Dohe

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amritameerut01

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Found the earlier thread locked , thats y posting in a new one.:)

कंकड़ पत्थर जोड़कर , मस्जिद लियो बनाये ,
चढ़ कर मुलाह बांग दे , क्या बहरा हुआ खुदाए I


देवी बड़ी ना देवता , सूरज बड़ा ना चन्द ,
आदि अंत दोनों बड़े , के गुरु के गोविन्द I


माला फेरूँ ना हरी भजूं , मुख से कहूँ ना राम,
मेरे हरी मोको भजें , तब पाऊं विश्राम I


भय से भक्ति करें सबै , भय से पूजा होए ,
भय पारस है जीव को , निर्भय होए ना कोए I


शब्द बराबर धन नहीं , जो कोई जाने बोल ,
हीरा तो दामों मिलें , शब्द मोल ना तोल I
 
Amazing thread Amrita....Anil will contribute a lot:)

मनका मनका फेर के मिटा ना मन का फेर
कनका मनका डारी के मन का मनका फेर

Hope its right
 
One of my favorites:
Kabira garv na kijiye, ooncha dekh aavaas
Kaal pado bhui letna, oopar jamsi ghaas

Another one I really like:
Kabira man nirmal bhaya, jaisa ganga neer
Paache paache hari firey, kehat Kabir Kabir
 
कबीर के दोहे

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥
 
Amazing thread Amrita....Anil will contribute a lot:)

मनका मनका फेर के मिटा ना मन का फेर
कनका मनका डारी के मन का मनका फेर

Hope its right


Thnx Sunita.......

It is :

माला फेरत युग गया , फिरा ना मनका फेर ,
करका मनका डारी दे , मनका मनका फेर I
 
Thnx to all for their contribution.

Kindly try to post max. 5 dohe at a time only, otherwise readers might loose interest. :)

And dont forget to post ur favourite one...;)
 
Put meaning and brief explanations as well if possible!

I will do the same!
( I have a book and will write from the same! :))

And i apologise for repeating any one of those!

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My first 5
=========
कबीर गर्व न कीजिये , इस जोवन की आस
टेसू फूला दिवस दस , खंखर भय पलास !
( जवानी की आशा (मद) में , पड़कर क्यूँ अपना जीवन बिगाड़ रहे हो ? पलास के पौधे को फूलों के झाड़ जाने पर उसकी और कोई निहारता तक नहीं है , वैसे ही तेरी यह जवानी है )


कबीर गर्व न कीजिये , ऊंचा देखि आवास
काल परों भूईं लेटना , ऊपर जमसी घास !
(अपनी भव्य ईमारत को देख कर गर्व मत कर , आखिर में तुझे पृथ्वी के भीतर ही लेटना है और तेरे ऊपर घास को ही उगना है )


कबीरा गर्व न कीजिये , चाम लपेटी हाड
हयबर ऊपर छत्रतट , तो भी देवें गाड़ !
(शरीर का घमंड मत कर , सर्वोत्तम घोडे की सवारी तथा एक्चात्र राज्य का स्वामी होने पर भी एक दिन तेरे शरीर को लोग भूमि में गाड़ देंगे )

प्रेम न बाडी उपजे , प्रेम न हाट बिकाए
राजा प्रजा जो भी रुचे , शीश देही ले जाए !
( प्रेम बाडी में नहीं उगता , न बाजार में बिकता , राजा हो या साधारण इंसान , जिसे चाहिए , अपने सर्व निछावर करके प्राप्त कर सकता है !)


ऊंचे कुल का जनमिया , करनी उंच न होए
सुवर्ण कलश सुरा भरा , साधुन निंदा होए
(सिर्फ उच्च कुल में जन्म्नें से ही किसी का आचरण उच्च श्रेणी का नहीं हो जाता , सोने के कलश में यदि मदिरा भरी हो तो भी श्रेष्ट पुरुष उसकी निंदा ही करते हैं )
 
Another one I really like:
Kabira man nirmal bhaya, jaisa ganga neer
Paache paache hari firey, kehat Kabir Kabir


Sorry can't stop myelf from adding this one to your's Satyeshwar!

माला फेरूँ न हरी भजूँ , मुख से कहूं न राम
मेरे हरी मौको भजें , तब पाऊँ विश्राम !! :)




Only to realise later that Amrita had posed this one earlier ! : )
 
Last edited by a moderator:
As the owner of this thread requested....I am submiting only 5 dohe....


(1)
सफल वही है आजकल, वही हुआ सिरमौर।
जिसकी कथनी और है, जिसकी करनी और।।

(2)
हमको यह सुविधा मिली, पार उतरने हेतु।
नदिया तो है आग की, और मोम का सेतु।।

(3)
हर कोई हमको मिला, पहने हुए नकाब।
किसको अब अच्छा कहें, किसको कहें खराब।।

(4)
सुख सुविधा के कर लिये, जमा सभी सामान।
कौड़ी पास न प्रेम की, बनते है धनवान ।।

(5)
सागर से रखती नहीं, सीपी कोई आस।
एक स्वाती की बूँद से, बुझ जाती है प्यास।।
 
ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोये ।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलया कोई ।
जो मन खोजा आपना, तो मुझ से बुरा ना कोई ॥

साँईं इतना दीजिये, जामें कुटुम्ब समाये ।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू ना भूखा जाये ॥

दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे ना कोये ।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होये ॥

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होये ।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फ़ल होये ॥
 
Last edited:
I m sorry mujhe 1 bhi pooora naahe aata. So i m watching all the Posts and thanks Amrita g and other Contributors its really a nice thread after a long time. :)
 
"Kabir Soyee Soorma, Man Soon Maande Jhoojh
Panch Pyada Paari Le, Door Kare Sab Dooj"


In the time period Kabir lived there were lot of wars and fighting taking around. Instead of this fighting and killing outside, Kabir redirects our attention to waging a war inside of us via this verse. The mind is the root of all our troubles. This mind is what creates a myriad of thoughts that drive us everywhere and do not allow us to rest in peace. Thoughts are instigated, fed and driven by our five sensual desires - Lust, Anger, Intoxication with Pride, Attachment and Greed. He calls these as pawns because they are protecting the true enemy that lies behind - The Mind. Here the game is won only when we go beyond the sensual (pawn-like) pleasures and conquer the Mind who has been running the show. Kabir then tells us that removing the mind takes away the root of all misery which is the feeling of the "other". There is no "other" anymore as this distinction comes via a creation of our mind. Once the mind is gone there is nobody else except us ourselves.​
 
रहीम के दोहे

खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान॥


टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार॥

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय॥


रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥
 


These are simple to understand thats y not explaining the meaning...:)

माँगन मरण समान है , मत मांगो कोई भीख ,
माँगन से मरना भला , यह सतगुरु की सीख I


मेरा मुझ में कुछ नाही , जो कुछ है सो तेरा,
तेरा तुझ को सोपते , क्या लागे है मेरा I


कबीरा गर्व ना कीजिये , कबहू ना हँसिये कोए ,
अजयी नाव समुन्द्र में , का जाने का होए I


जहाँ दया वहां धर्म है , जहाँ लोभ वहां पाप,
जहाँ क्रोध वहां काल है ,जहाँ क्षमा वहां आप I


जल में बसे कमोध्नी , चन्दा बसे अकास ,
जो है जांको भवता , सो ताहि के पास I
 
यों ही होता है सदा, हर चूनर के संग
पंछी बनकर धूप में, उड़ जाते हैं रंग


पंछी मानव, फूल, जल, अलग-अलग आकार
माटी का घर एक ही, सारे रिश्तेदार


सीधा सादा डाकिया जादू करे महान
एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान


छोटा कर के देखिए जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाँहों भर संसार
 
Kisi ne kabhi yeh doha suna hai kya?
Jab man changa to kathoti mein ganga

Sant Ravidas ji ka hai aur iske peeche ek badi hi acchi kahaani bhi hai. Yadi kisi ko iske baare mein kuch aur jaankaari ho to mujhe avashya bataiye.
 
kisi ne kabhi yeh doha suna hai kya?
jab man changa to kathoti mein ganga

sant ravidas ji ka hai aur iske peeche ek badi hi acchi kahaani bhi hai. Yadi kisi ko iske baare mein kuch aur jaankaari ho to mujhe avashya bataiye.


एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास (रविदास) के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, "गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को जूते बनाकर आज ही देने का मैंने वचन दे रखा है। यदि मैं उसे आज जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा। गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा ? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है।"

कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि - मन चंगा तो कठौती में गंगा।
 
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