Christian net in India
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दिल्ली के आस-पास के देहातों में ईसाई मिशनरियों ने बहुत पहले ही जाल बिछाया था । सन् 1920 के आसपास ही उन्होंने हरिजन और दूसरे गरीब तबके के लोगों को ईसाइयत में दीक्षित किया । सन् 1931 की जनगणना में नरेला क्षेत्र के 33 गांवों में 10 हजार लोगों ने अपने आपको ईसाई लिखवाया था । मुखमेलपुर जैसे छोटे गांवों में भी अनेक लोग ईसाई बन गये थे । वहां एक मिट्टी का गिरजाघर भी बनाया था । यहां के अनेक गांवों की यही हालत थी परन्तु आचार्य भगवान देव, जो उन दिनों नरेला में ही कार्यशील थे, ने इतनी मेहनत की कि 1941 की जनगणना में इस पूरे क्षेत्र में एक भी आदमी ने अपने आपको ईसाई नहीं लिखवाया । यह सब ब्रह्मचारी भगवान देव (जो बाद में ओमानन्द सरस्वती बने) के ही कार्य का प्रताप था । चौ. हीरासिंह भू.पू. कार्यकारी पार्षद आदि प्रमुख व्यक्तियों ने इस दिशा में बड़ा भारी कार्य किया । उन्होंने तो पूरी अंग्रेजी सरकार से भी टक्कर ली । अगर ये जाट नेता इतना कुछ न करते तो दिल्ली देहात में आधे लोग आज ईसाई होते ।
ईसाइयत को बढ़ाने के लिये मिशनरियां पाखंड और झूठ का सहारा लेने से नहीं हिचकती । उड़ीसा के आदिवासी इलाके में एक पादरी पहुंचा, एक बस्ती के लोगों में कुछ कपड़े आदि बांटे और लोगों को इकट्ठा करके चमत्कार दिखाने लगा । पत्थर की एक छोटी सी कृष्ण भगवान की मूर्ति को लोगों को दिखाकर बोला - देखो, यह है तुम्हारा भगवान । फिर उस मूर्ति को पानी पर छोड़ा तो वह डूब गई । फिर उसने एक लकड़ी का क्रास निकाला जो दूर से देखने पर पत्थर का दिखाई पड़ता था । बोला - "देखो, यह है हमारा ईशामसीह ।" उस क्रास को पानी पर छोड़ा तो वह तैरने लगा । पादरी फिर बोला - "देखो, तुम्हारा भगवान तो पानी में डूब गया और हमारा तैर रहा है ।" पुराने माडल के हाथ से घुमाने वाले ग्रामोफोन रिकार्ड भी आदिवासियों में बांटे गये हैं । चलाने पर उनमें से आवाज आती है - "भय त्याग दो, ईसा तुम्हें पुकार रहा है ।" आस-पास बैठकर सुनने वाले भोले-भाले आदिवासियों को यह आवाज एक "आकाशवाणी" की तरह लगती है और वे इसके भय से ईसाईकरण के चंगुल में फंस जाते हैं ।
अंग्रेजी राज्य में 1877 में भयंकर अकाल पड़ा । अकेले मद्रास प्रान्त में भूख से बिलखते 14000 बच्चों को ईसाई बनाया गया । उस इलाके में यह खेल आज भी जारी है । सन् 2005 में मदुरई के समुद्री इलाके में सुनामी तूफान आया । वहां के तूफान पीड़ित लोगों को उस वक्त आश्चर्य हुआ जब राहत सामग्री लेकर पहुंचे ईसाई मत प्रचारकों ने उनसे पहले ईसाइयत में दीक्षित होने की शर्त रखी ।
झारखंड, उड़ीसा, और आसाम आदि के इलाकों की बात छोड़ो - दिल्ली में ही यह खेल चालू है । नई दिल्ली के इलाके में ठीक संसद भवन के सामने गुरुद्वारा रकाब गंज रोड के गोल चोराहे पर 1980 में सरकार से जमीन लेकर एक चार मंजिली इमारत बनाई गई जिस पर लिखा है "Church of North India". जिस जगह पर जमीन मिलना असंभव है, वहीं पर यह एक विशाल दफ्तर बनाया गया । अभी दो साल पहले ही इस पर दो मंजिलें और बनाई गईं हैं । रोहतक में भी एक चर्च रोड है - चुप वे भी नहीं बैठे हैं । पंजाब जैसे राज्य में भोले-भाले गरीब लोग ईसाइयत के चंगुल में फंसाए जा रहे हैं । पड़ौसी पाकिस्तान में भी यह खेल तेजी पर है, बेशक वहां इस्लामी कट्टरवादी बैठे हैं । जहां जहां अंग्रेजी या अमरीकी फौज जाए, वहां ईसाइयत नहीं आये यह तो हो ही नहीं सकता ।
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