Gazals "The Finest Ever"

ये चिराग़ बेनज़र है...

ये चिराग़ बेनज़र है ये सितारा बेज़ुबाँ है
अभी तुझसे मिलता जुलता कोई दूसरा कहाँ है


वही शख़्स जिसपे अपने दिल-ओ-जाँ निसार कर दूँ
वो अगर ख़फ़ा नहीं है तो ज़रूर बदगुमाँ है



कभी पा के तुझको खोना कभी खो के तुझको पाना
ये जनम जनम का रिश्ता तेरे मेरे दरमियाँ है



मेरे साथ चलनेवाले तुझे क्या मिला सफ़र में
वही दुख भरी ज़मीं है वही ग़म का आस्माँ है


मैं इसी गुमाँ में बरसों बड़ा मुत्मइन रहा हूँ
तेरा जिस्म बेतग़ैय्युर है मेरा प्यार जाविदाँ है



उन्हीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे
मुझे रोक रोक पूछा तेरा हमसफ़र कहाँ है...




Bashir Badr
 
एक बच्चा बादलों का मुझ को पानी दे गया,
वो मेरी प्यासी जड़ों को जिंदगानी दे गया,
जिसकी खुशबू से महकने लग गया मेरा बदन,
कौन था वो जो मुझे एक रातरानी दे गया,
डाकिया इस बार जब आया तो मेरे हाथ मे,
चिट्ठियों के साथ कुछ यादे पुरानी दे गया,
राम जाने कौन था जो एक पल ठहरा नही,
दर्द लेकिन जाते- जाते खानदानी दे गया,
उम्र भर क्या क्या कमाया मैने जब पूछा सवाल,
पोटली मे बाँध कर किस्से कहानी दे गया,
धीरे धीरे ले गया मेरी जवानी बीन कर,
और बदले मे मुझे अपनी जवानी दे गया,
मेरी खुशियों के इलाके ले गया वो जीत कर,
और सम्झोतो मे गम की राजधानी दे गया!!


Aik Pal Me Zindgi Bher Ki Udaasi De Gaya
Wo Juda Hote Hote KuCh PhooL Basi De Gaya

Noch Kar ShakHon ke Tan se Khushk Patto.n Ka Libas
Zard Mausam Banjh Rut Ko Be'libasi De Gaya

Log Malbon Me Dabe Saaye Bhi Dafnane Lage
Zal zala ahl-e-Zamin Ko Badhawasi De Gaya

Thande Jhonke Ki Rago Me GhoL Kar Apna Dhuaan
Ek Diya andhi Hawa Ko Khud Shanashi De Gaya

Le Gaya Mohsin Wo Mujh Se Aber Banta Aasman
Us Ke Badle Me Zameen Sadiyon Ki Piyasi De Gaya!

​

MoHsIn NaQvI ​
 
नहीं निगाह में मंज़िल........

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरजू ही सही.

ना तन में खून फ़राहम ना अश्क आंखों में
नमाज़-ए-शौक तो वाजिब बे-वजू ही सही.

किसी तरह तो जमे बज़्म मैकदे वालों
नहीं जो बादा-ओ-सागर तो हां-ओ-हु ही सही.

ग़र इंतज़ार कठिन है तो जब तलक ए दिल
किसी के वादा-ए-फर्दा की गुफ्तगू ही सही.

दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोइ
तो 'फैज़' ज़िक्र-ए-वतन रुबरु ही सही...


Faiz Ahmed Faiz
 
Ussi Aik Furd kay wastay Meray Dil mein Durd hai kis liye...
Meri Zindagi ka Mutalba Wohi aik Furd hai Kiss liye...

Tu ju Shehr mein hee Moqeem hai tu Musafirat ki Fiza hai kyoon...
Tera Karwa’n jo nahi gaya tu Hawa mein Gurd hai kis liye...

Na Jamal-o Husn ki buzm hai Na Junoon-o Ishq ka Azm hai...
Sur-e-Dusht-e-Rukhs mein Hur Gahri ko baad gurd hai kis liye...

Teray Husn say ye Pata chala Tujhay Dekh kur ye Khabr hoee...
Jahan Rasta hee nahi koi Wahan Rah Nord hai kis liye...

Jo Likha hai Meray Naseeb mein kahin Tu nay parh tu nahi liya...
Tera Haath Surd hai kis liye, Tera Rung Zurd hai Kis liye...

Wo Turk-e Rubt ka Ehud tha Kahin Tootnay tu nahin laga...
Teary Dil kay Durd ko Dekh kur, Meray Dil mein Durd hai kis liye...

Koi Wasta jo Nahin Raha Teri Aankh mein Ye Nami hai Kyoon...
Meray Ghum ki Aag ko Dekh kur, Teri Aah Surd hai Kis liye...

******************** **

Gum'shuda Lamhaat Ka Kuch Khoj Paaya He Nahin...
Zindagi Ki Girti Dewaro'n Ka Saaya He Nahin...

Tishna Faryaad Hain Lab Aur Aankhain Khushk Hain...
Kion Ke Dil Per Aansu'on Ka Abrr Chhaya He Nahin...

Zindagi Ko Lamha Lamha Apni Palkon Se Chuna...
Koi Sangraiza Teray Koochay Ka Paaya He Nahin...

Hum Ne Aankhain Bund He Rakhee'n Tasavvur Main Teray...
Aur Uss Shab Hum Ko Koi Khuaab Aaya He Nahin...

Her Qadam Per Khaar Paye, Paon Zakhmi Ho Gaye...
Phir Bhi Koi Raasta Qadmon Ko Bhaaya He Nahin...

Umrr Kuch Aisi Guzaari Jese Khuaabon Ka Safar...
Aur Safar Aisa Ke Raah Main, Koi Saaya He Nahin...

Chund Lamho'n Ki Enaayat Hum Ne Lauta Di Unhain...
Lub Pe Bakhshish Ka Tabassum Hum Ko Bhaaya He Nahin...


Poet :Unknown​
__________________
Dukh Wo Hai Jo Ander Se Lahu Kerde Hamara Dil...
Hum Wo Ke Pighal Ker Bhi Ansoo Nikalne Na De...
Ager Waqt Ke Marham Ka Darma'n Na Mile Koi...
Kuch Hadse Insaan Ko Barso Sambhalne Na De...
 
I dont know if it is releated to Gazal or not,
but I really like these deep touchin' beautiful lines! ... :)

रिश्ते की तो नहीं है हमे उम्मीद
मगर दोस्ताना बना रहे यों गहरा
के, मिले जो राहों में कल कहीं
अनजान ना लगे तुम्हे ये चेहरा...


Rock on
Jit
 
ये चिराग़ बेनज़र है ये सितारा बेज़ुबाँ है
अभी तुझसे मिलता जुलता कोई दूसरा कहाँ है


वही शख़्स जिसपे अपने दिल-ओ-जाँ निसार कर दूँ
वो अगर ख़फ़ा नहीं है तो ज़रूर बदगुमाँ है


कभी पा के तुझको खोना कभी खो के तुझको पाना
ये जनम जनम का रिश्ता तेरे मेरे दरमियाँ है


मेरे साथ चलनेवाले तुझे क्या मिला सफ़र में
वही दुख भरी ज़मीं है वही ग़म का आस्माँ है


मैं इसी गुमाँ में बरसों बड़ा मुत्मइन रहा हूँ
तेरा जिस्म बेतग़ैय्युर है मेरा प्यार जाविदाँ है


उन्हीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे
मुझे रोक रोक पूछा तेरा हमसफ़र कहाँ है...



Bashir Badr

bahut gahrai mein chale gaye , wah!! kya alfaz hei

MERE PAAS SE GUZAR KAR MERA HAAL TAK NA POOCHHA
MEIN YE KAISE MAAN JAU KE WOH DOOR JAKE ROYE.
 
I dont know if it is releated to Gazal or not,
but I really like these deep touchin' beautiful lines! ... :)

रिश्ते की तो नहीं है हमे उम्मीद
मगर दोस्ताना बना रहे यों गहरा
के, मिले जो राहों में कल कहीं
अनजान ना लगे तुम्हे ये चेहरा...


Rock on
Jit

ROOH KO CHHOO KAR GUZAR GAYE BHAI
 
जब से तू ने मुझे दीवाना बना रक्खा है
संग हर शख्स ने हाथों में उठा रक्खा है I


उस के दिल पे भी कड़ी इश्क में गुज़री होगी
नाम जिस ने भी मुहब्बत का सज़ा रक्खा है I


पत्थरों आज मेरे सर पे बरसते क्यों हो
मैंने तुम को भी कभी अपना खुदा रक्खा हैI


अब मेरी दीद की दुनिया भी तमाशाई है
तू ने क्या मुझ को मुहब्बत मैं बना रक्खा है I


पी जा अय्याम की तल्खी को भी हंस कर नासिर
ग़म को सहने मैं भी कुदरत ने मज़ा रक्खा है I


नासिर
_______________________
उनकी गली से जब हम गुज़रे टुकड़े टुकड़े दिल कर आए
एक तो तबाही दिल की हो गई इल्जामात सर पे आए
 
आये है समझाने लोग

आये हैं समझाने लोग
हैं कितने दीवाने लोग


दैर -ओ -हरम में चैन जो मिलता
क्यों जाते मयखाने लोग


जान के सब कुछ , कुछ भी न जाने
हैं कितने अनजाने लोग


वक़्त पे काम नहीं आते हैं
ये जाने पहचाने लोग


अब जब मुझ को होश नहीं है
आये हैं समझाने लोग


शायर - महेंद्र सिंह बेदी 'सहर'
_______________________
 
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा.......

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा,
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा.


हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़ेगे, रास्ता हो जाएगा.


कितना सच्चाई से, मुझसे ज़िंदगी ने कह दिया,
तू नहीं मेरा तो कोई, दूसरा हो जाएगा.


मैं खूदा का नाम लेकर, पी रहा हूँ दोस्तो,
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा.


सब उसी के हैं, हवा, ख़ुश्बु, ज़मीनो-आस्माँ,
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा.



Bashir Badr
 
Nazm - तुम मेरे पास रहो.....

तुम मेरे पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
जिस घड़ी रात चले
आसमानों का लहू पी कर सियह रात चले
मर्हम-ए-मुश्क लिये नश्तर-ए-अल्मास चले
बैन करती हुई, हँसती हुई, गाती निकले
दर्द की कासनी पाज़ेब बजाती निकले
जिस घड़ी सीनों में डूबते हुये दिल
आस्तीनोंमें निहाँ हाथों की रह तकने निकले
आस लिये
और बच्चों के बिलखने की तरह क़ुल-क़ुल-ए-मय
बहर-ए-नासुदगी मचले तो मनाये न मने
जब कोई बात बनाये न बने
जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी, सुन-सान, सियह रात चले
पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो.....



Faiz Ahmed Faiz
 
Is Ghazal se juddi huyi ek baat yaad aa gayi....i'd started liking ghazals in my post graduation days and since my childhood i've a habit of playing LOUD music....irrespective of the type of music and who's listening apart from me. Somehow "MY CHOICE" was always disliked by my sisters/mother/ and cousins:Dbecause i used to listen EVERYTHING N LITERALLY ANYTHING....like indian classical both vocal & instrumental, western rock/pop/country songs/ old hindi songs/pakistani songs n WHAT NOT? So my latest love "GHAZALS" had to face a strong opposition from all family members. So i made my Maa to like this ghazal after explaining the meaning of it and then i had ATLEAST ONE SUPPORTER as she never opposed and would request to play this one again n again....i know i'd been l'il wicked but it was justified:D;)WASN'T IT?
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा,
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा.


हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़ेगे, रास्ता हो जाएगा.


कितना सच्चाई से, मुझसे ज़िंदगी ने कह दिया,
तू नहीं मेरा तो कोई, दूसरा हो जाएगा.


मैं खूदा का नाम लेकर, पी रहा हूँ दोस्तो,
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा.


सब उसी के हैं, हवा, ख़ुश्बु, ज़मीनो-आस्माँ,
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा.



Bashir Badr
 
Last edited:
Fard-e-jurm..............

फ़कीह-ए-शहर बोला बादशाह से
बड़ा संगीन मुज़रीम है, ये आका!
इसे मसलूब करना ही पड़ेगा
के इसकी सोच हम सब से मुखतलिफ है...

Maqbool Amir

Is Ghazal se juddi huyi ek baat yaad aa gayi....i'd started liking ghazals in my post graduation days and since my childhood i've a habit of playing LOUD music....irrespective of the type of music and who's listening apart from me. Somehow "MY CHOICE" was always disliked by my sisters/mother/ and cousins:Dbecause i used to listen EVERYTHING N LITERALLY ANYTHING....like indian classical both vocal & instrumental, western rock/pop/country songs/ old hindi songs/pakistani songs n WHAT NOT? So my latest love "GHAZALS" had to face a strong opposition from all family members. So i made my Maa to like this ghazal after explaining the meaning of it and then i had ATLEAST ONE SUPPORTER as she never opposed and would request to play this one again n again....i know i'd been l'il wicked but it was justified:D;)WASN'T IT?
 
Last edited:
उसे कह दो...

Nazm....

उसे कह दो...
हजारों पल तुम्हारे बिन ना पूछो कैसे काटे हैं
कभी यादें सताती हैं...
कभी मौसम रुलाते हैं...
उसे कह दो... हम आये हैं...
हमें मायूस ना करना
हमारा मान रख लेना
हमें वापिस नहीं जाना...
हमें अपना बना लेना...हमें दिल में बसा लेना...
बहुत टूटे हुए दिल से... कभी रूठा नहीं करते
मुहब्बत तो इबादत है... इसे रुसवा नहीं करते
ज़माने से छुपाते हैं... कभी चर्चा नहीं करते...
सुनो...
ऐसा नहीं करते,
सुनो..ऐसा नहीं करते...
 
तुझे देख कर समझ लूं..........

तुझे देख कर समझ लूं, वो नज़र कहा से लाऊं;
तेरी आरजू में तड़पे, वो जिगर कहाँ से लाऊं.


जिसे तू कुबूल कर ले, मेरे पास ऐसा क्या है;
करूं चरणों में जो अर्पण, वो समर कहाँ से लाऊं.


मेरे वास्ते जो करदे, तेरे दिल में दर्द पैदा;
इस अश्क-ओ-आह में, वो असर कहाँ से लाऊं.


गम-ए-इश्क में हूँ जलता, शब-ए-रोज़ यूँ तो लेकिन;
मेरे नफस को जला दे, वो शरर कहाँ से लाऊं.


तू ही मेरा खुदा है, ऐ मेरे पीर-ओ-मुर्शिद;
तेरी सिफत जो परख ले, वो हूनर कहाँ से लाऊं.


तू करम करे तो मुमकिन है, वरना 'गाफिल',
मेरा दिल करे जो रोशन, वो सहर कहाँ से लाऊं.



"गाफिल बर्नी"
 
हमें जान देनी है एक दिन .........

मेरी जिंदगी तो फिराक है वो अज़ल से दिल में मकीं सही,
वो निगाह-ए-शौक से दूर हैं; रग-ए-जां से लाख करीब सही.

हमें जान देनी है एक दिन वो किसी तरह वो कहीं सही,
हमें आप खेंचिये दर पे जो नहीं कोई, तो हमीं सही.

सर'तोर हो सर हश्र हो हमें इंतज़ार कुबूल है
वो कभी मिलें वो कहीं मिलें वो कभी सही वो कहीं सही.

जो हो फैसला वो सुनाइये उसे हश्र पे ना उठाइये,
जो करेंगे आप सितम वहाँ वो अभी सही वो यहीं सही.

उसे देखने की जो लौ लगी तो 'नसीर' देख ही लेंगें हम,
वो हजार आँख से दूर हों वो हजार पर्दा नशीं सही.
 
कुछ शे'र .....

कासिम पयाम-ए-शौक़ को इतना ना कर तवील,
कहना फ़क़त ये उन से के, आँखे तरस गयी....

आखिरी दीदार कर लो खोल कर मेरा कफ़न,
अब ना शरमाओ के चश्म-ए-मुन्तजिर बे'नूर है....

चले भी आओ के मैराज़-ए-इश्क हो जाए
आज की रात अकेला हूँ मैं खुदा की तरह....

जब भी गुजरे लम्हात की याद आएगी
होंठ सी लूँगा मगर आँख तो भर आएगी....

आशना दर्द से होना था हमें
तू ना मिलता तो किसी और से बिछुड़े होते....

एक इसी भी घड़ी इश्क में आयी थी हम तक
ख़ाक को हाथ लगाते तो सितारा करते....

अजीब कहर पड़ा अबके साल अश्कों का,
के आँख तर ना हुयी खूं में नहा कर भी....

क्या अजीब शख्स है भेद ही ना खुलते उसके,
जब भी देखूं तो दुनिया से खफा ही देखूं....

बहुत अजीब है ये सिलसिला मुहब्बत का,
ना उसने कैद में रखा ना हम फरार हुए....

अपने सिवा बताओ कभी कुछ मिला है तुम्हें,
हजार बार ली हैं तुमने मेरे दिल की तलाशियां....

जो लिखता फिरता है दीवार-ओ-दर पे नाम मेरा,
बिखेर दे ना कहीं हर्फ़ हर्फ़ करके मुझे....

Aur fir...

इस सादगी पे कौन ना मर जाए ऐ खुदा
लड़ते है और हाथ में तलवार भी नहीं....

रफ्ता रफ्ता भूले है उसे मुद्दतों में हम,
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा मुझसे पूछिए....


Finally,

झूठ बोला है तो उस पर कायम भी रहो 'ज़फर'
आदमी को साहिब-ए-किरदार होना चाहिए....

एक और.....

समझ जाता हूँ देर से मैं दांवपेच उसके,
वो बाजी जीत जाता है मेरे चालाक होने तक....

For "someone " :

बेरुखी बे'सबब नहीं 'गालिब'
कुछ तो है जिसकी पर्दा'दारी है...


और अब:

चाँदनी बन के बरसती हैं तेरी यादें मुझ पर,
बड़ा दिलकश मेरी तनहाइयों का मंज़र होता है....

फर्क:

फर्क इतना है मुझ में और युसूफ में "फ़राज़"
उसको गैर मुझको यार बेच देते हैं....

"दुआ"

"मैं खुद गरज इतना हूँ के बस यही चाहूँ
रहें हमेशा मेरी मुन्तज़िर तेरी आँखें"


ऐसा ना हो:

इतनी सिद्दत से ना कर तर्क-ए-ताल्लुक का सवाल,
ऐसा ना हो के हम से तेरी बात ना टाली जाए...


Kyun:

एक ताल्लुक था सो आया हूँ खुदाया, वर्ना
कौन आता है तेरी महफ़िल में तमाशा बनने...


और 'मैं'

मुझे आजाद कर तौक-ए-असीरी बख्सने वाले,
मैं ज़ंजीरों में ऐलान-ए-बगावत कर नहीं सकता.

मेरी मुश्किल ये है मुझको अदाकारी नहीं आती,
हकीकी आदमी रस्मी मोहब्बत कर नहीं सकता...
 
Last edited:
arz kiya hai

manga karege ab se dua hizre yaar ki
akhir to dushmani hai dua ko asar ke saath


hizr=judai
 
Too good Devenda...liked al of them.

कासिम पयाम-ए-शौक़ को इतना ना कर तवील,
कहना फ़क़त ये उन से के, आँखे तरस गयी....

आखिरी दीदार कर लो खोल कर मेरा कफ़न,
अब ना शरमाओ के चश्म-ए-मुन्तजिर बे'नूर है....

चले भी आओ के मैराज़-ए-इश्क हो जाए
आज की रात अकेला हूँ मैं खुदा की तरह....

जब भी गुजरे लम्हात की याद आएगी
होंठ सी लूँगा मगर आँख तो भर आएगी....

आशना दर्द से होना था हमें
तू ना मिलता तो किसी और से बिछुड़े होते....

एक इसी भी घड़ी इश्क में आयी थी हम तक
ख़ाक को हाथ लगाते तो सितारा करते....

अजीब कहर पड़ा अबके साल अश्कों का,
के आँख तर ना हुयी खूं में नहा कर भी....

क्या अजीब शख्स है भेद ही ना खुलते उसके,
जब भी देखूं तो दुनिया से खफा ही देखूं....

बहुत अजीब है ये सिलसिला मुहब्बत का,
ना उसने कैद में रखा ना हम फरार हुए....

अपने सिवा बताओ कभी कुछ मिला है तुम्हें,
हजार बार ली हैं तुमने मेरे दिल की तलाशियां....

जो लिखता फिरता है दीवार-ओ-दर पे नाम मेरा,
बिखेर दे ना कहीं हर्फ़ हर्फ़ करके मुझे....

Aur fir...

इस सादगी पे कौन ना मर जाए ऐ खुदा
लड़ते है और हाथ में तलवार भी नहीं....

रफ्ता रफ्ता भूले है उसे मुद्दतों में हम,
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा मुझसे पूछिए....


Finally,

झूठ बोला है तो उस पर कायम भी रहो 'ज़फर'
आदमी को साहिब-ए-किरदार होना चाहिए....

एक और.....

समझ जाता हूँ देर से मैं दांवपेच उसके,
वो बाजी जीत जाता है मेरे चालाक होने तक....

For "someone " :

बेरुखी बे'सबब नहीं 'गालिब'
कुछ तो है जिसकी पर्दा'दारी है...


और अब:

चाँदनी बन के बरसती हैं तेरी यादें मुझ पर,
बड़ा दिलकश मेरी तनहाइयों का मंज़र होता है....

फर्क:

फर्क इतना है मुझ में और युसूफ में "फ़राज़"
उसको गैर मुझको यार बेच देते हैं....

"दुआ"

"मैं खुद गरज इतना हूँ के बस यही चाहूँ
रहें हमेशा मेरी मुन्तज़िर तेरी आँखें"


ऐसा ना हो:

इतनी सिद्दत से ना कर तर्क-ए-ताल्लुक का सवाल,
ऐसा ना हो के हम से तेरी बात ना टाली जाए...


Kyun:

एक ताल्लुक था सो आया हूँ खुदाया, वर्ना
कौन आता है तेरी महफ़िल में तमाशा बनने...


और 'मैं'

मुझे आजाद कर तौक-ए-असीरी बख्सने वाले,
मैं ज़ंजीरों में ऐलान-ए-बगावत कर नहीं सकता.

मेरी मुश्किल ये है मुझको अदाकारी नहीं आती,
हकीकी आदमी रस्मी मोहब्बत कर नहीं सकता...
 
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