ek najam

सिलसिला ये दोस्ती का हादसा जैसा लगे
फिर तेरा हर लफ़्ज़ मुझको क्यों दुआ जैसा लगे।

बस्तियाँ जिसने जलाई मज़हबों के नाम पर
मज़हबों से शख़्स वो इकदम जुदा जैसा लगे।

इक परिंदा भूल से क्या आ गया था एक दिन
अब परिंदों को मेरा घर घोंसला जैसा लगे

घंटियों की भाँति जब बजने लगें ख़ामोशियाँ
घंटियों का शोर क्यों न ज़लज़ला जैसा लगे।

बंद कमरे की उमस में छिपकली को देखकर
ज़िंदगी का ये सफ़र इक हौसला जैसा लगे।
 
डर के किसी से छुप जाता है जैसे साँप खज़ाने में
ज़र के ज़ोर से जिंदा हैं सब ख़ाक के इस वीराने में

जैसे रस्म अदा करते हों शहरों की आबादी में
सुब्ह को घर से दूर निकलकर शाम को वापस आने में

नीले रंग में डूबी आँखें खुली पडी थीं सब्ज़े पर
अक्स पड़ा था आसमान का शायद इस पैमाने में

दिल कुछ और भी सर्द हुआ है शामे-शह्र की रौनक में
कितनी जिया बेसूद गई शीशे के लफ्ज़ जलाने में

मैं तो आईने में ख़ुद को तक कर हैरान हुआ
ये चेहरा कुछ और तरह था पहले एक ज़माने में
 
जिसके सम्मोहन में पागल धरती है आकाश भी है
एक पहेली-सी दुनिया ये गल्प भी है इतिहास भी है

चिंतन के सोपान पे चढ़ कर चाँद-सितारे छू आये
लेकिन मन की गहराई में माटी की बू-बास भी है

मानवमन के द्वन्द्व को आख़िर किस साँचे में ढालोगे
‘महारास’ की पृष्ट-भूमि में ओशो का सन्यास भी है

इन्द्र-धनुष के पुल से गुज़र कर इस बस्ती तक आए हैं
जहाँ भूख की धूप सलोनी चंचल है बिन्दास भी है

कंकरीट के इस जंगल में फूल खिले पर गंध नहीं
स्मृतियों की घाटी में यूँ कहने को मधुमास भी है.
 
चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं
नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं

जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर
अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं

बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त
जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं

मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश पर
चंद ग़ज़लें चुटकुलों के बीच आकर मर गईं

वो लम्हा जब झूठ की महफ़िल में सच दाखिल हुआ
साज़िशें उस एक पल में हड़बड़ा कर मर गईं

क्या इसी पल के लिए करता था गुलशन इंतज़ार
जब बहार आई तो कलियाँ खिलखिला कर मर गईं

जिन दीयों में तेल कम था, उन दीयों की रोशनी
तेज़ चमकी और पल में डगमगा कर मर गईं

दिल कहे है- प्रेम में उतरी तो मीरा जी उठीं
अक्ल बोले- बावरी थीं, दिल लगाकर मर गईं
 
न मेरा है न तेरा है ये हिन्दुस्तान सबका है
नहीं समझी गई ये बात तो नुक़सान सबका है

हज़ारों रास्ते खोजे गए उस तक पहुँचने के
मगर पहुँचे हुए ये कह गए भगवान सबका है

जो इसमें मिल गईं नदियाँ वे दिखलाई नहीं देतीं
महासागर बनाने में मगर अहसान सबका है

अनेकों रंग, ख़ुश्बू, नस्ल के फल-फूल पौधे हैं
मगर उपवन की इज़्ज़त-आबरू-ईमान सबका है

हक़ीक़त आदमी की और झटका एक धरती का
जो लावारिस पड़ी है धूल में सामान सबका है

ज़रा से प्यार को ख़ुशियों की हर झोली तरसती है
मुक़द्दर अपना-अपना है, मगर अरमान सबका है

झूठी कहानी हैं सभी राजा औ रानी की
जिसे हम वक़्त कहते हैं वही सुल्तान सबका है
 
सफ़र पर चले हम, सफ़र के लिए
सफ़र में हमें हमसफ़र मिल गया
कुछ लम्हे गुज़ारे हमवक़्त के संग
वो ठहरा मुसाफिर भीड़ में मिल गया
इत्तफ़ाक़ की इस मुलाक़ात को क्या नाम दूँ?



दिन-महीने-साल गुज़रने लगे हैं
वो यादों के झरने भी झरने लगे हैं
समय की राह पर उनका फिर से टकराना
हमें पहचानना और परिचित बताना
पहचान की शुरूआत को क्या नाम दूँ?



मिलते ही मुस्कुराना आदत लगी उनकी
कोई करिश्माई, शख़्सियत लगी उनकी
खुशियाँ बाँटना, फितरत लगी उनकी
मुझमें कुछ तलाशना नीयत लगी उनकी
इस अनजानी तलाश की क्या नाम दूँ?



मंज़िल क़रीब अपनी आने लगी थी
बिछुड़ने की बातें सताने लगी थीं
उनकी झुकी आँखे इशारा थी इस बात का
कि वो हमसे कोई रिश्ता जताने लगी थी
इन रिश्तों के जज़्बात को क्या नाम दूँ?



वर्षों बाद भी उस सुखद हादसे के
मैं भीड़ में अकेला वो चेहरा तलाश करता हूँ
खुली आँखो से देखा है जो सपना
पूरा होगा बस यही आस करता हूँ
ख़्वाबों की बरसात को क्या नाम दूँ?
 
नई सदी में तरक्कियों की
जो होड़ चारों तरफ लगी है
ये होड़ मखलूक के लिए भली है
ये खोज आदम की है कि जिसने
कदम रखे हैं जो चाँद ऊपर
तो चाँद का वो हसीं तसव्वुर
जो शायरों ने हमें सुनाया था मुद्दतों तक
हकीकतन वो फरेब साबित हुआ है जानां
तरक्कियों ने हमें बताया
चिराग अपनी नज़र के नीचे
तमाम जुल्मत को पालता है,
तरक्कियां अब फलक पे अपनी रिहाइशों की तलाश में हैं!
मगर हमारा सवाल ये है,
सभी मसाइल का हल तो पहले तलाश कर लें
जमीं के ऊपर
फलक पे फिर आशियाँ बनाने की सोच लेंगे !
वही हैं खुशियाँ वही हैं गम
तो जनाबे-आदम को आस्मां पर
सुकून कैसे मिलेगा जानां?
ये जो समझने की सोचने की
मिली है कूवत हमें जनम से
यही हमारी तरक्कियों की
तहों में शामिल रही है लेकिन
यही तो सारे फसाद की जड़ बनी हुई है!
हमारे जज्बे ही बंद राहों को खोलते हैं
हमारे जज्बे हमारी राहों को गुम भी करते हैं
जिन्दगी में
यही तो वो खेल है जो
सदियों से चल रहा है जमीं के ऊपर
सभी मसाइल
वसीअ होते रहे हैं अब तक
हमारे मसाइल के हल की कोई
सबील करना पड़ेगी खुद ही !
सुलझ गए फिर जो ये मसाइल
जमीं पे अम्नो-अमान होगा
जमीं बहुत है अदम की खातिर
तरक्कियां सब भली हैं लेकिन
जमीं कम भी नहीं है तो फिर
हमें फलक पर
पनाह लेने की कुछ जरूरत अभी नहीं है
 
आकाश भी अब उसको पराया-सा लगे है
इक परकटा पक्षी है कि सहमा-सा लगे है

बनवाई है जिस शख़्स ने ये उँची इमारत
अब इसकी बुलन्दी में वो अदना-सा लगे है

जिसमें न हो शब्दों का कोई भीड़-भड़ाका
सादा-सा नमस्कार वो अच्छा-सा लगे है

पर खोल के बैठा है जो आँगन में परिन्दा
वीरान-से घर में मुझे अपना-सा लगे है

वो कृष्ण है शायद कि जो बैठा है महल में
जो द्वार के बाहर है सुदामा-सा लगे है.
 
कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज
आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज
हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज
जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिये
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिये
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिये
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिये
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ कर रस्म के बुत बन्द-ए-क़दामत से निकल
ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल
नफ़स के खींचे हुये हल्क़ा-ए-अज़मत से निकल
क़ैद बन जाये मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा-ए-पन्द भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़
तौक़ यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीन
तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
 
Last edited:
Tomar Saahb!

I've come first time here to this thread but I feel personally that I am too late here. Classic. Bravo. Splendid. Everything here I found, is Unforgettable.
Thanx a Lot Gentleman!
 
Meaning of word are as below.

कल्ब = heart; लरज़ाँ = quiver; शरर-ए-ज़ंग = sparks of war; ज़ीस्त = life; हमआहंग = in harmony; जहद = jihaad/struggle; नक़्हत = fragrance; ख़म-ए-गेसू = tresses of hair; रविश = pathways; क़ज़ा = death; अश्कफ़िशानी = shedding tears; उनवान = title/heading; बन्द-ए-क़दामत = old restrictions (puraane bandhan); नफ़स = breath; हल्क़ा-ए-अज़मल = beautiful necklace (khubsoorat fanda); अज़्म-शिकन = resolve-breaking; दग़दग़ा-ए-पन्द = suspicions coming from sermons; ज़मर्रूद = emerald; पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द = standards set by wise men; अफलातून = Plato; अरस्तू = Aristotle; ज़ोहरा = radiant; परवीन = star; ग़रदूँ = sky; पा-ए-मुक़द्दर = feet of the fate; ज़बीं = forehead
कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज
आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज
हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज
जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिये
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिये
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिये
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिये
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ कर रस्म के बुत बन्द-ए-क़दामत से निकल
ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल
नफ़स के खींचे हुये हल्क़ा-ए-अज़मत से निकल
क़ैद बन जाये मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा-ए-पन्द भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़
तौक़ यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीन
तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
 
जमीं को या खुदा वो जलजला दे
निशां तक सरहदों के जो मिटा दे

सियासत की अगर माँ मारनी है
तो फिर लाहौर दिल्ली से मिला दे

बुजुर्गों का बस एक कमरा बचाकर
तू जब चाहे पुराना घर गिरा दे

खुशी में ऐसे गोली मत चलाना
शजर से जो परिंदों को उड़ा दे

अलीफ़ से आशना स्कूल कोई
मेरे बच्चों को जो पढ़ना सीखा दे

मैं सूरज तोड़ लाऊँगा, नहीं तो
मुझे ए रोशनी अपना पता दे

मुहाजिर का मकान खाली है लेकिन
मैं दर खोलूँ तो कोई बददुआ दे

मैं हमसाया हूँ तेरा 'अश्क' मुझको
जरा-सी धूप थोड़ी सी हवा दे
 
रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या है
दिल ही शोला है तो ये सोज़-ए-मोहब्बत क्या है
वो मुझे भूल गई इसकी शिकायत क्या है
रंज तो ये है के रो-रो के भुलाया होगा


वो कहाँ और कहाँ काहिफ़-ए-ग़म सोज़िश-ए-जाँ
उस की रंगीन नज़र और नुक़ूश-ए-हिरमा
उस का एहसास-ए-लतीफ़ और शिकस्त-ए-अरमा
तानाज़न एक ज़माना नज़र आया होगा


झुक गई होगी जवाँ-साल उमंगों की जबीं
मिट गई होगी ललक डूब गया होगा यक़ीं
छा गया होगा धुआँ घूम गई होगी ज़मीं
अपने पहले ही घरोंदे को जो ढाया होगा


दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाये होँगे
अश्क आँखों ने पिये और न बहाये होँगे
बन्द कमरे में जो ख़त मेरे जलाये होँगे
इक-इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा


उस ने घबरा के नज़र लाख बचाई होगी
मिट के इक नक़्श ने सौ शक़्ल दिखाई होगी
मेज़ से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी
हर तरफ़ मुझ को तड़पता हुआ पाया होगा


बेमहल छेड़ पे जज़्बात उबल आये होँगे
ग़म पशेमा तबस्सुम में ढल आये होँगे
नाम पर मेरे जब आँसू निकल आये होँगे
सर न काँधे से सहेली के उठाया होगा


ज़ुल्फ़ ज़िद कर के किसी ने जो बनाई होगी
रूठे जलवों पे ख़िज़ाँ और भी छाई होगी
बर्क़ आँखों ने कई दिन न गिराई होगी
रंग चेहरे पे कई रोज़ न आया होगा


होके मजबूर मुझे उस ने भुलाया होगा
ज़हर चुप कर के दवा जान के ख़ाया होगा
 
ये कह कर मुझ को रुला दिया
कि तूने माज़ी भुला दिया
जो किया तूने बुरा किया
उस से बुरा कि बता दिया

तुझ को हमेशा प्यार था
मुझे कितना ये ऐतबार था
बुरा किया ये प्यार तोड़े के
उस से बुरा कि जता दिया

ख्वाबों को तेरी जो दीद थी
मेरी नींदों की वही तो ईद थी
बुरा किया ख्वाब छीन के
उस से बुरा कि सुला दिया

तेरी आँखों के ये जो चिराग़ थे
मेरी मंज़िलों के सुराग थे
बुरा किया निगाहें फेर लीं
उस से बुरा चाँद भी छिपा दिया

तूने कितने ही मुझ को ग़म दिए
मैने आँसू फिर भी कम लिए
बुरा किया कि दामन छुड़ा लिया
उस से बुरा कि मुस्कुरा दिया

कुछ मासूम थी कुछ ज़हीन थी
मेरी रूह की जो भी ज़मीन थी
बुरा किया यहाँ हल चला दिया
उस से बुरा दर्द भी उगा दिया

जो भी मेरा अब हाल है
तेरी मुहब्बतों का कमाल है
बुरा किया मुझ को सँवारा नहीं
उस से बुरा आईना दिखा दिया

मिट्टी का दिल का गाँव था
हर दीवार पर तेरा नाम था
बुरा किया तूने पढ़ा नहीं
उस से बुरा कि मिटा दिया

जिसका भी अब ये गुनाह था
वक़्त सुबूत लम्हा गवाह था
बुरा किया हर गवाह हटा दिया
उस से बुरा सुबूत मिटा दिया

अगॅर्चे अब रिश्ता नहीं
ये दर्द पर जाता नहीं
जो कुछ हुआ वो बुरा हुआ
उस से बुरा कि तूने किया
 
Dil ko kabar bana kar jaate to acha tha,,,दिल को कबर बना कर जाते तो अच्छा था,,,
Armanon ko ismain dafnakar jaate to acha tha,,,अरमानों को इसमें दफनाकर जाते तो अच्छा था,,,
Judai ki saza badi takleef deti hai,,, जुदाई की सज़ा बड़ी तकलीफ देती है,,,
Mujhe deevaron main chunvakar jaate to acha tha,,,मुझे दीवारों मैं चुनवाकर जाते तो अच्छा था,,,
Tumhare baad in hasrton ka kya hoga,,, तुम्हारे बाद इन हसरतों का क्या होगा,,,
Inhain kafan pahna kar jaate to acha tha,,,इन्हें कफ़न पहनाकर जाते तो अच्छा था,,,
Yun rota chhod kar na jaate mujhko,,,यूँ रोता छोड़ कर न जाते मुझको,,,
Mere dil ko bahlakar jaate to acha tha,,,मेरे दिल को बहलाकर जाते तो अच्छा था,,,
Teri khatir chhod sakte the is jamane ko,,,तेरी खातिर छोड़ सकते थे इस जमाने को,,,
Ek baar hamain aajmakar jaate to acha tha,,,एक बार हमें आजमाकर जाते तो अच्छा था,,,
Yun dosti par daag lagkar na jaate,,, यूँ दोस्ती पर दाग लगाकर न जाते,,,
Rasm-e- dosti nibhakr jaate to acha tha,,, रस्मे दोस्ती निभाकर जाते तो अच्छा था,,,
Meri mayyat par shirkat to na kar sake lekin,,,मेरी मय्यत पर शिरकत तो न कर सके लेकिन,,,
Kabar ko foolon se saja kar jaate to acha tha,,,कबर को फूलों से सजा कर जाते तो अच्छा था,,,
Hamari aankhon se neend churakar chale gaye,,,हमारी आँखों से नींद चुराकर चले गए,,,
Meethi neend hamain sulakar jaate to acha tha,,,मीठी नींद हमें सुलाकर जाते तो अच्छा था,,,
Sagar ko andheron main tahna chhod chale ho,,, सागर को अंधेरों मैं तनहा छोड़ चले हो,,,
Deep koi jalakar jaateto acha tha,,, दीप कोई जलाकर जाते तो अच्छा था,,,
 
Last edited:
Jindgi main mujhse milne vo kabhi aaya na tha,,,
Aaj kyon meri kabar par ro raha tha bewafaa,,,
Aankh uski ab khuli hai jab ye duniyan chhod di,,,
Itne din tha vo kahan tha, kya so raha tha bewfaa,,,
Usne mujhko gam diye or gam ne meri jaan li,,,
Khud ko kaatil maanta hai isiliye to aaj vo,,,
Aansuon se jurm apne dho raha tha bewafaa,,,
Meri saansain jindgi or maut ke thi darmiyan,,,
Meri haalat dekhkar sabne kaha mar jayega,,,
Ro pade dushman magar khush ho raha tha bewafa,,,
der thodi si lagi par rang laai hai wafaa,,,
baad marne ke 'jafar'unki inayat hai badi...
chaar pul mere liye padh to raha tha bewafaa,,,


 
Phir kisi yaad ne raat bhar hai jagaya mujh ko,,,
Kya sazaa di hai mohabbat ne khudaaya mujhko,,,
Din ko aaram hai na raat ko hai chain kabhi,,,
Jane kis khaak se qudrat ne banaya hai mujhko,,,
Dukh to ye hai ke zamane main mile gair sabhi,,,
Jo mila hai wo mila ban ke paraya mujhko,,,
Jab koi bhi na raha kandha mere rone ko,,,
Ghar ki deewaron ne seene se lagaya mujhko,,,
Yun to umeed-e-wafa tum se nahin hai koi,,,
Phir chiragon ki trah kis ne jalaya mujhko,,,
Bewafa zindgi ne jab chhor diya hai tanhaa,,,
Maut ne pyar se pahloo main bithaya mujhko,,,
Wo diyaa hoon jo mohabbat ne jalaya tha kabhi,,,
Gam ki aandhi ne sar-e-sham bujhaya mujhko,,,
Kaise bhulaunga wo waqt ke lamhe,,,
Yaad aata raha zulfon ka hi saaya mujhko......
 
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