prahladdevenda
New member
Thanks....
दिल लेके आ गये है सरे बाज़ार-ए-हुस्न हम,
सिक्का अगर खरा है तो चल जाना चाहिए...
You are most welcome...
& Thanks tooo.......
और
मयखाना सलामत है तो हम सुर्खी-ए-मय से
ताजीं-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगें...
दिल लेके आ गये है सरे बाज़ार-ए-हुस्न हम,
सिक्का अगर खरा है तो चल जाना चाहिए...
You are most welcome...
& Thanks tooo.......
और
मयखाना सलामत है तो हम सुर्खी-ए-मय से
ताजीं-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगें...
Too good Devenda...liked al of them.
कासिम पयाम-ए-शौक़ को इतना ना कर तवील,
कहना फ़क़त ये उन से के, आँखे तरस गयी....
आखिरी दीदार कर लो खोल कर मेरा कफ़न,
अब ना शरमाओ के चश्म-ए-मुन्तजिर बे'नूर है....
चले भी आओ के मैराज़-ए-इश्क हो जाए
आज की रात अकेला हूँ मैं खुदा की तरह....
जब भी गुजरे लम्हात की याद आएगी
होंठ सी लूँगा मगर आँख तो भर आएगी....
आशना दर्द से होना था हमें
तू ना मिलता तो किसी और से बिछुड़े होते....
एक इसी भी घड़ी इश्क में आयी थी हम तक
ख़ाक को हाथ लगाते तो सितारा करते....
अजीब कहर पड़ा अबके साल अश्कों का,
के आँख तर ना हुयी खूं में नहा कर भी....
क्या अजीब शख्स है भेद ही ना खुलते उसके,
जब भी देखूं तो दुनिया से खफा ही देखूं....
बहुत अजीब है ये सिलसिला मुहब्बत का,
ना उसने कैद में रखा ना हम फरार हुए....
अपने सिवा बताओ कभी कुछ मिला है तुम्हें,
हजार बार ली हैं तुमने मेरे दिल की तलाशियां....
जो लिखता फिरता है दीवार-ओ-दर पे नाम मेरा,
बिखेर दे ना कहीं हर्फ़ हर्फ़ करके मुझे....
Aur fir...
इस सादगी पे कौन ना मर जाए ऐ खुदा
लड़ते है और हाथ में तलवार भी नहीं....
रफ्ता रफ्ता भूले है उसे मुद्दतों में हम,
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा मुझसे पूछिए....
Finally,
झूठ बोला है तो उस पर कायम भी रहो 'ज़फर'
आदमी को साहिब-ए-किरदार होना चाहिए....
एक और.....
समझ जाता हूँ देर से मैं दांवपेच उसके,
वो बाजी जीत जाता है मेरे चालाक होने तक....
For "someone " :
बेरुखी बे'सबब नहीं 'गालिब'
कुछ तो है जिसकी पर्दा'दारी है...
और अब:
चाँदनी बन के बरसती हैं तेरी यादें मुझ पर,
बड़ा दिलकश मेरी तनहाइयों का मंज़र होता है....
फर्क:
फर्क इतना है मुझ में और युसूफ में "फ़राज़"
उसको गैर मुझको यार बेच देते हैं....
"दुआ"
"मैं खुद गरज इतना हूँ के बस यही चाहूँ
रहें हमेशा मेरी मुन्तज़िर तेरी आँखें"
ऐसा ना हो:
इतनी सिद्दत से ना कर तर्क-ए-ताल्लुक का सवाल,
ऐसा ना हो के हम से तेरी बात ना टाली जाए...
Kyun:
एक ताल्लुक था सो आया हूँ खुदाया, वर्ना
कौन आता है तेरी महफ़िल में तमाशा बनने...
और 'मैं'
मुझे आजाद कर तौक-ए-असीरी बख्सने वाले,
मैं ज़ंजीरों में ऐलान-ए-बगावत कर नहीं सकता.
मेरी मुश्किल ये है मुझको अदाकारी नहीं आती,
हकीकी आदमी रस्मी मोहब्बत कर नहीं सकता...
arz kiya hai
manga karege ab se dua hizre yaar ki
akhir to dushmani hai dua ke asar ke saath
hizr=judai
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