Gazals "The Finest Ever"

अपनी धुन में रहता हूँ --नासिर काज़मी

अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ



ओ पिछली रुत के साथी
अब के बरस मैं तन्हा हूँ



तेरी गली में सारा दिन
दुख के कन्कर चुनता हूँ



मुझ से आँख मिलाये कौन
मैं तेरा आईना हूँ



मेरा दिया जलाये कौन
मैं तेरा ख़ाली कमरा हूँ



तू जीवन की भरी गली
मैं जंगल का रस्ता हूँ



अपनी लहर है अपना रोग
दरिया हूँ और प्यासा हूँ



आती रुत मुझे रोयेगी
जाती रुत का झोँका हूँ
 
भँवर से बच के निकलें जो उन्हें साहिल डुबोते हैं
अजूबे तेरी दुनिया में कभी ऐसे भी होते हैं

ये परदे की कलाकारी भला व्यवहार थोड़े है
जो रिश्तों को बनाते हैं वही रिश्तों को खोते हैं

वो फूलों से भी सुंदर हैं वो कलियों से भी कोमल हैं
मुहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं

किसी को पेट भरने तक मयस्सर भी नहीं रोटी
बहुत से लोग खा-खा कर यहां बीमार होते हैं

जिन्हें रातों में बिस्तर के कभी दर्शन नहीं होते
बिछा कर धूप का टुकड़ा ऒढ़ अखब़ार सोते हैं

हमीं ने आसमानों को सितारों से सजाया है
हमीं धरती के सीने में बसंती बीज बोते हैं

मुहब्बत से भरी नज़रें तो मिलती हैं मुकद्दर से
बहुत से लोग नज़रों के मगर नश्तर चुभोते हैं



योगेन्द्र मौदगिल
 
Last edited:
http://www.youtube.com/watch?v=zryWgKEor-o&feature=related
kiya hai pyar jise humne zindagi ki tarah
wo aashna bhi mila humse ajnabi ki tarah

kise khabar thi baDhegi kuch aur tareeqi
chupega wo kisi badli meiN chandni ki tarah

baDha ke pyaas meri usne haath choD diya
wo kar raha tha murawwat bhi dillagi ki tarah

sitam to ye hai ke wo bhi na ban saka apna
qabool humne kiye jiske gam khushi ki tarah

kabhi na socha tha humne 'qateel' uske liye
karega hum pe sitam wo bhi har kisi ki tarah

Thanks for sharing the album...are you jagjit ji's fan??? :)
 
जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग

मिल भी लेते हैं गले से अपने मतलब के लिए
आ पड़े मुश्किल तो नज़रें भी चुरा लेते हैं लोग

है बजा उनकी शिकायत लेकिन इसका क्या इलाज
बिजलियाँ खुद अपने गुलशन पर गिरा लेते हैं लोग

हो खुशी भी उनको हासिल ये ज़रूरी तो नहीं
गम छुपाने के लिए भी मुस्कुरा लेते हैं लोग

ये भी देखा है कि जब आ जाये गैरत का मुकाम
अपनी सूली अपने काँधे पर उठा लेते हैं लोग




क़तील शिफाई
 
कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है


हमसे पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी
हमने भी इस शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है


उससे बिछड़े बरसों बीते लेकिन आज न जाने क्यों
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारण धमकाया है


कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें की
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है



निदा फाज़ली
 
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो


वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो


पत्थरों में भी ज़ुबाँ होती है दिल होते हैं
अपने घर की दर-ओ-दीवार सजा कर देखो


फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढा़ कर देखो






निदा फाज़ली
 
तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ यह कैसी तन्हाई है
तेरे साथ तेरी याद आई, क्या तू सचमुच आई है

शायद वो दिन पहला दिन था मलकें बोझल होने का
मुझ को देखते ही जब उन की अंगड़ाई शरमाई है

उस दिन पहली बार हुआ था मुझ को रफ़ाक़ात का एहसास
जब उस के मलबूस की खुश्बू घर पहुँचाने आई है

हुस्न से अर्ज़ ए शौक़ न करना हुस्न को ज़ाक पहुँचाना है
हम ने अर्ज़ ए शौक़ न कर के हुस्न को ज़ाक पहुँचाई है

हम को और तो कुछ नहीं सूझा अलबत्ता उस के दिल में
सोज़ ए रक़बत पैदा कर के उस की नींद उड़ाई है

हम दोनों मिल कर भी दिलों की तन्हाई में भटकेंगे
पागल कुछ तो सोच यह तू ने कैसी शक्ल बनाई है

इश्क़ ए पैचान की संदल पर जाने किस दिन बेल चढ़े
क्यारी में पानी ठहरा है दीवारों पर काई है

हुस्न के जाने कितने चेहरे हुस्न के जाने कितने नाम
इश्क़ का पैशा हुस्न परस्ती इश्क़ बड़ा हरजाई है

आज बहुत दिन बाद मैं अपने कमरे तक आ निकला था
ज्यों ही दरवाज़ा खोला है उस की खुश्बू आई है

एक तो इतना हब्स है फिर मैं साँसें रोके बैठा हूँ
वीरानी ने झाड़ू दे के घर में धूल उड़ाई है
 
अति सुन्दर अंजलि :)
जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग

मिल भी लेते हैं गले से अपने मतलब के लिए
आ पड़े मुश्किल तो नज़रें भी चुरा लेते हैं लोग

है बजा उनकी शिकायत लेकिन इसका क्या इलाज
बिजलियाँ खुद अपने गुलशन पर गिरा लेते हैं लोग




क़तील शिफाई
 
सिलसिला ज़ख्म ज़ख्म जारी है -----अख़्तर नाज़्&

सिलसिला ज़ख्म ज़ख्म जारी है
ये ज़मी दूर तक हमारी है

मैं बहुत कम किसी से मिलता हूँ
जिससे यारी है उससे यारी है

हम जिसे जी रहे हैं वो लम्हा
हर गुज़िश्ता सदी पे भारी है

मैं तो अब उससे दूर हूँ शायद
जिस इमारत पे संगबारी है

नाव काग़ज़ की छोड़ दी मैंने
अब समन्दर की ज़िम्मेदारी है

फ़लसफ़ा है हयात का मुश्किल
वैसे मज़मून इख्तियारी है

रेत के घर तो बेह गए नज़मी
बारिशों का खुलूस जारी है
 
उस दिन पहली बार हुआ था मुझ को रफ़ाक़ात का एहसास
जब उस के मलबूस की खुश्बू घर पहुँचाने आई है

खूबसूरत वाह !
 
ज़ुबां ख़ामोश है डर बोलते हैं
अब इस बस्ती में ख़ंजर बोलते हैं

मेरी परवाज़ की सारी कहानी
मेरे टूटे हुए पर बोलते हैं


सराये है जिसे नादां मुसाफ़िर
कभी दुनिया कभी घर बोलते हैं

तेरे हमराह मंज़िल तक चलेंगे
मेरी राहों के पत्थर बोलते हैं

नया इक हादिसा होने को है फिर
कुछ ऐसा ही ये मंज़र बोलते हैं

मेरे ये दोस्त मुझसे झूठ भी अब
मेरे ही सर को छूकर बोलते हैं



राजेश रेड्डी
 
Last edited:
मिट्टी का जिस्म लेके मैं पानी के घर में हूँ
मंज़िल है मेरी मौत, मैं हर पल सफ़र में हूँ

होना है मेरा क़त्ल ये मालूम है मुझे
लेकिन ख़बर नहीं कि मैं किसकी नज़र में हूँ

पीकर भी ज़हरे-ज़िन्दगी ज़िन्दा हूँ किस तरह
जादू ये कौन-सा है, मैं किसके असर में हूँ

अब मेरा अपने दोस्त से रिश्ता अजीब है
हर पल वो मेरे डर में है, मैं उसके डर में हूँ

मुझसे न पूछिए मेरे साहिल की दूरियाँ
मैं तो न जाने कब से भँवर-दर-भँवर में हूँ



राजेश रेड्डी


 
कोई बरसता रहा बादलों की भाषा में





कोई बरसता रहा बादलों की भाषा में
कोई तरसता रहा मरुथलों की भाषा में

ज़ुबान होश की उसको समझ नहीं आती

बहक रही है सदी, मनचलों की भाषा में

तमाम खेत निवाले बने हैं शहरों के

यहाँ किसान कहे क्या हलों की भाषा में

सुकूँ ज़रूर है अब हम यहाँ ग़ुलाम नहीं

बँधे हुए हैं मगर साँकलों की भाषा में

सवाल हमने किए हैं बड़े ही संजीदा

न टालिएगा इन्हें चुटकलों की भाषा में

ग़ज़ल हमारी हो कैसे ज़ुबान पर उनकी

जो चाहते हैं ग़ज़ल पायलों की भाषा में

‘द्विज’! आज उसको भी लम्बे सफ़र ने तोड़ दिया

जो बात करता रहा मंज़िलों की भाषा में




द्विजेन्द्र 'द्विज'


 
Very nice Gazal Anjali Ji. :)

मिट्टी का जिस्म लेके मैं पानी के घर में हूँ
मंज़िल है मेरी मौत, मैं हर पल सफ़र में हूँ

होना है मेरा क़त्ल ये मालूम है मुझे
लेकिन ख़बर नहीं कि मैं किसकी नज़र में हूँ

पीकर भी ज़हरे-ज़िन्दगी ज़िन्दा हूँ किस तरह
जादू ये कौन-सा है, मैं किसके असर में हूँ

अब मेरा अपने दोस्त से रिश्ता अजीब है
हर पल वो मेरे डर में है, मैं उसके डर में हूँ

मुझसे न पूछिए मेरे साहिल की दूरियाँ
मैं तो न जाने कब से भँवर-दर-भँवर में हूँ



राजेश रेड्डी


 
Buniyad Husein Zahid

जी चाहे तो शीशा बन जा, जी चाहे पैमाना बन जा
शीशा पैमाना क्या बनना मय बन जा मैखाना बन जा

मय बन कर मयखाना बन का मस्ती का अफ़साना बन जा
मस्ति का अफ़साना का बन कर हस्ती से बैगाना बन जा

हस्ती से बैगाना होना मस्ती का अफ़साना बनाना
इस होने से इस बनने से अच्छा है दीवाना बन जा

दीवाना बन जाने से भी दीवाना होना अच्छा है
दीवाना होने से अच्छा ख़ाक-ऐ-दिल-जानाना बन जा

ख़ाक-ऐ-दिल-जानाना क्या है अहल-ऐ-दिल का आँख का सुरमा
शम्मा के दिल की ठंडक बन जा नूर-ऐ-दिल-ऐ-परवाना बन जा

सीख ज़हीन के दिल से जलना काहे को हर शम्मा पर जलना
अपनी आग में खुद जल जाए तू ऐसा परवाना बन जा
:) :)​
 
अगर तुम मिलने आ जाओ।

One of my favourate......


तमन्*ना फिर मचल जाए

अगर तुम मिलने आ जाओ।

यह मौसम ही बदल जाए

अगर तुम मिलने आ जाओ।

मुझे गम है कि मैने जिन्*दगी में कुछ नहीं पाया

ये गम दिल से निकल जाए

अगर तुम मिलने आ जाओ।

नहीं मिलते हो मुझसे तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे

ज़माना मुझसे जल जाए

अगर तुम मिलने आ जाओ।

ये दुनिया भर के झगड़े घर के किस्*से काम की बातें

बला हर एक टल जाए

अगर तुम मिलने आ जाओ।
 
Thou am not into Shayris or Gajals but once in a while few lines leaves an impression, here am adding one which I liked a lot, am not sure if it is Gajal or something of that genre !

मुद्दत से जिसके वास्ते दिल बेकरार था
वो लौटकर ना आया मगर इंतजार था

जो हमसफ़र था छोड़ गया राह मे मुझे
मैं फस गया भवर मे वो दरिया के पार था

मंजिल करीब आई तो वो दूर हो गया
इतना तो वो कहे की ये कैसा प्यार था

दीवार बना दी ये किसने दोनों के दरमियाँ
ना वो सुकून से था ना मुजको करार था

ये बात उम्र भर ना समझ सका आसान
क्यों दिल मेरा उस बेवफा का तलबगार था !


Rock on
Jit
 
दिल के आँगन में कोई फूल खिला है शायद
आज फिर उसने मुझे याद किया है शायद

मेरे आने का गुमाँ उसको हुआ है शायद
वो मेरी राह कहीं देख रहा है शायद

एक वो शख़्स कभी जिससे मुलाक़ात न थी
मेरे हर ख़्वाब की ताबीर बना है शायद

उसको हर चंद अँधेरों ने निगलना चाहा
बुझ न पाया वो महब्बत का दिया है शायद

जो कभी अहद—ए—जवानी में हुआ था सर ज़द
ग़म उसी जुर्म—ए—महब्बत की सज़ा है शायद

ज़ीस्त वो शब है कि काटे नहीं कटती ‘साग़र’!
है सहर दूर अभी एक बजा है शायद.
 
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