Gazals "The Finest Ever"

है भंवरे को जितना कमल का नशा
किसी को है उतना ग़ज़ल का नशा

पियें देवता शौक से सोमरस
महादेव को है गरल का नशा

हैं ख़ुश अपने कच्चे घरौंदों में हम
उन्हें होगा अपने महल का नशा

पिलाकर गया है कुछ ऐसी अतीत
उतरता नहीं बीते कल का नशा

कोई गीतिका छंद में है मगन
किसी को है बहरे-रमल का नशा

बड़ी शान से अब तो पीते हैं सब
कि फ़ैशन हुआ आजकल का नशा

पियो तुम तो महरिष सुधा शांति की
बुरा युद्ध का एक पल का नशा


रामप्रसाद शर्मा 'महर्षि '
 
डर उसे फिर न रात का होगा







डर उसे फिर न रात का होगा
जब ज़मीर उसका जागता होगा


क़द्र वो जानता है खुशियों की
ग़म से रखता जो वास्ता होगा


बात दिल की निगाह कह देगी
चुप जु़बाँ गर रहे तो क्या होगा


क्या बताएगा स्वाद सुख का वो
ग़म का जिसको न ज़ायका होगा


सुलह कैसे करें अँधेरों से
रौशनी से भी सामना होगा


मिलना जुलना है ‘देवी’ दरया से
पर किनारों में फ़ासला होगा







देवी नांगरानी
 
कोई तुमसे पूछ बैठे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई खास नहीं...

एक दोस्त है कच्चा पक्का सा,
एक झूट है आधा सच्चा सा...
 
कोई तुमसे पूछ बैठे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई खास नहीं...

एक दोस्त है कच्चा पक्का सा,
एक झूट है आधा सच्चा सा...

जज्बात को ढके एक परदा बस,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा...

जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर होकर पास नहीं...

हवा का एक सुहान झोंका है,
कभी नाज़ुक तो कभी तूफ़ान सा...

शक्ल देख कर जो नज़रे झुका ले,
कभी अपना तो कभी बेगाना सा...

जिन्दगी का एक ऐसा हमसफ़र,
जो समंदर है, पर दिल को प्यास नहीं...

एक साथी जो कुछ अनकही बाते कह जाता है,
यादो में जिसका एक धुन्दला चेहरा रह जाता है...

यूँ तो उसके ना होने का कोई गम नहीं,
पर कभी कभी आंखों से आंसूं बन के बह जाता है....

यूँ रहता तो मेरे तस्सवुर में है,
पर इन आंखों को उसकी तलाश नहीं...

कोई तुम से पूछे बैठे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं....



कोई तुमसे पूछ बैठे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई खास नहीं...

एक दोस्त है कच्चा पक्का सा,
एक झूट है आधा सच्चा सा...
 
मुझे दरिया नहीं लिखना, मुझे सहरा नहीं लिखना...
जन्म से सफर में हूँ, मुझे ठहरा नहीं लिखना...

पुराने रिश्तो की राख अब तक दिल में बाकी है...
मेरी जलती हथेली पे नया वादा नहीं लिखना...

बिसात-ऐ-जिन्दगी की आखरी सरहद पे खड़ा हूँ मैं...
मुझे फतह नहीं लिखना, मुझे मोहरा नहीं लिखना...

गवाही अपने दिल से लो, तुम्हारा दिल क्या कहता है...
मुझे झूठा नहीं लिखना, मुझे सच्चा नहीं लिखना...

मैं उसकी याद में गूम हूँ , के अपनी आप में गूम हूँ...
मुझे महफिल नहीं लिखना, मुझे तनहा नहीं लिखना...

मैं अपने लफ्जों की शोहरत दे जाऊंगा तुम्हे एक दिन...
मुझे मशहूर न करना, मेरा चर्चा नहीं लिखना...

ये न हो कभी तुम मुझे ख़ुद से मिटाना चाहो और मिटा न सको...
मुझे अपना समझ लेना, मगर अपना नहीं लिखना...

मेरी आंखों में बातें हैं पर चेहरे पे गहरी चुप...
मेरी आँखें तो लिख देना, मेरा चेहरा नहीं लिखना...

कहीं ऐसा ना हो मेरी कसक उस दिल में रह जाए...
मेरा दुःख-दर्द लिख देना, मगर गहरा नहीं लिखना...
 
कोई खामोश ज़ख्म लगती है...
जिन्दगी एक नज़्म लगती है...

बज्म-ऐ-यारा में रहता हूँ...
और तन्हाई बज्म लगती है....

चाँद की नब्ज़ देखना उठकर...
रात की साँस गरम लगाती है...

जीते रहने का हुकम है लेकिन...
मरते रहने की रस्म लगती है....
-----गुलज़ार
 
anjali
es ghazal ka hindi mein bhi translation kar dey, mere teh shir key upper tei gaye yah ghazal.:p

आपको जवाब देने में हुई देरी के लिए मुझे खेद है
महोदय, आप इस में सर ना खपायें तो ही अच्छा, आप बुद्धिजीवी हैं, और यहाँ दिलों की बाते हो रहीं हैं , मैं हिन्दी में लिखूंगी तो भी समझ नहीं आयेगा.

गुस्ताखी के लिए मुआफ (क्षमा) कर देना !!!
 
ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें
ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें



सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें
दिन ढले यूँ तेरी आवाज़ बुलाती है हमें



याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से
रात के पिछले पहर रोज़ जगाती है हमें



हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें

-------------शहरयार
 
हम पढ़ रहे थे ख़्वाब के पुर्ज़ों को जोड़ के
आँधी ने ये तिलिस्म भी रख डाला तोड़ के



आग़ाज़ क्यों किया था सफ़र उन ख़्वाबों का
पछता रहे हो सब्ज़ ज़मीनों को छोड़ के



इक बूँद ज़हर के लिये फैला रहे हो हाथ
देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के



कुछ भी नहीं जो ख़्वाब की तरह दिखाई दे
कोई नहीं जो हम को जगाये झिन्झोड़ के



इन पानियों से कोई सलामत नहीं गया
है वक़्त अब भी कश्तियाँ ले जाओ मोड़ के


---------------शहरयार
 

मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं



इक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे रिश्ता तोड़ लिया
इक वो दिन दिन जब पेड़ की शाख़े बोझ हमारा सहती थीं



इक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आँसू का
इक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं



इक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी रूठी लगती हैं
इक वो दिन जब 'आओ खेलें' सारी गलियाँ कहती थीं



इक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं
इक वो दिन जब शाख़ों की भी पलकें बोझल रहती थीं



इक ये दिन जब ज़हन में सारी अय्यारी की बातें हैं
इक वो दिन जब दिल में सारी भोली बातें रहती थीं



इक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है
इक वो घर जिसमें मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं

----------जावेद अख़्तर
 
Hello

Soo nice one brother
pehle mein chain se soya karta tha,

ab raaton ko karvatein badalne laga hun.

Pehle mein sabse bahut baatein kiya karta tha,

ab chupchaap rehne laga hun.

Pehle mein mehfilon mein raha karta tha,

ab akela rehne laga hun.

Shaayri aur kavitaaon ka shokh nahi tha mujhe,

par ab khud shaayri likhne laga hun.

Unse mulakat hone ke baad,

jaane kyun unke baare mein hi sochne laga hun.

Zindagi ke safar mein akele chalte chalte achanak,

unke saath chalne ki khwayish karne laga hun.

Sablog unka naam le lekar mujhe pareshaan kiya karte the,

par ab yeh pareshaani bhi pasand karne laga hun.
 
आँखें पलकें गाल भिगोना ठीक नहीं
छोटी-मोटी बात पे रोना ठीक नहीं|

गुमसुम तन्हा क्यों बैठे हो सब पूछें
इतना भी संज़ीदा होना ठीक नहीं

कुछ और सोच ज़रिया उस को पाने का
जंतर-मंतर जादू-टोना ठीक नहीं


अब तो उस को भूल ही जाना बेहतर है
सारी उम्र का रोना-धोना ठीक नहीं


मुस्तक़बिल के ख़्वाबों की भी फिक्र करो
यादों के ही हार पिरोना ठीक नहीं


दिल का मोल तो बस दिल ही हो सकता है
हीरे-मोती चांदी-सोना ठीक नहीं


कब तक दिल पर बोझ उठाओगे ‘परवाज़’
माज़ी के ज़ख़्मों को ढोना ठीक नहीं



जतिंदर परवाज़
 
bahut achi lines hai anjali ji..thnx for sharing....
आँखें पलकें गाल भिगोना ठीक नहीं
छोटी-मोटी बात पे रोना ठीक नहीं|

गुमसुम तन्हा क्यों बैठे हो सब पूछें
इतना भी संज़ीदा होना ठीक नहीं
कुछ और सोच ज़रिया उस को पाने का
जंतर-मंतर जादू-टोना ठीक नहीं

अब तो उस को भूल ही जाना बेहतर है
सारी उम्र का रोना-धोना ठीक नहीं

मुस्तक़बिल के ख़्वाबों की भी फिक्र करो
यादों के ही हार पिरोना ठीक नहीं

दिल का मोल तो बस दिल ही हो सकता है
हीरे-मोती चांदी-सोना ठीक नहीं

कब तक दिल पर बोझ उठाओगे ‘परवाज़’
माज़ी के ज़ख़्मों को ढोना ठीक नहीं


जतिंदर परवाज़
 
उजाले अपनी यादों के


हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए
चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाए

मैं ख़ुद भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ
कोई मासूम क्यों मेरे लिए बदनाम हो जाए

अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर
मोहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए

समन्दर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको
हवाएँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए

मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहाँ होगा
परिंदा आसमाँ छूने में जब नाकाम हो जाए

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए


-----------बशीर बद्र
 
Tenu Bhul Hi Javanga

[FONT=Arial,sans-serif]Mein dil laa ke vekh leya,
is dil te chalda zor nahi,
mere hise bas dard hai aaeya,
hor pale kujh reha baki nahi,
aj ton baad kise naal dil nahi lavaanga,
holi holi tenu bhulda bhulda,
bhul hi javaanga.

meri muskaan vi tere vaang,
bevafayi hai kar chali,
bura waqt aaeya vekh,
eh vi mera saath hai chhad chali,
is nu aj ton baad,
apne chehre te nahi leyavaanga,
holi holi tenu bhulda bhulda,
bhul hi javaanga.

je eh zamana tenu bewafa kahe,
mein eh vi jar nahi pavaanga,
tu methon dur rahe,
mein is gam vich mar javaanga,
tu taan meri dunia vichon chali gayi,
teri yaad vi dil vichon kad devaanga,
holi holi tenu bhulda bhulda,
bhul hi javaanga.

adhi raati chan chhipeya,
chamak rahe ne tare,
raati uth uth mein haan ronda,
sau rahe ne sare,
teri yaad vich mein,
hor hanju nahi vahavaanga
holi holi tenu bhulda bhulda,
bhul hi javaanga.

jo tu mere naal kardi rahi,
us ton mein reha bekhabar,
hun joban rute mar ke,
mein ho javaanga amar,
marno pehlaan mein apna dard,
kavitavaan vich likh javaanga,
holi holi tenu bhulda bhulda,
bhul hi javaanga.

hor peer nahi jar hundi,
aisa hai eh be-ilaaj dard tera,
is dard nu mitaun layi,
monty maut nu chumm ke gal lavega,
holi holi oh marda marda,
mar hi javega.
;):confused:;):confused:;):confused:;);):confused::confused:
[/FONT]
 
आपको जवाब देने में हुई देरी के लिए मुझे खेद है
महोदय, आप इस में सर ना खपायें तो ही अच्छा, आप बुद्धिजीवी हैं, और यहाँ दिलों की बाते हो रहीं हैं , मैं हिन्दी में लिखूंगी तो भी समझ नहीं आयेगा.

गुस्ताखी के लिए मुआफ (क्षमा) कर देना !!!

Anjali
Yoh tey aapney lath maar diya, kai mihney paasu dookhangee....:eek:
 
Anjali
Yoh tey aapney lath maar diya, kai mihney paasu dookhangee....:eek:

मैं इसके लिए भी आप से माफ़ी चाहती हूँ , मेरा इरादा आपको तकलीफ़ देने का नहीं था .
 
ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी

ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी नहीं कुछ कम है
हर घड़ी होता है एहसास कहीं कुछ कम है



घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है



बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफ़ी है यक़ीं कुछ कम है



अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में
कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है



आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
ये अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है



---- शहरयार
 
haasil-e-iztenaab....sochaa hai!....rooth jaayenge khwaab....sochaa hai!!
saari duniyaa....... karegi ek sawaal!.....tumne..... koi ....jawaab sochaa hai!!...............

WASEEM BARELWI
haasil-e-iztenaab=bachne aur door rahne kaa nateeza
 
Back
Top