Gazals "The Finest Ever"

Jad tahi paad lyawange ji chinta kyun mano ho
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Baaki Urdu ki gobhi si khod bagayee apne bhi

In this age of re-mixing and electronic Shayari this was a genetically modified and easy-to-cook cauliflower. We all know everybody is borrowing and sharing information from different sources and no one is claiming to be the original writer and there is no harm in it. It saves expenditure towards purchase of books/CDs etc. Also, a little twist and modification in the original shayari is not a breach of copyright.

Anyway, good research, Rakesh.
 
Some excerpts from the poetry of last Mughal Emperor Bahadur-Shah Jafar written by him while incarcerating in Burma jail.

दिल लगता नही है उजडे दयार मे
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार मे
कह दो इन ह्सरतो से कही और जा बसे
इतनी जगह कहा दिल-ए-दाग्दार मे
उमर-ए-दराज माग कर लाए थे चार रोज
दो आरजू मे कट गए दो इन्त्जार मे
कितना बदनसीब है जफ़र के दफ़न के लिये
दो गज जमी ना मिल सकी सर-जमीने यार मे
 
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शाख़-ए-बदन को ताज़ा फूल निशानी दे
कोई तो हो जो मेरी जड़ों को पानी दे

अपने सारे मंज़र मुझसे ले ले और

मालिक मेरी आँखों को हैरानी दे

उसकी सरगोशी में भीगती जाए रात

क़तरा-क़तरा तन को नई कहानी दे

उसके नाम पे खुले दरीचे के नीचे

कैसी प्यारी ख़ुशबू रात की रानी दे

बात तो तब है मेरे हर्फ़ में गूँज के साथ

कोई उस लहजे को बात पुरानी दे


परवीन शाकिर
 
तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ
ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ-साथ

बचपने का साथ, फिर एक से दोनों के दुख
रात का और मेरा आँचल भीगता है साथ-साथ

वो अजब दुनिया कि सब खंज़र-ब-कफ़ फिरते हैं और
काँच के प्यालों में संदल भीगता है साथ-साथ

बारिशे-संगे-मलामत में भी वो हमराह है
मैं भी भीगूँ, खुद भी पागल भीगता है साथ-साथ

लड़कियों के दुख अजब होते हैं, सुख उससे अज़ीब
हँस रही हैं और काजल भीगता है साथ-साथ

बारिशें जाड़े की और तन्हा बहुत मेरा किसान
जिस्म और इकलौता कंबल भीगता है साथ-साथ




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समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का
'अकबर' ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का

गर शैख़-ओ-बहरमन(1) सुनें अफ़साना किसी का
माबद(2) न रहे काबा-ओ-बुतख़ाना(3) किसी का

अल्लाह ने दी है जो तुम्हे चांद-सी सूरत
रौशन भी करो जाके सियहख़ाना(4) किसी का

अश्क आँखों में आ जाएँ एवज़(5) नींद के साहब
ऐसा भी किसी शब सुनो अफ़साना किसी का

इशरत(6) जो नहीं आती मेरे दिल में, न आए
हसरत ही से आबाद है वीराना किसी का

करने जो नहीं देते बयां हालत-ए-दिल को
सुनिएगा लब-ए-ग़ौर(7) से अफ़साना किसी का

कोई न हुआ रूह का साथी दम-ए-आख़िर
काम आया न इस वक़्त में याराना किसी का

हम जान से बेज़ार(8)रहा करते हैं 'अकबर'
जब से दिल-ए-बेताब है दीवाना किसी का

शब्दार्थ:
1. धर्मोपदेशक
2. पूजा का स्थान
3. काबा और मंदिर
4. अँधेरे भरा कमरा
5. बदले में
6. धूमधाम
7. ध्यान से
8. ना-खुश
 
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देख कर तिरछी निगाहों से वो मुस्काते हैं
जाने क्यों बात मगर करने से शरमाते हैं.



मेरी यादों में तो वो रोज चले आते हैं
अपनी आँखों में बसाने से वो कतराते हैं.



दिल के गुलशन में बसाया था जिन्हें कल हमने
आज वो बनके खलिश जख्म दिये जाते हैं.



बेवफा मैं तो नहीं हूं ये उन्हें है मालूम
जाने क्यों फिर भी मुझे दोषी वो ठहराते हैं.



मेरी आवाज़ उन्होंने भी सुनी है, फिर क्यों
सामने मेरे वो आ जाने से कतराते हैं.



दिल के दरिया में अभी आग लगी है जैसे
शोले कैसे ये बिना तेल लपक जाते हैं.



रँग दुनियां के कई देखे है देवी लेकिन
प्यार के इँद्रधनुष याद बहुत आते हैं.
 
दिल की बात लबों पर लाकर, अब तक हम दुख सहते हैं|
हम ने सुना था इस बस्ती में दिल वाले भी रहते हैं|

बीत गया सावन का महीना मौसम ने नज़रें बदली,
लेकिन इन प्यासी आँखों में अब तक आँसू बहते हैं|

एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं,
दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं|

जिस की ख़ातिर शहर भी छोड़ा जिस के लिये बदनाम हुए,
आज वही हम से बेगाने-बेगाने से रहते हैं|

वो जो अभी रहगुज़र से, चाक-ए-गरेबाँ गुज़रा था,
उस आवारा दीवाने को 'ज़लिब'-'ज़लिब' कहते हैं|
 
1.
किसी को दे के दिल हमने महुब्बत का मज़ा पाया
मगर सोज़े-दरूँ सीने में पहले से सवा पाया

न यह पूछो गया कब किस तरह पहलू से दिल अपना
बस इतना जानते हैं एक दिन हमने गया पाया

तमन्ना थी दिले-मुज़्तिर की सारी कह सुनाएँगे
तुम्हारे रू-ब-रू लेकिन न लब तक भी हिला पाया

तुम्हारे वास्ते सब बुतकदे ठुकरा दिए जिसने
बताओ उसने क्या पाया तुम्हें जो बेवफ़ा पाया

लगाई आग जो तुमने उसे कब अश्कबारी से
मेरी पुर-आब आँखों का समन्दर भी बुझा पाया

करें शिकवा ज़माने में तो किस-किसका करें ऐ दिल!
न अपना और न बेग़ाना कोई भी काम का पाया

ख़िज़ाँ के दौर में भी मुस्कुराते जिसको देखा हो
`शरर' तुम-सा ज़माने में न कोई दूसरा पाया

2.
ज़िन्दगी में जो इक ख़ुशी-सी थी
हाय वोह कितनी आरज़ी-सी थी

उनसे मिलने को जी तरसता था
उनसे मिलने पै बेकली-सी थी

बज़्म में जब हमें पुकारा गया
हर तरफ़ एक खलबली -सी थी

कुछ हमें उनका रूप ले डूबा
कुछ तबीयत की सादगी-भी थी

दीनो-दुनिया से बेख़बर हो कर
इक अजब हमको आगही-सी थी

क्या मिले वो कि गोया नस-नस में
बह उठी एक बाँसुरी-सी थी

किस ने छीना चमन से रंगे चमन
सहमी-सहमी-सी हर कली-सी थी

हम ‘शरर’ सर -बुलन्द हो के जिये
ज़िन्दगी अपनी ज़िन्दगी-सी थी
 
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तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा
इसी कूचे में जहां चांद उगा करते थे
शब-ए-तारीक गुज़ारूंगा चला जाऊंगा


रास्ता भूल गया या यहां मंज़िल है मेरी
कोई लाया है या ख़ुद आया हूं मालूम नहीं
कहते हैं कि नज़रें भी हसीं होती हैं
मैं भी कुछ लाया हूं क्या लाया मालूम नहीं


यूं तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब कुछ बेच आया
कहीं इनाम मिला और कहीं क़ीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा है
देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं


फिर भी इक राह में सौ तरह के मोड़ आते हैं
काश तुम को कभी तन्हाई का एहसास न हो
काश ऐसा न हो ग़ैर-ए-राह-ए-दुनिया तुम को
और इस तरह कि जिस तरह कोई पास न हो


आज की रात जो मेरी तरह तन्हा है
मैं किसी तरह गुज़ारूंगा चला जाऊंगा
तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा
 
अपनी भीगी हुई पलकों पे सजा लो मुझको
रिश्ताए-दर्द समझकर ही निभा लो मुझको

चूम लेते हो जिसे देख के तुम आईना
अपने चेहरे का वही अक्स बना लो मुझको

मैं हूँ महबूब अंधेरों का मुझे हैरत है
कैसे पहचान लिया तुमने उजालो मुझको

छाँओं भी दूँगा, दवाओं के भी काम आऊँगा
नीम का पौदा हूँ, आँगन में लगा लो मुझको

दोस्तों शीशे का सामान समझकर बरसों
तुमने बरता है बहुत अब तो संभालो मुझको

गए सूरज की तरह लौट के आ जाऊँगा
तुमसे मैं रूठ गया हूँ तो मनालो मुझको

एक आईना हूँ ऐ 'नक़्श' मैं पत्थर तो नहीं
टूट जाऊँगा न इस तरह उछालो मुझको
 
Thanks for sharing

Anjali ji....aaj hindi translate ne kaam nahi kiya varna hindi main hi likhta......magar hamehsa ki tarah bahut bahut shuriya aise panktiyoon ko share karne ke liye

तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ
ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ-साथ

बचपने का साथ, फिर एक से दोनों के दुख
रात का और मेरा आँचल भीगता है साथ-साथ

वो अजब दुनिया कि सब खंज़र-ब-कफ़ फिरते हैं और
काँच के प्यालों में संदल भीगता है साथ-साथ

बारिशे-संगे-मलामत में भी वो हमराह है
मैं भी भीगूँ, खुद भी पागल भीगता है साथ-साथ

लड़कियों के दुख अजब होते हैं, सुख उससे अज़ीब
हँस रही हैं और काजल भीगता है साथ-साथ

बारिशें जाड़े की और तन्हा बहुत मेरा किसान
जिस्म और इकलौता कंबल भीगता है साथ-साथ



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आइने कितने यहाँ टूट चुके हैं अब तक
आफ़रीं उन पे जो सच बोल रहे हैं अब तक

टूट जाएँगे मगर झुक नहीं सकते हम भी

अपने ईमाँ की हिफ़ाज़त में तने हैं अब तक

रहनुमा उनका वहाँ है ही नहीं मुद्दत से

क़ाफ़िले वाले किसे ढूँढ रहे हैं अब तक

अपने इस दिल को तसल्ली नहीं होती वरना

हम हक़ीक़त तो तेरी जान चुके हैं अब तक

फ़त्ह कर सकता नहीं जिनको जुनूँ महज़ब का

कुछ वो तहज़ीब के महफ़ूज़ क़िले हैं अब तक

उनकी आँखों को कहाँ ख़्वाब मयस्सर होते

नींद भर भी जो कभी सो न सके हैं अब तक

देख लेना कभी मन्ज़र वो घने जंगल का

जब सुलग उठ्ठेंगे जो ठूँठ दबे हैं अब तक

रोज़ नफ़रत की हवाओं में सुलग उठती है

एक चिंगारी से घर कितने जले हैं अब तक

इन उजालों का नया नाम बताओ क्या हो

जिन उजालों में अँधेरे ही पले हैं अब तक

पुरसुकून आपका चेहरा ये चमकती आँखें

आप भी शह्र में लगता है नये हैं अब तक

ख़ुश्क़ आँखों को रवानी ही नहीं मिल पाई

यूँ तो हमने भी कई शे’र कहे हैं अब तक

दूर पानी है अभी प्यास बुझाना मुश्किल

और ‘द्विज’! आप तो दो कोस चले हैं अब तक
 
Kavta Kiran ki 3 gazale..

1.
निकला करो इधर से भी होकर कभी कभी
आया करो हमारे भी घर पर कभी कभी

माना कि रूठ जाना यूँ आदत है आप की
लगते मगर है ये अच्छे ये तेवर कभी कभी

साये की है तमन्ना दरख्तो को भी
प्यासा रहा है खुद भी समन्दर कभी कभी

2.

जिंदगी को जुबान दे देंगे
धडकनों की कमान दे देंगे

हम तो मालिक हैं अपनी मर्ज़ी के
जी में आया तो जान दे देंगे

रखते हैं वो असर दुआओं में
हौसले को उड़ान दे देंगे

जो है सहमी पड़ी समंदर में
उस लहर को उफान दे देंगे

जिनको ज़र्रा नही मयस्सर है
उनको पूरा जहान दे देंगे

करके मस्जिद में आरती-पूजा
मंदिरों से अजान दे देंगे

मौत आती 'किरण' है आ जाए
तेरे हक में बयान दे देंगे

3.
धूप है, बरसात है, और हाथ में छाता नहीं
दिल मेरा इस हाल में भी अब तो घबराता नहीं

मुश्किलें जिसमें न हों वो जिंदगी क्या जिंदगी
राह हो आसां तो चलने का मज़ा आता नहीं

चाहनेवालों में शिद्दत की मुहब्बत थी मगर
जिस्म से रिश्ता रहा, था रूह से नाता नहीं

मांगते देखा है सबको आस्मां से कुछ न कुछ
दीन हैं सारे यहाँ, कोई भी तो दाता नहीं

पा लिया वो सब कतई जिसकी नहीं उम्मीद थी
दिल जो पाना चाहता है बस वही पाता नहीं

जिंदगी अपनी तरह कब कौन जी पाया 'किरण'
वक्त लिखता है वो नगमें दिल जिसे गाता नहीं
 
प्रभा दीक्षित

तू कारवाँ के साथ में सबको मिला के चल
इक रोशनी का फूल दिलों में खिला के चल।

ये रात तेरे सर पर भी मंडराएगी ज़रूर

जुगनू की तरह जलते हुए झिलमिला के चल।

कुछ मुश्किलें पहाड-सी आएंगी राह में

दरियाँ की तरह हँसते हुए खिलखिला के चल।

चलने के लिए शर्त है मंज़िल की राह में

सारे जहाँ के बोझ को सर पे उठा के चल।

हर दर्द से गुज़रा है मेरे इश्क का ज़मीर

फटते हुए दामन को ज़रा सिल सिला के चल।

शायद ग़ज़ल में तेरी 'प्रभा' वो असर नहीं

बस्ती की बेहतरी में ख़ुद का घर जला के चल।
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ठोकरों से मंज़िलें आबाद होकर रह गईं
कशमकश में ज़िन्दगी बरबाद होकर रह गई।

आपसे किसने कहा था चाँद छूने के लिए
शायरी वर्जित फलों का स्वाद होकर रह गई।

सांझ के ढलने से पहले कौन पंछी चीख़ता था
क्रौंच-वध की फिर नई फ़रियाद होकर रह गई।

घोंसलें किस पर बनाएँ पेड़ जब कटने लगे
वक़्त की बुलबुल यहाँ अवसाद होकर रह गई।

दोस्ती का लुत्फ़ इतना ही उठा पाए हैं हम
दुश्मनी भी एक भली-सी याद होकर रह गई।

पहनती है एक उदासी मुस्कुराहट का लिबास
जब ग़ज़ल हर दर्द का अनुवाद होकर रह गई।
 
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