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हालात-ए-बयां - जाटलैंड की फोरम
एक भाई ने मेरे बारे में लिख दिया - जी, आपने तो जाटलैंड की डाक्टरी कर रखी है । पता ना भाई, पर मुझे इसका बहम जरूर हो गया है । कई बार हालात बिगड़े, छोटे-मोटे पंगे भी हुए जो कि जाटों में एक आम बात है । कई बार जी में आया कि इसे छोड़कर कहीं और आराम से बैठूं । पर दिल नहीं मानता । कहते हैं कि अपना तो अपना ही होता है - अगर अपना ही कोई मारेगा तो कम से कम मार कर छाया में तो डाल देगा।
मैने लगभग सभी फोरम में कुछ न कुछ लिखा है पर अभी तक एक ऐसी है जो अछूती है – Chapters and Itineraries. यह पोस्ट भी यहीं "टाईम पास" में लिख रहा हूं, बजाय उसके । फोरम है अच्छी और मकसद भी अच्छा है - सभा, गोष्टियां और एक दूसरे से मिलने के लिए जानकारी लेना । पर यह मत सोचना कि यह फसादों से बची है । मैने “दास्ताने टाईम-पास” धागा लिखा था जिस पर थोड़ा वाद-विवाद हुआ था, इसी डर से सावधानी बरत रहा हूं ।
एक धागा लिखा गया - है कोई महम-चौबीसी से? एक मेंबर ने लिख दिया - "क्यूं, पहलम के कोए बुड़के मारै था, अक डरावणे भूत-प्रेत बैठे सैं ? महम-चौबीसी तै भतेरी बड्डी सै, और भी भतेरे पा-ज्यांगे" । वैसे बात भी ठीक है । कई बार हम संकुचित हो जाते हैं । बहुत से धागे तो ऐसे हैं - कोई है हमारा गोत्ती भाई फलां फलां जगह पर ? अब भला विदेशों में भी अपने इलाके और गोत की याद आने लगी ? एक अपना दहिया भाई अफ्रीका के देश केन्या में है - पूछने लगा - नैरोबी या केन्या में कोई जाट भाई है ? कोई जवाब नहीं मिला - कोई हो तो बताए !
थोड़ा बहुत विज्ञापन या ‘बिजनेस’ भी है - "बंगलौर में एक कमरा खाली है - किसी भाई को चाहिये तो बता देना - किराया बहुत मामूली लगेगा ।"
मैं भी थोड़े-बहुत 'टूर' या घूमना-फिरना करता हूं पर मैने ऐसा कोई धागा नहीं लिखा - कि लो जी मैं --- आ रहा हूं और उस जगह पर ठहरूंगा - है कोई जाट भाई जो मुझ से मिलना चाहे ? खयाल अपना-अपना !
हमारे यहां मेहमान को ‘अतिथि’ ( बिना "तिथि" वाला) कहते हैं, यानी कि वह आदमी जो बिना कोई तिथि या तारीख बताए घर में आ धमके । कौन अच्छा मेहमान-नवाज है, इसकी पहचान तभी होती है जब उसके यहां बिना बताए कोई अजनबी पहुंच जाये । आजकल तो फैशन ही अलग चल पड़ा है - पहले अपनों को ही फोन करो कि हम कब पहुंच रहे हैं, नहीं तो तुम्हारी कोई पूछ नहीं । हमारे विदेशों में बसे 'जाटलैंडर' तो कुछ ज्यादा ही 'वी.आई.पी' हैं । पहले ही कोई धागा लिखवा देगा "----चौधरी इन दिल्ली" - कोई मिलना चाहे तो मिल लेना । "मैं भारत आ रहा हूं - जाटलैंडर्स से मिलना चाहूंगा" blah…blah…blah ।
वैसे जरूरतमंद आदमी को ज्यादा 'response' नहीं आते । जितेन्द्र हुड्डा ने एक बार धागा लिखा -JATs from London ... please reply - कोई खास बात बनी नहीं । भला लंडन जैसी जगह पर भी कोई कमी है ?
विदेशी भारतीयों में भी एकता का अभाव है । जाट भी इसके अपवाद नहीं । अकेले अमेरिका में ही पता नहीं कितनी "Indian Association" हैं । पहले एक पूरे इलाके का "नार्थ अमेरिका जाट चैपटर" (या कोई ऐसा ही नाम) बनता है, उसके बाद उसके दो-तीन टुकड़े होते हैं, बाद में किसी छोटे शहर तक ही सिमट कर रह जाता है । अलग-अलग पड़े तिनकों में कोई शक्ति नहीं होती, एक साथ मिल जाने पर बात ही और होती है, जैसे बंद मुट्ठी में ही ताकत होती है, अलग-अलग उंगलियों में नहीं । भारत में भी यही हाल है । delhi jats meet – यह धागा खूब चल रहा है, पर अगर दिल्ली वाली सभा के साथ-साथ हरयाणा, यू-पी और राजस्थान के जाट भी मिल जायें तो आलम अलग ही होगा । जरा करो कौशिश साथ मिलने की ।
यह बता दूं कि मैं कुछ दिन पहले ही दिल्ली गया था और अब फिर जा रहा हूं । पर पब्लिसिटी से डर रहा हूं, पता-ठिकाना नहीं बताऊंगा - राम बचाये ! और समय मिला तो किसी 'जाटलैंडर' के यहां बिना बताए पहुंच जाऊंगा - अंजाम चाहे कुछ भी हो ! क्यूं रै लाडोसराय के दीवे (दीपक सेजवाल) ? पर तेरे को कहने का फायदा ही क्या, पता नहीं तू अपने कंप्यूटर पर मेरी यह हिन्दी की पोस्ट पढ़ भी पा रहा है या नहीं ?
पर "Chapters & Itineraries” में धागा नहीं लिखूंगा । समय मिला तो हालात-ए-बयान करके दिल्ली के दिल की दास्तान लिख दूंगा ।
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हालात-ए-बयां - जाटलैंड की फोरम
एक भाई ने मेरे बारे में लिख दिया - जी, आपने तो जाटलैंड की डाक्टरी कर रखी है । पता ना भाई, पर मुझे इसका बहम जरूर हो गया है । कई बार हालात बिगड़े, छोटे-मोटे पंगे भी हुए जो कि जाटों में एक आम बात है । कई बार जी में आया कि इसे छोड़कर कहीं और आराम से बैठूं । पर दिल नहीं मानता । कहते हैं कि अपना तो अपना ही होता है - अगर अपना ही कोई मारेगा तो कम से कम मार कर छाया में तो डाल देगा।
मैने लगभग सभी फोरम में कुछ न कुछ लिखा है पर अभी तक एक ऐसी है जो अछूती है – Chapters and Itineraries. यह पोस्ट भी यहीं "टाईम पास" में लिख रहा हूं, बजाय उसके । फोरम है अच्छी और मकसद भी अच्छा है - सभा, गोष्टियां और एक दूसरे से मिलने के लिए जानकारी लेना । पर यह मत सोचना कि यह फसादों से बची है । मैने “दास्ताने टाईम-पास” धागा लिखा था जिस पर थोड़ा वाद-विवाद हुआ था, इसी डर से सावधानी बरत रहा हूं ।
एक धागा लिखा गया - है कोई महम-चौबीसी से? एक मेंबर ने लिख दिया - "क्यूं, पहलम के कोए बुड़के मारै था, अक डरावणे भूत-प्रेत बैठे सैं ? महम-चौबीसी तै भतेरी बड्डी सै, और भी भतेरे पा-ज्यांगे" । वैसे बात भी ठीक है । कई बार हम संकुचित हो जाते हैं । बहुत से धागे तो ऐसे हैं - कोई है हमारा गोत्ती भाई फलां फलां जगह पर ? अब भला विदेशों में भी अपने इलाके और गोत की याद आने लगी ? एक अपना दहिया भाई अफ्रीका के देश केन्या में है - पूछने लगा - नैरोबी या केन्या में कोई जाट भाई है ? कोई जवाब नहीं मिला - कोई हो तो बताए !
थोड़ा बहुत विज्ञापन या ‘बिजनेस’ भी है - "बंगलौर में एक कमरा खाली है - किसी भाई को चाहिये तो बता देना - किराया बहुत मामूली लगेगा ।"
मैं भी थोड़े-बहुत 'टूर' या घूमना-फिरना करता हूं पर मैने ऐसा कोई धागा नहीं लिखा - कि लो जी मैं --- आ रहा हूं और उस जगह पर ठहरूंगा - है कोई जाट भाई जो मुझ से मिलना चाहे ? खयाल अपना-अपना !
हमारे यहां मेहमान को ‘अतिथि’ ( बिना "तिथि" वाला) कहते हैं, यानी कि वह आदमी जो बिना कोई तिथि या तारीख बताए घर में आ धमके । कौन अच्छा मेहमान-नवाज है, इसकी पहचान तभी होती है जब उसके यहां बिना बताए कोई अजनबी पहुंच जाये । आजकल तो फैशन ही अलग चल पड़ा है - पहले अपनों को ही फोन करो कि हम कब पहुंच रहे हैं, नहीं तो तुम्हारी कोई पूछ नहीं । हमारे विदेशों में बसे 'जाटलैंडर' तो कुछ ज्यादा ही 'वी.आई.पी' हैं । पहले ही कोई धागा लिखवा देगा "----चौधरी इन दिल्ली" - कोई मिलना चाहे तो मिल लेना । "मैं भारत आ रहा हूं - जाटलैंडर्स से मिलना चाहूंगा" blah…blah…blah ।
वैसे जरूरतमंद आदमी को ज्यादा 'response' नहीं आते । जितेन्द्र हुड्डा ने एक बार धागा लिखा -JATs from London ... please reply - कोई खास बात बनी नहीं । भला लंडन जैसी जगह पर भी कोई कमी है ?
विदेशी भारतीयों में भी एकता का अभाव है । जाट भी इसके अपवाद नहीं । अकेले अमेरिका में ही पता नहीं कितनी "Indian Association" हैं । पहले एक पूरे इलाके का "नार्थ अमेरिका जाट चैपटर" (या कोई ऐसा ही नाम) बनता है, उसके बाद उसके दो-तीन टुकड़े होते हैं, बाद में किसी छोटे शहर तक ही सिमट कर रह जाता है । अलग-अलग पड़े तिनकों में कोई शक्ति नहीं होती, एक साथ मिल जाने पर बात ही और होती है, जैसे बंद मुट्ठी में ही ताकत होती है, अलग-अलग उंगलियों में नहीं । भारत में भी यही हाल है । delhi jats meet – यह धागा खूब चल रहा है, पर अगर दिल्ली वाली सभा के साथ-साथ हरयाणा, यू-पी और राजस्थान के जाट भी मिल जायें तो आलम अलग ही होगा । जरा करो कौशिश साथ मिलने की ।
यह बता दूं कि मैं कुछ दिन पहले ही दिल्ली गया था और अब फिर जा रहा हूं । पर पब्लिसिटी से डर रहा हूं, पता-ठिकाना नहीं बताऊंगा - राम बचाये ! और समय मिला तो किसी 'जाटलैंडर' के यहां बिना बताए पहुंच जाऊंगा - अंजाम चाहे कुछ भी हो ! क्यूं रै लाडोसराय के दीवे (दीपक सेजवाल) ? पर तेरे को कहने का फायदा ही क्या, पता नहीं तू अपने कंप्यूटर पर मेरी यह हिन्दी की पोस्ट पढ़ भी पा रहा है या नहीं ?
पर "Chapters & Itineraries” में धागा नहीं लिखूंगा । समय मिला तो हालात-ए-बयान करके दिल्ली के दिल की दास्तान लिख दूंगा ।
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