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क्रांतिकारी शहीद करतारसिंह

क्रांतिकारी शहीद करतारसिंह

जन्म- 16 नवम्बर 1886 ,

शहीदी- 16 नवम्बर 1915

गोत्र - ग्रेवाल,

गाँव सराभा, जिला लुधियाना, पंजाब.

पिता के इकलोते पुत्र.

अमरीका में छपने वाले 'गद्दार' के संपादक रहे. कामागाटामारू जहाज से वापस आने पर सैनिक छावनियों में बगावत की चिनगारी लगाते हुए एक साथी की गद्दारी से पकडे गए. सरकार इन्हें उड़ना सांप कहती थी. इन्हें मात्र 19 वर्ष की आयु में फांसी दे दी गयी.

अधिक जानकारी के लिए जाटलैंड पर यहाँ पढ़ें - [Wiki]Kartar Singh[/Wiki]
 
क्रांतिकारी शहीद करतारसिंह

जन्म- 16 नवम्बर 1886 ,

शहीदी- 16 नवम्बर 1915

गोत्र - ग्रेवाल,

गाँव सराभा, जिला लुधियाना, पंजाब.

पिता के इकलोते पुत्र.

अमरीका में छपने वाले 'गद्दार' के संपादक रहे. कामागाटामारू जहाज से वापस आने पर सैनिक छावनियों में बगावत की चिनगारी लगाते हुए एक साथी की गद्दारी से पकडे गए. सरकार इन्हें उड़ना सांप कहती थी. इन्हें मात्र 19 वर्ष की आयु में फांसी दे दी गयी.

अधिक जानकारी के लिए जाटलैंड पर यहाँ पढ़ें - Kartar Singh


Bahut badhiya shrdhanjhali hai! Ghadar party ke akhbar ka naam 'Ghadar' thha '''गद्दार' nahin. Kindly make necessary correction in place of ''गद्दार''

''19 varsh ki umar mein phansi'' ka talmel aap dwara post mein janam or death dates dikhai hain unse mel nahin khaata,

Sayad, Jaanam varsh 1896 ho?

kindly check and rectify.
 
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Jat MLAs in Gujarat

People are not aware that there are Jats in Gujarat. At present there are two Jat MLAs in Gujarat and both from BJP.

1. Shankar Chaudhary - MLA Radhanpur in Patan district in Gujarat and General Secretary Youth BJP, Mob:09825313199

2. Parbatbhai Patel - BJP MLA Vav and Tharad taluka in the Banaskantha district of the state of Gujarat. He is State Minister of Health and Family Welfare Gujarat.

YOU ARE RIGHT AT SERIAL ONE, BUT patel I doubt, though, patels have migrated from old punjab via Rajesthan but seeing their personality traits, their nature, greed for money, they can sacrifice any thing for money, their unmarried girls can stay for months together in would be inlaws house go with the boy or stay with him without marriage and later on they can seperate and get married any where else without any objection etc, so such traits are unlike jats
 
YOU ARE RIGHT AT SERIAL ONE, BUT patel I doubt, though, patels have migrated from old punjab via Rajesthan but seeing their personality traits, their nature, greed for money, they can sacrifice any thing for money, their unmarried girls can stay for months together in would be inlaws house go with the boy or stay with him without marriage and later on they can seperate and get married any where else without any objection etc, so such traits are unlike jats

Dear Friend,

I am curious to know if the social traditions as described in the post are Universally followed by all the 'Patels' or are practiced in some specific area/region. If, they are followed by the 'Patel' community as a whole, then they have lost all connections with the 'Jats'!

Thanks
 
General Subjects

One of the objectives of Jatland is writing skill development. It may be that you do not have much content about Jats but you have content on any other subject which you think we all should share here. You may do here on forums and also write on Jatland Wiki section and put under General category by putting template-

[[Category:General]]
 
General Subjects

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Thanks for broadening the scope of discussions on the JatLand.com It is hoped that more and more participants will enjoy joining the [[Category: Genaral]] pages and contribute to make the new experiment by sharing their informative and stimulating views on a variety of issues.

Regards
 
जाट-राज्य पूर्ण वैभव-संपन्न और समृद्धिशाली हुआ करते थे। वे किसी देश को जीत भी लेते तो उसकी सभ्यता को नष्ट नहीं करते थे। उनमें एक आदत ऐसी भी थी जिससे उनका गौरव आज नष्ट-प्रायः हो गया। वे कहते थे कि शुभ कृत्य ही स्मृति के लिए पर्याप्त है, स्मारक-स्तूप आदि बनाने की क्या आवश्यकता है? यही कारण है कि उनमें से बहुत कम ने यह चेष्टा की कोई अपना निशान खड़ा कर दें। (जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ-723)
 
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“Those who forget history, history also forgets them forever”. How important is writing and reading history ! See what Thakur Deshraj opines :


(Quoted from Thakur Deshraj's book "Jat Itihas") -
जाट लोगों ने इतिहास की आवश्यकता को अनुभव नहीं किया, दूसरी जातियों ने इस ओर पूरा ध्यान दिया, उसका फल सामने आया। जिन्होंने इतिहास लिखाया उनकी आज सब कद्र करते हैं। जाट अपने विषय में कुछ सोच लें कि इतिहास की उपेक्षा करने के कारण समाज में उनका स्थान गिरा या नहीं?

भरतपुर और चित्तौड़ में कौन लोक की निगाह में चढ़ा हुआ है? चित्तौड़ - क्योंकि चित्तौड़ के लोगों ने चारणों से भाटों से, लेखकों से अपने कृत्यों का प्रचार कराया - उसका इतिहास तैयार कराया। चित्तौड़ पर देहली की ओर से चढ़ाइयां हुईं। भरतपुर पर हुईं। किन्तु चित्तौड़ देहली पर चढ़कर कभी नहीं गया। भरतपुर ने दिल्ली को खाक में मिला दिया । चित्तौड़ से जो वस्तु दिल्ली गई, भरतपुर उसे दिल्ली से घर ले आया। किन्तु भरतपुर ने इन घटनाओं और कृत्यों का प्रमाण (इतिहास) नहीं रखा, न उसके प्रचार के लिए कोई व्यय किया।

जाटों के समान दूसरी कौमें इतिहास के लाभों से अनभिज्ञ नहीं रहना चाहतीं और न पहले रहीं। उन्होंने इस काम के लिए लाखों रुपये व्यय किए हैं। हमने कई छोटी-छोटी राजपूत रियासतों के कई-कई इतिहास देखे हैं, किन्तु जाटों की बड़ी-बड़ी रियासतों का एक भी इतिहास नहीं मिलता।

दूसरे लोगों ने जाटों के इतिहास के प्रति ऐसी उदासीनता देखकर खूब लाभ उठाया। कहीं उन्हें राजपूतों की औलाद लिखा तो कहीं वर्ण-शंकर। विदेशी लेखकों ने जब इनका कोई भी अपना इतिहास नहीं देखा, तो कई तो इतने झुंझलाए कि असभ्य और जंगली तक लिख गए। ‘मथुरा मेमायर्स’ के लेखक मि. ग्राउस को भी फटकार लगानी पड़ी। कुछ एक विदेशी इतिहासकारों को भी वही बात माननी पड़ी जो उनके विरोधियों ने इनके विषय में गढ़ी थी।

इतने समय के पश्चात् थोड़ी सी आंख जाटों की खुलीं। ...........

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I want to say something here..........

Kuch baat hai ki hasti
mit-tee nahi hamari, Sadiyon se raha hai dushman daure-<wbr>zaman hamara.
 
Friends,

Through the Ages Jats have created the History through their actions but ignored construction of historical records in a readable book form. Even the Jat ruling house of Bharatpur which was in existence in 19th and 20th Centuries does not provide original correspondence of the rulers with the contemporary rulers whereas even the records of the Marathas, Rajputs and other local powers are available in abundance.

This remains the tragedy of the Jat Community even today as pointed out rightly by Thakur Desraj about a century ago [as quoted by our learned friends in the above two quotes].

Raja Mahendra Pratap, the Aryan Peshwa, seems to be the first person who has written his autobiographical sketch. Is there any other such person among the Jats who has taken up to writing his memoirs!
 
ठाकुर देशराज ने उन कठिन समयों में गाँव गाँव घूम कर जाट इतिहास के तथ्य जुटाए यह काबीले तारीफ़ है. यहाँ हम उनकी पुस्तक से कुछ ऐतिहासिक तथ्य दे रहे हैं -

#यूरोप में उन्होंने एक स्तूप रायन नदी के किनारे खड़ा किया था।

#भारत में भी बयाने में राजा विष्णुवर्द्धन का एक जय-स्तंभ है जो भीम की लाठ के नाम से मशहूर है।

#राजस्थान में उनके खुदाये हुए बहुत से तालाब और कुऐं हैं।


#अलवर में महाराज सूरजमल के समय के बनवाये हुए तालाब हैं। वे सूरजकुण्ड, डुंडिया और चांदपोल के नाम से मशहूर हैं। इनका परिमाण इस प्रकार है - सूरजकुण्ड 80 गज लम्बा, 36 गज चौड़ा और 15 गज गहरा है। डूंडिया 62 गज लम्बा, 32 गज चौड़ा, 6 गज गहरा है। चांदपोल 27 गज लम्बा, 25 गज चौड़ा ओर 11 गज गहरा है। दो महल भी अलवर में महाराज सूरजमल के बनवाये हुए हैं जो सूरज-महल के नाम से मशहूर हैं। उनमें एक जनाना महल है। किले के दरवाजों के नाम महाराज सूरजमल ने बदल दिये थे जो अब तक सूरजपोल और रामपालपोल के नाम से मशहूर हैं। ऐसा कहा जाता है कि अलवर के किले में महाराज सूरजमल का एक खजाना भी था, किन्तु विश्वास नहीं होता।


#आगरे में महाराज जवाहर सिंह ने एक हंसमहल बनवाया था जिसके पास उनकी रानी महाराज के आगरा किले मे मारे जाने के पश्चात् सती हो गई थी।

([Wiki]जाट इतिहास:ठाकुर देशराज[/Wiki],पृष्ठ-723)
 
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ठाकुर देशराज ने उन कठिन समयों में गाँव गाँव घूम कर जाट इतिहास के तथ्य जुटाए यह कबीले तारीफ़ है. यहाँ हम उनकी पुस्तक से कुछ ऐतिहासिक तथ्य दे रहे हैं -

#यूरोप में उन्होंने एक स्तूप रायन नदी के किनारे खड़ा किया था।

#भारत में भी बयाने में राजा विष्णुवर्द्धन का एक जय-स्तंभ है जो भीम की लाठ के नाम से मशहूर है।

#राजस्थान में उनके खुदाये हुए बहुत से तालाब और कुऐं हैं।


#आगरे में महाराज जवाहर सिंह ने एक हंसमहल बनवाया था जिसके पास उनकी रानी महाराज के आगरा किले मे मारे जाने के पश्चात् सती हो गई थी।

(जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ-723)


The statement regarding the place of the death of Maharaja Jawahar Singh and Sati incident need further verification. Because we hear in the Bharatpur royal house this sati incident as an isolated case, if only, it were true. All the royal ladies survived their husbands including the wives of Maharaja Suraj Mal as recorded in the pages of the history. Maharaja Jawahar Singh is also said to have been murdered at his masnad in his capital. This means he was killed either at Deeg, the first capital founded by Thakur Badan Singh or the Second capital Bharatpur, founded by Maharaja Suraj Mal. Could anyone throw further light on the issue.
 
ठाकुर देशराज ने उन कठिन समयों में गाँव गाँव घूम कर जाट इतिहास के तथ्य जुटाए यह कबीले तारीफ़ है. यहाँ हम उनकी पुस्तक से कुछ ऐतिहासिक तथ्य दे रहे हैं -

#यूरोप में उन्होंने एक स्तूप रायन नदी के किनारे खड़ा किया था।

#भारत में भी बयाने में राजा विष्णुवर्द्धन का एक जय-स्तंभ है जो भीम की लाठ के नाम से मशहूर है।

#राजस्थान में उनके खुदाये हुए बहुत से तालाब और कुऐं हैं।


#आगरे में महाराज जवाहर सिंह ने एक हंसमहल बनवाया था जिसके पास उनकी रानी महाराज के आगरा किले मे मारे जाने के पश्चात् सती हो गई थी।

(जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ-723)


No doubt, Thakur Deshraj accomplished unthinkable task of the construction of the Jat History due to his dedication and honest zeal to serve the cause of the community!
 
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Dr Rajpalji

[Wiki]Dr Vir Singh[/Wiki], the noted Jat Historian, had told me that one of his relatives recently published a book on monuments of Bharatpur. I could not get a copy yet. Probably that book can be of help in further research. I have added a photo of memorial of [Wiki]Maharaja Jawahar Singh[/Wiki] on this page. Need further research.
 
Dr Rajpalji

Dr Vir Singh, the noted Jat Historian, had told me that one of his relatives recently published a book on monuments of Bharatpur. I could not get a copy yet. Probably that book can be of help in further research. I have added a photo of memorial of Maharaja Jawahar Singh on this page. Need further research.

Burdak Sahib,

It is good of you that you have added this very valuable photoraph related to the memorial of Maharaja Jawahar Singh. Kindly share information, if any, about its original location and any other details.

I am in touch with Dr. Vir Singh to elicit further information as hinted by you.

thanks.
 
ठाकुर देश राज द्वारा प्रस्तुत जाट इतिहास से सम्बंधित प्रमाण: शिलालेख आदि

o देरावल में जाट-राज्य के समय के राज-महलों के कुछ खंडहर अब तक पाये जाते हैं। ‘वाक्य राजपूताना’ के लेखक ने लिखा है कि शालिवाहन से विताड़ित होकर जाट लोग देरावल में आकर राज करने लग गए थे। रंगमहल के पास भी उनके राजभवनों के चिन्ह मिलते हैं।

o मन्दसौर में राजा यशोधर्मा के और

o गंगधार में विश्ववर्मा आदि के शिलालेख मिले हैं।


o जोधपुर राज्य में जाटों के अनेक शिलालेख और तालाब हैं।


o महाराज कनिष्क की मूर्ति इस समय लखनऊ म्यूजियम में रखी हुई है जो पांच फीट के लगभग ऊंची है किन्तु सिर कटा हुआ है। घुटनों से नीचे तक अंगरखा, हाथ में गदा जैसा हथियार है। किन्तु शायद गदा नहीं है। मूर्ति विशाल पुरुष की जैसी है।


o किशनगढ़ में अगम जाट का एक कूप है जिसका वर्णन पं. जयरामजी वैद्य ने जाटवीर के लेखों में किया था।

o इटावा और कानपुर के मध्य में एक शहर फफूंद है। उसमें जाट नरेश भागमल के, जो कि महाराज सूरजमल के समकालीन थे किले के चिन्ह मिलते हैं। एक मसजिद के पत्थर में जो कि उन्होंने मुसलमानों की प्रार्थना पर बनवाई होगी, उनका नाम खुदा हुआ है।3राजा भागमल शायद मीठे गोत के जाट थे।


o सिन्ध में मोहन-जो-दड़ो की खुदाई में कुछ मोहरें ऐसी निकली हैं जिन पर शिव देवता के उपासक जाट लोगों के देवता का नाम अंकित है।

o पुष्कर में महाराज जवाहरसिंह का जवाहर-घाट बना हुआ है। साथ ही मकानात भी हैं। वहां जाटों का एक मन्दिर है।


o गोवर्धन में भरतपुर के महाराजगान की छतरियां और घाट हैं।


o मथुरा में एक बाग और सराय है।


o आगरा और शिमला में कोठियां हैं। शिमला की कोठी व्रजेन्द्र-मण्डल कहलाती है।


o पंजाब में जहां भी देखिए जाट-साम्राज्यों का वैभव दिखाई देगा।


o अलीगढ़, हाथरस, सासनी में जाटों के किले हैं जो कि मुरसान और वृन्दावन के पूर्वजों ने बनवाये थे।


o सोंख, पेंठा, अडींग में भी जाटों की गढ़ियां बनी हुई हैं।

([Wiki]जाट इतिहास:ठाकुर देशराज[/Wiki],पृष्ठ-724)
 
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ठाकुर देश राज द्वारा प्रस्तुत जाट इतिहास से सम्बंधित प्रमाण: शिलालेख आदि (जारी ---)

o मथुरा मेमायर्स के पढ़ने से मालूम होता है कि नोहवार जाटों ने नोह झील को खुदवाया था।


o किशनगढ़, अजमेर, जोधपुर के अनेक स्थानों में तेजाजी के मन्दिर हैं। जिन पर हजारों हिन्दू भादों की तेजा दसमी को वन्दना करने के लिए आते हैं।

o बिलोचिस्तान में हिंगलाज नाम की देवी का मन्दिर जाटों का बनवाया हुआ है जिसे कि एक कन्या के रूप में मानते थे।


o कप्तान एबट को उदयान के निकट पूर्व समय में ऐसे चिन्ह मिले थे जो कि वहां के यज्ञ-प्रेमी जाटों के ही कहे जा सकते हैं।


o पण्डित जयराम ने अपने जीवन-काल में जाट जाति के कुछ समृद्धि चिन्हों का पता लगाया था और जाटवीर के द्वारा उन्होंने अपनी खोज में पाये हुए शिलालेखों और सिक्कों के सम्बन्ध में लेख भी लिखे थे। उन्हीं लेखों का सार हम यहां देते हैं।
 
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ठाकुर देश राज द्वारा प्रस्तुत जाट इतिहास से सम्बंधित प्रमाण: शिलालेख आदि (जारी ---)

जेवल्या की छतरी: नराना गांव

किशनगढ़ में तीन छतरियां हमने देखीं - दो राजपूतों की और एक तीसरे वंश की छतरी देखी गई। यह छतरी बहुत ही पुरानी है और जेवल्या गोत के जाट सरदार की है। इसके पच्छिम-दक्षिण की ओर एक बड़ा भारी कीर्ति-स्तम्भ खड़ा है। इस पत्थर में मनुष्य की मूर्ति खुदी हुई है और संबत 1111 का लेख खुदा हुआ है। यह शिलालेख बहुत ही पुराना होने से घिस गया है इसलिए समूचा लेख साफ-साफ पढ़ने में नहीं आता। दूसरे दो राज-वंशों की छतरियों के पास ऐसे अक्षय पुण्यदान के चिन्ह देखने में नहीं आते जैसे जाट की छतरी के पास देखने में आ रहे हैं। छतरी से करीब दस हाथ उत्तर की ओर गौओं की प्यास के लिए कुआं बनाया गया है। इस कुएं की चुनाई अपनी प्राचीनता को बता रही है। पत्थरों को काटकर पूठियां खड़ी हुई हैं। जैसे गाड़ी के पहियों की पूठियां होती हैं, वैसी पूठियों को जोड़कर कुआं चुनाया गया है। इसलिए इस कुएं की मजबूती ऐसी है कि हजारों वर्ष तक रह सकता है। कुएं के पास गौओं को जल पीने के लिए खेली बनाई गई है। खेली की कारीगरी भी देखने योग्य है। पांच-पांच हाथ लम्बी और तीन-तीन हाथ चौड़ी पत्थर की शिलाओं को जमीन में गाड़कर खेली बांधी गई है, जिससे पत्थर की मरम्मत का सैकड़ों वर्षों तक भी काम न पड़ सके। लोगों से सुना गया है कि जिस जाट की कीर्ति को चिरकाल तक स्मरण रखने के लिए कुआं और छतरी बनाये थे, उसी महापुरुष का बनाया हुआ, उसकी छतरी के पश्चिम की ओर एक तालाब है जो गौओं के जल पीने के लिए खुदवाकर बनाया गया था। यह तालाब बड़ा भारी है। लगभग पचास बीघें में होगा। जाटों के खोजने से
([Wiki]जाट इतिहास:ठाकुर देशराज[/Wiki],पृष्ठ-725)

थोड़े बहुत जो प्राचीन इतिहास के चिन्ह मिलते हैं वे प्रमाद, अत्याचार और दूसरों की बुराई के कभी नहीं मिलते। किन्तु संसार की भलाई, परोपकार, गोचर भूमि-दान, तालाब, कुआं और निर्बल की रक्षा करने के लिए वीरता, ये ही चिन्ह प्राचीन जाटवीरों के इतिहासों में मिलते हैं। नराना गांव के नीचे अठारह हजार बीघे जमीन है। अन्दाजन छः हजार बीघे जमीन जोती जाती है और करीब बारह हजार बीघों में गायें चरती है। इस गांव में गाय और भैंसों का झुंड देखकर सतयुग याद आता है। हर एक आदमी के घर में दूध दही के भण्डार भरे ही रहते हैं।

राजपूताने में जाटों के राज्यों के बाद कई राजवंशों के राज्य हो गए हैं। इसलिए जाटों के इतिहास खोजने के लिए सहसा कोई खड़ा नहीं होता। लोगों को ऐसा विश्वास नहीं होता कि राजपूताने में जाट सदा से हल जोतकर दूसरों को खिलाने वाले ही नहीं थे किन्तु जाट ही भूमिपति थे और अपनी भूमि की मालगुजारी जाट दूसरों से लेते थे।

([Wiki]जाट इतिहास:ठाकुर देशराज[/Wiki],पृष्ठ-726)
 
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