Doobaldhan walon kaa kaarnama

dndeswal

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दूबळधन वालों का कारनामा


बड़ों के मुंह से यह किस्सा सुना है - आपकी जानकारी के लिए यहां लिख रहा हूं ।

सन् 1940 के आसपास बारिश नहीं हुई, जोहड़-तालाब सूख गए । हरयाणा की बेरी तहसील में दूबळधन काफी बड़ा गांव है । गांव का जोहड़ सूख चुका था, लोग उसकी छंटाई कर रहे थे यानि जोहड़ की तलहटी की मिट्टी को खोद कर किनारे लगा रहे थे । वहां एक पुरानी खंडित (टूटी हुई) मूर्ति मिली । कई पंडित कहने लगे कि अब तो एक मंदिर बनवाना पड़ेगा । जाट नहीं माने, कहने लगे कि एक टूटी मूर्ति के पीछे इतना बड़ा बवंडर खड़ा करने की क्या जरूरत है ? बाहमणों की जिद देखकर जाट बोले कि चलो, हम खुद इस सूखे जोहड़ में ही एक शिवजी की मूर्ति बना देते हैं, इसी जोहड़ की गीली मिट्टी से ।


कई जवान लड़कों ने जोहड़ के गारे (गीली मिट्टी) से एक शिवजी की मूर्ति बनाई । साथ में गणेश की मूर्ति बना दी । शिवजी का दाहिना हाथ गणेश के सिर पर रखा था ।


फिर उनमें से एक ने अजीब सा काम किया । शिवजी के सामने एक खड़े हुए जाट की मूर्ति बनाई, जिसके हाथ में दुसंगी जेली थी और जेली का अगला हिस्सा शिवजी की मूर्ति के बिल्कुल पास यानि उसके पेट पर रखा था ।

कई दिन तक लोग उन तीनों मूर्तियों को देखकर दिल बहलाते रहे । फिर एक बाहमण बूझ बैठा - अरै, यो के सांग कर राख्या सै, न्यूं तै बताओ अक शिवजी महाराज कै ऊपर जेळी क्यूं धर राक्खी सै ?

एक जाट बोल्या - पंडित जी, तेरी समझ में ना आवै या बात । यो जाट आपणी जेळी दिखा-कै शिवजी तैं न्यूं कहै सै - "रै मोडे, के तै मींह बरसा दे, नहीं तै या जेळी तेरे पेट में गचो दूंगा ।" फिर शिवजी इस गणेश के सिर पै हाथ धर कै न्यूं कह सै - "भाई, मेरै बेशक जेळी गचो दे । मन्नैं आपणे छोरे की सूं, इस साल तै मेरै धोरै पाणी की एक बूंद भी कोनी !!"

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असली जट्टां का कारनामा | आज काल आले जाट ते भाम्नां ने भी पाछे छोड्गे अन्ध्विसवासां में |
 
दूबळधन वालों का कारनामा

बहुत बढ़िया छाप दिया देसवाल साहब | इस ने कहा करें असली जाट जोक ||||||:rock
 
बहुत सही किया देशवाल साहब यो आड़े छाप क न
नु ए काट्या था यो रोग उस टेम !
 
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दूबळधन वालों का कारनामा


बड़ों के मुंह से यह किस्सा सुना है - आपकी जानकारी के लिए यहां लिख रहा हूं ।

सन् 1940 के आसपास बारिश नहीं हुई, जोहड़-तालाब सूख गए । हरयाणा की बेरी तहसील में दूबळधन काफी बड़ा गांव है । गांव का जोहड़ सूख चुका था, लोग उसकी छंटाई कर रहे थे यानि जोहड़ की तलहटी की मिट्टी को खोद कर किनारे लगा रहे थे । वहां एक पुरानी खंडित (टूटी हुई) मूर्ति मिली । कई पंडित कहने लगे कि अब तो एक मंदिर बनवाना पड़ेगा । जाट नहीं माने, कहने लगे कि एक टूटी मूर्ति के पीछे इतना बड़ा बवंडर खड़ा करने की क्या जरूरत है ? बाहमणों की जिद देखकर जाट बोले कि चलो, हम खुद इस सूखे जोहड़ में ही एक शिवजी की मूर्ति बना देते हैं, इसी जोहड़ की गीली मिट्टी से ।


कई जवान लड़कों ने जोहड़ के गारे (गीली मिट्टी) से एक शिवजी की मूर्ति बनाई । साथ में गणेश की मूर्ति बना दी । शिवजी का दाहिना हाथ गणेश के सिर पर रखा था ।


फिर उनमें से एक ने अजीब सा काम किया । शिवजी के सामने एक खड़े हुए जाट की मूर्ति बनाई, जिसके हाथ में दुसंगी जेली थी और जेली का अगला हिस्सा शिवजी की मूर्ति के बिल्कुल पास यानि उसके पेट पर रखा था ।

कई दिन तक लोग उन तीनों मूर्तियों को देखकर दिल बहलाते रहे । फिर एक बाहमण बूझ बैठा - अरै, यो के सांग कर राख्या सै, न्यूं तै बताओ अक शिवजी महाराज कै ऊपर जेळी क्यूं धर राक्खी सै ?

एक जाट बोल्या - पंडित जी, तेरी समझ में ना आवै या बात । यो जाट आपणी जेळी दिखा-कै शिवजी तैं न्यूं कहै सै - "रै मोडे, के तै मींह बरसा दे, नहीं तै या जेळी तेरे पेट में गचो दूंगा ।" फिर शिवजी इस गणेश के सिर पै हाथ धर कै न्यूं कह सै - "भाई, मेरै बेशक जेळी गचो दे । मन्नैं आपणे छोरे की सूं, इस साल तै मेरै धोरै पाणी की एक बूंद भी कोनी !!"

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Ji saa aa gyaa
 
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दूबळधन वालों का कारनामा


बड़ों के मुंह से यह किस्सा सुना है - आपकी जानकारी के लिए यहां लिख रहा हूं ।

सन् 1940 के आसपास बारिश नहीं हुई, जोहड़-तालाब सूख गए । हरयाणा की बेरी तहसील में दूबळधन काफी बड़ा गांव है । गांव का जोहड़ सूख चुका था, लोग उसकी छंटाई कर रहे थे यानि जोहड़ की तलहटी की मिट्टी को खोद कर किनारे लगा रहे थे । वहां एक पुरानी खंडित (टूटी हुई) मूर्ति मिली । कई पंडित कहने .........................................................................................................................................................................


बोल्या - पंडित जी, तेरी समझ में ना आवै या बात । यो जाट आपणी जेळी दिखा-कै शिवजी तैं न्यूं कहै सै - "रै मोडे, के तै मींह बरसा दे, नहीं तै या जेळी तेरे पेट में गचो दूंगा ।" फिर शिवजी इस गणेश के सिर पै हाथ धर कै न्यूं कह सै - "भाई, मेरै बेशक जेळी गचो दे । मन्नैं आपणे छोरे की सूं, इस साल तै मेरै धोरै पाणी की एक बूंद भी कोनी !!"
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दोनों same हैं , जाट और बाह्मण !

एक बिना जाने कह रहा है पूजा करो,


दूसरा बिना जाने कह रहा है नहीं करूंगा,

किसी को भी logical या सम्जदार नहीं कह सकते,

दोनों मूर्खों की तरह व्यवहार कर रहे हैं !

असली मजा तब्ब आता जब्ब जाट कह्न्द्दे अक्क हामनै सारी meditation

आळी विधियां बेरा हैं जो शिवजी नै बता रख्ही हैं !

हाम उन विधियां की प्रक्टिस करेंगे न कि मूर्ति क़ी पूजा !
 
katee original!!! jee sa aa gaya :) :)




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दूबळधन वालों का कारनामा


बड़ों के मुंह से यह किस्सा सुना है - आपकी जानकारी के लिए यहां लिख रहा हूं ।

सन् 1940 के आसपास बारिश नहीं हुई, जोहड़-तालाब सूख गए । हरयाणा की बेरी तहसील में दूबळधन काफी बड़ा गांव है । गांव का जोहड़ सूख चुका था, लोग उसकी छंटाई कर रहे थे यानि जोहड़ की तलहटी की मिट्टी को खोद कर किनारे लगा रहे थे । वहां एक पुरानी खंडित (टूटी हुई) मूर्ति मिली । कई पंडित कहने लगे कि अब तो एक मंदिर बनवाना पड़ेगा । जाट नहीं माने, कहने लगे कि एक टूटी मूर्ति के पीछे इतना बड़ा बवंडर खड़ा करने की क्या जरूरत है ? बाहमणों की जिद देखकर जाट बोले कि चलो, हम खुद इस सूखे जोहड़ में ही एक शिवजी की मूर्ति बना देते हैं, इसी जोहड़ की गीली मिट्टी से ।


कई जवान लड़कों ने जोहड़ के गारे (गीली मिट्टी) से एक शिवजी की मूर्ति बनाई । साथ में गणेश की मूर्ति बना दी । शिवजी का दाहिना हाथ गणेश के सिर पर रखा था ।


फिर उनमें से एक ने अजीब सा काम किया । शिवजी के सामने एक खड़े हुए जाट की मूर्ति बनाई, जिसके हाथ में दुसंगी जेली थी और जेली का अगला हिस्सा शिवजी की मूर्ति के बिल्कुल पास यानि उसके पेट पर रखा था ।

कई दिन तक लोग उन तीनों मूर्तियों को देखकर दिल बहलाते रहे । फिर एक बाहमण बूझ बैठा - अरै, यो के सांग कर राख्या सै, न्यूं तै बताओ अक शिवजी महाराज कै ऊपर जेळी क्यूं धर राक्खी सै ?

एक जाट बोल्या - पंडित जी, तेरी समझ में ना आवै या बात । यो जाट आपणी जेळी दिखा-कै शिवजी तैं न्यूं कहै सै - "रै मोडे, के तै मींह बरसा दे, नहीं तै या जेळी तेरे पेट में गचो दूंगा ।" फिर शिवजी इस गणेश के सिर पै हाथ धर कै न्यूं कह सै - "भाई, मेरै बेशक जेळी गचो दे । मन्नैं आपणे छोरे की सूं, इस साल तै मेरै धोरै पाणी की एक बूंद भी कोनी !!"

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दूबळधन और इस्सरहेड़ी

समय का हेर-फेर देखो । आज गेहूं की भरपूर उपज है । 1970 के आसपास देश में गेहूं की कमी थी और गेहूं का 'ब्लैक' होता था । उस समय गेहूं की सरकारी खरीद का मूल्य हरयाणा में कुल 74 रुपये क्विंटल होता था जबकि दिल्ली में गेहूं 100 रुपये क्विंटल के आस-पास बिक जाता था । हरयाणा बार्डर से लोग गेहूं दिल्ली लाते थे और पुलिस उन्हें पकड़ लेती थी । लोग कच्चे रास्ते से भी 1-2 बोरी गेहूं ऊंट पर लाद कर पार कर देते थे ।

झज्जर जिले के बेरी कस्बे से आगे दूबळधन एक काफी बड़ा गांव है । उस गांव का एक जवान चौधरी एक ऊंट पर गेहूं की दो बोरी रखकर रात को कच्चे रास्ते से दिल्ली बार्डर की तरफ चला - नजफगढ की मंडी में बेचने के लिए । सुबह 4 बजे के करीब दिल्ली बार्डर के गांव इस्सरहेड़ी के पास कच्चे रास्ते से पहुंच गया । वहां पुलिस पहले ही छिपी बैठी थी । जब पुलिस वाले पास आये तो चौधरी ने ऊंट को छोड़कर गांव की तरफ दुड़की* लगाई - सोचा कि ये इस्सरहेड़ी भी दूबळधन की तरह बड़ा गांव होगा, इसकी गलियों में गुम हो जाऊंगा और पुलिस के हाथ नहीं आऊंगा ।

इस्सरहेड़ी दरअसल एक छोटा सा गांव है । चौधरी एक गली में घुसा और थोड़ी ही देर में गांव का दूसरा सिरा आ गया । फिर दूसरी गली की तरफ भागा और एक मिनट बाद फिर गांव का दूसरा छोर आ गया । वहां आकर वो रुक गया । जब पुलिस वाले पास आये तो बोला : "ओ भाई, मन्नै बेशक पकड़ ल्यो, पर पहल्यां न्यूं बताओ अक यो गाम बसाया किस अनाड़ी नै - इसतैं तै मेरी एक डाक बी ना उटती*" !!


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* (दुड़की) - दौड़

*(इसतैं तै मेरी एक डाक बी ना उटती) – इससे तो मेरी एक छलांग भी बर्दाश्त नहीं होती.


( copied from my old thread - Doobaldhan Vs. Issarheddihttp://www.jatland.com/forums/showt...ssarheddi&highlight=Doobaldhan+Vs.+Issarheddi
http://www.jatland.com/forums/showt...ssarheddi&highlight=Doobaldhan+Vs.+Issarheddi )

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