा या 1/4 है मगर इस समय अपने अनुपात से कहीं ज्यादा भर्ती हैं, पलटन और रिसालों पर मैंने ऊपर जो कुछ भी लिखा है केवल अपनी जानकारी से लिखा है। संभव है कि कुछ पलटने या रिसाले ऐसे हों जिनमें हिन्दू जाट भर्ती हैं लेकिन मेरी जानकारी में न हो मगर उपरोक्त रेजीमेन्टों के अन्दर जाटों की मौजूदगी में कोई संदेह नहीं। मैं 'लायल गजट' को सलाह दूंगा कि उपरोक्त रिपोर्ट की एक कॉपी अपने दफ्तर में रख लें ताकि उसको आगे काम आ सके और उससे ऐसी बेहूदा गलती दोबारा न हो ।

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लालचंद और साथियों पर लगाए आरोप निराधार
जाट सिखों को सिखों से अलग करके सिख कौमीयत की एकता बिखरने और सिख जाटों को देव समाजी और आर्यसमाजी या हिन्दू जाट बनाने का जो इल्जाम माननीय चौधरी लालचन्द और उनके साथियों पर लगाया गया है उस सिलसिले में 'लायल गजट' को भरोसा दिलाता हूं कि इस आन्दोलन का धर्म की तरफ बिलकुल ध्यान नहीं है।

इस आन्दोलन का केवल एक उद्देश्य है कि हर जाट कौमीयत के मामले में पक्का जाट हो चाहे वह धर्म के हिसाब से सिख हो, सनातनी हो, आर्यसमाजी हो, देव समाजी हो या कोई और समाजी हो। जाट-जाटों के उद्देश्य, लाभ जिन पर उनकी आगे की उन्नति, खुशहाली और हर तरह की उन्नति निर्भर है, एकदम एक है। तमाम जाटों के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक लाभ धर्म की मान्यताओं से परे एक हैं। जो चीज सिख जाटों के लिए लाभकारी है वह हिन्दू जाटों के लिए भी लाभकारी है, जो चीज सिख जाटों के लिए हानिकारक है वह चीज हिन्दू जाटों के लिए भी हानिकारक है और जो चीज कारोबारी सिखों के लिए लाभकारी है वह चीज जाट सिखों के लिए जहर के बराबर है और जो चीज कारोबारी सिखों के लिए हानिकारक है वह चीज जाट सिखों के लिए लाभकारी है। इस सम्बन्ध में केवल तीन चीजों का उदाहरण दूंगा। (1) लैंड ट्रान्सफर एक्ट (2) सूदखोरी का कानून (3) जमींदारी बैंक। इसी तरज पर जिस चीज से गैर जाट हिन्दुओं को अधिक लाभ हो सकता है, उससे हिन्दू जाटों की बहुत हानि है और जिस चीज से गैर जाट हिन्दूओं को हानि पहुंचेगी उस चीज से हिन्दू जाटों को लाभ पहुंचेगा।

धर्म को कौमी मामले से अलग रखा जाए
हिन्दू धर्म को सिख धर्म के किस खतरे से मुकाबला होना है इसमें मैं बिलकुल अनजान हूं और अगर कोई खतरा है तो मैं उसको कोई खतरा नहीं मानता और न मैं उससे बचने की कोई जरूरत समझता हूं। मैं सिख और हिन्दू जाट में कोई भेदभाव नहीं करता और न सिख और समाजी जाट के बीच किसी तरह के भेदभाव की आवश्यकता समझता हूं। इस मामले में धर्म मेरे सोचने के दायरे से बाहर है। धर्म का कौमी मामले में कोई रोल नहीं होना चाहिए। धर्म का नाता ईमान से है और हर इंसान अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं रखता हुआ कौमी उन्नति में बिना रोक-टोक और अपने धार्मिक मान्यताओं को कमजोरी पहुंचाए बिना भी भाग ले सकता है।

आर्यसमाजी जाटों की संख्या में वृद्धि होने और इस वृद्धि का स्वयं लाभ उठाने की तरफ जो इशारा 'लायल गजट' ने किया है उसका कोई अर्थ नहीं है। जब एक आन्दोलन धार्मिक मामलों को अपने कार्य क्षेत्र से बाहर समझता है और कौम की शैक्षणिक, आर्थिक, राजनीतिक और अल्प राजनीतिक उन्नति की तरफ अपना ध्यान सीमित करता है तो उसको आर्यसमाज के बढ़ने या घटने से क्या वास्ता ? वह आन्दोलन अपने काम से न आर्य को बढ़ा सकता है न घटा सकता है। इसलिए आर्यसमाजियों के बढ़ने और उनकी बढ़ी हुई संख्या से लाभ उठाने का प्रश्न ही नहीं उठता और यह इशारा 'लायल गजट' का केवल एक चाल है जिससे वह पुराने जमाने में लट्टू और हव्वा का काम लेता रहा है।

2. लायल गजट का फिर भाऊ भड़का'
मैं 'लायल गजट' के उस हमले का जो उसने अपने 18 नवम्बर 1917 के अंक में माननीय चौधरी लालचन्द और उनके साथियों पर इस स्वार्थ से किया था कि सिख और हिन्दू जाटों के प्राकृतिक और अत्यधिक आवश्यक एकता के रास्ते में रुकावटें पैदा की जाए। तीन लेखों में पहले ही उत्तर दे चुका हूं। आज यह चौथा लेख है जो उसी उत्तर का एक भाग है और ‘जाट गजट' के पाठकों के निष्पक्ष और न्यायपूर्ण फैसले के लिए उनके सामने रख रहा हूं। सिख और हिन्दू जाटों के प्रतिनिधिमंडल और उसकी बनावट के बारे में लायल गजट लिखता है कि "इस प्रतिनिधिमंडल के सिख सदस्य तो केवल सरदार खड़क सिंह या शायद कोई एक आध और अंग्रेजी नहीं जानते और सिवाए इसके कि मान्टेगो के दर्शन कर आए और कुछ न कर सकेंगे, लेकिन आर्यसमाजी और देवसमाजी प्रतिनिधिमंडल के सदस्य पढ़े-लिखे हैं और वही बातचीत करेंगे।"

सिख और हिन्दू जाटों के प्रति लायल गजट की धारणा
'लायल गजट' का कहना बिलकुल गलत है। सरदार खड़क सिंह सरदार संपूर्ण सिंह, सरदार हरबख्श सिंह, सरदार झन्डा सिंह और सरदार दुसवन्धा, जिनकी अंग्रेजी पर तो शायद 'लायल गजट' भी शक करने की हिम्मत न कर सकेगा। इसके अतिरिक्त सरदार बिशन सिंह साहब एक अंग्रेजी हाई स्कूल (खालसा हाई स्कूल लायलपुर) के सचिव हैं। सरदार बसन्त सिंह साहब माझा खालसा दीवान के अध्यक्ष हैं। सरदार बहादुर सरदार कृपाल सिंह साहब एक नम्बर के ऑनरेरी मजिस्ट्रेट हैं, राय बहादुर सरदार पालसिंह साहब का भाषण सुनने का अवसर अगर 'लायल गजट' को नसीब हो तो अपनी हठधर्मी के बावजूद शायद वह उनकी योग्यता का लोहा मानने के लिए तैयार हो। ऑनरेरी कप्तान सरदार बहादुर भगवन्त सिंह साहब की मामलों की समझ और प्राकृतिक गुणों के सामने शायद 'लायल गजट' और उसके सहकर्मी सबसे पहले मान चुके होंगे। ऑनरेरी कप्तान गुरुदत्त सिंह और ऑनरेरी कप्तान शेरसिंह को अंग्रेजी भाषा में माहिर होने का दावा नहीं कर सकते फिर भी उनका सामान्य ज्ञान और अपनी मातृ भाषा पर महारत बहुत तगड़ी थी। सरदार साहब सरदार किशन सिंह, सरदार धर्म सिंह साहब, सरदार बेला सिंह साहब और सरदार अमर सिंह साहब की आम समझ जिससे लायल गजट अभी तक अन्जाना मालूम पड़ता है और उनकी उर्दू और गुरमुखी की जानकारी जिन्दगी की तमाम आवश्यकताओं के लिए काफी है हमारे माननीय उपाध्यक्ष ऑनरेरी कप्तान सरदार बहादुर सरदार...

'लायल गजट' को सिख विद्वानों की योग्यता की सही जानकारी नहीं
जन्मजेय सिंह साहब का नाम प्राय: 'लायल गजट' के लिए तकलीफ पैदा करता रहा है। ऑनरेरी मजिस्ट्रेट और सिविल जज हैं और यह अवार्ड ऐसे नहीं है जो पूरी योग्यता के बिना प्राप्त हो सके और अगर महीने में एक बार 'लायल गजट' उनसे उर्दू और गुरमुखी में सबक ले लिया करे तो शायद वह उनकी योग्यता का ठीक तरीके से अनुमान लगा सकेगा। इसके अलावा अगर कोई समूह अंग्रेजी भाषा में अच्छी पकड़ न रखता हो तो क्या अपने अधिकारी के सामने अपनी बात कहने से वंचित हो जाता है ? अगर किसी कौम में ग्रेजुएट काफी संख्या में मौजूद नहीं तो क्या उसका अधिकार नहीं रह जाता कि वह अपने अधिकारों के प्रति अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को जाहिर कर सके। अगर किसी समुदाय के अन्दर अंग्रेजी पढ़े हुए लोगों की कमी हो और अधिकारी खुद उनकी भाषा को ठीक से न जानता हो तो क्या उनको अधिकारी की भाषा में अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अधिकार हासिल नहीं। अगर उन लोगों के लिए जो अंग्रेजी भाषा में पर्याप्त योग्यता नहीं रखते प्रतिनिधिमंडल ले जाना या प्रतिनिधिमंडल के अन्दर शामिल होना गुनाह है तो चीफ खालसा दीवान के प्रतिनिधिमंडल के प्रबन्धकों ने कसान भगवंत सिंह साहब और एक सेवानिवृत फौजी अधिकारी को अपने में शामिल करने की गलती क्यों की थी। हम तो अपनी कौम के फौजी अधिकारियों को चाहे वह अंग्रेजी भाषा को न जानते हों. अपना दायां हाथ समझते हैं। हमारे लिए गौरवशाली हैं और वह हमारी शक्ति के असली खजाना है, जहां कहीं हमारी कौम पहुंच सकती है वह हमेशा हमारी कौम के प्रतिनिधियों की पहली पंक्ति में होंगे।

जाटों के साथ हो रहा है अन्याय
हम इस तरह के पाप बिलकुल नहीं कर सकते कि जो लोग हमारे गौरव, हमारी अहमियत के खजाना हों, जिनके बलिदान हमारी गुजरी हुई हशमत (शानो-शौकत), वर्तमान का गौरव और भविष्य को ठीक करने का सबसे बड़ा साधन हो और जिनकी बहादुरियों और कुर्बानियों पर अपने-अपने भाषण के अन्दर तो गर्व करें और अपने राजनीतिक अधिकारों और [दुआबी] का बुनियादी पत्थर बनावें, लेकिन केवल अंग्रेजी न जानने के कारण दूसरे प्रतिनिधिमंडल की लिस्ट से इनको बाहर रखकर इनकी बेईज्जती करें। इसी तरह से हम अपने रईस और जमींदार भाइयों को जो अपनी कौम की भलाई में जिज्ञासा रखते हों और उसके लिए कुर्बानी कर रहे हों और करने के लिए तैयार हों, सच्चे दिल से गर्व योग्य समझते हैं और भले ही वह अंग्रेजी भाषा में महारत न रखते हों, फिर भी उन अंग्रेजी भाषा के माहिरों से अच्छे हैं वे जो पूरी निर्लज्जता के साथ एक समूह की कुर्बानियों से लाभ उठाना तो चाहते है, मगर इस समूह का आदर करने के लिए तैयार नहीं। क्या हिन्दू, क्या सिख दोनों ही जगहों पर जाटों के साथ एक अजीब तरह का अन्याय हो रहा है, जनसंख्या गणना के उद्देश्य के लिए हिन्दू जाट हिन्दू हैं और सिख जाट सिख हैं जब कभी वफादारी वाली सेवा की तरफ इशारा करने की आवश्यकता पड़ती है तब तो आम हिन्दू और आम सिख दोनों ही जाटों को अपनी तरफ शामिल करने के लिए चिन्तन करते दिखाई पड़ते हैं, जहां कहीं, जहां कभी अपनी उपयोगिता और गौरव दिखाने की आवश्यकता होती है, आम सिख और आम हिन्दू जाटों के बलिदानों का फोटो खूबसूरत तरीके से दिखाने के लिए तैयार हैं मगर उनका मामूली बर्ताव हमारे साथ बिलकुल अलग विचारों को दिखलाता है । रोजमर्रा की बातचीत में जाट गंवार और देहाती है और उनके बहादुराना गुणों और भोलीभाली आदतें, हमारे अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भाइयों के दिलों में केवल हीनता और तुच्छता के अलावा कोई और भावना पैदा नहीं करतीं। उसी समय धर्म की एकता और उससे जन्म लेने वाली हमदर्दी मिट जाती है और सिख और हिन्दू होने के बजाए, केवल जाट रह जाते हैं। सिखी और हिन्दुत्त्व की एकता के अन्दर इस समय जाटों का कोई स्थान नहीं। यह हालात देखकर हैरानी होती है कि इस एकता के टांके भी अजीब है और कैसी हैरान कर देने वाली सोच के साथ लगाए गए हैं।

बिना जानकारी के अस्पष्ट वाक्य लिखा
'लायल गजट' का यह कहना है कि जो आर्यसमाजी और देव समाजी प्रतिनिधि मंडल के सदस्य पढ़े-लिखे है और वही बातचीत करेंगे, बताता है कि न उसको कुछ जानकारी है और न वह सच्चाई पर टिकने वाला है, हिन्दू जाटों में से तो देवसमाजी तो कोई था ही नहीं। मैं केवल जरूर आर्यसमाजी हूं और शायद चौधरी वंश गौपाल भी आर्यसमाजी या आधा आर्यसमाजी हों। मगर 'लायल गजट' ने बिना खोजबीन के और बिना जानकारी के एक ऐसा वाक्या अस्पष्ट लिख दिया जिससे यह मतलब निकले कि हिन्दू जाट बिना धार्मिक मान्यताओं के सब के सब आर्यसमाजी या देव समाजी थे। शिक्षा के हिसाब से भी जहां तक मेरा ख्याल है सिख जाटों को ही वरीयता प्राप्त थी, लेकिन चूंकि 'लायल गजट' एक खास इरादे और एक खास उद्देश्य से तमाम हिन्दू जाटों को आर्य समाजी या देव समाजी और ज्यादा पढ़ा लिखा दिखाना चाहता था इसलिए सच्चाई और अच्छाई के विरुद्ध जंग छेड़ कर झूठ और गलत के साथ दोस्ती की और मनमानी हांकने लगा, बातचीत करने वालों के प्रति 'लायल गजट' को कहां से पता चला और किस देवता की तरफ से आकाशवाणी हुई, मैं नहीं कह सकता, लेकिन इतना भरोसे के साथ कह सकता हूं कि इसकी जानकारी गलत थी और उसकी आकाशवाणी असत्य थी।

(Sir Chhoturam writings and speeches, Vol–IV, p–9)1002093632.jpg
 
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