Gazals "The Finest Ever"

Ghalib Sahib ki aakhri Ghazalon me se ek !

1. woh firaaq aur woh wisaal kahaaN ?
woh shab-o-roz-o-maah-o-saal kahaaN ?

[ firaaq = separation, wisaal = meeting, shab = night, roz = day, maah = month, saal = year ]

2. fursat-e-kaarobaar-e-shauq kise ?
zauq-e-nazzaraa-e-jamaal kahaaN ?

[ zauq = delight/joy, jamaal = beauty ]

3. dil to dil wo dimaaGH bhee na rahaa
shor-e-sauda-e-KHatt-o-KHaal kahaaN ?

4. thee woh ik shaKHs ke tasavvur se
ab woh raanaai-e-KHayaal kahaaN ?

[ tasavvur = imagination, raanaai-e-KHayaal = tender thoughts ]

5. 'eisa aasaaN naheeN lahoo rona
dil meiN taaqat jigar meiN haal kahaaN ?

[ haal = spiritual ecstasy ]

6. hamse chooTa qamaar_KHaana-e-ishq
waaN jo jawaiN, girah meiN maal kahaaN ?

[ qamaar_khaana = casino, girah = knot/joint ]

7. fikr-e-duniyaaN meiN sar khapaata hooN
maiN kahaaN aur ye wabaal kahaaN ?

[ wabaal = calamity ]

8. muzmahil ho gaye quwa'a 'GHalib'
wo anaasir meiN 'eitdaal kahaaN ?

[ muzmahil = exhausted/idle, quwa'a = limbs, anaasir = elements, 'eitdaal = moderation ]
 
Last edited:
Kaifi Azami

सुना करो मेरी जाँ इन से उन से अफ़साने
सब अजनबी हैं यहाँ कौन किस को पहचाने

यहाँ से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालों
हैं मेरी प्यास के फूँके हुए ये वीराने

मेरी जुनून-ए-परस्तिश से तंग आ गये लोग
सुना है बंद किये जा रहे हैं बुत-ख़ाने

जहाँ से पिछले पहर कोई तश्ना-काम उठा
वहीं पे तोड़े हैं यारों ने आज पैमाने

बहार आये तो मेरा सलाम कह देना
मुझे तो आज तलब कर लिया है सेहरा ने

सिवा है हुक़्म कि "कैफ़ी" को संगसार करो
मसीहा बैठे हैं छुप के कहाँ ख़ुदा जाने


:) :)​
 
kiya hai pyar jise humne zindagi ki tarah
http://www.hallagulla.com/urdu/dil-...umne-zindagi-ki-tarah-241768.html#post4215097

kiya hai pyar jise humne zindagi ki tarah
wo aashna bhi mila humse ajnabi ki tarah

kise khabar thi baDhegi kuch aur tareeqi
chupega wo kisi badli meiN chandni ki tarah

baDha ke pyaas meri usne haath choD diya
wo kar raha tha murawwat bhi dillagi ki tarah

sitam to ye hai ke wo bhi na ban saka apna
qabool humne kiye jiske gam khushi ki tarah

kabhi na socha tha humne 'qateel' uske liye
karega hum pe sitam wo bhi har kisi ki tarah
 
दुष्यंत कुमार जी की कलम से..

ये सारा जिस्म झुक कर, बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था, आप को धोखा हुआ होगा

यहाँ तक आते आते, सूख जाती हैं सभी नदियाँ
मुझे मालूम है, पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा


गज़ब ये है की अपनी मौत की, आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परेशान हैं, वहां पर क्या हुआ होगा


तुम्हारे शहर में ये शोर, सुन -सुन कर तो लगता है
की इंसानों के जंगल में, कोई हांका हुआ होगा


कई फाके बिताकर मर गया जो, उस के बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा

यहाँ पर सिर्फ़ गूंगे और बहरे, लोग बसते हैं
खुदा जाने यहाँ पर किस तरह, जलसा हुआ होगा

चलो अब यादगारों की, अँधेरी कोठरी खोलें
कम-अज-कम एक वो चेहरा, तो पहचाना हुआ होगा


रचियता : दुष्यंत कुमार जी
 
ये सारा जिस्म झुक कर, बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था, आप को धोखा हुआ होगा

यहाँ तक आते आते, सूख जाती हैं सभी नदियाँ
मुझे मालूम है, पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा....

Very nice sharing Anjali Ji... Thanks for posting it.... :)
 
Last edited:
Dushyant Kumar

Here is another Gazal by Dushyant Kumar,one of his finest compositions. Its a one among the many thought provoking gazals by him. Hope all of you would appreciate it. :) :)

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है ।

:) :)​
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here is another gazal by dushyant kumar,one of his finest compositions. Its a one among the many thought provoking gazals by him. Hope all of you would appreciate it. :) :)


रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।​

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।​


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बेहद यथार्थवादी हे दुष्यंत जी की रचनाये
 
subhan allah

bahut khub
:) :)

तम्हीद-ए-सितम और है तकमील-ए-जफ़ा और
चखने का मज़ा और है पीने का मज़ा और

तासीर तो तासीर तसव्वुर है गुरेज़ाँ
रातों को ज़रा माँगिये उठ उठ के दुआ और

दोनों ही बिना-ए-कशिश-ओ-जज़्ब हैं लेकिन
नग़्मों की सदा और है नालों की सदा और

टकरा के वहीं टूट गये शीशा-ओ-साग़र
मैख़्वारों के झुर्मुट में जो साक़ी ने कहा और

वो ख़ुद नज़र आते हैं जफ़ाओं पे पशेमाँ
क्या चाहिये और तुम को "शकील" इस के सिवा और

:) :)
 
Dushayant Kumar

One more by him.... :) :)

मरना लगा रहेगा यहाँ जी तो लीजिए
ऐसा भी क्या परहेज़, ज़रा—सी तो लीजिए

अब रिन्द बच रहे हैं ज़रा तेज़ रक़्स हो
महफ़िल से उठ लिए हैं नमाज़ी तो लीजिए

पत्तों से चाहते हो बजें साज़ की तरह
पेड़ों से पहले आप उदासी तो लीजिए

ख़ामोश रह के तुमने हमारे सवाल पर
कर दी है शहर भर में मुनादी तो लीजिए

ये रौशनी का दर्द, ये सिरहन ,ये आरज़ू,
ये चीज़ ज़िन्दगी में नहीं थी तो लीजिए

फिरता है कैसे—कैसे सवालों के साथ वो
उस आदमी की जामातलाशी तो लीजिए.

:) :)
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Thanks for liking Anjali Ji and Sachin Ji. ....:)


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बेहद यथार्थवादी हे दुष्यंत जी की रचनाये

bahut khub
 
दस्तूर इबादत का दुनिया से निराला हो
इक हाथ में माला हो इक हाथ में प्याला हो


पूजेंगे सलीके से अंदाज़ मगर अपना
हो याद -ऐ -खुदा दिल में साकी ने सम्भाला हो


मस्ती भी तक़द्दुस भी एक साथ चले दोनों
इक सिम्त हो मयखाना हो इक सिम्त शिवाला हो


मस्जिद की तरफ़ से तू जाना ना कभी साकी
जाहिद भी कभी तेरा ना चाहने वाला हो


वो दूब के मर जाएँ मदिरा की सुराही में
माशूक ने गर दिल की महफ़िल से निकाला हो




दलीप ताहिर
 
दस्तूर इबादत का दुनिया से निराला हो
इक हाथ में माला हो इक हाथ में प्याला हो


पूजेंगे सलीके से अंदाज़ मगर अपना
हो याद -ऐ -खुदा दिल में साकी ने सम्भाला हो


Nice sharing Anjali Ji... Thanks for it .... :) :)
 
Ahmed Nadeem Kasami

तुझे इज़हार-ए-मुहब्बत से अगर नफ़रत है
तूने होठों के लरज़ने को तो रोका होता

बे-नियाज़ी से, मगर कांपती आवाज़ के साथ
तूने घबरा के मिरा नाम न पूछा होता

तेरे बस में थी अगर मशाल-ए-जज़्बात की लौ
तेरे रुख्सार में गुलज़ार न भड़का होता

यूं तो मुझसे हुई सिर्फ़ आब-ओ-हवा की बातें
अपने टूटे हुए फ़िरक़ों को तो परखा होता

यूं ही बेवजह ठिठकने की ज़रूरत क्या थी
दम-ए-रुख्सत में अगर याद न आया होता

:) :)​
 
Hum se badal gaya wo nigaahe to kya hua
Zinda hai kitne log mohabbat kiye baghair
Guzre dino mein jo kabhi gunje the keh kahe
Ab apne ikhtiyaar mein wo bhi nahin rahe
Kismat mein reh gayi hai jo aahe to kya hua
Sadma ye jhelna hai shikaayat kiye baghair
Wo saamne bhi ho to na kholenge hum zubaan
Likkhi hai uske chehre pe apni hi daastaan
Usko taras gayi hai ye baahen to kya hua
Wo laut jaaye hum pe inaayat kiye baghair
Pehle karib tha koi ab dooriyaan bhi hain
Insaan ke naseeb mein majbooriyaan bhi hain
Apni badal chuka hai wo raahen to kya hua
Hum chup rahenge usko malaamat kiye bahgair
 
Saharyar

Hope all of you would appreciate it.

मेरे लिए रात ने
आज फ़राहम किया
एक नया मर्हला
नींदों ने ख़ाली किया
अश्कों से फ़िर भर दिया
कासा मेरी आँख का
और कहा कान में
मैंने हर एक जुर्म से
तुमको बरी कर दिया
मैंने सदा के लिए
तुमको रिहा कर दिया
जाओ जिधर चाहो तुम
जागो कि सो जाओ तुम
ख़्वाब का दर बंद है

:) :)​
 
Last edited:
Saharyar

It's a famous gazal from the movie "Umrao Jaan". Indeed it's one of the finest compositions by Saharyar.

जुस्तजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने

तुझ को रुसवा न किया ख़ुद भी पशेमाँ न हुये
इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हम ने

कब मिली थी कहाँ बिछड़ी थी हमें याद नहीं
ज़िन्दगी तुझ को तो बस ख़्वाब में देखा हम ने

ऐ "अदा" और सुनाये भी तो क्या हाल अपना
उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तन्हा हम ने

:) :)
​
Don't miss the video. :)


http://in.youtube.com/watch?v=xkbIuvjrzQQ
 
Saharyar

One more from the collections of Saharyar from the movie. Awesome composition and impressive voice of Suresh Wadlkar make this gazal a superb one. :) :)

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यूँ है

तन्हाई की ये कौन सी मन्ज़िल है रफ़ीक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है

हम ने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की
वो ज़ूद-ए-पशेमान पशेमान सा क्यूँ है

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आईना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है

:) :)​
 
BY Dushyant Kumar

Ho gayi hai peer parvat si pighalni chahiye,Iss himayala se koi ganga nikalni chahiye.Aaj yah dewaar, pardon ki tarah hilne lagi,Shart lekin thi ki ye buniyaad hilni chahiye.Har sadak par, har gali mein, har nadi, har gaon mein,Haath lahrate hue har lash chalni chahiye.Sirf hungama khada karna mera maksad nahi,Meri koshish hai ki ye surat badalni chahiye.Mere seene mein nahi to tere seene mein sahi,Ho kahin bhi aag, lekin aag jalni chahiye.
 
Last edited:
Suderashan Fakir

ज़ख़्म जो आप की इनायत है इस निशानी को नाम क्या दे हम
प्यार दीवार बन के रह गया है इस कहानी को नाम क्या दे हम

आप इल्ज़ाम धर गये हम पर एक एहसान कर गये हम पर
आप की ये मेहरबानी है मेहरबानी को नाम क्या दे हम

आपको यूँ ही ज़िन्दगी समझा धूप को हमने चाँदनी समझा
भूल ही भूल जिस की आदत है इस जवानी को नाम क्या दे हम

रात सपना बहार का देखा दिन हुआ तो ग़ुबार सा देखा
बेवफ़ा वक़्त बेज़ुबाँ निकला बेज़ुबानी को नाम क्या दे हम

:) :)
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Josh Malihabadi

अशवों को चैन ही नहीं आफ़त किये बगैर
तुम, और मान जाओ शरारत किये बगैर!

अहल-ए-नज़र को यार दिखाना रह-ए-वफ़ा
ए काश! ज़िक्र-ए-दोज़ख-ओ-जन्नत के बगैर

अब देख उस का हाल कि आता न था करार
खुद तेरे दिल को, जिस पे इनायत किये बगैर

ए हमनशीं मुहाल है नासेह का टालना
यह, और यहाँ से जाएँ नसीहत किये बगैर

तुम कितने तुन्द-खू हो कि पहलू से आज तक
एक बार भी उठे न क़यामत किये बगैर
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