Dada Bastiram ki Juban Se

Status
Not open for further replies.
A great visionary

.
दादा बस्तीराम ने उस समय पोपलीला से तंग आये हुए जाट समाज को पाखंडी पंडितों से छुटकारा दिलाकर जाट समाज पर बड़ा उपकार किया था । किसी के मरने पर गौदान कराया जाता था । पाखंडी पंडितों ने जाटों को बहका रखा था कि माघ (जनवरी-फरवरी) के महीने में जो गाय ब्याती है वो निकम्मी होती है इसलिये उसे घर में रखने की बजाय दान में दे देना चाहिये । भला इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है? वेदों के मतानुसार जो गाय सर्दी के महीने में ब्याती है, वह बहुत ही पुण्यकारी होती है क्योंकि वह आगे वाले गर्मी के महीनों में दूध देती रहती है - जब गर्मी में दूध की आम तौर पर कमी होती है । पहले के भोले-भाले जाटों को बहकाकर ये पाखंडी ऐसी शुभ गाय को मुफ्त में हड़प ले जाते थे और मौज उड़ाते थे । दादा बस्तीराम का सबसे बड़ा योगदान हमें ऐसी कुरीतियों से छुटकारा दिलाने का ही है ।उनके एक लंबे से भजन की एक कली यहां प्रस्तुत है ।

लंबे तिलक वालों से, ढ़ीली धोती वालों से रहना होशियार ।

माह में गऊ ब्यावै उसनै पोप ले ज्यावै - मुफ्त में पीवै धार-
माह में घोड़ी ब्यावै, उसनै पोप ले ज्यावै - मुफ्त में बणै सवार।
माह में सूरी ब्यावै, उसनै क्यूं ना पोप ले ज्यावै ? - बाहरणै ला दे लार* !
माह में औरत ब्यावै, उसनै क्यूं ना पोप ले ज्यावै ? - मांगै वा खांड-कसार !


*बाहरणै ला दे लार - सूरी तो एक दर्जन बच्चे देती है - वो तो उस पोप के बाहरणै (घर के बाहर) बच्चों की लार (कतार) लगा देगी !!

.
 
Last edited:
Status
Not open for further replies.
Back
Top