One more chamar kissa
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अपने ही गाँव का एक किस्सा याद आ गया । अब तो ये भोले-भाले चमार कम ही रह गए हैं । एक चमार हुआ करता था जिसका नाम था ’तिप्पन’ । गर्मी के दिन थे, रात को अपनी मूंज की चारपाई पर लेटा था, हल्की सी गुदड़ी बिछा रखी थी । खटमलों ने उसे सोने न दिया । गुस्से में आकर बोला "अळ सुसळो, आज के तै तुम नहीं, या मैं" । और अपनी गुदड़ी जमीन पर रखकर उसको आग लगा दी । सारे गांव को यह खबर लग गई और आज भी गांव वाले चटकारी लेकर यह कहते हैं:
"तिप्पन चमार तेरी गूदड़ी जळै"
"अळ के करूं किसान मेरै जूं सी लड़ैं"
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अपने ही गाँव का एक किस्सा याद आ गया । अब तो ये भोले-भाले चमार कम ही रह गए हैं । एक चमार हुआ करता था जिसका नाम था ’तिप्पन’ । गर्मी के दिन थे, रात को अपनी मूंज की चारपाई पर लेटा था, हल्की सी गुदड़ी बिछा रखी थी । खटमलों ने उसे सोने न दिया । गुस्से में आकर बोला "अळ सुसळो, आज के तै तुम नहीं, या मैं" । और अपनी गुदड़ी जमीन पर रखकर उसको आग लगा दी । सारे गांव को यह खबर लग गई और आज भी गांव वाले चटकारी लेकर यह कहते हैं:
"तिप्पन चमार तेरी गूदड़ी जळै"
"अळ के करूं किसान मेरै जूं सी लड़ैं"
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