Gazals "The Finest Ever"

Seemab Akabarabadi

दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में
एक आईना था टूट गया देखभाल में

सब्र आ ही जाए गर हो बसर एक हाल में
इमकां एक और ज़ुल्म है क़ैद-ए-मुहाल में

आज़ुरदा इस क़दर हूँ सराब-ए-ख़याल से
जी चाहता है तुम भी न आओ ख़याल में

तंग आ के तोड़ता हूँ तिलिस्म-ए-ख़याल को
या मुतमईन करो कि तुम्हीं हो ख़याल में

दुनिया है ख़्वाब हासिल-ए-दुनिया ख़याल है
इंसान ख़्वाब देख रहा है ख़याल में

उम्रर-ए-दो-रोज़ा वाक़ई ख़्वाब-ख़याल थी
कुछ ख़्वाब में गुज़र गई बाक़ी ख़याल में
 
Nice

दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में
एक आईना था टूट गया देखभाल में

सब्र आ ही जाए गर हो बसर एक हाल में
इमकां एक और ज़ुल्म है क़ैद-ए-मुहाल में

आज़ुरदा इस क़दर हूँ सराब-ए-ख़याल से
जी चाहता है तुम भी न आओ ख़याल में

तंग आ के तोड़ता हूँ तिलिस्म-ए-ख़याल को
या मुतमईन करो कि तुम्हीं हो ख़याल में

दुनिया है ख़्वाब हासिल-ए-दुनिया ख़याल है
इंसान ख़्वाब देख रहा है ख़याल में

उम्रर-ए-दो-रोज़ा वाक़ई ख़्वाब-ख़याल थी
कुछ ख़्वाब में गुज़र गई बाक़ी ख़याल में

Nice one Prashant ..... :)

My two cents with due respect to the great Shaayar .... just to continue

गुप्तगू महज़ तेरी वफ़ा पर ही मुख्तसर न हुई
वो शोखियाँ भी तो अब नहीं रही तेरे जमाल में

जिक्र हुआ हर महफिल में तेरी उस रोशनाई का
किसी पतंगे की ज़िन्दगी झुलसी जिस मशाल में

ये हुस्न का गुरुर तुमसे और क्या नहीं करवाएगा
तेरे तमाम जवाब शामिल हैं 'विजय' के सवाल में
 
Thanx Vijay Ji
And your composition is amiable. It has beautiful words full of a great spirit.
Thanx for sharing it. :) :)


Nice one Prashant ..... :)

My two cents with due respect to the great Shaayar .... just to continue

गुप्तगू महज़ तेरी वफ़ा पर ही मुख्तसर न हुई
वो शोखियाँ भी तो अब नहीं रही तेरे जमाल में

जिक्र हुआ हर महफिल में तेरी उस रोशनाई का
किसी पतंगे की ज़िन्दगी झुलसी जिस मशाल में

ये हुस्न का गुरुर तुमसे और क्या नहीं करवाएगा
तेरे तमाम जवाब शामिल हैं 'विजय' के सवाल में
 
Kabhi Kabhi Mere Dil Mein...

:) Hope all of you will like it. :)

Kabhi Kabhi Mere Dil Mein Khayal Aata Hai
K Zindagi Teri Zulfon Ki Narm Chhaon Mein
Guzarne Paati To Shadaab Ho Bhi Sakti Thi
Yeh Teergi Jo Teri Zeest Ka Muqaddar Hai
Teri Nazar Ki Shuaon Mein Kho Bhi Sakti Thi

Ajab Na Tha K Main Begana E Alam Reh Kar
Tere Jamal Ki Rehnaiyyon Mein Kho Rehta
Tera Gudaaz Badan,Teri Neem Baaz Aankhein
Inhi Haseen Fasano Mein Main Ho Rahta

Pukaarti Mujhe Jab Talkhiyan Zamane Ki
Tere Labon Se Hawalat K Ghooont Pi Leta
Hayaat Chhekhti Phirti Barehna Sar Aur Main
Ghaneri Zulfon K Saaye Mein Chhupke Jee Leta

Magar Yeh Ho Na Saka,Aur Ab Yeh Aalam Hai
K Tu Nahi,Tera Gham Teri Justuju Bhi Nahi
Guzar Rahi Hai Kuchhh Is Tarah Zindagi Jaise
Isey Kisi Ke Sahare Ki Aarzu Bhi Nahi..

Na Koi Jawa Na Manzil Na Roshni Ka Suraagh
Guzar Rahi Hai Khilaon Mein Zindagi Meri
Inhi Khilaon Mein Reh Jaunga Kabhi Kho Kar
Main Jaanta Hoon Mere Hum Nafas Magar Yun Hi


:) :)​
 
By Suresh Rampuri

Loota gaya hai mujhko ajab dillagi ke saath,
Ek haadsa hua hai meri bebasi ke saath.

Mujh pe laga raha tha wahi aaj kahkahe,
Milta tha mujhse jo sada sharmindagi ke saath.

Rasmo-riwaz aur zamane ki bandishen,
Sab kuch bhula diya hai teri bandagi ke saath.

Mai kyun kisi se uski zafaa ka gila karun,
Mazbooriyan bahut hain hare ek aadmi ke saath.

Munsif ke faisle se na mayoos ho ‘Suresh’,
Insaaf ho saka naa teri muflisi ke saath.
 
Sudershan Fakir

मेरी ज़ुबाँ से मेरी दास्ताँ सुनो तो सही
यक़ीं करो न करो मेहरबाँ सुनो तो सही

चलो ये मान लिया मुजरिमे-मोहब्बत हैं
हमारे जुर्म का हमसे बयाँ सुनो तो सही

बनोगे दोस्त मेरे तुम भी दुश्मनों एक दिन
मेरी हयात की आह-ओ-फ़ुग़ाँ सुनो तो सही

लबों को सी के जो बैठे हैं बज़्मे-दुनिया में
कभी तो उनकी भी ख़ामोशियाँ सुनो तो सही

कहोगे वक़्त को मुजरिम भरी बहारों में
जला था कैसे मेरा आशियाँ सुनो तो सही

​

:) :)
 
रेत पर लिख के मेरा नाम

रेत पर लिख के मेरा नाम, मिटाया ना करो
आँखें सच बोलती हैं, प्यार छुपाया ना करो


लोग हर बात का, अफसाना बना लेते हैं
सब को हालात की रुदाद*, सुनाया ना करो


ये ज़रूरी नहीं, हर शख्स मसीहा ही हो
प्यार के ज़ख्म अमानत हैं, दिखाया ना करो


शहर -ऐ -एहसास में, पथराव बहुत हैं 'मोहसिन'
दिल को शीशे के झरोंखों में, सजाया ना करो



ग़ज़ल : मोहसिन नक़वी

*रुदाद = कहानी
 
रेत पर लिख के मेरा नाम, मिटाया ना करो
आँखें सच बोलती हैं, प्यार छुपाया ना करो


ये ज़रूरी नहीं, हर शख्स मसीहा ही हो
प्यार के ज़ख्म अमानत हैं, दिखाया ना करो




ग़ज़ल : मोहसिन नक़वी

*रुदाद = कहानी


बहुत बढ़िया .... :)
 
दुश्मन को भी सीने से लगाना नहीं भूले
हम अपने बुज़ुर्गों का ज़माना नहीं भूले


तुम आँखों की बरसात बचाये हुये रखना
कुछ लोग़ अभी आग़ लगाना नहीं भूले


ये बात अलग हाथ कलम हो गये अपने
हम आप की तस्वीर बनाना नहीं भूले


इक ऊम्र हुई मैं तो हँसी भूल चुका हूँ
तुम अब भी मेरे दिल को दुखाना नहीं भूले




ग़ज़ल : सागर आज़मी
 
Zara Gaur Pharmaeye !

“Kabhi yaad aaye to poochna zara apni khalwat – e - shaam say”



Kabhi yaad aaye to poochna zara apni khalwat – e - shaam say


Kisay ishq tha teri zaat say
kisay pyar tha tere naam say



Zara yaad karo k wo kon tha jo kabhi tujhay bhi aziz tha


Wo jo jee utha tere naam say
Wo jo mar mita tere naam say



Humain berukhi ka nahi gila k yehi wafaon ka hai sila
Magar aisa jurm tha konsa gaey hum dua salam say



Na kabhi visaal ki chaah ki na kabhi firaaq mein aah ki
“Kay mera “tareeqa - e - bandagi”, hai juda “tareeqa - e – aam” say
​
 
Excellent !

दुश्मन को भी सीने से लगाना नहीं भूले
हम अपने बुज़ुर्गों का ज़माना नहीं भूले

तुम आँखों की बरसात बचाये हुये रखना
कुछ लोग़ अभी आग़ लगाना नहीं भूले

ये बात अलग हाथ कलम हो गये अपने
हम आप की तस्वीर बनाना नहीं भूले

इक ऊम्र हुई मैं तो हँसी भूल चुका हूँ
तुम अब भी मेरे दिल को दुखाना नहीं भूले


ग़ज़ल : सागर आज़मी

Such a nice gazal ..... so meaningful :).
 
Marvelous post Jakhar Ji :) :)
Thanks a lot for sharing :) :)

“Kabhi yaad aaye to poochna zara apni khalwat – e - shaam say”



Kabhi yaad aaye to poochna zara apni khalwat – e - shaam say


Kisay ishq tha teri zaat say
kisay pyar tha tere naam say



Zara yaad karo k wo kon tha jo kabhi tujhay bhi aziz tha


Wo jo jee utha tere naam say
Wo jo mar mita tere naam say



Humain berukhi ka nahi gila k yehi wafaon ka hai sila
Magar aisa jurm tha konsa gaey hum dua salam say



Na kabhi visaal ki chaah ki na kabhi firaaq mein aah ki
“Kay mera “tareeqa - e - bandagi”, hai juda “tareeqa - e – aam” say
​
 
dil ko chu liya.........wow
दुश्मन को भी सीने से लगाना नहीं भूले
हम अपने बुज़ुर्गों का ज़माना नहीं भूले

तुम आँखों की बरसात बचाये हुये रखना
कुछ लोग़ अभी आग़ लगाना नहीं भूले

ये बात अलग हाथ कलम हो गये अपने
हम आप की तस्वीर बनाना नहीं भूले

इक ऊम्र हुई मैं तो हँसी भूल चुका हूँ
तुम अब भी मेरे दिल को दुखाना नहीं भूले



ग़ज़ल : सागर आज़मी
 
खामोशी ख़ुद अपनी सदा हो,

खामोशी ख़ुद अपनी सदा हो, ऐसा भी हो सकता है
सन्नाटा ही गूँज रहा हो, ऐसा भी हो सकता है


मेरा माजी मुझ से बिछड़ कर, क्या जाने किस हाल में है
मेरी तरह वो भी तनहा हो, ऐसा भी हो सकता है


सहारा सहरा कब तक मैं ढूँढू, उल्फत का एक आलम
आलम आलम इक सहरा हो, ऐसा भी हो सकता है


अहल -ऐ -तूफ़ान सोच रहे हैं, साहिल डूबा जाता है
ख़ुद उन का दिल ड़ूब रहा हो, ऐसा भी हो सकता है


ग़ज़ल : ज़का सिद्दीकी
 
तू किसी और की जागीर है ए जान-ए-ग़ज़ल

तू किसी और की जागीर है ए जान-ए-ग़ज़ल
लोग तूफ़ान उठा देंगे मेरे साथ न चल


पहले हक था तेरी चाहत के चमन पर मेरा
पहले हक़ था तेरे खुश्बू -ए -बदन पर मेरा
अब मेरा प्यार तेरे प्यार का हक़दार नहीं
मै तेरे गेसू -ओ -रुखसार का हक़दार नहीं
अब किसी और के शानों पे है तेरा आँचल
तू किसी और की जागीर है ए जान-ए-ग़ज़ल
लोग तूफ़ान उठा देंगे मेरे साथ न चल



मै तेरे प्यार से घर अपना बसाऊं कैसे
मै तेरी मांग सितारों से सजाऊँ कैसे
मेरी किस्मत में नहीं प्यार की खुश्बू शायद
मेरे हाथों की लकीरों में नहीं तू शायद
अपनी तकदीर बना मेरा मुक़द्दर न बदल
तू किसी और की जागीर है ए जान-ए-ग़ज़ल
लोग तूफ़ान उठा देंगे मेरे साथ न चल



मुझ से कहती हैं ये खामोश निगाहें तेरी
मेरी परवाज़ से ऊंची हैं पनाहें तेरी
और गैरत -ए -एहसास पे शर्मिन्दा हूँ
अब किसी और की बाहों में हैं बाहें तेरी
अब कहाँ मेरा ठिकाना है कहाँ तेरा महल
तू किसी और की जागीर है ए जान-ए-ग़ज़ल
लोग तूफ़ान उठा देंगे मेरे साथ न चल




ज़फर कलीम
 
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