prashanthooda
Banned
Very nice selection Anjali ji and Pravin ji. Thanks a lot for sharing
ये सारा जिस्म झुक कर, बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था, आप को धोखा हुआ होगा
यहाँ तक आते आते, सूख जाती हैं सभी नदियाँ
मुझे मालूम है, पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा....
here is another gazal by dushyant kumar,one of his finest compositions. Its a one among the many thought provoking gazals by him. Hope all of you would appreciate it.![]()
रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।
हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।
![]()
तम्हीद-ए-सितम और है तकमील-ए-जफ़ा और
चखने का मज़ा और है पीने का मज़ा और
तासीर तो तासीर तसव्वुर है गुरेज़ाँ
रातों को ज़रा माँगिये उठ उठ के दुआ और
दोनों ही बिना-ए-कशिश-ओ-जज़्ब हैं लेकिन
नग़्मों की सदा और है नालों की सदा और
टकरा के वहीं टूट गये शीशा-ओ-साग़र
मैख़्वारों के झुर्मुट में जो साक़ी ने कहा और
वो ख़ुद नज़र आते हैं जफ़ाओं पे पशेमाँ
क्या चाहिये और तुम को "शकील" इस के सिवा और
![]()
![]()
[/center]
बेहद यथार्थवादी हे दुष्यंत जी की रचनाये
bahut khub
दस्तूर इबादत का दुनिया से निराला हो
इक हाथ में माला हो इक हाथ में प्याला हो
पूजेंगे सलीके से अंदाज़ मगर अपना
हो याद -ऐ -खुदा दिल में साकी ने सम्भाला हो
We use essential cookies to make this site work, and optional cookies to enhance your experience.