Gazals "The Finest Ever"

pyaar mujhase jo kiyaa tumane to kyaa paaogii
mere haalat kii aandhii men bikhar jaogii
pyaar mujhase jo kiyaa tumane to kyaa paaogii

ranj aur dard kii bastii kaa main baashindaa huun
ye to bas main huun ke is haal men bhii zindaa huun
khvaab kyuun dekhuun vo kal jisape main sharmindaa huun
main jo sharmindaa huaa tum bhii to sharamaaogii
pyaar mujhase jo kiyaa ...

kyun mere saath koi aur pareshaan rahe
merii duniyaa hai jo viraan to viraan rahe
zindagii kaa ye safar tumako to aasaan rahe
hamasafar mujhako banaogii to pachhataaogii
pyaar mujhase jo kiyaa ...

ek main kyaa abhii aayenge dIvaane kitane
abhii gunjege muhabbat ke taraane kitane
zindagii tumako sunaayegii fasaane kitane
kyun samajhatii ho mujhe bhuul nahii paaogii
pyaar mujhase jo kiyaa ...
 
लहरें साहिल तक जब आयीं

लहरें साहिल तक जब आयीं, चांदी के वरक़ चिपकाए हुए.
हम हौले-हौले पानी में, चलते रहे दिल गरमाए हुए.


वो देखो उधर उस कश्ती पर, दो उजले-उजले कबूतर हैं,
कुछ राज़ की बातें करते हैं, आपस में चोंच मिलाए हुए.


मैं उनके लिए कूचों-कूचों, छाना किया ख़ाक ज़माने की,
वो सामने मेरी आंखों के, निकले मुझ से कतराए हुए.


परदेस में बेटा खुश होगा, माँ-बाप के दिल को ढारस है,
फिर भी ये शिकायत रहती है, मुद्दत गुज़री घर आए हुए.


आँगन में बाँध के अलगनियां, कपडे कल लोग सुखाते थे,
अब शहरों में आँगन ही नहीं,सब हैं सिमटे-सिमटाए हुए।


मिटटी के चरागों की रौनक़, बिजली के ये कुम्कुमे क्या जानें,
इनसे ही दिवाली रौशन थी, जलते थे क़तार बनाए हुए.


मैं बाग़ से कल जब गुज़रा था, इक ठेस लगी थी दिल को मेरे,
कुछ फूलों में बे-रंगी थी, कुछ फूल मिले मुरझाये हुए.



" ज़ैदी जाफ़र रज़ा"
 
Ab voh pehle si shanasai bhi nahi
tanhai to ye hai ke tanhai bhi nahi

hua hai jab se khyaale-yaar hamraah
qurb nahi haasil to judai bhi nahi

dil hai ke jaane khuda kis maqaam
qaid maen bhi nahi rihaai bhi nahi

hui is qadar viraan mehfile tanhai
ke rah gayi ab parchhayee bhi nahi

aap aur bhule mujhe ye kaise mumkin
ab tak to yaad meri aayi bhi nahi

mayoos badaa aap ki bazm se lauta
baat to baat are roonumai bhi nahi

ye kyaa abhi se tang aa gaye aap
abhi kya abhi puri sunaai bhi nahi

ab vohi kare yaad to shayad ho kuch
hai khwabo khyaali itni rasai bhi nahi

kyon na ubhrey shauqe-ghazal sarai
tabiyat ab se pehle kabhi aai bhi nahi

vaham hai yaqeen hai ya khusfahmi
ho ga mujh sa koi shedaai bhi nahi

gustakhiye-qalaam voh karenge muaf
kya unse ab itni aashnaai bhi nahi

padh kar ghazal aap ho gaye khamosh
taareef to ki nahi burrai bhi nahi
 
समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का
'अकबर' ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का


गर शैख़ो-बहरमन सुनें अफ़साना किसी का
माबद न रहे काब-ओ-बुतख़ाना किसी का


अल्लाह ने दी है जो तुम्हे चांद-सी सूरत
रौशन भी करो जाके सियहख़ाना किसी का


अश्क आँखों में आ जाएँ एवज़ नींद के साहब
ऐसा भी किसी शब सुनो अफ़साना किसी का


इशरत जो नहीं आती मिरे दिल में, न आए
हसरत ही से आबाद है वीराना किसी का


करने जो नहीं देते बयाँ हालते-दिल को
सुनिएगा लबे-ग़ौर से अफ़साना किसी का


कोई न हुआ रूह का साथी दमे-आख़िर
काम आया न इस वक़्त में याराना किसी का


हम जान से बेज़ार रहा करते हैं 'अकबर'
जब से दिले-बेताब है दीवाना किसी का





"अकबर इलाहाबादी" (सैयद हुसैन)
(१८४६-१९२१)
 
Mirza Ghalib

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले

मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले

हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले

हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले

जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले

खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले

कहाँ मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले
 
तेरी बातें ही सुनाने आये
दोस्त भी दिल ही दुखाने आये


फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं
तेरे आने के ज़माने आये


ऐसी कुछ चुप सी लगी है जैसे
हम तुझे हाल सुनाने आये


इश्क़ तन्हा है सर-ए-मंज़िल-ए-ग़म
कौन ये बोझ उठाने आये


अजनबी दोस्त हमें देख के हम
कुछ तुझे याद दिलाने आये


दिल धड़कता है सफ़र के हंगाम
काश फिर कोई बुलाने आये


अब तो रोने से भी दिल दुखता है
शायद अब होश ठिकाने आये


क्या कहीं फिर कोई बस्ती उजड़ी
लोग क्यूँ जश्न मनाने आये


सो रहो मौत के पहलू में "फ़राज़"
नींद किस वक़्त न जाने आये



"अहमद फ़राज़"
 
very nice Anjali ji..........
तेरी बातें ही सुनाने आये
दोस्त भी दिल ही दुखाने आये


फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं
तेरे आने के ज़माने आये


ऐसी कुछ चुप सी लगी है जैसे
हम तुझे हाल सुनाने आये


इश्क़ तन्हा है सर-ए-मंज़िल-ए-ग़म
कौन ये बोझ उठाने आये


अजनबी दोस्त हमें देख के हम
कुछ तुझे याद दिलाने आये


दिल धड़कता है सफ़र के हंगाम
काश फिर कोई बुलाने आये


अब तो रोने से भी दिल दुखता है
शायद अब होश ठिकाने आये


क्या कहीं फिर कोई बस्ती उजड़ी
लोग क्यूँ जश्न मनाने आये


सो रहो मौत के पहलू में "फ़राज़"
नींद किस वक़्त न जाने आये



"अहमद फ़राज़"
 
Yaar ko hamne janbaja dekha,
kahin zahir kahin chhupa dekha.
Kahin mumkin hua kahin vazib,
kahin faani kahin waffa dekha.
Kahin wo badshah-e-takhat nasin,
kahin kasali-e-daga dekha.
Kahin wo dar libas-e-mashuka,
par sare naazo or ada dekha.
Kahin aashik niaj ki surat,
seena dariya-o-dil or jala dekha.
 
दहकते अंगारों पर सोते रहे हैं लोग।
इस तरह भी रात रोशनाते रहें हैं लोग॥

न कल हुए, न होंगे इश्क के गीत ये।
मौत की सरदल पर बैठ गाते रहे हैं लोग॥

आँधियों को यदि भ्रम है, अँधेरा फैलाने का।
आँधियों को रोक भी पाते हैं लोग॥

जिन्दगी का अपमान जब किसी ने किया।
मौत बन कर मौत की आते हैं लोग॥

तोड़ कर मजबूरियों की जंजीरों को शुरू से।
जुल्म के गले जंजीरें डालते रहे हैं लोग॥
 
पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है



लगने न दे बस हो तो उस के गौहर-ए-गोश के बाले तक
उस को फ़लक चश्म-ए-मै-ओ-ख़ोर की तितली का तारा जाने है



आगे उस मुतक़ब्बर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं
कब मौजूद् ख़ुदा को वो मग़रूर ख़ुद-आरा जाने है



आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में
जी के ज़िआँ को इश्क़ में उस के अपना वारा जाने है



चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है



क्या ही शिकार-फ़रेबी पर मग़रूर है वो सय्यद बच्चा
त'एर उड़ते हवा में सारे अपनी उसारा जाने है



मेहर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
और तो सब कुछ तन्ज़-ओ-कनाया रम्ज़-ओ-इशारा जाने है



क्या क्या फ़ितने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना
जिस बेदिल बेताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है



आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक उम्र दो बारा जाने है



रख़नों से दीवार-ए-चमन के मूँह को ले है छिपा य'अनि
उन सुराख़ों के टुक रहने को सौ का नज़ारा जाने है



तशना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ीकश
दमदार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है
 
अजनबी शहर के/में अजनबी रास्ते , मेरी तन्हाईयों पे मुस्कुराते रहे ।

मैं बहुत देर तक यूं ही चलता रहा, तुम बहुत देर तक याद आते रहे ।।


ज़ख्म मिलता रहा, ज़हर पीते रहे, रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे,

जिंदगी भी हमें आज़माती रही, और हम भी उसे आज़माते रहे ।।


ज़ख्म जब भी कोई ज़हनो दिल पे लगा, तो जिंदगी की तरफ़ एक दरीचा खुला

हम भी किसी साज़ की तरह हैं, चोट खाते रहे और गुनगुनाते रहे ।।


कल कुछ ऐसा हुआ मैं बहुत थक गया, इसलिये सुन के भी अनसुनी कर गया,

इतनी यादों के भटके हुए कारवां, दिल के जख्मों के दर खटखटाते रहे ।।


सख्त हालात के तेज़ तूफानों, गिर गया था हमारा जुनूने वफ़ा

हम चिराग़े-तमन्ना़ जलाते रहे, वो चिराग़े-तमन्ना बुझाते रहे ।।
 
तू इस कदर मुझे अपने करीब लगता है
तुझे अलग से जो सोचूं , अजीब सा लगता है

जिसे न हुस्न से मतलब न इश्क से सरोकार
वो शख्स मुझको बहुत बदनसीब लगता है

हदूद ऐ जात से बाहर निकल के देख ज़रा
न कोई गैर , न कोई रकीब लगता है

ये दोस्ती , ये मरासिम , ये चाहतें , ये खुलूस
कभी कभी ये सब कुछ अजीब सा लगता है

उफक पे दूर चमकता हुआ कोई तारा
मुझे चराग ऐ दयार ऐ हबीब लगता है

न जाने कब कोई तूफ़ान आएगा यारों
बुलंद मौज से साहिल करीब लगता है

- जान निसार अख्तर
 
मैं और मेरी आवारगी

फिरते हैं कब से दरबदर अब इस नगर अब उस नगर
एक दूसरे के हमसफ़र मैं और मेरी आवारगी
ना आशना हर रहगुज़र ना मेहरबाँ है एक नज़र
जायें तो अब जायें किधर मैं और मेरी आवारगी



हम भी कभी आबाद थे ऐसे कहाँ बरबाद थे
बिफ़िक्र थे आज़ाद थे मसरूर थे दिलशाद थे
वो चाल ऐसि चल गया हम बुझ गये दिल जल गया
निकले जला के अपना घर मैं और मेरी आवारगी



वो माह-ए-वश वो माह-ए-रूह वो माह-ए-कामिल हूबहू
थीं जिस की बातें कूबकू उस से अजब थी गुफ़्तगू
फिर यूँ हुआ वो खो गई और मुझ को ज़िद सी हो गई
लायेंगे उस को ढूँड कर मैं और मेरी आवारगी



ये दिल ही था जो सह गया वो बात ऐसी कह गया
कहने को फिर क्या रह गया अश्कों का दरिया बह गया
जब कह कर वो दिलबर गया ती लिये मैं मर गया
रोते हैं उस को रात भर मैं और मेरी आवारगी



अब ग़म उठायें किस लिये ये दिल जलायें किस लिये
आँसू बहायें किस लिये यूँ जाँ गवायें किस लिये
पेशा न हो जिस का सितम ढूँढेगे अब ऐसा सनम
होंगे कहीं तो कारगर मैं और मेरी आवारगी



आसार हैं सब खोट के इम्कान हैं सब चोट के
घर बन्द हैं सब कोट के अब ख़त्म है सब टोटके
क़िस्मत का सब ये खेल है अंधेर ही अंधेर है
ऐसे हुए हैं बेअसर मैं और मेरी आवारगी



जब हमदम-ओ-हमराज़ था तब और ही अन्दाज़ था
अब सोज़ है तब साज़ था अब शर्म है तब नाज़ था
अब मुझ से हो तो हो भी क्या है साथ वो तो वो भी क्या
एक बेहुनर एक बेसबर मैं और मेरी आवारगी
 
लहरें साहिल तक जब आयीं, चांदी के वरक़ चिपकाए हुए.
हम हौले-हौले पानी में, चलते रहे दिल गरमाए हुए.

वो देखो उधर उस कश्ती पर, दो उजले-उजले कबूतर हैं,
कुछ राज़ की बातें करते हैं, आपस में चोंच मिलाए हुए.

मैं उनके लिए कूचों-कूचों, छाना किया ख़ाक ज़माने की,
वो सामने मेरी आंखों के, निकले मुझ से कतराए हुए.

परदेस में बेटा खुश होगा, माँ-बाप के दिल को ढारस है,
फिर भी ये शिकायत रहती है, मुद्दत गुज़री घर आए हुए.

आँगन में बाँध के अलगनियां, कपडे कल लोग सुखाते थे,
अब शहरों में आँगन ही नहीं,सब हैं सिमटे-सिमटाए हुए।

मिटटी के चरागों की रौनक़, बिजली के ये कुम्कुमे क्या जानें,
इनसे ही दिवाली रौशन थी, जलते थे क़तार बनाए हुए.

मैं बाग़ से कल जब गुज़रा था, इक ठेस लगी थी दिल को मेरे,
कुछ फूलों में बे-रंगी थी, कुछ फूल मिले मुरझाये हुए.
 
ज़ख़्म जो आप की इनायत है इस निशानी को नाम क्या दे हम
प्यार दीवार बन के रह गया है इस कहानी को नाम क्या दे हम



आप इल्ज़ाम धर गये हम पर एक एहसान कर गये हम पर
आप की ये मेहरबानी है मेहरबानी को नाम क्या दे हम



आपको यूँ ही ज़िन्दगी समझा धूप को हमने चाँदनी समझा
भूल ही भूल जिस की आदत है इस जवानी को नाम क्या दे हम



रात सपना बहार का देखा दिन हुआ तो ग़ुबार सा देखा
बेवफ़ा वक़्त बेज़ुबाँ निकला बेज़ुबानी को नाम क्या दे हम
 
wah wah wah wah wah ............................................................................................sans chadhge wah wah wah .......................................................................................
 
अगर सफ़र में मेरे साथ मेरा यार चले ------आलोक श्&#23

अगर सफ़र में मेरे साथ मेरा यार चले,

तवाफ़ करता हुआ मौसमे-बहार चले।


लगा के वक़्त को ठोकर जो ख़ाकसार चले,

यक़ीं के क़ाफ़िले हमराह बेशुमार चले।


नवाज़ना है तो फिर इस तरह नवाज़ मुझे,

कि मेरे बाद मेरा ज़िक्र बार-बार चले।


ये जिस्म क्या है, कोई पैरहन उधार का है,

यहीं संभाल के पहना,यहीं उतार चले।


ये जुगनुओं से भरा आस्माँ जहाँ तक है,

वहाँ तलक तेरी नज़रों का इक़्तिदार चले।


यही तो इक तमन्ना है इस मुसाफ़िर की,

जो तुम नहीं तो सफ़र में तुम्हारा प्यार चले।
 
My favourite one from movie "PAKEEZAH" a movie whch need no introduction, this Ghazal's lyricist is Kaifi Azmi, music given by Gulam Mohammad and sung by Lata Mangeshkar:)


Chalte-chalte Yun hi koyi mil gaya tha
Sar-e-rah chalte chalte -2
wahin tham ke rah gayi hai
meri raat dhaltey dhaltey

Jo kahi gayi jo mukjh se
Jo kahi gayi jo mukjh se
woh zamana kah raha hai
Ke fasana ban gayi hai
ke fasana ban gayi hai
meri baat chaltey chaltey
Yun hi koyi mil gaya tha
sar-e-rah chaltey chaltey

Yun hi koyi mil gaya tha.....
Sar-e-rah chaltey chaley
Sar-e-rah chaltey chaltey
chaltey chaltey-chaltey chaltey
Yun hi koyi mil gaya tha.....

Shab-e-intezar aakhir
kabhi hogi muktasr bhi
ye chirag bujh rahe hain
ye chirag bujh rahe hain
Mere sath jaltey-jaltey
ye chirag bujh rahe hain
ye chirag bujh rahe hain
ye chirag bujh rahe hain
ye chirag bujh rahe hain
Mere sath jaltey jaltey

Yun hi koyi mil gaya tha
Yun hi koyi mil gaya tha
Sar-e-rah chalte chalte

 
ये दिल कुटिया है संतों की---निदा फ़ाज़ली

ये दिल कुटिया है संतों की यहाँ राजा भिकारी क्या

वो हर दीदार में ज़रदार है गोटा किनारी क्या



ये काटे से नहीं कटते ये बांटे से नहीं बंटते
नदी के पानियों के सामने आरी कटारी क्या



उसी के चलने-फिरने, हंसने-रोने की हैं तस्वीरें
घटा क्या, चाँद क्या, संगीत क्या, बाद-ए-बहारी क्या



किसी घर के किसी बुझते हुए चूल्हे में ढूँढ उसको
जो चोटी और दाढ़ी में रहे वो दीनदारी क्या



हमारा मीर जी से मुत्तफ़िक़ होना है नामुमकिन
उठाना है जो पत्थर इश्क़ का तो हल्का-भारी क्या
 
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