ek najam

htomar

New member
चाहता हूँ कि तेरा रूप मेरी चाह में हो
तेरी हर साँस मेरी साँस की पनाह में हो
मेरे महबूब तेरा ख़ुद का जिस्म न हो
मेरे एहसास की मूरत कोई तिलिस्म न हो
ढूँढता फिरता हूँ हर सिम्त भुला के ख़ुद को
अपनी पोशीदा रिहाइश का पता दे मुझको
तुझसे मिलने की क़सम मैंने नहीं तोड़ी है
दिल ने उम्मीद बहरहाल नहीं छोड़ी है
तुझको पाने का अभी मुझको इख़्तियार नहीं
पर मेरा इश्क़ कोई रेत की दीवार नहीं
बावफ़ा अब भी हूँ पर मेरी कहानी है अलग
मेरी आँखें हैं अलग आँख का पानी है अलग
अब न मजबूरी-ओ-दूरी का गिला कर मुझसे
यूँ नहीं है तो तसव्वुर में मिला कर मुझसे
मेरे महबूब तू इक रोज़ इधर आयेगा
हाँ मगर वक़्त का दरिया तो गुज़र जायेगा
तब न शाख़ों पे कहीं गुल नही पत्ते होंगे
जा-ब-जा बिखरे हुये बर्फ़ के छत्ते होंगे
एक मनहूस सफ़ेदी यहाँ फैली होगी
चाँदनी अपनी ही परछाई से मैली होगी
तब भी जज़्बात पे हालात का पहरा होगा
वक़्त इक फीकी हँसी पर कहीं ठहरा होगा
पस्त-कदमों से तू चलता हुआ जब आयेगा
सर्द-तूफ़ान के झोकों से सिहर जायेगा
मेरे अल्फ़ाज़ में तब भी यही नरमी होगी
और मेरे कोट में अहसास की गरमी होगी

 
हैं आशिक़ और माशूक जहाँ वां शाह बज़ीरी है बाबा
न रोना है न धोना है न दर्द असीरी है बाबा
दिन-रात बहारें चुहलें हैं और इश्क़ सग़ीरी है बाबा
जो आशिक़ हैं सो जानें हैं यह भेड फ़क़ीरी है बाबा

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

है चाह फ़क़त एक दिलबर की फिर और किसी की चाह नहीं
एक राह उसी से रखते हैं फिर और किसी से राह नहीं
यां जितना रंजो तरद्दुद(सोच) है हम एक से भी आगाह नहीं
कुछ करने का सन्देह नहीं, कुछ जीने की परवाह नहीं
हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

कुछ ज़ुल्म नहीं, कुछ ज़ोर नहीं, कुछ दाद(न्याय) नहीं फ़रयाद नहीं
कुछ क़ैद नहीं, कुछ बन्द नहीं, कुछ जब्र नहीं, आज़ाद नहीं
शागिर्द नहीं, उस्ताद नहीं, वीरान नहीं, आबाद नहीं
हैं जितनी बातें दुनियां की सब भूल गए कुछ याद नहीं

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

जिस सिम्त नज़र भर देखे हैं उस दिलबर की फुलवारी है
कहीं सब्ज़ी की हरियाली है, कहीं फूलों की गुलकारी है
दिन-रात मगन ख़ुश बैठे हैं और आस उसी की भारी है
बस आप ही वह दातारी हैं और आप ही वह भंडारी हैं

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

नित इश्रत है, नित फ़रहत है, नित राहत है, नित शादी है
नित मेहरो करम है दिलबर का नित ख़ूबी ख़ूब मुरादी है
जब उमड़ा दरिया उल्फ़त का हर चार तरफ़ आबादी है
हर रात नई एक शादी है हर रोज़ मुबारकबादी है

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

है तन तो गुल के रंग बना और मुँह पर हरदम लाली है
जुज़ ऐशो तरब(हर्षोल्लास) कुछ और नहीं जिस दिन से सुरत संभाली है
होंठो में राग तमाशे का और गत पर बजती ताली है
हर रोज़ बसंत और होली है और हर इक रात दिवाली है

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

हम चाकर जिसके हुस्न के हैं वह दिलबर सबसे आला है
उसने ही हमको जी बख़्शा उसने ही हमको पाला है
दिल अपना भोला-भाला है और इश्क़ बड़ा मतवाला है
क्या कहिए और ’नज़ीर’ आगे अब कौन समझने वाला है

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा
 
हैं आशिक़ और माशूक जहाँ वां शाह बज़ीरी है बाबा
न रोना है न धोना है न दर्द असीरी है बाबा
दिन-रात बहारें चुहलें हैं और इश्क़ सग़ीरी है बाबा
जो आशिक़ हैं सो जानें हैं यह भेड फ़क़ीरी है बाबा

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

है चाह फ़क़त एक दिलबर की फिर और किसी की चाह नहीं
एक राह उसी से रखते हैं फिर और किसी से राह नहीं
यां जितना रंजो तरद्दुद(सोच) है हम एक से भी आगाह नहीं
कुछ करने का सन्देह नहीं, कुछ जीने की परवाह नहीं
हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

कुछ ज़ुल्म नहीं, कुछ ज़ोर नहीं, कुछ दाद(न्याय) नहीं फ़रयाद नहीं
कुछ क़ैद नहीं, कुछ बन्द नहीं, कुछ जब्र नहीं, आज़ाद नहीं
शागिर्द नहीं, उस्ताद नहीं, वीरान नहीं, आबाद नहीं
हैं जितनी बातें दुनियां की सब भूल गए कुछ याद नहीं

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

जिस सिम्त नज़र भर देखे हैं उस दिलबर की फुलवारी है
कहीं सब्ज़ी की हरियाली है, कहीं फूलों की गुलकारी है
दिन-रात मगन ख़ुश बैठे हैं और आस उसी की भारी है
बस आप ही वह दातारी हैं और आप ही वह भंडारी हैं

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

नित इश्रत है, नित फ़रहत है, नित राहत है, नित शादी है
नित मेहरो करम है दिलबर का नित ख़ूबी ख़ूब मुरादी है
जब उमड़ा दरिया उल्फ़त का हर चार तरफ़ आबादी है
हर रात नई एक शादी है हर रोज़ मुबारकबादी है

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

है तन तो गुल के रंग बना और मुँह पर हरदम लाली है
जुज़ ऐशो तरब(हर्षोल्लास) कुछ और नहीं जिस दिन से सुरत संभाली है
होंठो में राग तमाशे का और गत पर बजती ताली है
हर रोज़ बसंत और होली है और हर इक रात दिवाली है

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

हम चाकर जिसके हुस्न के हैं वह दिलबर सबसे आला है
उसने ही हमको जी बख़्शा उसने ही हमको पाला है
दिल अपना भोला-भाला है और इश्क़ बड़ा मतवाला है
क्या कहिए और ’नज़ीर’ आगे अब कौन समझने वाला है

हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा

Pan ye baba kaun hai?View attachment 12437
 
याद की राहगुज़र जिसपे इसी सूरत से
मुद्दतें बीत गयीं हैं तुम्हें चलते-चलते
खत्म हो जाय जो दो-चार कदम और चलो
मोड़ पड़ता है जहाँ दश्त-ए-फ़रामोशी का
जिसके आगे न कोई मैं हूँ, न कोई तुम हो


साँस थामें हैं निग़ाहें, कि न जाने किस दम
तुम पलट आओ, गुज़र जाओ, या मुड़ के देखो
गरचे वाकिफ़ हैं निगाहें, के ये सब धोखा है
गर कहीं तुमसे हम-आग़ोश हुई फिर से नज़र
फूट निकलेगी वहाँ और कोई राहगुज़र
फिर इसी तरह जहां होगा मुकाबिल पैहम
साया-ए-ज़ुल्फ़ का और ज़ुंबिश-ए-बाजू का सफ़र


दूसरी बात भी झूठी है, कि दिल जानता है
यहाँ कोई मोड़, कोई दश्त, कोई राह नहीं
जिसके परदे में मेरा माह-ए-रवां डूब सके
तुमसे चलती रहे ये राह, यूँ ही अच्छा है
तुमने मुड़ कर भी न देखा तो कोई बात नहीं!
 
मेरी जाँ तेरी आँख खुलने से पहले
चला हूँ मैं ये रात ढलने से पहले

मैं पत्तों से थोड़ी-सी शबनम उठा लूँ
मैं सूरज की पहली किरण को चुरा लूँ

किसी फूल की खिल-खिलाती हँसी को
किसी खेत की लहलहाती छवी को

चहकते हुए पंछियों की सदाएँ
ठुमकती हुई हिरणियों की अदाएँ

भरी दो-पहर में इक अँबिया की छाया
महकती हवा और नदिया की धारा

जो हो जाये फिर शाम को लाल अम्बर
मैं थोड़ा-सा सिन्दूर उस का चुरा कर

ज़रा अपनी आँखों की डिबिया में भर लूँ
मैं पलकों के पीछे इन्हें क़ैद कर लूँ

इसी आशियाने में चन्दा निकलते
मैं आ जाउँगा लौट कर शाम ढलते

तेरे ख़्वाब का शहर इनसे सजा के
तेरी रात के घर की रंगत बढ़ा के

तेरे चेहरे को रात भर मैं तकूँगा
तेरी नींद की पासबानी करूँगा

यही सोच कर आज घर से चला हूँ

मेरी जाँ तेरी आँख खुलने से पहले
चला हूँ मैं ये रात ढलने से पहले
 
काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा
रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा

बायस-ए-रश्क़ है तन्हा रवी-ए-रहरौ-ए-शौक़
हमसफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंज़िल के सिवा

हम ने दुनिया की हर इक शै से उठाया दिल को
लेकिन इक शोख के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा

तेग़ मुन्सिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद
बेगुनाह कौन है उस शहर मे क़ातिल के सिवा

ज़ाने किस रंग से आई है गुलशन में बहार
कोई नग़मा ही नही शोर-ए-सिलासिल के सिवा
 
टुक हिर्सो-हवा[SUP][/SUP](लालच) को छोड़ मियां, मत देस-बिदेस फिरे मारा
क़ज़्ज़ाक(डाकू)[SUP]http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=बंजारानामा_/_नज़ीर_अकबराबादी#cite_note-1[/SUP] अजल[SUP][/SUP](मौत) का लूटे है दिन-रात बजाकर नक़्क़ारा
क्या बधिया, भैंसा, बैल, शुतुर[SUP][/SUP](ऊंट) क्या गौनें पल्ला सर भारा
क्या गेहूं, चावल, मोठ, मटर, क्या आग, धुआं और अंगारा

सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा

ग़र तू है लक्खी बंजारा और खेप भी तेरी भारी है
ऐ ग़ाफ़िल तुझसे भी चढ़ता इक और बड़ा ब्योपारी है
क्या शक्कर, मिसरी, क़ंद, गरी क्या सांभर मीठा-खारी है
क्या दाख़, मुनक़्क़ा, सोंठ, मिरच क्या केसर, लौंग, सुपारी है

सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा

तू बधिया लादे बैल भरे जो पूरब पच्छिम जावेगा
या सूद बढ़ाकर लावेगा या टोटा घाटा पावेगा
क़ज़्ज़ाक़ अजल का रस्ते में जब भाला मार गिरावेगा
धन-दौलत नाती-पोता क्या इक कुनबा काम न आवेगा

सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
 
गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं
उदास तुम भी हो यारों उदास हम भी हैं

फक्त तुमको ही नहीं रंज-ए-चाक दमानी
जो सच कहें तो दरीदा लिबास हम भी हैं

तुम्हारे बाम की शम्में भी तब्नक नहीं
मेरे फलक के सितारे भी ज़र्द ज़र्द से हैं

तुम्हें तुम्हारे आइना खाने की ज़न्गालूदा
मेरे सुराही और सागर गर्द गर्द से हैं

न तुमको अपने खादों खाल ही नज़र आयें
न मैं यह देख सकूं जाम में भरा क्या है

बशारतों पे वोह जले पड़े की दोनों को
समझ में कुछ नहीं आता की माज़रा क्या है

न सर में व्हो गरूर-ए-कसीदा कामती है
न कुम्रियों की उदासी में कुछ कमी आई

न खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के गुलाब
न शाख-ए-अमन लिए फाख्ता कोई आई

आलम तो यह है की दोनों के मर्ज़ारों से
हवा-ए-फितना-ओ-बू-ए-फसाद आती है

सितम तो यह है की दोनों को वहम है की बहार
उदूक-ए-खून में नहाने के बाद आती है

सो यह माल हुआ की इस दरिंदगी का की
अब तुम्हरे हाथ सलामत रहे न हाथ मेरे

करें तो किस से करें अपनी लग्ज़िसों का गिला
न कोई साथ तुम्हरे न कोई साथ मेरे

तुम्हें भी जिद है की मास्क-ए-सितम रहे जारी
हमें भी नाज़ की जारो जाफा के आदि हैं

तुम्हें भी जोम महाभारत लड़ी तुमने
हमें भी फख्र की हम कर्बला के आदि हैं

तुम्हरे हमारे शहरों की मजबूर बनवा मखलूक
दबी हुई हैं दुखों के हजार्ड हेरों में

अब इनकी तीर-ए-नाशी भी चिराग चाहती है
जो लोग उन्नीस सदी तक रहे अंधेरों में

चिराग जिन से मोहब्बत को रौशनी फैले
चिराग जिन से दिए बेशुमार रोशन हों

तुम्हारे देश में आया हूँ दोस्तों
अब के न साज़-ओ-नगमों की महफ़िल न शायरी के लिए

अगर तुम्हरी ही आन का है सवाल
तो चलो मैं हाथ बढ़ता हूँ दोस्ती के लिए
 
जिस तरह दामन-ए-मश्रिक़ में सहर होती है
ज़र्रे ज़र्रे को तजल्ली की ख़बर होती है
और जब नूर का सैलाब गुज़र जाता है
रात भर एक अंधेरे में बसर होती है
कुछ इसी तरह से है याद के तुम आये थे

जैसे गुलशन में दबे पाओं बहार आती है
पत्ती-पत्ती के लिये लेके निखार आती है
और फिर वक़्त वो आता है के हर मौज-ए-सबा
अपने दामन में लिये गर्द-ओ-ग़ुबार आती है
कुछ इसी तरह से है याद के तुम आये थे

जिस तरह मह्व-ए-सफ़र हो कोई वीराने में
और रस्ते में कहीं कोई ख़ियाबाँ आ जाये
चन्द लम्हों में ख़ियाबाँ के गुज़र जाने पर
सामने फिर वोही दुनिया-ए-बियाबाँ आ जाये
कुछ इसी तरह से है याद के तुम आये थे
 
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है


कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी


अजब न था के मैं बेगाना-ए-अलम रह कर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आँखें
इन्हीं हसीन फ़सानों में महव हो रहता


पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की
तेरे लबों से हलावट के घूँट पी लेता
हयात चीखती फिरती बरहना-सर, और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुप के जी लेता


मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
के तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं


ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रह्गुज़ारों से
महीब साये मेरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ारज़ारों से


न कोई जादह-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िन्दगी मेरी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स मगर फिर भी


कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
 
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है


कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी



This is my favourite. Thanks for uploading here.
 
अब न जाने कितना गम़ उन्*हें पीना होगा
हर पल आँसुओं में डूब कर जीना होगा
दोस्तों किसी का यार न बिछडे़ कभी
आज न जाने किस-किस का घर सूना होगा

अब न सजेंगी मांगे उनकी सिन्*दूरों से
न भाल पे उनके कुमकुम लाल होगा
न दीप जलेंगे दीवाली पे उनके घर
न होली पे अब रंग-गुलाल होगा

खोला होगा कैसे परिणय का बंधन
कैसे स्*नेह से दिया कंगन उतारा होगा
चढा़कर फूल अपने रहनुमा के चरणों पर
कैसे आँसुओं को घुट-घुट कर पीया होगा

गुजारी होंगी शामें जिन हंसी गुलजारों में
उस सबा ने भी दर्द का गीत गाया होगा
बात-बेबात जिक्र जो उनका आया होगा
आँखों में इक दर्द सा सिमट आया होगा

रातों को हुई होगी जो सन्*नाटे से दहशत
तड़प के बेसाख्*ता उन्*हें पुकारा होगा
ढूँढती रहेंगी हकी़र ताउम्र उन्*हें निगाहें
आज मोहब्*बत का 'ताज' भी गम़जा़या होगा
 
जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल
मचल रहा है किसी ख्वाबे-मरमरीं की तरह
हसीन फूल, हसीं पत्तियाँ, हसीं शाखें
लचक रही हैं किसी जिस्मे-नाज़नीं की तरह
फ़िज़ा में घुल से गए हैं उफ़क के नर्म खुतूत
ज़मीं हसीन है, ख्वाबों की सरज़मीं की तरह
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरतीं हैं

कभी गुमान की सूरत कभी यकीं की तरह
वे पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थे
खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह
इन्हीं के साए में फिर आज दो धड़कते दिल
खामोश होठों से कुछ कहने-सुनने आए हैं
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से
ये सोते-जागते लमहे चुराके लाए हैं
यही फ़िज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना था
यहीं से हमने मुहब्बत की इब्तिदा की थी
धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से
हुजूरे-ग़ैब में नन्हीं सी इल्तिजा की थी
कि आरज़ू के कंवल खिल के फूल हो जायें
दिलो-नज़र की दुआयें कबूल हो जायें
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बचकर
नज़र झुकाये हुए और बदन चुराए हुए
खुद अपने कदमों की आहट से, झेंपती, डरती,
खुद अपने साये की जुंबिश से खौफ खाए हुए
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

रवाँ है छोटी-सी कश्ती हवाओं के रुख पर
नदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता है
तुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले से
मेरी खुली हुई बाहों में झूल जाता है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े में
तुम्हारी आँख मुसर्रत से झुकती जाती है
न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँ
ज़बान खुश्क है आवाज़ रुकती जाती है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

मेरे गले में तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैं
तुम्हारे होठों पे मेरे लबों के साये हैं
मुझे यकीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगे
तुम्हें गुमान है कि हम मिलके भी पराये हैं।
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

मेरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को,
अदाए-अज्ज़ो-करम से उठ रही हो तुम
सुहाग-रात जो ढोलक पे गाये जाते हैं,
दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
 
अपने माज़ी[SUP][/SUP] के तसव्वुर से हिरासा[SUP][/SUP] हूँ मैं
अपने गुज़रे हुए दिन [SUP][/SUP] से नफ़रत है मुझे
अपनी बेकार तमन्नओं पे शर्मिंदा हूँ मैं
अपनी बेसुध[SUP][/SUP] उम्मीदों पे निदामत है मुझे

मेरे माज़ी को अंधेरे में दबा रहने दो
मेरा माज़ी मेरी ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं
मेरी उम्मीदों का हासिल मेरी खोज [SUP][/SUP] का सिला
एक बेनाम दुख [SUP][/SUP] के सिवा कुछ भी नहीं
कितनी बेकार उम्मीदों का सहारा लेकर
मैंने महल[SUP][/SUP] सजाये थे किसी की ख़ातिर
कितनी अधूरी [SUP][/SUP] तमन्नाओं के छुपे हुए[SUP][/SUP] ढांचे[SUP][/SUP]
अपने ख़्वाबों मे बसाये थे किसी की ख़ातिर
मुझसे अब मेरी मोहब्बत के फ़साने न पूछो
मुझको कहने दो के मैंने उन्हें चाहा ही नहीं
और वो मस्त निगाहें जो मुझे भूल गई
मैंने उन मस्त निगाहों को सराहा ही नहीं
मुझको कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूँ
इश्क़ नाकाम सही ज़िन्दगी नाकाम नहीं
उनको अपनाने की ख़्वाहिश उन्हें पाने की तलब
शौक़ बेकार सही सै-ग़म[SUP][/SUP](कहने के लिए)अंजाम नहीं
वही गेसू वही नज़र वही होंठ[SUP][/SUP] वही जिस्म
मैं जो चाहूँ कि मुझे और भी मिल सकते हैं
वो कँवल जिनको कभी उनके लिये खिलना था
उनकी नज़रों से बहुत दूर भी खिल सकते हैं
 
आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिसने इस दिल को परीख़ाना बना रखा था
जिसकी उल्फ़त में भुला रखी थी दुनिया हमने
दहर को दहर का अफ़साना बना रखा था

आशना हैं तेरे क़दमों से वो राहें जिन पर
उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है
कारवाँ गुज़रे हैं जिनसे इसी रनाई के
जिसकी इन आँखों ने बेसूद इबादत की है

तुझ से खेली हैं वह महबूब हवाएँ जिनमें
उसके मलबूस की अफ़सुर्दा महक बाक़ी है
तुझ पे भी बरसा है उस बाम से मेहताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है

तू ने देखी है वह पेशानी वह रुख़सार वह होंठ
ज़िन्दगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हमने
तुझ पे उठी हैं वह खोई-खोई साहिर आँखें
तुझको मालूम है क्यों उम्र गँवा दी हमने

हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़मे-उल्फ़त के
इतने एहसान कि गिनवाऊं तो गिनवा न सकूँ
हमने इस इश्क़ में क्या खोया क्या सीखा है
जुज़ तेरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ

आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिर्मां के दुख-दर्द के म’आनी सीखे
ज़ेर द्स्तों के मसाएब को समझना सीखा
सर्द आहों के, रुख़े ज़र्द के म’आनी सीखे
 
कहीं-कहीं से हर चेहरा
तुम जैसा लगता है
तुमको भूल न पायेंगे हम
ऐसा लगता है

ऐसा भी इक रंग है जो
करता है बातें भी
जो भी इसको पहन ले वो
अपना-सा लगता है

तुम क्या बिछड़े भूल गये
रिश्तों की शराफ़त हम
जो भी मिलता है कुछ दिन ही
अच्छा लगता है

अब भी यूँ मिलते हैं हमसे
फूल चमेली के
जैसे इनसे अपना कोई
रिश्ता लगता है

और तो सब कुछ ठीक है लेकिन
कभी-कभी यूँ ही
चलता-फिरता शहर अचानक
तन्हा लगता है
 
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है


कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी


अजब न था के मैं बेगाना-ए-अलम रह कर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आँखें
इन्हीं हसीन फ़सानों में महव हो रहता


पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की
तेरे लबों से हलावट के घूँट पी लेता
हयात चीखती फिरती बरहना-सर, और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुप के जी लेता


मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
के तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं


ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रह्गुज़ारों से
महीब साये मेरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ारज़ारों से


न कोई जादह-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िन्दगी मेरी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स मगर फिर भी


कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

is all of this your work?
 
Back
Top