.
(This post is in Devanagari script. If there is difficulty in reading the text, there is need to install ‘Mangal’ font)
दास्ताने "टाइम-पास"
दिल बहलाने को गालिब खयाल अच्छा है - जाटलैंड की "टाइम-पास" फोरम भी कोई कम नहीं । मैं यहाँ पर कुछ भी अंग्रेजी में नहीं लिख रहा हूं - यहां तक कि 'लिंक' भी हिन्दी में ही लिखूंगा - हल्के-फुल्के अंदाज में । टाइम पास कर रहा हूं, कोई मेंबर बुरा मत मान जाना ! दिसंबर में सन् २००६ के धागों का एक सर्वे किया था, सोचा कि इस "टाइम-पास" फोरम का भी छोटा सा सर्वे कर लूं ।
अभी-अभी एक दूसरी फोरम में जाट रामायण नाम का धागा लिखा था, सोचता हूं उसे यहीं पोस्ट कर देता तो ठीक था । कई फोरम हैं यहां पर - सभी पर कुछ न कुछ प्रतिबंध तो हैं ही - ह्यूमर फोरम में भी गैर-जाट मसाला लिखने पर रोक है । पर यहां पूरी आजादी है - शेरो-शायरी करो, इधर-उधर की हांको चाहे एकाध बार एक दूसरे की टांग भी खींच लो (वैसे इस बार हम 'वेलेंटाइन डे' के किस्सों से बच गए, यह अच्छी बात है) । और कुछ न मिले तो अपना जन्मदिन ही सही । अपना नहीं तो किसी और का सही, चाहे तुम उसे जानते हो या नहीं - या अपनी किसी 'बेबे' की 'बेबी' के जन्मदिन पर एक धागा लिखकर अपने 'पोस्ट-काउंट' में कर लो बढोतरी ! या फिर "डैडिकेटिड टू आल माई ब्रदर्स", "डैडिकेटिड टू आल वीमेन" जैसे शीर्षक लिखकर भिन-की-भिन हांकते रहो । कुछों के तो आधे के करीब धागे इसी किस्म के हैं, यानी अंधा बांटे रेवड़ी, अपने-अपनों को दे ! (सबके लिंक नहीं लिख रहा हूं)।
विजय के धागे वफा और मोहब्बत ने तो रिकार्ड ही तोड़ दिया था और अभी यादों के पल भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है । पहले वाले में मेरा कुछ भी योगदान नहीं था, अब वाले में कुछ करने की कौशिश करूंगा - बेशक मैं कोई शायर नहीं हूं, कुछ तुकबंदी तो जरूर कर लेता हूं । बहुत पहले मैने दादा बस्तीराम के भजनों का संग्रह यहां पर पोस्ट किया और बाद राजकवि दादा लखमीचंद की कुछ प्रसिद्ध रागनियां भी । पर कितने लोग पढ़ते हैं यह सब ? दीपक सेजवाल ने एक बार दूसरी फोरम में 'चुम्बन' पर एक धागा क्या लिखा, उस पर हमारे जवान लड़के ऐसे टूट पड़े जैसे मांस के टुकड़ों पर चील-कव्वे !
मुझे कुछ पुराने धागे याद हैं - देव दहिया जी के दिल के किसी कोने से, क्या जाता है मुस्कुराने में और जाटलैंड पर हंसी के फव्वारे आदि । केशव दहिया की गपड़-चौथ, "डैडिकेटिड टू आल द पीपल इन लव" और "कोई मन्नै इसकी अंग्रेजी बता दो"। शैलेन्द्र हुड्डा के कार्टून भी । वह अच्छा वक्त था । साल भर पहले देव दहिया ने एक अच्छी पैरोडी लिखी थी (लिंक बाद में ढूंढ़ कर बता दूंगा) - कोई 'जाटलैंडर' गड्ढा खोद रहा है, कोई गोबर का तसला सिर पर रखे है, कोई भैंस को नहला रहा है - मुझे 'रोल' दिया गया था : जोहड़ के गन्दे पानी में खड़े होकर "पौड़ सड़ाना" ! ना कोई शिकायत, ना कोई रंजिश - बस हंसी-मजाक और "टाइम-पास” । एक बार एक धागा जरूर निकला था - जाटलैंड का सबसे घृणित व्यक्ति कौन । उस पर तो बवाल होना ही था, पर जल्दी ही शान्त भी हो गया था ।
.... Continued in next post
.
.
(This post is in Devanagari script. If there is difficulty in reading the text, there is need to install ‘Mangal’ font)
दास्ताने "टाइम-पास"
दिल बहलाने को गालिब खयाल अच्छा है - जाटलैंड की "टाइम-पास" फोरम भी कोई कम नहीं । मैं यहाँ पर कुछ भी अंग्रेजी में नहीं लिख रहा हूं - यहां तक कि 'लिंक' भी हिन्दी में ही लिखूंगा - हल्के-फुल्के अंदाज में । टाइम पास कर रहा हूं, कोई मेंबर बुरा मत मान जाना ! दिसंबर में सन् २००६ के धागों का एक सर्वे किया था, सोचा कि इस "टाइम-पास" फोरम का भी छोटा सा सर्वे कर लूं ।
अभी-अभी एक दूसरी फोरम में जाट रामायण नाम का धागा लिखा था, सोचता हूं उसे यहीं पोस्ट कर देता तो ठीक था । कई फोरम हैं यहां पर - सभी पर कुछ न कुछ प्रतिबंध तो हैं ही - ह्यूमर फोरम में भी गैर-जाट मसाला लिखने पर रोक है । पर यहां पूरी आजादी है - शेरो-शायरी करो, इधर-उधर की हांको चाहे एकाध बार एक दूसरे की टांग भी खींच लो (वैसे इस बार हम 'वेलेंटाइन डे' के किस्सों से बच गए, यह अच्छी बात है) । और कुछ न मिले तो अपना जन्मदिन ही सही । अपना नहीं तो किसी और का सही, चाहे तुम उसे जानते हो या नहीं - या अपनी किसी 'बेबे' की 'बेबी' के जन्मदिन पर एक धागा लिखकर अपने 'पोस्ट-काउंट' में कर लो बढोतरी ! या फिर "डैडिकेटिड टू आल माई ब्रदर्स", "डैडिकेटिड टू आल वीमेन" जैसे शीर्षक लिखकर भिन-की-भिन हांकते रहो । कुछों के तो आधे के करीब धागे इसी किस्म के हैं, यानी अंधा बांटे रेवड़ी, अपने-अपनों को दे ! (सबके लिंक नहीं लिख रहा हूं)।
विजय के धागे वफा और मोहब्बत ने तो रिकार्ड ही तोड़ दिया था और अभी यादों के पल भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है । पहले वाले में मेरा कुछ भी योगदान नहीं था, अब वाले में कुछ करने की कौशिश करूंगा - बेशक मैं कोई शायर नहीं हूं, कुछ तुकबंदी तो जरूर कर लेता हूं । बहुत पहले मैने दादा बस्तीराम के भजनों का संग्रह यहां पर पोस्ट किया और बाद राजकवि दादा लखमीचंद की कुछ प्रसिद्ध रागनियां भी । पर कितने लोग पढ़ते हैं यह सब ? दीपक सेजवाल ने एक बार दूसरी फोरम में 'चुम्बन' पर एक धागा क्या लिखा, उस पर हमारे जवान लड़के ऐसे टूट पड़े जैसे मांस के टुकड़ों पर चील-कव्वे !
मुझे कुछ पुराने धागे याद हैं - देव दहिया जी के दिल के किसी कोने से, क्या जाता है मुस्कुराने में और जाटलैंड पर हंसी के फव्वारे आदि । केशव दहिया की गपड़-चौथ, "डैडिकेटिड टू आल द पीपल इन लव" और "कोई मन्नै इसकी अंग्रेजी बता दो"। शैलेन्द्र हुड्डा के कार्टून भी । वह अच्छा वक्त था । साल भर पहले देव दहिया ने एक अच्छी पैरोडी लिखी थी (लिंक बाद में ढूंढ़ कर बता दूंगा) - कोई 'जाटलैंडर' गड्ढा खोद रहा है, कोई गोबर का तसला सिर पर रखे है, कोई भैंस को नहला रहा है - मुझे 'रोल' दिया गया था : जोहड़ के गन्दे पानी में खड़े होकर "पौड़ सड़ाना" ! ना कोई शिकायत, ना कोई रंजिश - बस हंसी-मजाक और "टाइम-पास” । एक बार एक धागा जरूर निकला था - जाटलैंड का सबसे घृणित व्यक्ति कौन । उस पर तो बवाल होना ही था, पर जल्दी ही शान्त भी हो गया था ।
.... Continued in next post
.
.
Last edited: