maine aisi hi ek post mere FB pe daali thi, similar to this topic hai but kitni wo aap khud decicide karen:
मतलब कुछ पंथों-समूहों का मर्द-समाज कितना स्याणा है......शादी से पहले वो किसी से भी flirting कर सके उसके लिए concept अपना लिया friendship का (यानी भाई-बहन और पति-पत्नी के रिश्ते के अलावा दोस्ती का रिश्ता खुलेपन का symbol बताते हैं, स्त्री-पुरुष के लिए स्वछंदता बोलते हैं).......होना भी चाहिए......पर तब जब वो ब्याही आ जाती है तब क्यों नानी मर जाती है उनकी? कि अब ये वाली तो permanently मेरी हो गई है इ...सलिए मेरे सिवा सबको भैया बोलेगी चाहे वो उसका देवर हो या जेठ| हे राम कितने insecure हैं ऐसे लोग.......means शादी से पहले किसी को नहीं बख्सते दोस्ती किये बिना और शादी के बाद अपने वाली के maximum रास्ते बंद; कि कहीं घर में भी किसी से दोस्ती ना कर ले, फिर बाहर वालों की तो बात ही क्या है| बाहर वाले किस्से तो more than 90% दम्पति झगड़ों-तलाकों के कारण पाए जाते हैं|
और ड्रामा तो तब बनता है जब जो honesty से शादी से पहले भी अपने घर के अलावा बाहर की लड़की जैसे कि गाँव-गोत्र वाली को कुछ समाज बहन मानते हैं, तब यही friendship के नाम पे openess का राग अलापने वाले भाषण देने आते हैं कि कोई लड़की सिर्फ तुम्हारी बहन या बीवी ही नहीं बल्कि दोस्त भी हो सकती है| जबकि जिनके लिए ये lecture देते हैं उनके यहाँ शादी के बाद भी बहु को देवर-जेठ को भैया कहने की नौटंकी भी नहीं करनी पड़ती|
और चौड़े तौर पर देखो तो इस friendship के concept को कोई शादी से पहले रखता है तो कोई शादी के बाद| तो बताओ रिश्तों में ज्यादा ईमानदार और खुल्ले पहले वाले हुए कि दूसरे वाले? असली खुलापन तो तभी पता चलता है ना जब अपने वाली पे आती है, है कि नहीं?
कमाल की बात तो यह है कि ऐसे समाजों के लोग दुनियाँ के समाजों को खुलेपन के उपदेश सुनाते हैं, भाई-बहन और बीर-मर्द के रिश्ते के अलावा एक स्त्री-पुरुष में दोस्ती का भी रिश्ता हो सकता है ऐसा बतलाते है, कई लव-कमांडो जैसे संगठन भी बना लेते हैं पर खुद के घरों और रिश्तों में इतने डरे हुए होते हैं कि घर में नई बहु आई नहीं कि सबसे पहले देवर-जेठ को उसके मुंह से "भैया" कहलवाते हैं| समझ में नहीं आती ये पिछड़ी मान...सिकता कि जो शादी से पहले किसी की दोस्त बन सकती है वो शादी के बाद अपने ही देवर-जेठ की दोस्त क्यों नहीं बन सकती, क्यों उसको उन्हें भैया बोलना पड़ता है?
खुद के घरों-समाज की घुटन खत्म कर सकते नहीं/दीखती नहीं और चल निकलते हैं दूसरों के बैठकों-चौपालों में औरतों के अधिकार ढूँढने| कभी झाँक के देखा है अपने पहलू में?
कहते हैं हम समाज के सबसे आधुनिक प्राणी हैं, हाँ ऐसे आधुनिक प्राणी जो सम-गोत्र विवाह के लिए गोद दिलवा के गोत्र बदलेंगे तो लड़की का, लड़के का क्यों नहीं? कोई विधवा हो गई तो ताउम्र विधवा रहती है चाहे उसकी दोबारा विवाह करने की इच्छा अंदर ही अंदर दम तोड़ दे| क्या उस विधवा की इच्छाएं नहीं?
नहीं फिर भी बुगले की भांति, दूसरों के समाज पे ऊँगली उठाने से बाज नहीं आते| ये तो वही बात हुई "घर में गधी मरी पड़ी और भाड़े करै सोनीपत के"|