शायर-ए-फितरत हूँ मैं जब जिक्र फ़रमाता हूँ मैं,
रूह बन कर जर्रे जर्रे में समाँ जाता हूँ मैं.
आ! के तुझ बिन ए दोस्त घबराता हूँ मैं,
जैसे हर शै में किसी शै की कमी पाता हूँ मैं.
जिस कदर अफसाना-ए-हस्ती को दोहराता हूँ मैं,
और भी बेगाना-ए-हस्ती हुआ जाता हूँ मैं.
जब मकां-ओ-लामकां सब से गुजर जाता हूँ मैं,
अल्लाह अल्लाह तुझ को खुद अपनी जगह पाता हूँ मैं.
हाय री मजबूरियाँ तर्क-ए-मुहब्बत के लिये,
मुझको समझाते हैं वो और उनको समझाता हूँ मैं.
मेरी हिम्मत देखना और मेरी तबियत देखना,
जो सुलझ जाती है गुत्थी फिर से उलझाता हूँ मैं.
हुस्न को क्या दुश्मनी है इश्क को क्या बैर है,
अपने ही कदमों की खुद ही ठोकरें खाता हूँ मैं.
वाह रे शौक़-ए-शहादत, कुंचा-ए-कातिल की तरफ,
गुनगुनाता रक्स करता झूमता जाता हूँ मैं.
एक ही दिल है और तूफ़ान-ए-हवादिस है 'जिगर',
एक शीशा है के हर पत्थर से टकराता हूँ मैं...
Jigar Muradabadi
(It's my most desired Gazal, I find everything in it.)
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