Gazals "The Finest Ever"

कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है



कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है
ग़ज़ल की शाख़ पे इक फूल खिलने वाला है

ग़ज़ब की धूप है इक बे-लिबास पत्थर पर
पहाड़ पर तेरी बरसात का दुशाला है

अजीब लहजा है दुश्मन की मुस्कराहट का
कभी गिराया है मुझको कभी सँभाला है

निकल के पास की मस्जिद से एक बच्चे ने
फ़साद में जली मूरत पे हार डाला है

तमाम वादी में, सहरा में आग रोशन है
मुझे ख़िज़ाँ के इन्हीं मौसमों ने पाला है




बशीर बद्र
 
Bus bhi karo, ab yoon pina pilana saheb
Achcha nahi lagta dard ka bahana saheb

Maikhaane mein baatein poshida ho jati hai
Dil nahi chahta jinhe batana saheb

Haal yeh mera aisa kyuN huaa hai
Tajurbekar se ab kya chhupana saheb
 
अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूँ तेरा नसीब अपना बना ले मुझको

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी

ये तेरी सादादिली मार न डाले मुझको

मैं समंदर भी हूँ, मोती भी हूँ, ग़ोताज़न भी

कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको

तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी

ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको

कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ

जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको

ख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन-दामन

कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको

मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन


मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको

मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामाँ प्यारे

तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको

तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम

तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझको

वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ "क़तील"

शर्त ये है कोई बाँहों में सम्भाले मुझको


क़तील"
 
पढ़ेगी जब तलक दुनिया लिखा दीवान ग़ालिब का
बढ़ेगा और भी रुतबा अज़ीमुश्शान ग़ालिब का

लगा सकता नहीं कोई कभी कीमत यहाँ उसकी
जो घर से बाद मरने के मिला सामान ग़ालिब का

जुआरी मस्त बादाकश-सा शायर तो दिखा सब को
कि कोई कद्र-दाँ ही फ़न सका पहचान ग़ालिब का

गली कोठों मुहल्लों के झरोखे आज तक पूछें
चुका पाएगी क्या दिल्ली कभी एहसान ग़ालिब का

शराबो-कर्ज़ में ड़ूबे करें अशयार दीवाना
कि प्यासा रह नहीं सकता कभी मेहमान ग़ालिब का

ज़रा बादल गुज़रने दो दिखाई चाँद तब देगा
नहीं मतलब समझ पाना रहा आसान ग़ालिब का

न कहिए यह कि तू क्या है ये अंदाज़े-अदावत है
ख़फ़ा इस गुफ़्तगू से है दिले-नादान ग़ालिब का

नहीं थी हाथ को जुंबिश तो ये आँखों का ही दम था रहा
पाँओं की लग्ज़िश से बचा ईमान ग़ालिब का

है लाया रंग सचमुच शोख़ फ़ाक़ामस्त वो पैकर
न हो बेआबरू पाया ‘मधुर’ ऐलान ग़ालिब का



मधुभूषण शर्मा 'मधुर'
 
कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है
ग़ज़ल की शाख़ पे इक फूल खिलने वाला है

ग़ज़ब की धूप है इक बे-लिबास पत्थर पर
पहाड़ पर तेरी बरसात का दुशाला है


Kaka Dhoop mein bhi chughde chaswawega?



http://syaah.blogspot.com/2010/03/blog-post_9925.html

http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%88_%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%BC_%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82_%E0%A4%B9%E0%A5%88_%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A4%B0_%E0%A4%89%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%B9%E0%A5%88_/_%E0%A4%AC%E0%A4%B6%E0%A5%80%E0%A4%B0_%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0



http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=उजाले_अपनी_यादों_के_/_बशीर_बद्र
 
कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है
ग़ज़ल की शाख़ पे इक फूल खिलने वाला है

ग़ज़ब की धूप है इक बे-लिबास पत्थर पर


पहाड़ पर तेरी बरसात का दुशाला है


Kaka Dhoop mein bhi chughde chaswawega?



http://syaah.blogspot.com/2010/03/blog-post_9925.html

http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%88_%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%BC_%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82_%E0%A4%B9%E0%A5%88_%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A4%B0_%E0%A4%89%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%B9%E0%A5%88_/_%E0%A4%AC%E0%A4%B6%E0%A5%80%E0%A4%B0_%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0



http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=उजाले_अपनी_यादों_के_/_बशीर_बद्र


bhai jit dekho udey-a punjhad laa de s , kissey nu kimmey likhan dey gaa ak ni.ak JL nu registaan banaawegaa?
 
कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है
ग़ज़ल की शाख़ पे इक फूल खिलने वाला है

ग़ज़ब की धूप है इक बे-लिबास पत्थर पर
पहाड़ पर तेरी बरसात का दुशाला है

श्री राकेश जी ,
यहाँ सब शायर नहीं हैं , और जो आपने लिंक दिया है वहां पर भी किसी ने कॉपी पेस्ट ही किया है.
यहाँ पर पोस्ट करने के पीछे एक ही मकसद है, जो हमें अच्छा लगा उसे आप सभी के साथ बाँट लिया
इसमें तकलीफ हो तो माफ़ करना .
 



फिर तारों भरी रातें हैं,फिर खुशबु की बारातें हैं ,
फिर शाम का ठंडा आँचल है ,
और एक भटकता बादल है ,
फिर सावन टूट के बरसा है ,
और फिर दिल इतना तरसा है ,
फिर दुनिया के झमेलों में ,
फिर ज़िन्दगी के मेलों में ,
तेरी याद की शहनाई है ,
बस मैं और मेरी "तन्हाई "
 
Driving-47.jpg

​


भूख इन्सान के रिश्तों को मिटा देती है।
करके
नंगा ये सरे आम नचा देती है।।

आप
इन्सानी जफ़ाओं का गिला करते हैं।
रुह
भी ज़िस्म को इक रोज़ दग़ा देती है।।

कितनी
मज़बूर है वो माँ जो मशक़्क़त करके।
दूध
क्या ख़ून भी छाती का सुखा देती है।।

आप
ज़रदार सही साहिब-ए-किरदार सही।
पेट
की आग नक़ाबों को हटा देती है।।

भूख
दौलत की हो शौहरत की या अय्यारी की।
हद
से बढ़ती है तो नज़रों से गिरा देती है।।

अपने
बच्चों को खिलौनों से खिलाने वालो!
मुफ़लिसी
हाथ में औज़ार थमा देती है।।

भूख
बच्चों के तबस्सुम पे असर करती है।
और
लडअकपन के निशानों को मिटा देती है।।

देख
’मासूम’ मशक़्क़त तो हिना के बदले।
हाथ
छालों से क्या ज़ख़्मों से सजा देती है।।







मासूम गाज़ियाबादी
 
Last edited:
रूह बेचैन है इक दिल की अजियत क्या है
दिल ही शोला है तो ये सोज-ए मोहब्बत क्या है
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब ना मान्ग
मैने समझा था तू है तो दुरुख्सा है हयात
तेरा गम ही सब कुच्ह है तो गम-ए-दहर क झगडा क्या है
तेरी सूरत से है आलम मे बहारो कi सबात
तेरी आन्खो के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है
मगर और भी गम है जमाने मे मुहब्बत के सिवा
राह्ते और भी बहुत है वस्ल की राहत के सिवा
देखता हून जब भूख-ओ प्यास से लाचार खलकत को
लौट जाती है नजर उधर को भी क्या कीजै
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न कया कीजै
 
रूह बेचैन है इक दिल की अजियत क्या है
दिल ही शोला है तो ये सोज-ए मोहब्बत क्या है
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब ना मान्ग
मैने समझा था तू है तो दुरुख्सा है हयात
तेरा गम ही सब कुच्ह है तो गम-ए-दहर क झगडा क्या है
तेरी सूरत से है आलम मे बहारो कi सबात
तेरी आन्खो के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है
मगर और भी गम है जमाने मे मुहब्बत के सिवा
राह्ते और भी बहुत है वस्ल की राहत के सिवा
देखता हून जब भूख-ओ प्यास से लाचार खलकत को
लौट जाती है नजर उधर को भी क्या कीजै
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न कया कीजै
http://poetrybybhavarth.blogspot.com/search?q=%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%B9+%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%9A%E0%A5%88%E0%A4%A8+%E0%A4%B9%E0%A5%88+%E0%A4%87%E0%A4%95+%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%85%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%B9%E0%A5%88&updated-max=2008-08-18T04%3A22%3A00-07%3A00&max-results=20
 



फिर तारों भरी रातें हैं,फिर खुशबु की बारातें हैं ,
फिर शाम का ठंडा आँचल है ,
और एक भटकता बादल है ,
फिर सावन टूट के बरसा है ,
और फिर दिल इतना तरसा है ,
फिर दुनिया के झमेलों में ,
फिर ज़िन्दगी के मेलों में ,
तेरी याद की शहनाई है ,
बस मैं और मेरी "तन्हाई "
Aur bera nahi fotu kasut toh toh lyaye ho Anjali ji Bandar aali
Ar Balhara meri post pe comment kare bina tere tikde gheti tein talle na utarte ke?
 
Last edited:
आँखें रूह का आइना हैं ,
जाते-जाते आँखों से ही
ली उसने विदाई हे |
और मेरी तन्हाई में ,
उस की रूह की परछाई हे ||

शिकायत करूँ किसे ,
जिसने दी थी अनगिनत ,
खुशियाँ कभी मुझे |
आज उसी ने ही दी ,
तन्हाई हे ||


ये जिन्दगी कभी अकेला हे
ये जिन्दगी कभी दुकेला हे
कभी अनंत विराना हे
कभी दुनिया का मेला हे

अब तो बस तन्हाई हे
और तन्हाई आँखों में उतर आई हे |
 
ए जहान-ए-कुहना के मफ़लूज फ़लसफ़ादIन,
निजाम-ए-नौ के तकाजे सवाल करते है कि
महज चुट्कुले-ऒ-दिल्लगी जिन्दगी की हकीकत है या
कुछ और भी है जिन्दगी मे इनके सिवा

हजारो साल तक चमन-ए-जाटलैड मे नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती रही
तब जाकर यहा एक दीदाव्रर पैदा हुआ जो शहन्शाह-ए-जाट्लैड
के नाम से जलवा फ़रोश हुआ और समूचे जाट समुदाय मे इसका कोइ सानी नही


Rakesh has simply pointed out the source of first two lines and there is nothing wrong about it. In fact I was not mindful of this 'tukbandi' of mine. It was my first misadventure in the world of Shayari. So will be more careful in future. I appreciate Rakesh's hard-work and debth of knowledge and thankful for bringing this wrongful tukbandi to my notice. Keep it up Rakesh. Third parties are humbly advised not to fish in troubled waters. My advise to them is just to 'lay off' as I never step into their monopolized domain of 'Chutkula' business.
 
Last edited:
ए जहान-ए-कुहना के मफ़लूज फ़लसफ़ादIन,
निजाम-ए-नौ के तकाजे सवाल करते है कि
महज चुट्कुले-ऒ-दिल्लगी जिन्दगी की हकीकत है या
कुछ और भी है जिन्दगी मे इनके सिवा

हजारो साल तक चमन-ए-जाटलैड मे नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती रही
तब जाकर यहा एक दीदाव्रर पैदा हुआ जो शहन्शाह-ए-जाट्लैड
के नाम से जलवा फ़रोश हुआ और समूचे जाट समुदाय मे इसका कोइ सानी नही


Rakesh has simply pointed out the source of first two lines and there is nothing wrong about it. In fact I was not mindful of this 'tukbandi' of mine. It was my first misadventure in the world of Shayari. So will be more careful in future. I appreciate Rakesh's hard-work and debth of knowledge and thankful for bringing this wrongful tukbandi to my notice. Keep it up Rakesh. Third parties are humbly advised not to fish in troubled waters. My advise to them is just to 'lay off' as I never step into their monopolized domain of 'Chutkula' business.




you are alweys right , on your wrong points
 
ए जहान-ए-कुहना के मफ़लूज फ़लसफ़ादIन,
निजाम-ए-नौ के तकाजे सवाल करते है कि
महज चुट्कुले-ऒ-दिल्लगी जिन्दगी की हकीकत है या
कुछ और भी है जिन्दगी मे इनके सिवा

हजारो साल तक चमन-ए-जाटलैड मे नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती रही
तब जाकर यहा एक दीदाव्रर पैदा हुआ जो शहन्शाह-ए-जाट्लैड
के नाम से जलवा फ़रोश हुआ और समूचे जाट समुदाय मे इसका कोइ सानी नही


Rakesh has simply pointed out the source of first two lines and there is nothing wrong about it. In fact I was not mindful of this 'tukbandi' of mine. It was my first misadventure in the world of Shayari. So will be more careful in future. I appreciate Rakesh's hard-work and debth of knowledge and thankful for bringing this wrongful tukbandi to my notice. Keep it up Rakesh. Third parties are humbly advised not to fish in troubled waters. My advise to them is just to 'lay off' as I never step into their monopolized domain of 'Chutkula' business.
Jad tahi paad lyawange ji chinta kyun mano ho
http://surabesura.blogspot.com/2008/09/blog-post_14.html


Baaki Urdu ki gobhi si khod bagayee apne bhi
 
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