Gazals "The Finest Ever"

Thanks....

दिल लेके आ गये है सरे बाज़ार-ए-हुस्न हम,
सिक्का अगर खरा है तो चल जाना चाहिए...


You are most welcome...
& Thanks tooo.......


और

मयखाना सलामत है तो हम सुर्खी-ए-मय से
ताजीं-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगें...


Too good Devenda...liked al of them.


कासिम पयाम-ए-शौक़ को इतना ना कर तवील,
कहना फ़क़त ये उन से के, आँखे तरस गयी....

आखिरी दीदार कर लो खोल कर मेरा कफ़न,
अब ना शरमाओ के चश्म-ए-मुन्तजिर बे'नूर है....

चले भी आओ के मैराज़-ए-इश्क हो जाए
आज की रात अकेला हूँ मैं खुदा की तरह....

जब भी गुजरे लम्हात की याद आएगी
होंठ सी लूँगा मगर आँख तो भर आएगी....

आशना दर्द से होना था हमें
तू ना मिलता तो किसी और से बिछुड़े होते....

एक इसी भी घड़ी इश्क में आयी थी हम तक
ख़ाक को हाथ लगाते तो सितारा करते....

अजीब कहर पड़ा अबके साल अश्कों का,
के आँख तर ना हुयी खूं में नहा कर भी....

क्या अजीब शख्स है भेद ही ना खुलते उसके,
जब भी देखूं तो दुनिया से खफा ही देखूं....

बहुत अजीब है ये सिलसिला मुहब्बत का,
ना उसने कैद में रखा ना हम फरार हुए....

अपने सिवा बताओ कभी कुछ मिला है तुम्हें,
हजार बार ली हैं तुमने मेरे दिल की तलाशियां....

जो लिखता फिरता है दीवार-ओ-दर पे नाम मेरा,
बिखेर दे ना कहीं हर्फ़ हर्फ़ करके मुझे....

Aur fir...

इस सादगी पे कौन ना मर जाए ऐ खुदा
लड़ते है और हाथ में तलवार भी नहीं....

रफ्ता रफ्ता भूले है उसे मुद्दतों में हम,
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा मुझसे पूछिए....


Finally,

झूठ बोला है तो उस पर कायम भी रहो 'ज़फर'
आदमी को साहिब-ए-किरदार होना चाहिए....

एक और.....

समझ जाता हूँ देर से मैं दांवपेच उसके,
वो बाजी जीत जाता है मेरे चालाक होने तक....

For "someone " :

बेरुखी बे'सबब नहीं 'गालिब'
कुछ तो है जिसकी पर्दा'दारी है...


और अब:

चाँदनी बन के बरसती हैं तेरी यादें मुझ पर,
बड़ा दिलकश मेरी तनहाइयों का मंज़र होता है....

फर्क:

फर्क इतना है मुझ में और युसूफ में "फ़राज़"
उसको गैर मुझको यार बेच देते हैं....

"दुआ"

"मैं खुद गरज इतना हूँ के बस यही चाहूँ
रहें हमेशा मेरी मुन्तज़िर तेरी आँखें"


ऐसा ना हो:

इतनी सिद्दत से ना कर तर्क-ए-ताल्लुक का सवाल,
ऐसा ना हो के हम से तेरी बात ना टाली जाए...


Kyun:

एक ताल्लुक था सो आया हूँ खुदाया, वर्ना
कौन आता है तेरी महफ़िल में तमाशा बनने...


और 'मैं'

मुझे आजाद कर तौक-ए-असीरी बख्सने वाले,
मैं ज़ंजीरों में ऐलान-ए-बगावत कर नहीं सकता.

मेरी मुश्किल ये है मुझको अदाकारी नहीं आती,
हकीकी आदमी रस्मी मोहब्बत कर नहीं सकता...


arz kiya hai

manga karege ab se dua hizre yaar ki
akhir to dushmani hai dua ke asar ke saath


hizr=judai
 
Last edited:
हुस्न-ए-जानां की तारीफ मुमकिन नहीं............

A very beautiful Urdu Nazm, without it, the thread cann't be said an accomplished one.


हुस्न-ए-जानां की तारीफ मुमकिन नहीं
आफरीं आफरीं आफरीं आफरीं
तू भी देखे अगर तो कहे हमनशीं
आफरीं आफरीं आफरीं आफरीं


ऐसा देखा नहीं खूबसूरत कोई
जिस्म जैसे अजंता की मूरत कोई
जिस्म जैसे निगाहों पे जादू कोई
जिस्म नगमा कोई, जिस्म खुशबू कोई
जिस्म जैसे मचलती हुई रागनी
जिस्म जैसे महकती हुई चाँदनी
जिस्म जैसे है खिलता हुआ एक चमन
जिस्म जैसे है सूरज की पहली किरण
जिस्म तरशा हुआ, दिलकश-ओ-दिलनशीं
संदली संदली मरमरी मरमरी



आँखें देखी तो मैं देखता रह गया
जाम दो और दोनों ही दो आतिशां
आँखे या मयकदे के वो दो बाब हैं
आँखें उनको कहूँ, या कहूँ ख्वाब हैं
आँखें नीची हुई तो हया बन गयी
आँखे ऊँची हुई तो दुआ बन गयी
आँखें उठ कर झूकी तो अदा बन गयी
आँखें झुक कर उठी तो क़ज़ा बन गयी
आँखें जिनमे हैं कैद आसमान-ओ-ज़मीं
नरगिसी नरगिसी सुरमई सुरमई



चेहरा एक फूल की तरह शादाब है
चेहरा उसका है या कोई महताब है
चेहरा जैसे ग़ज़ल चेहरा जान-ए-ग़ज़ल
चेहरा जैसे कली चेहरा जैसे कँवल
चेहरा जैसे तसव्वुर भी तस्वीर भी
चेहरा बोले अलिफ -लैला'वी दास्तां
चेहरा एक पल यकीं, चेहरा एक पल गुमां
चेहरा जैसे के चेहरा कभी भी नहीं
माहरू माहरू महजबीं महजबीं



जुल्फ-ए जानां की भी लम्बी है दास्तां
जुल्फ के मेरे दिल पर है परछाइयां
जुल्फ जैसे के उमड़ी हुई हो घटा
जुल्फ जैसे के हो कोई काली बला
जुल्फ उलझे तो दुनिया परेशान हो
जुल्फ सुलझे तो ये जीस्त आसान हो
जुल्फ बिखरे सियाह रात छाने लगे
जुल्फ लहरे तो रात आने लगे
जुल्फ ज़ंजीर है, फिर भी कितनी हंसीं
रेशमी रेशमी अम्बरी अम्बरी


हुस्न-ए-जानां की तारीफ मुमकिन नहीं
आफरीं आफरीं आफरीं आफरीं
तू भी देखे अगर तो कहे हमनशीं
आफरीं आफरीं आफरीं आफरीं



Ek sh'er:

जो रुके तो कोह-ए-गराँ थे हम, जो चले जां से गुज़र गए
राह-ए-यार हमने क़दम क़दम, तुझे यादगार बना दिया...
 
Environment Day ( 05 June) Humdum By 'gulzar'

Humdum
The nazm of this month is dedicated to the Environment, as we celebrate World Environment Day (5th June) this month.This nazm depicts relationship between Man and Trees. The main character of the nazm is a tree, who according to the poet is his HUMDUM. In this nazm the poet tells about various stages of his life (childhood, marriage, birth of his son and now in old age) and how this 'Ped' has contributed to his life . Like always, Gulzar saheb ends this nazm with a brilliant climax.

HUMDUM
Mod pe dekha hai wo boodha-sa ek ped kabhi ?
Mera waqif hai, bahut salon se mein use jaanata hoon

Jab mein chhota tha to ik aam udaane ke liye
Parli deewar se kandhon pe chadha tha uske
Jaane dukhti huee kis shaakh se jaa paanv lagaa
Dhaad se phenk diya tha muje neeche usne
Meine khunnas main bahut phenke the pathar us par

Meri shaadi pe mujhe yaad hai shaakhein dekar
Meri vedi ka hawan garm kiya tha usne
Aur jab haamla thi 'Biba' to dopahar main har din
Meri biwi ki taraf kairiyan phenki thi isi ne
Waqt ke saath sabhi phool, sabhi patti gaye

Tab bhi jal jaata tha jab Munne se kehti 'Biba'
'Haan,usi ped se aaya hai tu, Ped ka phal hai'
Ab bhi jal jaata hoon. jab mod se gujarte mein kabhi
Khaanskar kehta hai, 'Kyo, Sar ke sabhi baal gaye?'

'Subah se kaat rahe hain woh Kameti wale
Mod tak jaane ki himmat nahin hoti mujhko'
 
arz kiya hai

tu kya rokega a nakhuda mujhe gark honne se
jinhe dubna ho vo dubb jaate hai safeeno me

safeeno=boat

 
Jab kabhi tera naam lete hain-2
Dil se hum inteqaam lete hain-2

Meri barbadiyon ke afsaaney-2
Mere yaaron ke naam lete hain-2

Bas yahi ek jurm hai apna-2
Hum mohabbat se kaam lete hain-2

Har kadam par girey magar seekha-2
Kaise girton ko tham lete hain-2

Hum bhatak kar junoon ki rahon mein-2
Akal se inteqam lete hain-2

Jab kabhi tera naam lete hain....
Dil se hum inteqam lete hain

Lyrics- Sartar Anjum
Singer- Jagjit Singh & Chitra Singh

 
गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का करोबार चले


क़फ़्फ़स उदास है यरो, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले


कभी तो सुभ तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले


बड़ा है दर्द् का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़मगुसार चले


जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब्-ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तेरी आक़बत सँवार चले


हुज़ोओर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब
गिरह में लेके गरेबाँ का तार तार चले


मक़ाम 'फैज़' कोई राह् में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले



Faiz Ahmed Faiz


 
गैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं.....

गैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं
आप कहते हैं जो ऐसा तो बज़ा कहते हैं


वाकई तेरे इस अन्दाज को क्या कहते हैं
ना वफ़ा कहते हैं जिस को ना ज़फ़ा कहते हैं

हो जिन्हे शक, वो करें और खुदाओं की तलाश
हम तो इन्सान को दुनिया का खुदा कहते हैं

तेरी सूरत नजर आई तेरी सूरत से अलग
हुस्न को अहल-ए-नजर हुस्न नुमां कहते हैं

शिकवा-ए-हिज़्र करें भी तो करें किस दिल से
हम खुद अपने को भी अपने से जुदा कहते हैं

तेरी रूदाद-ए-सितम का है बयान नामुमकिन
फायदा क्या है मगर यूं जो जरा कहते हैं

लोग जो कुछ भी कहें तेरी सितमकोशी को
हम तो इन बातों अच्छा ना बुरा कहते हैं

औरों का तजुरबा जो कुछ हो मगर हम तो फ़िराक
तल्खी-ए-ज़ीस्त को जीने का मजा कहते हैं





Jab kabhi tera naam lete hain-2
Dil se hum inteqaam lete hain-2
 
अश'आर .........

आखिरी बात:


अल्लाह अगर तौफीक न दे इंसान के बस का काम नहीं,
फैजान-ए-मुहब्बत आम सही इरफान-ए-मुहब्बत आम नहीं.

 
....................

दिल हो रहा है देर से खामोश झील सा,
क्या दोस्तों के हाथ में पत्थर नहीं कोई ?...
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Last edited:
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या रब हुजूम-ए-गम को दे कुछ और वसुअतें
दामन तो क्या अभी तक तो मेरी आँख नम नहीं...
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Last edited:
उर्दू ........

उर्दू है जिसका नाम हम ही जानते है 'दाग़'
हिन्दोस्तां में धूम हमारी जुबां की है.

​
 
Do Sh'er.......

औरों से कहा तुमने औरों से सुना तुमने,
कभी हमसे कहा होता कभी हमसे सुना होता.





जिसको तुम भूल गए याद करे कौन उसे
जिसे तुम याद हो वो याद किसको करे.
 
Sh'er of the Day

फिर पलट कर निगाह नहीं आयी,
तुझ पे कुर्बान हो गयी होगी...
 
Nazm.....

ये गए दिनों का मलाल है,
मेरे दुश्मना से कहे कोई
किसी गहरी चाल के एहतराम को सिलसिला ही फिजूल है
मुझे शिकस्त यूं भी कुबूल है
के
कभी होंसले जो मिसाल थे
वो नहीं रहे...


मेरे दुश्मना से कहो कोई
वो कभी जो एहद-ए-निशात में
मुझे खुद पे इतना गुरूर था...वो खो गया
वो जो फातिहाना खुमार में
मेरे सारे ख्वाब निहाल थे
वो नहीं रहे...




(Does not comprise the whole text)
 
Sh'er of the Day.............

मेरे इक गोश-ए-फिकर में मेरी जिंदगी से अजीज तर,
मेरा एक ऐसा भी दोस्त है जो कभी मिला ना जुदा हुआ...
 
Maana Ke Zindagi Se Humain Kuch Mila Bhi Hai
Iss Zindagi Ko Hum Ne Buhat Kuch Diya Bhi Hai

Mehsoos Ho Raha Hai Ke Tanha Nahi Hoon Main
Shayad Kahin Qareeb Koi Doosra Bhi Hai
Qatil Ne Kis Safayi Se Dhoyi Hai Aasteen
Uss Ko Khaber Nahi Ke Laho Bolta Bhi Hai

Garq-aab Ker Diya Tha Humain Na-Khuda Ne Aaj
Woh To Kahe Ke Aik Humara Khuda Bhi Hai
Ho To Rahi Thi Koshish-e-Aaraish-e-Chaman
Lekin Chaman Gareeb Mein Aab Kuch Raha Bhi Hai

Aye Qafilay Ke Lougo! Zara Jagtey Raho
Suntay Hain Qafiley Mein Koi Rehnoma Bhi Hai
Yeh Husn-e-Itefaaq Hai Ya Husn-e-Ehtamaam
Hai Jis Jagah Farat Wahin Karbala Bhi Hai

Hum Phir Bhi Apney Chere Na Dekhein To Kya Ilaaj
Aankhein Bhi Hain, Chiragh Bhi Hai, Aaina Bhi Hai
Iqbal Shukar Bhaijo Ke Tum Deedah-Wer Nahi
Deedah-Waron Ko Aaj Koi Poochta Bhi Hai....

poet: unknown
 
another sher for the day

Gham Ko Zulfon Ka Bal Nahi Kehta
Zakham-e-Jaan Ko Kanwal Nahi Kehta
Woh Jo Ik Pal Ko Rooth Jaata Hai
Muddaton Mein Ghazal Nahi Kehta
 
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