Gazals "The Finest Ever"

फिरते हैं कब से दरबदर अब इस नगर अब उस नगर
एक दूसरे के हमसफ़र मैं और मेरी आवारगी
नाआशना(अपरीचित) हर रहगुज़र ना मेहरबाँ है एक नज़र
जायें तो अब जायें किधर मैं और मेरी आवारगी


हम भी कभी आबाद थे ऐसे कहाँ बरबाद थे
बिफ़िक्र थे आज़ाद थे मसरूर(प्रसन्न) थे दिलशाद(दिल से खुश) थे
वो चाल ऐसि चल गया हम बुझ गये दिल जल गया
निकले जला के अपना घर मैं और मेरी आवारगी



जीना बहुत आसान था इक शख़्स का एहसान था
हमको भी इक अरमान था जो ख़्वाब का सामान था
अब ख़्वाब हैं न आरज़ू अरमान है न जुस्तजू
यूँ भी चलो ख़ुश हैं मगर मैं और मेरी आवारगी



वो माह-ए-वश(चाँद जैसी) वो माह-ए-रूह(चाँद जैसे चेहरेवाली) वो माह-ए-कामिल(पूरा चाँद) हूबहू
थीं जिस की बातें कूबकू(गली-गली) उस से अजब थी गुफ़्तगू
फिर यूँ हुआ वो खो गई और मुझ को ज़िद सी हो गई
लायेंगे उस को ढूँड कर मैं और मेरी आवारगी


ये दिल ही था जो सह गया वो बात ऐसी कह गया
कहने को फिर क्या रह गया अश्कों का दरिया बह गया
जब कह कर वो दिलबर गया ती लिये मैं मर गया
रोते हैं उस को रात भर मैं और मेरी आवारगी


अब ग़म उठायें किस लिये ये दिल जलायें किस लिये
आँसू बहायें किस लिये यूँ जाँ गवायें किस लिये
पेशा न हो जिस का सितम ढूँढेगे अब ऐसा सनम
होंगे कहीं तो कारगर मैं और मेरी आवारगी


आसार हैं सब खोट के इम्कान(संभावना) हैं सब चोट के
घर बन्द हैं सब कोट के अब ख़त्म है सब टोटके
क़िस्मत का सब ये खेल है अंधेर ही अंधेर है
ऐसे हुए हैं बेअसर मैं और मेरी आवारगी


जब हमदम-ओ-हमराज़ था तब और ही अन्दाज़ था
अब सोज़ है तब साज़ था अब शर्म है तब नाज़ था
अब मुझ से हो तो हो भी क्या है साथ वो तो वो भी क्या
एक बेहुनर एक बेसमर(निष्फल) मैं और मेरी आवारगी
 
When I was a kid My father use to listen this song, even in his last days of life it was his favorite, there were some more like

Jab tak maine samjha jeewan kya hai, jeewan beet gaya by kishore kumar..
 
Acha song hai..
pyasi aankhe pee jaye aanshu,aankho se naa chhalke
jab tak mene jaana aanshu kya hai,daamn bheeg gya
jab tak mene jaana jeevan kya hai,jeevan beet gya

When I was a kid My father use to listen this song, even in his last days of life it was his favorite, there were some more like

Jab tak maine samjha jeewan kya hai, jeewan beet gaya by kishore kumar..
 
ज़ैदी जाफ़र रज़ा

लहरें साहिल तक जब आयीं, चांदी के वरक़ चिपकाए हुए.
हम हौले-हौले पानी में, चलते रहे दिल गरमाए हुए.

वो देखो उधर उस कश्ती पर, दो उजले-उजले कबूतर हैं,
कुछ राज़ की बातें करते हैं, आपस में चोंच मिलाए हुए.

मैं उनके लिए कूचों-कूचों, छाना किया ख़ाक ज़माने की,
वो सामने मेरी आंखों के, निकले मुझ से कतराए हुए.

परदेस में बेटा खुश होगा, माँ-बाप के दिल को ढारस है,
फिर भी ये शिकायत रहती है, मुद्दत गुज़री घर आए हुए.

आँगन में बाँध के अलगनियां, कपडे कल लोग सुखाते थे,
अब शहरों में आँगन ही नहीं,सब हैं सिमटे-सिमटाए हुए।

मिटटी के चरागों की रौनक़, बिजली के ये कुम्कुमे क्या जानें,
इनसे ही दिवाली रौशन थी, जलते थे क़तार बनाए हुए.
 
मुझे मोबाइल पर एक sms प्राप्त हुआ है, जिसको मैं आप सबसे शेयर करना चाहता हूँ:-

संगीत सुनकर ज्ञान नहीं मिलता,

मंदिर जाकर भगवान नहीं मिलता,

पत्थर तो लोग इसलिए पूजते हैं,

क्योंकि विश्वास के लायक मनुष्य नहीं मिलता.
 
अज़ीज़ आज़ाद

जिस्म में जाँ की तरह मैंने बसाया तुमको
अपने एहसास की परतों में समाया तुमको

ख़ुश्क मिट्टी हूँ मिले प्यार की हलकी-सी नमी

ये ही उम्मीद लिए अपना बनाया तुमको

तुम मिले जब भी ज़माने की हवा बन के मिले

मैंने हर बार ही बदला हुआ पाया तुमको

मुझ से यूँ बच के निकलते हो गुनाह हूँ जैसे

मेरा साया भी कभी रास न आया तुमको

तेरी ख़ुशबू को हवा बन के बिखेरा मैंने

जाने दिल रूहे-चमन मैंने बनाया तुमको

दौरे-गर्दिशे के ये झोंके न रुलादें ऐ ‘अज़ीज़’

मैंने हर मोड़ पे बाँहों में छुपाया तुमको
 
1.



तू अमीरे शह्र है, तू मोहतरम अपनी जगह
ठीक हैं जैसे भी हैं हम अहले-ग़म अपनी जगह

तेरी बख़शीश से नहीं बढ़कर ज़माने की अता

और भी हैं ग़म कई पर तेरा ग़म अपनी जगह

तेरी ख़ातिर मुस्कुराना फर्ज़ है हम पर मगर

क़हक़हे अपनी जगह आँखों का नम अपनी जगह

इश्क़ में हर एक मंज़िल हमने तय कर ली मगर

पहले-पहले प्यार का पहला क़दम अपनी जगह

यह तो सच है हमसफ़र अब तेरा कोई और है

तू है मेरे साथ अब भी यह भरम अपनी जगह

यार तू तो जाने कब का छोड़ बैठा है हमें

तेरी यादें हैं मगर साबित क़दम अपनी जगह

हमने यह माना बहुत कुछ हैं इनायाते जहॉ

ऐ ‘ज़िया’ उसकी मगर चश्मे-करम अपनी जगह




2.
दुशमन-ए-जाँ है मगर जान से प्यारा भी है
ऐसा इस दुनिया में एक शख़्स हमारा भी है

जागती आँखों ने देखे हैं तेरे ख़्वाब ऐ जाँ
और नींदों में तेरा नाम पुकारा भी है

वो बुरा वक़्त कि जब साथ न हो साया भी
बारहा हमने उसे हँस के गुज़ारा भी है

जिसने मँझधार में छोड़ा उसे मालूम नहीं
डूबने वाले को तिनके का सहारा भी है

हमने हर जब्र तेरा हँस के सर-आँखों पे लिया
ज़िन्दगी तुझ पे यह एहसान हमारा भी है

मत लुटा देना ज़माने पे ही सारी खै़रात
मुंतज़िर हाथ में कशकोल हमारा भी है

नाम सुनकर मेरा उस लब पे तबस्सुम है 'ज़िया'
और पलकों पे उतर आया सितारा भी है


-----'ज़िया' ज़मीर
 
अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं यूँ ही कभी लब खोले हैं
पहले "फ़िराक़" को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं

दिन में हम को देखने वालो अपने-अपने हैं औक़ाब
जाओ न तुम इन ख़ुश्क आँखों पर हम रातों को रो ले हैं

फ़ितरत मेरी इश्क़-ओ-मोहब्बत क़िस्मत मेरी तन्हाई
कहने की नौबत ही न आई हम भी कसू के हो ले हैं

बाग़ में वो ख़्वाब-आवर आलम मौज-ए-सबा के इशारों पर
डाली डाली नौरस पत्ते सहस सहज जब डोले हैं

उफ़ वो लबों पर मौज-ए-तबस्सुम जैसे करवटें लें कौंदें
हाय वो आलम जुम्बिश-ए-मिज़गाँ जब फ़ितने पर तोले हैं

इन रातों को हरीम-ए-नाज़ का इक आलम होये है नदीम
ख़ल्वत में वो नर्म उँगलियाँ बंद-ए-क़बा जब खोले हैं

ग़म का फ़साना सुनने वालो आख़िर्-ए-शब आराम करो
कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सो ले हैं

हम लोग अब तो पराये-से हैं कुछ तो बताओ हाल-ए-"फ़िराक़"
अब तो तुम्हीं को प्यार करे हैं अब तो तुम्हीं से बोले हैं
 
ईद का चांद हो गया है कोई
जाने किस देस जा बसा है कोई

पूछता हूं मैं सारे रस्तों से
उस के घर का भी रास्ता है कोई

एक दिन मैं ख़ुदा से पूछूं गा
क्या ग़रीबों का भी ख़ुदा है कोई

इक मुझे छोड़ के वो सब से मिला
इस से बढ़ के भी क्या सज़ा है कोई

दिल में थोड़ी सी खोट रखता है
यूं तो सोने से भी खरा है कोई

वो मुझे छोड़ दे कि मेरा रहे
हर क़दम पर ये सोचता है कोई

हाथ तुम ने जहां छुड़ाया था
आज भी उस जगह खड़ा है कोई

फिर भी पहुंचा न उस के दामन तक
ख़ाक बन बन के गो उड़ा है कोई

तुम भी अब जा के सो रहो 'रहबर`
ये न सोचो कि जागता है कोई



 
तेरे आने की...........

मुझे बहुत ज्य़ादा पसंद है जगजीत सिंह की ये ग़ज़ल: तेरे आने की जब ख़बर महके... तेरी ख़ुश्बू से सारा घर महके ! :)
 
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