ek najam

चाँद तन्हा है आसमां तन्हा,दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा,,,
बुझ गई आस छुप गया तारा थर थराता रहा धुआं तन्हा,,,
जिंदगी क्या इसी को कहते हैं,जिस्म तनहा है और जाँ तन्हा,,,
हमसफ़र कोई गर मिले भी कहीं,दोनों चलते रहे तन्हा तन्हा,,,
जलती बुझती सी रौशनी के परे सिमटा सिमटा सा एक मकां तन्हा,,,
राह देखा करेंगे सदियों तक,छोड़ जायेंगे ये जहाँ तन्हा...

 
उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे


उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से
मैंने खुद रोके बहुत देर हँसाया था जिसे


बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा
धूप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे


छू के होंठों को मेरे वो भी कहीं दूर गई
इक गजल शौक से मैंने कभी गाया था जिसे


दे गया घाव वो ऐसे कि जो भरते ही नहीं
अपने सीने से कभी मैंने लगाया था जिसे


होश आया तो हुआ यह कि मेरा इक दुश्मन
याद फिर आने लगा मैंने भुलाया था जिसे


वो बड़ा क्या हुआ सर पर ही चढ़ा जाता है
मैंने काँधे पे हँस के बिठाया था जिसे
 
Last edited:
ज़मीं, फिर दर्द का ये सायबां कोई नहीं देगा
तुझे ऐसा कुशादा आसमां कोई नहीं देगा

अभी ज़िंदा हैं, हम पर ख़त्म कर ले इम्तिहाँ सारे
हमारे बाद कोई इम्तिहां, कोई नहीं देगा

जो प्यासे हो तो अपने साथ रक्खो अपने बादल भी
ये दुनिया है, विरासत में कुआँ कोई नहीं देगा

हवा ने सुब्ह की आवाज़ के पर काट डाले हैं
फ़ज़ा चुप है, दरख़्तों में अज़ां कोई नहीं देगा

मिलेंगे मुफ्त़ शोलों की क़बाएँ बाँटने वाले
मगर रहने को काग़ज़ का मक़ा कोई नहीं देगा

हमारी ज़िंदगी बेवा दुल्हन, भीगी हुई लकड़ी
जलेंगे चुपके–चुपके सब, धुआँ कोई नहीं देगा
 
बदन कजला गया तो दिल की ताबानी से निकलूंगा
मै सूरज बनके इक दिन अपनी पेशानी से निकलूंगा

मुझे आंखों में तुम जां के सफ़र की मत इजाज़त दो
अगर उतरा लहू में फिर न आसानी से निकलूंगा

नज़र आ जाऊंगा मैं आंसुओं में जब भी रोओगे
मुझे मिट्टी किया तुमने तो मैं पानी से निकलूंगा

मैं ऐसा ख़ूबसूरत रंग हूँ दीवार का अपनी
अगर निकला तो घरवालों की नादानी से निकलूंगा

ज़मीरे-वक़्त में पैवस्त हूं मैं फांस की सूरत
ज़माना क्या समझता है कि आसानी से निकालूंगा

यही इक शै है जो तनहा कभी होने नहीं देती
मर जाऊंगा जिस दिन परेशानी से निकलूंगा
 
दिल उजड़ी हुई एक सराय की तरह है,,,
अब लोग यहाँ रात बिताने नहीं आते,,,
होठों पे मोहब्बत के फ़साने नहीं आते,,,
साहिल पे समंदर के खजाने नहीं आते,,,
पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी,,,
आँखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते,,,
हम पर नए मौसम ने ये एहसान किया है,,,
अब याद मुझे दर्द पुराने नहीं आते,,,
उड़ने दो परिंदों को अभी शोख हवा में,,,
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते,,,
इस शहर के बादल तेरी जुल्फों की तरह हैं,,,
ये आग लगाते हैं भुझाने नहीं आते,,,
एहबाब भी गैरों की अदा सीख गए है,,,
आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते,,,



 
टूटे हुए ख्वाबों में हकीकत ढूँढता हूँ,,,
पत्थर के दिलों में मोहब्बत ढूँढता हूँ,,,
नादान हूँ में ये भी नहीं समझा,,,
बेजान बुतों में इबादत ढूँढता हूँ,,,
मेरे ज़ज्बातों कि कीमत यहाँ कुछ भी नहीं,,,
बेईमानी के बाजारों में शराफत ढूँढता हूँ,,,
इस अजनबी दुनियां में कोई भी अपना नहीं,,,
गैरों कि आँखों में अपनी सूरत ढूँढता हूँ,,,
उम्मीद की थी प्यार की बस यही भूल थी मेरी,,,
गिरते हुए अश्कों में अपनी हसरत ढूँढता हूँ...
[FONT=Arial, Helvetica, sans-serif]
[/FONT]
 
तंग आ चुके हैं कश्मकशे जिंदगी से हम,,,
ठुकुरा न दे जहाँ को कहीं बेदिली से हम,,,
हम गमजदा हैं लाये कहाँ से खुशी के गीत,,,
देंगे वही जो पायेंगे इस जिंदगी से हम,,,
उभरेंगे एक बार अभी दिल के वलवले,,,
माना के दब गए हैं गम-ए-जिंदगी से हम,,,
लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उम्मीद,,,
लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम....

 
हमेशा एक दुसरे के हक में दुआ करेंगे ये तय हुआ था,,,
मिले के बिछड़े मगर तुम्हीं से वफ़ा करेंगे ये तय हुआ था,,,
कहीं रहो तुम कहीं रहे हम मगर मोहब्बत रहेगी कायम,,,
जो ये खता है तो उम्र भर ये खता करेंगे ये तय हुआ था,,,
उदासियाँ घर घडी हों लेकिन हयात काँटों भरी हो लेकिन,,,
हुतूत फूलों कि पत्तियों पर लिखा करेंगे ये तय हुआ था,,,
जहाँ मुकदर मिलाएगा अब वहां मिलेंगे ये शर्त कैसी,,,
जहाँ मिले थे वहीँ हमेशा मिला करेंगे ये तय हुआ था,,,
लिपट के रो लेंगे जब मिलेंगे गम अपना अपना बयां करेंगे,,,
मगर ज़माने से मुस्कुराकर मिला करेंगे ये तय हुआ था,,,
किसी के आँचल में खो गए तुम बताओ क्यों दूर हो गए तुम,,,
कि जान देकर भी हक वफ़ा का अदा करेंगे ये तय हुआ था...







 
है दुनिया की कुछ परवा ,न कुछ अच्छा बुरा जाने
कोई समझे क़लंदर[SUP][/SUP] उस को और कोई गदा[SUP][/SUP] जाने

मदद से असलहों[SUP][/SUP] की जो दुकां अपनी चलाता है
मुहब्बत, दोस्ती, एहसास, जज़्बा, फ़िक्र क्या जाने?

जिया जो दूसरों के वास्ते है बस वही इंसां
कि अपने वास्ते जीने को वो अपनी क़ज़ा[SUP][/SUP] जाने

फ़राएज़[SUP][/SUP] की जगह ऊँची न होगी जब तलक हक़ से
तो दुनिया भी तेरी बातों को गूंगे की सदा जाने

सऊबत[SUP][/SUP] ज़िंदगी का हर सबक़ ऐसे सिखाती है
कि नादारी[SUP][/SUP] में भी इंसान जीने की अदा जाने

नज़र में उन की गर मज़हब है इक शतरंज का मोहरा
तो फिर अंजाम कैसा, क्या, कहाँ होगा ख़ुदा जाने

वफ़ादारी ही जिस की ज़ात का हिस्सा रही बरसों
मगर ये क्या हुआ कि आज वो इस को सज़ा जाने

न जाने किस ज़माने में ’शेफ़ा’ वो शख़्स जीता है
जो ख़ुद्दारी[SUP][/SUP], रवादारी[SUP][/SUP], मिलनसारी, वफ़ा जाने
 
मै तो जलवो मे गुम हू मेरे हुस्न पर

सदके किसकी नजर है,मुझे क्या खबर !
मेरे जल्वो ने किस किस पे जादू किया,
आइने को खबर है, मुझे क्या खबर !!
मै तो जलवो मे गुम हू...


आप तो मेरे हमदम है गम-ख्वार है,


कोई दुश्मन नही मेरे दिल-दार है !
हाथ किस-किस का मेरी तबाही मे है,
आप को सब खबर,मुझे क्या खबर !!
मै तो जलवो मे गुम हू...


मै हू अपने जुनूने मोहब्बत मे गुम,


कुफ़्र का मुझको इल्जाम देना ना तुम !
दिल जहा॑ आ गया सर वही झुक गया,
शेख ये किसका दर है,मुझे क्या खबर !!
मै तो जलवो मे गुम हू.....



जीते जी हाल पूछा ना आकर कभी,


प्यार से हाथ दिल पर ना रक्खा कभी !
अब मेरी मॊत पर क्यू परेशान है ,
क्यू तेरी आन्ख तर है मुझे क्या खबर !!
मै तो जलवो मे गुम हू....


घर के जलने का जब मैने शिकवा किया,


मुस्करा कर के बिजली ने मुझसे कहा !
मै तो निकली थी सैरे चमन के लिये,
राह मे तेरा घर है मुझे क्या खबर !!

मै तो जलवो मे गुम हू.....

​
 
अपनी इच्छाओं का ही विस्तार है
जिंदगी जैसी भी है स्वीकार है |

दीखता है जो हमारे सामने
वह तो अपना ही रचा संसार है |

एक पत्ता सूख डाली से गिरा
एक आने के लिए तैयार है |

है दिया आनंद फूलों ने जहाँ
पत्थरों ने भी किया उपकार है |

चाहकर भी कुछ न दे पाया तुझे
मुझ पे भी मेरा कहाँ अधिकार है |

जिस चिकित्सक ने मुझे चंगा किया
वह भला क्यों आजकल बीमार है |

लोग जो हैं स्वार्थ में अंधे हुए
क्या नहीं उनका कोई उपचार है |
 
कभी खुशी मिली तो कभी गम कहीं मिला
जो भी मिला किसी से कभी कम नहीं मिला |

उड़ता है प्रेम जैसे टिकिया कपूर की
किसी भी दोस्ती में कोई दम नहीं मिला |

न मैंने उन्हें जाना, न समझे वे मुझे
मिलते रहे ये हाथ मगर मन नहीं मिला |

चढ़ना पड़ा कहीं तो उतरना पड़ा कहीं
रास्ता कहीं भी कोई सम नहीं मिला |

आकाश की आँखों में भी पानी नहीं बचा
भेजेगा वो पत्थर ही अगर बम नहीं मिला |
 
यूँ दिल में अरमान बहुत हैं
अक्षत कम भगवान बहुत हैं |

हासिल हो तो भी क्या होगा
फिर भी वे हैरान बहुत हैं |

यहाँ मुखौटे का फैशन है
गुल हैं कम गुलदान बहुत हैं |

शहर नया दस्तूर पुराना
दर हैं कम दरबान बहुत हैं |

सच बोलोगे, दार मिलेगी
झूठ कहो, ईनाम बहुत हैं |

हैं हकीम बीमार आज खुद
नुस्खे भी नादान बहुत हैं |

सुबह तुम्हारी मुट्ठी में है
दुनिया में इंसान बहुत हैं |
 
क़द अपना कभी नापिये इज्जत की नज़र से
आईना कभी देखिये सीरत की नज़र से

हक़ मारने की रस्म ख़त्म होगी दिन ब दिन
ऐसों को अगर देखिये लानत की नज़र से

आपही के रचे इश्तेहार हैं जो मुल्क़ के
नाहक़ उन्हें न देखिये नफ़रत की नज़र से

कुछ को बना के हाशिया क्यों दे दिये सिफ़र
भरसक उन्हें भी देखिये रहमत की नज़र से

छज्जे पे चाय और पकौड़ों के दरमियाँ
देखें कभी सावन को , टूटी छत की नज़र से

हाथों से दूर , दिल में बसा चाँद लगेगी
रोटी को कभी देखिये ग़ुरबत की नज़र से

ग़म और ख़ुशी के दौर से पेश आइयेगा यूँ
सम भाव सबको देखिये मरघट की नज़र से

जो साथ न जाना , वही बस क्यों कमा रहे
उपलब्धियों को देखियेगा यश की नज़र से

इस ख़्वाहिशों के दौर में पनपा अज़ब चलन
कुछ ढूंढते हैं प्यार तिज़ारत की नज़र से
 
तक़दीर ने छीना जो इंसान कहा देगा
इंसान का बच्चा जो ईमान कहाँ देगा

पानी का सहारा तो सागर ही तुझे देगा
कश्ती को तेरी कान्धा तूफ़ान कहाँ देगा

उम्मीद तेरी पूरी सज्जन के यहाँ होगी
आशा को तेरी पानी अभिमान कहाँ देगा

मंदिर की तो सीढ़ी पर घुंघरू भी चढ़ा होगा
जुगनू को भी अँधियारा दिनमान कहाँ देगा

दिल में तो जगह खाली निर्धन के यहाँ होगी
इज्जत वो भरा पूरा धनवान कहाँ देगा
 
साथ कुछ सूखे हुए पत्ते उड़ाकर ले गया,
वो मेरे ख़्वाबों को पलकों से चुराकर ले गया.

कुछ दिनों के वास्ते ले जा रहा है ये कहा,
और सारी उम्र को मेरा मुक़द्दर ले गया.

बदहवस लम्हों में उसकी तिश्नगी तो देखिये,
एक क़तरा प्यास थी सारा समंदर ले गया.

जीतना दिल की तसल्ली के सिवा कुछ भी नहीं,
सोचिये कि साथ क्या अपने सिकंदर ले गया.

सांस का रिश्ता बदन से टूट जाएगा कभी,
बस इसी एहसास को मैं अपने घर पर ले गया.

तयशुदा था डूबना मंझधार में मेरा मगर,
था कोई तो जो मुझे फिर भी बचाकर ले गया.

तेज़ बारिश थी हवाएं मुट्ठियाँ ताने हुए,
वो पतंगों को मगर फिर भी उड़ाकर ले गया
 
Back
Top