By sheer ignorance of word
'Gupta' (गुप्त), historians have done a big blunder by associating emperors of Gupta Empire (240-528 AD - Srigupta, Chandragupta-II, Samudragupta, Ramagupta, Skandgupta, Kumaragupta etc.) with trading community (often called 'Baniya') who now-a-days write their surnames as Gupta
(गुप्ता).
Kings of Gupta empire were
Dharan (धारण/ धारी/ धारीवाल) gotra Jats, whose lengthy names ended with गुप्त. This was never their surname or gotra name, but part of their first name itself.
Interestingly, Chanakya's real name was Vishnugupta (विष्णुगुप्त). He was a Brahmin, but was never associated by historians with 'Baniya' community.
Dalip Singh Ahlawat has written -
गुप्तवंशज सम्राट् धारण गोत्र के जाट थे इसके प्रमाण निम्नलिखित हैं -
1. जैसे वीर योद्धा
मांडा जाटों के साम्राज्य को व्यापारी एवं दुकानदार
मेड लोगों का साम्राज्य लिखने की भाषाशास्त्रीय गलती की गई है जिसको प्रमाणों द्वारा ठीक किया गया है। ठीक उसी तरह से इतिहासकारों ने
धारण गोत्र के जाटों के साम्राज्य को गुप्त साम्राज्य लिखने की बड़ी भूल की है। गुप्त वैश्य वर्ण के नहीं थे, बल्कि क्षत्रिय वर्ण के थे।
2. यह धारण जाट गोत्र है जो कि
वैश्य समाज में नहीं पाया जाता है इसके लिए “अन्धकारयुगीन भारत” पृ० 252 पर लेखक काशीप्रसाद जायसवाल ने लिखा है कि : “गुप्त लोग कारसकर जाट थे, जो पंजाब से चलकर आए थे। मेरी समझ में आजकल के कक्कड़-कक्करान जाट उसी मूल समाज के प्रतिनिधि हैं जिस समाज में गुप्त लोग थे। कारसकरों में भी गुप्त लोग जिस विशिष्ट गुप्त विभाग या गोत्र के थे, उनका नाम धारण या धारी या धारीवाल था। इसके लिए एपीग्राफिका इण्डीका, खण्ड 15, पृ० 41-42 पर लिखा है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती जिसका विवाह वाकाटकवंशज रुद्रसेन द्वितीय से हुआ तब प्
रभावती गुप्ता ने अपने पिता का गोत्र शिलालेख पर धारण ही लिखा है। इस बात का समर्थन कौमुदी महोत्सव नाटक और चन्द्रव्याकरण से भी होता है।” स्कन्दगुप्त के द्वारा हूणों की पराजय का
अजयज्जर्टो हूणान् वाक्य चन्द्रगोमिन् की व्याकरण से स्पष्ट
गुप्तवंश का जाट होना सिद्ध करता है।
3.
वैदिककाल, महाभारतकाल तथा बौद्धकाल तक गुप्त शब्द किसी जाति के लिए लिखा नहीं मिलता है। गुप्त साम्राज्य के समय तक शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास आदि इन शब्दों का प्रयोग किसी के नाम पर इतिहास में नहीं हुआ था। इन शब्दों का प्रयोग स्वामी शंकराचार्य (सन् 788 ई० से 820 ई० तक) के द्वारा नवीन हिन्दू धर्म प्रचलित करने के बाद शुरु हुआ। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा और बशेशरनाथ रेयू ने गुप्तों को चन्द्रवंशीय क्षत्रिय लिखा है। बम्बई गजेटियर जिल्द भाग 2, पृ० 578, नोट 3 में और पाली संस्कृत एण्ड ओल्ड केनीयरज इन्स्क्रीपशन्स नं० 108 में भी इन लोगों को चन्द्रवंशी क्षत्रिय लिखा है। इन गुप्त लोगों के धारण या धारी गोत्र के जाट संयुक्त पंजाब के निम्नलिखित जिलों में बड़ी संख्या में बसे हुए हैं – लाहौर, अमृतसर, सियालकोट, गुरदासपुर, गुजरांवाला, जालन्धर, कपूरथला, जींद, नाभा, पटियाला, मालेरकोटला, लुधियाना, हिसार।
4. डाक्टर जायसवाल ने अपने अंग्रेजी इतिहास के पृ० 115-116 पर गुप्तवंश को कारसकर जाट जाति सिद्ध किया है। कारसकर, कक्कर और खोखर एक नाम के अपभ्रंश हैं। खोखर जाटों की एक बड़ी खाप मुलतान देश में रही जिन्होंने मुहम्मद गौरी से टक्कर ली थी और उसका सिर काट लिया था। इस खोखर जाट गोत्र के लोग बड़े वीर योद्धा थे। इनका वर्णन अलग से उचित अध्याय में किया जाएगा।
5.
इन गुप्त सम्राटों के वैवाहिक सम्बन्ध जाटवंशों में ही रहे। जैसे चन्द्रगुप्त प्रथम की महारानी कुमारदेवी लिच्छवि जाटवंश की राजकुमारी थी जो कि सम्राट् समुद्रगुप्त की माता थी। समुद्रगुप्त की महारानी दत्ता महादेवी यौधेय जाटवंश की राजकुमारी थी जिसके प्रथम पुत्र रामगुप्त का जन्म पाटलिपुत्र में हुआ और उसी से दूसरे पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का जन्म अग्रोदका (अग्रोहा) में हुआ जो यौधेयों की राजधानी थी जिसका शासक उसका पिता था। रामगुप्त की पटरानी ध्रुवदेवी मालव या मल्ल जाटवंश की पुत्री थी। ध्रुवदेवी अपनी सास दत्तादेवी और परसास कुमारदेवी की योग्य बहू थी।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने भी नागवंश (जाटवंश) तथा वाकाटकवंश (जाटवंश) के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करके अपनी शक्ति को बढ़ाया। उसने नागराज की कन्या कुबेर नाग से स्वयं विवाह किया जिससे चन्द्रगुप्त द्वितीय के यहां प्रभावती नामक कन्या उत्पन्न हुई। उस प्रभावती कन्या का विवाह पूर्वी मालवा के वाकाटकवंश के राजा रुद्रसेन द्वितीय से कर दिया गया।
6.
गुप्त शब्द के विषय में
ऋषि पाणिनि ने दो शब्द
गोप्तरी और
गुप्ती लिखे हैं। वी० एस० अग्रवाल ने “India as known to Panini” में इन शब्दों का स्पष्ट अर्थ किया है कि
गुप्ती का अर्थ रक्षा है और
गोप्तरी का अर्थ सैनिक प्रबन्धकला से है। इस आधार से जो मनुष्य रक्षा करने का अधिकारी होता है
वह गुप्त या गोप्त कहलाता था। कश्मीरी कवि कल्हण ने अपनी ‘राजतरंगिणी’ में ‘गुप्तरी’ शब्द लिखा है जिसका अर्थ किया है
“पृथ्वी का रक्षक” या “प्रदेश का रक्षक” (Rajat, viii, 341 and 339. stein Edition)। गुप्त का अर्थ सैनिक राज्यपाल भी है और यह इसी अभिप्राय से पांचवीं ई० पू० से सन् आठवीं शताब्दी तक प्रयोग में लाया गया और गुप्त सम्राटों ने भी इस गुप्त शब्द का इसी तरह प्रयोग किया।
यह बात ठीक समझ में आ जानी चाहिए कि गुप्त कुलनाम या उपनाम के तौर पर प्रयोग में नहीं लाया जाता, यह तो सदा व्यक्तिगत नाम का भाग है। यदि हम गुप्त का अर्थ वैश्य जाति के उपनाम या कुलनाम का लगा लें तो चाणक्य भी वैश्य जाति का हुआ क्योंकि उसका नाम विष्णुगुप्त था। किन्तु वह तो बड़ा विद्वान् ब्राह्मण था।
इस तरह सहस्रों नाम हैं जिनके बाद गुप्त लगता है। उदाहरण के तौर पर
चन्द्रगुप्त मौर्य जाट क्षत्रिय था। अनेक प्रसिद्ध ब्राह्मणों और क्षत्रियों के नाम के बाद में गुप्त मिल जाएगा परन्तु इस से वे वैश्य जाति के नहीं बन सकते। अतः निर्णय यह हुआ कि गुप्त नाम का अभिप्राय केवल सैनिक राज्यपाल से है, और यह कभी भी उपनाम या कुलनाम या जाति के नाम से प्रयोग में नहीं लाया गया।
7. जब मथुरा में धारण गोत्र के जाटों का शासन था तब वहां इन्होंने विचार किया कि भारत को संयुक्त करके एक साम्राज्य बनाकर उसका सामान्य राज्यशासन बनाया जाए। इस उद्देश्य से इन्होंने लिच्छविवंशज जाटों से वैवाहिक सम्बन्ध किए, उस वंश का गणराज्य उस समय मगध के निकट वैशाली में था।
डा० जायसवाल ने स्वयं खोज करके यह प्रमाणों द्वारा सिद्ध कर दिया कि गुप्त लोग जाट थे। (JRAS, 1901, P. 99; 1905, P. 814; ABORI XX P. 50; JBORS, xix, P. 113-116; vol xxi, P. 77 and vol xxi, P. 275)।
डा० जायसवाल की इस बात को दशरथ शर्मा तथा दूसरों ने भी प्रमाणित माना है।
डा० जायसवाल के इस मत कि गुप्त लोग जाट थे के पक्ष में लेख्य प्रमाण हैं जो कि ‘आर्य मंजूसरी मूला कल्पा’ नामक भारत का इतिहास, जो संस्कृत एवं तिब्बती भाषा में आठवीं शताब्दी ई० से पहले लिखा गया, उस पुस्तक के श्लोक 759 में लिखा है कि “एक महान् सम्राट् जो मथुरा जाट परिवार का था और जिसकी माता एक वैशाली कन्या थी, वह मगध देश का सम्राट् बना।” (Imperial History of India, P. 72)।
यह हवाला समुद्रगुप्त का है जिसकी माता एक वैशाली राज्य की राजकुमारी थी।
उस सम्राट् समुद्रगुप्त ने अपने सिक्कों पर “लिच्छवि दौहित्र” बड़े गर्व से प्रकाशित करवाया था।
चन्द्रगुप्त प्रथम मथुरा का जाट था जिसका विवाह लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से हुआ था। उस सम्राट् के सिक्कों पर उन दोनों की मूर्तियां थीं।
8. परिणाम -
सब प्रकार से खोज करने से यह ज्ञात हुआ कि गुप्त लोग मथुरा के धारण गोत्र के जाट थे। इसके हर प्रकार के प्रमाण हैं जैसे लेखप्रमाण, शिलालेख, ऐतिहासिक, शास्त्रीय, मुद्रा सम्बन्धी आदि। परिणाम केवल एक ही है कि ‘गुप्त’ लोग जाट थे, जो शुरु में मध्य एशिया से आए, अपनी राजनीतिक कला और शस्त्रशक्ति के बल से मगध साम्राज्य के शासक बन गए, जहां पर लगभग 300 वर्ष तक शासन किया।
इसलिए प्रत्येक इतिहासकार का कर्त्तव्य है, विशेषकर उनका जो सच्चाई और न्याय में विश्वास करते हैं, वे असत्य लेखों तथा मतों को स्पष्ट रूप से त्याग दें और सत्य मत व लेख को मानें।
See the following page of Jatland Wiki -
http://www.jatland.com/home/Jat_History_Dalip_Singh_Ahlawat/Chapter_V (Page Nos. 492-495)
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