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parvyug

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विवेक आसरी

गांधी जी चाहते तो भगत सिंह को बचा सकते थे...नहीं , बल्कि यूं कहा जाए कि गांधी चाहता तो भगत सिंह को बचा सकता था। भगत को चाहने और ' मानने ' वाले लोगों के बीच यह जुमला काफी इस्तेमाल होता है। हालांकि ऐसा कहने वालों में से अधिकतर नहीं जानते कि ऐसा क्यों कहा जाता है और भगत सिंह को गांधी जी कैसे बचा सकते थे। फिर भी लोग ऐसा कहते हैं। मानते भी हैं।

लेकिन क्या वाकई भगत सिंह को गांधी ने मारा ? भगत ने जेल से कई चिट्ठियां लिखी थीं। उन्हीं में एक में उन्होंने लिखा था कि भगत सिंह मर नहीं सकता। अंग्रेज एक भगत सिंह को फांसी पर लटकाएंगे तो हजारों-लाखों भगत सिंह पैदा होंगे। इसलिए आप लोग इस बात का मलाल मत कीजिए कि अंग्रेज सरकार भगत सिंह को फांसी पर लटकाने जा रही है।

भगत को जब फांसी दी गई , तो वह एक इंसान , एक क्रांतिकारी या एक देशभक्त नहीं थे। वह एक सोच थे , जिसने लोगों के दिल-ओ-दिमाग में घर कर लिया था। वह एक जज्बा थे , जो हर खून में उबाल ले रहा था। वह एक अहसास थे , जिसे उस वक्त हर इंसान जी लेना चाहता था। इसीलिए अंग्रेज भगत सिंह को मार नहीं सके। तो फिर भगत सिंह को किसने मारा ?

भगत सिंह की मौत के लिए गांधी को कोसने वालों ( और नहीं कोसने वालों) के भीतर क्या भगत सिंह नाम की वह सोच , वह जज्बा , वह अहसास जिंदा है ? सरेआम एक प्रफेसर का कत्ल कर दिया जाता है। गवाही देने वालों के लाले पड़ जाते हैं। सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में हुई घटना का एक भी गवाह नहीं। क्या वे सब लोग ' अन्याय के खिलाफ लड़ने का आह्वान करने वाले ' भगत सिंह के कातिल नहीं हैं ?

भरी पार्टी में जेसिका लाल का कत्ल होता है। लेकिन कातिल को किसी ने नहीं देखा। क्या वे लोग भगत सिंह के कातिल नहीं हैं ? रेप तो अपराध हो गया , लेकिन चलते लड़कियों को छेड़ने , तानाकशी करने वाले और भीड़ में चोरी से छूने की कोशिश करने वाले लोगों को क्या कहा जाएगा ? क्या वे भगत सिंह के कातिल नहीं हैं ?

करीब-करीब हर रोज हजारों लोगों को इसलिए नीचा देखना पड़ता है क्योंकि वे ' छोटी ' जाति के लोग हैं। ' पांच दलितों को जिंदा जलाया ' खबर का सिर्फ हेडिंग देखकर छोड़ देने वाले हम नौजवान क्या ' समान समाज का सपना ' देखने वाले भगत सिंह के कातिल नहीं हैं ?

मराठी, बिहारी, साउथ इंडियन, नॉर्थ इंडियन, पंजाबी, गुजराती के नाम पर बहस करने वाले क्या उस भगत सिंह के कत्ल में शामिल नहीं हैं, जिसने सारी दुनिया के एक हो जाने का ख्वाब देखा था ?

ये तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें हैं। बिना टिकट सफर , ट्रैफिक नियम तोड़ने पर पुलिसवाले को 50-100 रुपये देकर छूटना , लाइन में न लगना पड़े इसलिए किसी की सिफारिश ढूंढना , कोई बड़ा काम आन पड़े तो जुगाड़ ढूंढना , वोट देने से पहले सोचना कि यह हमारी जाति का है या हमारे काम करवाएगा या नहीं वगैरह तो अब अपराध है ही नहीं। क्या इस तरह भगत सिंह कत्ल नहीं होता ?

भगत सिंह तो सब चाहते हैं, लेकिन पड़ोसियों के घर। इस कहावत को सुनकर हंस देने वाला हर आदमी क्या भगत सिंह का कातिल नहीं है ?

आज भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव की पुण्यतिथि है। हममें कितने लोगों को यह बात याद थी ? और कितने लोगों को इस बात से फर्क पड़ता है कि आज के दिन वे तीन नौजवान शहीद हुए थे ? कौन है भगत सिंह का असली कातिल ? और उससे भी अहम बात यह है कि जहां-कहीं थोड़ा-बहुत भगत सिंह जिंदा है, उसे बचाने के लिए क्या किया जाए ? आज इस वक्त भगत सिंह को आप क्या संदेश देना चाहेंगे ?
 
Praveen ji......... Bilkul sach likha hai aapne....... lakin ye bhi sach hai hum sabhi me jo jajba ya vo josh hai hi nahi....... Hum jo padte hai sunte hai usi par react karate hai..........

Main ye to nahi kahunga ki Gandhi ji ne Bhagat Singh ko marva lakin us time par bhi hum tum jaise bahut the jo news padkar ya dusro se sunkar SIRF react karate the. Agar kranti pahale aati to Bhagat Singh Jinda kuch din aur jinda hote........... kyoki kisi aur kranti me pakde jate.....Ache log jyada din ruk nahi pate........
 
Nice thread . Sharing an article about Jats.

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तो सिर्फ जाट ही बदनाम क्यों हैं?


मैंने बुजुर्गों को बचपन ही से शादी ब्याह के वक्त गोत्र, उसमें भी उपजाति, परिवार के मूल स्थान और रीति रिवाज से लेकर वधु की चूड़ियों के रंग तक का अता पता करते देखा है. ये तय करने के लिए कि शादी मिलते जुलते खानदान के साथ तो हो लेकिन गलती से भी अपनी ही उपजाति के लड़के या लड़की से न हो जाए. खासकर पंजाबियों में ये मान कर चला गया है कि खुराना, कक्कड़, मक्कड़, सलूजा, सुखीजा, कपूर या चावला लड़का और लड़की कभी कोई पुरानी जान पहचान न हो तो भी आपस में भाई-बहन होते हैं.

पुराने ज़माने में संपर्क और सुविधाओं से वंचित समाज में मामा या मौसी के बेटे बेटी के साथ तो शादी जायज़ थी. किसी हद तक आज भी है. लेकिन चाचा या अपनी उपजाति के किसी, कहीं के भी लड़के लड़की की शादी पे पाबंदी थी. आज भी है. एक फर्क के साथ ये पाबंदी मुस्लिम समाज में भी थी. आज भी है. मुसलमानों में दूध के रिश्ते की शादी नाजायज़ है. यानी चाचा के लड़के या लड़की से तो शादी हो सकती है. लेकिन मामा या मौसी के बच्चे से शादी कतई नहीं हो सकती. इस्लाम में ऐसी शादियों को शरीअत के खिलाफ माना गया है. इस तरह की पाबंदियां आप समाज के हर तबके में पायेंगे. मैं भारत की बात कर रहा हूँ. जहां जाट भी रहते हैं. शादी के मामले में कुछ पाबंदियों की परंपरा अपने पूर्वजों से उन्हें भी मिली है शिष्टाचार के तमाम संस्कारों के साथ. और वे लागू भी रही हैं अब से महज़ कुछ महीने पहले तक. स्वभाव से दबंग होने के बावजूद जाट कभी उग्र नहीं हुए. इसलिए कि इसकी नौबत ही नहीं आई.

अब आई है तो वे आपे से बाहर हुए हैं, हिंसक भी. और आप गौर करें इस हिंसा के पीछे भी परिवार की भूमिका कुछ कम, खाप की ज्यादा है. खाप भीड़ होती है. पर लोकतंत्र में भीड़ की भी एक भाषा होती है. अहमियत भी. हिंसा गलत है. कोई भी दलील किसी हत्या को जायज़ नहीं ठहरा सकती. कानून अपना काम करेगा. उसने किया. यहाँ टकराव दिखा. जो खापों को परंपरा में मिले वो संस्कार कानून की किताब में दर्ज नहीं थे. मनोज, बबली की गयी जान और कोई आधा दर्जन लोगों को फांसी के ऐलान के बाद ही सही समाज के संस्कारों और संविधान का सही मेल हो पाए तो ये बड़े पुण्य का काम होगा. मैं मीडिया में अपने मित्रों से उम्मीद करूँगा कि वे खापों को तालिबान बताने की बजाय एक बार अपने भी गिरेबान में झाँक कर देखें. जब खुद उनके परिवारों में फर्स्ट कजिन के साथ शादी नहीं हो सकती तो फिर इसका विरोध करने के लिए जाट ही बदनाम क्यों हैं? कुछ चिंतन मनन अपने अंतःकरण में जाटों और उनकी खापों को भी करना पड़ेगा. पंजाबियों और मुसलमानों ने तो शादी के लिए ददिहाल और ननिहाल में से एक रास्ता बंद किया है. खापों पे इलज़ाम है कि उनने इन दो के अलावा तीसरे और चौथे रास्ते पे भी नाका सा लगा रखा है.

ये ज़रूरी है देश की संसद खापों की हिन्दू मैरिज एक्ट में संशोधन की मांग पर विचार करे. शादी के लिए छत्तीसगढ़ और झारखण्ड से कुछ नज़दीक रास्ते जाटों की नई पीढी को भी दिखने चाहिए. वर्ना बेमेल शादियाँ होंगी. फतवे, खतरे होंगे. अदालतों में फ़रियाद होगी तो सुरक्षा मुहय्या कराने के आदेश भी दिए ही जायेंगे. खापों और पुलिस के बीच टकराव हमेशा रहेगा. इससे मुश्किलें बढेंगी. मतभेद मनभेद में बदले तो सरकार के लिए भी गोली डंडा चलाना दुश्वार हो जाएगा. हम सब अस्थायी असहमति के स्थायी अशांति में बदलने का इंतज़ार क्यों करें? ....मान के चलिए कि चौटाला और नवीन जिन्दलों के बाद "भाई-बहनों" की शादियों के खिलाफ तो जाटों के साथ कल दूसरी बिरादरियां भी होंगी.


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भ्रष्टाचार की जड़ें (३) / सच्चिदानन्द सिन्हा

अप्रैल 19, 2011 Aflatoon अफ़लातून द्वारा

पिछले हिस्से : एक , दो

आधुनिक केंद्रित व्यवस्थाओं में ऊँचे ओहदे वाले लोग अपने फैसले से किसी भी व्यक्ति को विशाल धन राशि का लाभ या हानि पहुँचा सकते हैं । लेकिन इन लोगों की अपनी आय अपेक्षतया कम होती है। इस कारण एक ऐसे समाज में जहाँ धन सभी उपलब्धियों का मापदंड मान लिया जाता हो व्यवस्था के शीर्ष स्थानों पर रहने वाले लोगों पर इस बात का भारी दबाव बना रहता है कि वे अपने पद का उपयोग नियमों का उल्लंघन कर नाजायज ढंग से धन अर्जित करने के लिए करें और धन कमाकर समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त प्राप्त करें । यहीं से राजनीति में भ्रष्टाचार शुरु होता है । लेकिन विकसित औद्योगिक समाजों में व्यवस्था की क्षमता को कायम रखने के लिए नियम कानून पर चलने और बराबरी की प्रतिस्पर्धा के द्वारा सही लोगों के चयन का दबाव ऐसा होता है जो ऐसे भ्रष्टाचार के विपरीत काम करता है । ऐसे समाजों में लोग भ्रष्ट आचरण के खिलाफ सजग रहते हैं क्योंकि इसे कबूल करना व्यवस्था के लिए विघटनकारी हो सकता है । हमारे समाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसे व्यवस्थागत मूल्यों का निर्माण नहीं हो पाया है । इसके विपरीत जहां हमारी परंपरा में संपत्ति और सामाजिक सम्मान को अलग – अलग रखा गया था वहीं आज के भारतीय समाज संपत्ति ही सबसे बड़ा मूल्य बन गई है और लोग इस विवेक से शून्य हो रहे हैं कि संपत्ति कैसे अर्जित की गई है इसका भी लिहाज रखें । इस कारण कोई भी व्यक्ति जो चोरी , बेईमानी , घूसखोरी तथा हर दूसरी तरह के कुत्सित कर्मों से धन कमा लेता है वह सम्मान पाने लगता है । इस तरह कर्म से मर्यादा का लोप हो रहा है ।

आधुनिकतावादियों पर , जो धर्म और पारंपरिक मूल्यों को नकारते हैं तथा आधुनिक उपकरणों से सज्जित ठाठबाट की जिंदगी को अधिक महत्व देते हैं , भ्रष्ट आचरण का दबाव और अधिक होता है । इस तरह हमारे यहाँ भ्रष्टाचार सिर्फ वैयक्तिक रूप से लोगों की ईमानदारी के ह्रास का परिणाम नहीं है बल्कि उस सामाजिक मूल्यहीनता का परिणाम है जहां पारंपरिक मूल्यों का लोप हो चुका है पर पारंपरिक वफादारियां अपनी जगह पर जमी हुई है । इसीका नतीजा है कि आधुनिकता की दुहाई देने वाले लोग बेटे पोते को आगे बढ़ाने में किसी भी मर्यादा का उल्लंघन करने से बाज नहीं आते । चूँकि हमारे समाज में विस्तृत परिवार के प्रति वफादारी के मूल्य को सार्वजनिक रूप से सर्वोपरि माना जाता रहा है कुनबापरस्ती या खानदानशाही के खिलाफ सामाजिक स्तर पर कोई खास विरोध नहीं बन पाता । आम लोग इसे स्वाभाविक मानकर नजरअंदाज कर देते हैं । ऐसी स्थिति में इनका विरोध प्रतिष्ठानों के नियम कानून के आधार पर ही संभव हो पाता है ।

ऊपर की बातों पर विचार करने से लगता है कि जब तक संपत्ति और सत्ता का ऐसा केंद्रीयकरण रहेगा जहाँ थोड़े से लोग अपने फैसले से किसी को अमीर और किसीको गरीब बना सकें और समाज में घोर गैर-बराबरी भी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार के दबाव से समाज मुक्त नहीं हो सकता । यही कारण है कि दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी और आदर्शवादी लोग सत्ता में जाते ही नैतिक फिसलन के शिकार बन जाते हैं । एक ऐसे समाज में ही जहाँ जीवन का प्रधान लक्ष्य संपत्ति और इसके प्रतीकों का अंबार लगाकर कुछ लोगों को विशिष्टता प्रदान करने की जगह लोगों की बुनियादी और वास्तविक जरूरतों की पूर्ति करना है भ्रष्ट आचरण नीरस बन सकता ।

भ्रष्टाचार का उन्मूलन एक समता मूलक समाज बनाने के आंदोलन के क्रम में ही हो सकता है जहाँ समाज के ढाँचे को बदलने के रा्ष्ट्रव्यापी आंदोलन के संदर्भ में स्थानीय तौर से भ्रष्टाचार के संस्थागत बिंदुओं पर भी हमला हो सके । बिहार में चलने वाले १९७४ के छात्र आंदोलन की कुछ घटनायें इसका उदाहरण हैं, जिसमें एक अमूर्त लेकिन महान लक्ष्य ’संपूर्ण क्रांति’ के संदर्भ में नौजवानों में एक ऐसी उर्जा पैदा हुई कि बिहार के किशोरावस्था के छात्रों ने प्रखंडों में और जिलाधीशों के बहुत सारे कार्यालयों में घूसखोरी आदि पर रोक लगा दी थी । लेकिन न तो संपूर्ण क्रांति का लक्ष्य स्पष्ट था और न उसके पीछे कोई अनुशासित संगठन ही था । इसलिए जनता पार्टी को सत्ता की राजनीति के दौर में वह सारी उर्जा समाप्त हो गई ।

अंतत: हर बड़ी क्रांति कुछ बुनियादी मूल्यों के इर्दगिर्द होती है । इन्हीं मूल्यों से प्रेरित हो लोग समाज को बदलने की पहल करेते हैं । हमारे देश में , जहां परंपरागत मूल्यों का ह्रास हो चुका है और आधुनिक औद्योगिक समाज की संभावना विवादास्पद है , भ्रष्टाचार पर रोक लगाना तभी संभव है जब देश को एक नयी दिशा में विकसित करने का कोई व्यापक आंदोलन चले । इसके बिना भ्रष्टाचार को रोकने के प्रयास विफलताओं और हताशा का चक्र बनाते रहेंगे ।http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/6282153.cms
 
हसन अली का खुलासा, 3 पूर्व cm का पैसा उसके खाते &#23

मुंबई। प्रवर्तन निदेशालय(ईडी) की पूछताछ में हसन अली ने खुलासा किया है कि उसके खाते में महाराष्ट्र के पूर्व तीन मुख्यमंत्रियों का पैसा जमा है। एक अखबार के मुताबिक हसन अली ने ईडी के अफसरों को बताया है कि उसके अकाउंट में जमा हजारों करोड़ रुपए में से एक बड़ा हिस्सा देश के कई बड़े नेताओं और नौकरशाहों का है। अली ने ये पैसे स्विस बैंक और दूसरे अकाउंट्स में जमा करवाए थे। इन बड़े नेताओं में महाराष्ट्र के तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल हैं।


हालांकि ईडी ने इन मुख्यमंत्रियों और नेताओं के नाम का खुलासा नहीं किया है। हसन के इस खुलासे ने ईडी की मुश्किल आसान कर दी है जो अब तक सही जांच नहीं करने पर कोर्ट की फटकार झेल रहा था। जांच से जुड़े अफसरों का कहना है कि हसन अली, स्टॉक मार्केट के कुछ हवाला कारोबारियों की मदद से अपना ही बैंकिंग नेटवर्क चला रहा था। जिसमें देश के कई बड़े नेता और आला अफसर भी शामिल थे। अली इसके जरिए नेताओं के काले धन को सफेद करने का काम करता थाहसन अली से पूछताछ के बाद ईडी के अफसरों ने यूबीएस, बार्क्लेज और क्रेडिट सुईस बैंकों के भारतीय अधिकारियों को तलब कर उनसे अली के खातों के बारे में जानकारी मांगी है।







दरअसल मशहूर घोड़ा व्यपारी और टैक्स चोरी का आरोपी हसन अली का मामला अब और तूल पकड़ रहा है। हसन अली से पूछताछ कर चुके एक डीसीपी के सस्पेंशन ने विवाद को और तूल दिया है। डीसीपी के सस्पेंशन के मुद्दे पर सोमवार को विपक्ष ने जमकर हंगामा किया। माना जा रहा है कि डीसीपी के जरिए कई नेताओं के चेहरे से नकाब हट सकता है।


आदर्श घोटाले के बाद हसन अली महाराष्ट्र सरकार के लिए सिरदर्द साबित हो रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार हसन अली के मामले की निष्पक्ष तरीके से जांच नहीं होने दे रही है। और इसका नजीर है जीआरपी के डीसीपी अशोक देशभरतार का निलंबन। आखिर डीसीपी का गुनाह क्या था? असल में डीसीपी अशोक भरतार ने ही 2008 में फर्जी पासपोर्ट मामले में हसन अली को गिरफ्तार किया था। तब हसन अली से 1 घंटे तक पूछताछ हुई थी। इस पूछताछ में अली ने कई नेताओं के नाम लिए थे। डीसीपी अशोक देश भरतार ने उस पूछताछ का एक वीडियो सीडी बनवाया था, जो बाद में मीडिया तक पहुंच गई थी।


साफ है डीसीपी देश भरतार हसन अली मामले की जांच की अहम कड़ी थे। माना जा रहा है कि डीसीपी की पूछताछ के जरिए कई सफेदपोश नेताओं के चेहरे से नकाब उतर सकता है। फिलहाल हसन अली ईडी की हिरासत में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत की समय सीमा 3 दिन और बढ़ा दी है। अब एक तरफ हसन अली हैं और दूसरी तरफ डीसीपी देश भरतार हैं। दोनों में से किसी एक ने भी अगर मुंह खोल दिया और नेताओं के नाम बाहर आ गए तो महाराष्ट्र सरकार की किरकिरी होने से कोई रोक नहीं पाएगा।http://khabar.ibnlive.in.com/news/50227/1
 
शहीद चन्द्रशेखर आजाद : तीन रोचक प्रसंग

23 जुलाई को शहीद चन्द्रशेखर आजाद की 104वीं जयंती है। पंडित जी की प्रचंड देशभक्ति के तमाम किस्से मशहूर हैं। उनके सामने एक ही लक्ष्य था, भारत की आजादी और बाकी सारे मुद्दे गौण थे इस लक्ष्य के सामने। व्यक्तिगत जीवन का तो कोई मोल था ही नहीं उनके लिये इस लक्ष्य को पाने के लिये तो जीवन में सुख सुविधाओं की चिंता करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता उनके मामले में।

अर्जुन की तरह पंडित जी अपना पूरा ध्यान इसी एक बात पर लगाये रहते थे कि कैसे आजादी प्राप्त की जाये। मुल्क की आजादी पाने के लिये उन्होने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन की स्थापना की थी और शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव एवम बटुकेश्वर दत्त आदि भी इसके सदस्य बने।

उनके जीवन से विशुद्ध आजादी के प्रयासों के अलावा भी और बहुत सारे रोचक प्रसंग जुड़े हुये हैं। उनमें से कुछ का जिक्र यहाँ किया जा सकता है।

बात उन दिनों की है जब भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और बटुकेश्वर दत्त भी इलाहाबाद में प्रवास कर रहे थे। एक दिन सुखदेव कहीं से एक कैलेंडर ले आये जिस पर शायद किसी सिने तारिका की मनमोहक तस्वीर छपी थी। सुखदेव को कैलेंडर अच्छा लगा और उन्होने उसे लाकर कमरे की दीवर पर टांग दिया और बाद में वे बाहर चले गये। उनके जाने के बाद पंडित जी वहाँ पँहुचे और ऐसे कैलेंडर को देखकर उनकी भृकुटी तन गयी, उनके गुस्से को देखकर वहाँ मौजूद अन्य साथी डर गये। वे सब पंडित जी का मिजाज़ जानते थे। पंडित जी ने किसी से कुछ नहीं कहा पर कैलेंडर को उतार कर फाड़कर फेंक दिया। कुछ समय बाद सुखदेव वापिस आ गये। दीवार पर कैलेंडर न देख कर वे इधर उधर देखने लगे और उन्हे उसके अवशेष दिखायी दिये तो वे क्रोधित हो गये। वे भी गर्म मिजाज़ के व्यक्ति थे। उन्होने गुस्से में सबको ललकारा कि किसने उनके लाये कैलेंडर की यह दशा की है?

पंडित जी ने शांत स्वर में उनसे कहा,” हमने किया है “?

सुखदेव थोड़ा बहुत कसमसाये परंतु पंडित जी के सामने क्या बोलते सो धीरे से बोले कि अच्छी तस्वीर थी।

पंडित जी ने कहा,”यहाँ ऐसी तस्वीरों का क्या काम”।

उन्होने सुखदेव को समझा दिया कि ऐसे किसी भी आकर्षण से लोगों का ध्यान ध्येय से भटक सकता है।

दूसरी घटना दूसरे दशक के अंत की है। अंग्रेजों का दमन चक्र तेजी से चल रहा था और जनता में खासा रोष था। एक दिन महिलायें इलाहाबाद में जुलूस निकाल रही थीं और हाथ पड़ जाने वाले किसी भी पुरुष पर खासी लानत भेज रहीं थीं उन्हे चुनौती देकर कि वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं। आजाद अपने किसी साथी के साथ वहाँ से गुजर रहे थे। महिलाओं ने उन्हे घेर लिया और एक महिला ने गरजते हुए उन पर शब्दों से आक्रमण कर दिया,” आप लोगों से कुछ होने वाला नहीं है, आप सब मर्दों को चूड़ी पहन कर घर बैठ जाना चाहिये”।

एक दो महिलाओं ने आजाद के हाथ पकड़ लिये और कहने लगीं कि इन्हे चूड़ियां पहनाओ।

जाहिर था कि उन्होने आजाद को पहचाना नहीं था।

आजाद मुस्कुराये और उन्होने अपनी कलाइयाँ बढ़ाते हुये कहा कि लो बहन पहना लो चूड़ियाँ।

कद्दावर शरीर के मालिक आजाद के हष्ट-पुष्ट हाथों के चौड़े गट्टों में भला कौन सी चूड़ी चढ़ सकती थी?

कुछ देर में महिलायें शर्मिंदा हो गयीं।

तीसरी घटना उस समय की है जब आजाद चाकू चलाने की कला में माहिर एक उस्ताद से चाकू चलाना सीखा करते थे। उस्ताद जी पंडित जी को छत पर चाकू चलाना सिखाते थे। पास ही स्थित एक दूसरे घर की छत से, जो इस घर की छत से थोड़ा ऊँची थी, रोज एक युवती और उसका छोटा भाई इस ट्रेनिंग को देखा करते थे। दोनों नियत समय पर छत पर आकर बैठ जाते थे और आजाद को ट्रेनिंग लेते हुये देखते थे।

एक दिन ऐसा संयोग हुआ कि सीखते हुये आजाद का ध्यान थोड़ा हट गया और उस्ताद जी का चाकू उनके शरीर को छीलता हुआ निकल गया। उस्ताद जी और उनके शागिर्द पंडित जी के घाव को देख रहे थे कि उस दूसरी छत से बहुत सारी चीजें वहाँ बरसनी शुरु हो गयीं। युवती, जो भी उसके हाथों में आ रहा था वह उसे निशाना साध कर उस्ताद जी के ऊपर फेंक रही थी और उसका छोटा भाई भी उसकी सहायता कर रहा था।

उस्ताद जी ने मुस्कुराते हुये पंडित जी से कहा,”लगता है लड़की का दिल लग गया है तुमसे”

प्रेम, विवाह, परिवार, धन-सम्पत्ति आदि सब तरह के सुख जो एक सामान्य मनुष्य अपने जीवन में चाहता है, उन्हे पंडित चन्द्रशेखर आजाद जैसे देशभक्तों ने अपने जीवन में प्रवेश करने ही नहीं दिया। जिस बहुमूल्य आजादी का आज हम सब जीवित लोग दुरुपयोग करके देश को रसातल में पहुँचा रहे हैं, वह ऐसी महान आत्माओं के बलिदान से हमें मिली है। ये सब लोग इतने कर्मठ और काबिल थे कि ऐश्वर्य से भरपूर जीवन जी सकते थे पर वे तैयार नहीं थे स्वाभिमान को ताक पर रखकर गुलामी में जीने को और देशवासियों को गुलामी की जंजीरों से छुड़वाने के लिये उन्होने अपने जीवन होम कर दिये।

नमन पंडित जी जैसी महान आत्माओं को।

पुनश्च : प्रंसग यशपाल द्वारा लिखित अदभुत पुस्तक “फाँसी के फँदे तक” से स्मरण के सहारे प्रस्तुत किये गये हैं।
 
Hi Praveen,
I have the book- Singhavlokan by Yashpal. Where can I get this book- "Phansi ke fande tak"?

I have read both the books written by the great revolutionary, comrade-in-arms of Bhagat Singh and the Gyanpeeth Award winner late Shri Yashpal. I checked out one of the books from Central Secretariat Library in Shastri Bhavan, New Delhi way back in 1986 and had borrowed the other from one of my Marxist friends. One can find these books on Nai Sadak also, perhaps. I would recommend some more good books by the author which are: "Teri Meri Uski Baat" "Dada Comrade", "Pakka Comrade", "Baat Baat me Baat", "Phulo ka Kurta", " Lohe kee Deewaron ke dono aur" "Janani Dyodhi" "Gandhivaad kee Shav Pareeksha" etc. which I found interesting. As most of his literature is left oriented, you may find some of these books outdated too. Interestingly, the beloved of this great writer went all the way to jail (where he was lodged) to marry him.
 
Last edited:
Nice thread . Sharing an article about Jats.

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तो सिर्फ जाट ही बदनाम क्यों हैं?




पुराने ज़माने में संपर्क और सुविधाओं से वंचित समाज में मामा या मौसी के बेटे बेटी के साथ तो शादी जायज़ थी. किसी हद तक आज भी है. लेकिन चाचा या अपनी उपजाति के किसी, कहीं के भी . एक फर्क के साथ ये पाबंदी मुस्लिम समाज में भी थी. आज भी है. मुसलमानों में दूध के रिश्ते की शादी नाजायज़ है. यानी चाचा के लड़के या लड़की से तो शादी हो सकती है. लेकिन मामा या मौसी के बच्चे से शादी कतई नहीं हो सकती. इस्लाम में ऐसी शादियों को शरीअत के खिलाफ माना गया है. इस तरह की पाबंदियां आप समाज के हर तबके में पायेंगे. मैं भारत की बात कर रहा हूँ. जहां जाट भी रहते हैं. शादी के मामले में कुछ पाबंदियों की परंपरा अपने पूर्वजों से उन्हें भी मिली है शिष्टाचार के तमाम संस्कारों के साथ. और वे लागू भी रही हैं अब से महज़ कुछ महीने पहले तक. स्वभाव से दबंग होने के बावजूद जाट कभी उग्र नहीं हुए. इसलिए कि इसकी नौबत ही नहीं आई.

अ.


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I am writing this out of curiosity,, I have some Muslim friends and coleagues ,: उनके अनुसार वो लोग अपने किसी भी relation में शादी कर सकते हैं , चाचा की लड़की/लड़का ,मामा की लड़की/लड़का,बुआ की लड़की/लड़का,मौसी की लड़की/लड़का l
Anyways this has nothing to do with the rhythm of the thread,, but this is for information of all.
 
दुर्गा भाभी का जीवन व क्रांतिकारी व्यक्तित्व
Posted by अरविन्द विद्रोही on October 14, 2010 in इतिहास, भारतनामा | 0 Comment

प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की पत्नी दुर्गादेवी का जन्म ७ अक्तूबर,1907 को इलाहाबाद के न्यायाधीश की पुत्री के रूप में हुआ था। यह संयोग ही है कि दुर्गा देवी की मृत्यु अक्तूबर माह की 14 तारीख को ९२ वर्ष की उम्र में 1999 को हुई। ग्यारह वर्ष की उम्र में दुर्गा देवी का विवाह पन्द्रह वर्षीय भगवतीचरण वोहरा से हुआ था। नेशनल कालेज-लाहौर के विद्यार्थी वोहरा क्रंातिभाव से भरे हुए थे ही, उनकी पत्नी दुर्गा देवी भी आस-पास के क्रांतिकारी वातावरण के कारण उसी में रम गईं थी। सुशीला दीदी को वे अपनी ननद मानती थीं। भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव की त्रिमूर्ति समेत सभी क्रंातिकारी उन्हें भाभी मानते थे।

साण्डर्स वध के पश्चात् सुखदेव दुर्गा भाभी के पास आये। सुखदेव ने दुर्गा भाभी से 500 सौ रूपये की आर्थिक मदद ली तथा उनसे प्रश्न किया-आपको पार्टी के काम से एक आदमी के साथ जाना है, क्या आप जायेंगी ? प्रत्युत्तर में हाँ मिला। सुखदेव ने कहा-आपके साथ छोटा बच्चा शची होगा, गोली भी चल सकती है। दुर्गा स्वरूप रूप धर दुर्गा भाभी ने कहा-सुखदेव, मेरी परीक्षा मत लो। मैं केवल क्रंातिकारी की पत्नी ही नहीं हूँ, मैं खुद भी क्रंातिकारी हूँ। अब मेरे या मेरे बच्चे के प्राण क्रान्तिपथ पर जायें, मैं तैयार हूँ। दूसरी रात ग्यारह बजे के बाद सुखदेव साण्डर्स का वध करने वाले भगत सिंह और राजगुरू, दुर्गा भाभी के घर आ गये। फिर प्रातःभगत सिंह ने शची को गोद में लिया, फैल्ट हैट और शची के कारण भगत सिंह का चेहरा छिपा था, पीछे दुर्गा भाभी बड़ी रूआब से ऊँची हील की सैण्डिल पहने, पर्स लटकाये तथा राजगुरू नौकर रूप में पीछे-पीछे स्टेशन पहुंचे। भगत सिंह और दुर्गा भाभी प्रथम श्रेणी में तथा राजगुरू तृतीय श्रेणी के डिब्बे में चढ़ गये। गाडी के लखनउ आने पर राजगुरू अलग होकर आगरा चल दिये। लखनउ स्टेशन पर भगवती चरण वोहरा और सुशीला दीदी इनको लेने आये। इस प्रकार भगत सिंह और राजगुरू को सकुशल लाहौर से निकालने का श्रेय दुर्गा भाभी को है। धन्य हैं ये वीरांगना। इनके अतिरिक्त भेष बदल बदल कर बम-पिस्तौल क्रांतिकारियों को दुर्गा भाभी अक्सर मुहैया कराती रहती थीं।

असेम्बली बम काण्ड में गिरफतारी देकर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त जेल गये। न्यायालय को इन लोगों ने क्रांतिकारियों की विचार-धारा के प्रचार का माध्यम बनाया। इन्हें छुड़ाने की योजना के तहत किये जा रहे बम परीक्षण के दौरान भगवती चरण वोहरा की मृत्यु हो गयी। मृत्यु की सूचना का वज्रपात सहते हुए, अन्तिम दर्शन भी न कर पाने का दंश झेलते हुए भी धैर्य और साहस की प्रतिमूर्ति बनी रहीं दुर्गा भाभी। पति की मृत्योपरान्त उनको श्रद्धांजलि रूपेण वे दोगुने वेग से क्रांति कार्य को प्रेरित करने लगी। पुनः कुछ दिनों बाद जहां वे लोग रह रहीं थीं, बम विस्फोट हो गया। सभी लोगों ने तत्काल वहां से तितर-बितर होकर भागने की योजना बनाई। इस आपाधापी में दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी एक साथ रहीं।

मुम्बई के गवर्नर हेली की हत्या की योजना दुर्गा भाभी ने पृथ्वी सिंह आजाद, सुखदेव राज, शिंदे और बापट को मिला कर बनाई। गलत-फहमी में इन लोगों ने पुलिस चैकी के पास एक अंग्रेज अफसर पर गोलियां बरसा दीं। बापट की कुशलता पूर्वक की गई डाइविंग से यह लोग बच पाये।चन्द्रशेखर आजाद, दुर्गा भाभी को अब भाई की तरह सहारा देते थे, उन्होंने इस योजना को लेकर काॅफी डांट लगाई। कुछ दिनों के बाद चन्द्रशेखर आजाद भी इलाहाबाद में शहीद हो गये।

समृद्ध परिवार की दुर्गा भाभी के तीनों घर लाहौर के तथा दोनो घर इलाहाबाद के जब्त हो चुके थे। पुलिस पीछे पडी थी। शची को दुर्गा भाभी अब अपने से दूर रख चुकी थी। लाहौर आकर दुर्गा भाभी ने फ्री प्रेस आॅफ इण्डिया से कहा, ‘‘पुलिस मेरा लगातार पीछा कर रही है, लेकिन कैद नही करती। मैं कोई काम नहीं कर पा रही हूँ। मुझे गिरफतार किया जाये नही तो मैं आज से अपने आप को स्वतन्त्र समझूंगी। ‘‘उसी दिन 14सितम्बर,1932 को पुलिस ने बुखार में तपती दुर्गा भाभी को कैद कर लिया। 15दिन के रिमाण्ड के पश्चात सबूतों के अभाव में दुर्गा भाभी को पुलिस को रिहा करना पड़ा। 1919रेग्यूलेशन ऐक्ट के तहत तत्काल आपको नजर कैद कर लिया गया। फिर लाहौर और दिल्ली प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। तीन वर्ष बाद पाबंदी हटने पर आपने प्यारेलाल गल्र्स स्कूल-गाजियाबाद में शिक्षिका के रूप में कार्य किया। इसी दौरान क्षय रोग हो गया परन्तु आप समाज-सेवा करते हुए कांग्रेस से जुडी रहीं। 1937में दिल्ली कांग्रेस समिति की अध्यक्षा चुनी गईं। 1938 में हड़ताल में आप पुनःजेल गईं। बालक शची अब शचीन्द्र हो गया था, योग्य शिक्षा देने की चाह में दुर्गा भाभी ने अड्यार में माण्टेसरी का प्रशिक्षण लिया और 1940 में लखनउ में पहला माण्टेसरी स्कूल खोला। सेवानिवृत्त के पश्चात् आप गाजियाबाद में रहीं। आपका स्वर्गवास 14अक्तूबर, 1999 को हुआ।राष्ट के लिए समर्पित दुर्गा भाभी का सम्पूर्ण जीवन श्रद्धा-आदर्श-समर्पण के साथ-साथ क्रान्तिकारियों के उच्च आदर्शों और मानवता के लिए समर्पण को परिलक्षित करता है।
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I have read both the books written by the great revolutionary, comrade-in-arms of Bhagat Singh and the Gyanpeeth Award winner late Shri Yashpal. I checked out one of the books from Central Secretariat Library in Shastri Bhavan, New Delhi way back in 1986 and had borrowed the other from one of my Marxist friends. One can find these books on Nai Sadak also, perhaps. I would recommend some more good books by the author which are: "Teri Meri Uski Baat" "Dada Comrade", "Pakka Comrade", "Baat Baat me Baat", "Phulo ka Kurta", " Lohe kee Deewaron ke dono aur" "Janani Dyodhi" "Gandhivaad kee Shav Pareeksha" etc. which I found interesting. As most of his literature is left oriented, you may find some of these books outdated too. Interestingly, the beloved of this great writer went all the way to jail (where he was lodged) to marry him.

Thanks a lot VP Singh ji. I liked Singhavloakn, would buy the recommended books as soon I as I get a chance to be to new Delhi.
 
आयुर्वेदःएक सम्पूर्ण चिकित्सा पद्धति

सड़क के किनारे ऊँटगाड़ी या टेन्ट लगा घुमन्तू कबीले के लोग जंगल-पहाड़-गाँव नापते बहुधा हमारे आप के शहर में अधिकांशतः गुप्त या विषम रोगों के डाक्टर बन सपरिवार प्रकट हो जाते हैं। इसी यायावरी के चलते जंगल-विज़न में साधू सन्तों की सेवा से उन्हें कृपावश कभी कभी अचूक नुस्खे और जड़ी बूटियों को पहचाननें की समझ भी मिल जाती थी। आज के समय में ऎसे नीम-हकीमों पर भरोसा नहीं किया जा सकता जहाँ यह एक तथ्य है वहीं सामान्य और गरीब जनता तक चिकित्सा पहुँचे इस पर भी गंभीर विचार की आवश्यकता है। आम आदमी की चिकित्सा को सरल बनानें के लिए लगभग १०० वर्ष पहले एक किताब लिखी गयी थी ‘इलाज़ुल गुरबा’। आयुर्वेद एवं यूनानी की अनुभूत एवं सर्व सुलभ सस्ती औषधियों पर अधारित उपयोगी पुस्तक है। वस्तुतः किसी भी चिकित्सा पद्धति के ‘निदान-औषधि-अनुपात एवं अनुपान’ यह चार आवश्यक अंग हैं किन्तु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है औषधि का निर्माण।

आजकल आयुर्वैदिक औषधियों को बनानें में जिन आधुनिक संसाधनों का प्रयोग, भारी माँग के चलते हो रहा है वह ठीक नहीं है। आयुर्वैदिक औषधियाँ तभी प्रभावी होंगी जब वह पारंपरिक ढ़ंग से तैयार होंगी। अधिक माँग की पूर्ति के लिए कुछ वर्ष पहले कन्नौज के ‘गुलाबजल’ उत्पादकों नें मिट्टी के परंपरागत भभकों के बजाय स्टील के, गैस से चलनें वाले भभकों का इस्तेमाल किया था। गुलाबजल का आसवन तो जल्दी हुआ लेकिन उसकी शीतलता प्रदायक मदिर सुगन्ध जाती रही। परिणामतः खासे नुक्सान के बाद पुरानी व्यवस्था पर चलना पड़ा।

एक शब्द है ‘परिपाक’। परिपक्व, पचना, पचाना आदि। क्या अर्थ है? सामान्यतः हम आहार पके हुए अन्नादि का ही लेते हैं। फिर यह उदरस्थ आहार तुरन्त क्यों नहीं हजम हो जाता? इस आहार को उदर में पचानें, परिपाक होनें में सहायक होती है ‘जठराग्नि’। चारों वेदों का प्रारम्भ अग्नि या ऊर्जा की प्रशस्ति -‘अग्निमीळे पुरोहितम्*’ आदि से ही प्रारम्भ होता है। ‘एक एव अग्नि बहुधा समिद्धः’- जिस प्रकार एक ही अग्नि ८ रूपों मे विभक्त हो पिण्ड़ से ब्रह्माण्ड़ तक को नियंत्रित करती है वैसे ही एक ही अग्नि मनुष्य शरीर में १८ रूपों (भागों) मे व्याप्त हो अलग अलग अंगों एवं कार्यों को नियंत्रित एवं संचालित करती है। उसी के एक रूप को ‘जठराग्नि’ कहा जाता है जो उदरस्थ आहार का परिपाक कर खाये हुए पदार्थ को रस,रक्त,अस्रक,माँस,मेदा,अस्थि,वीर्य एवं ओज में परावर्तित करती है। यह अग्नि ही है जिससे शरीर में एक प्रकार की हरारत,गर्मी (९८०) रहती है। इसी के मन्द होंने पर चिकित्सक कहते हैं कि ‘मंदाग्नि-रोग’ हो गया है या ड़ाइजेशन वीक हो गया है। उसी (अग्नि) का सूक्ष्मतम वायव्य रूप ‘हंस’ प्राण, शिरोकपाल में रहता है जिसको निष्क्रामित करनें के लिए मृतक के कपाल का भेदन किया जाता है। भलीभाँति निष्क्रमित (release) न होंने पर मृतक प्रेत आदि योंनि में जाता है, ऎसी मान्यता शास्त्रों में दी गयी है।

उक्त विस्तृत विवरण का उद्देश्य इतना है कि औषधि निर्माण की प्रक्रिया में औषधियों के परिपाक होंने,सम्मिलित होंने,मिश्रित होंने के लिए आवश्यक है कि शास्त्रोक्त प्रक्रिया ही अपनायी जाए तभी वह लाभप्रद होंगी। यह अनायास नहीं है कि कहीं कण्डे की,कहीं इमली की लकड़ी कहीं शमी आदि की लकड़ी की अग्नि अलग-अलग औषधि को पकानें और कहीं मिट्टी, काष्ठ तो कहीं ताम्रादि के पात्र प्रयोग किय जाते थे। आवश्यकता पारम्परिक तरीकों को कारण सहित जाननें और तद्*नुरुप नये तरीके इज़ाद करनें की है।

आयुर्वेद की अभिकल्पना मात्र रोग से तात्कालिक मुक्ति की नहीं बल्कि रोग को समूल-जड़ से समाप्त करनें की रही है। आयुर्वैदिक चिकित्सा के कम असर दायक होने में हमारा आहार विहार भी एक बड़ा कारण है। आज अधिकांश अन्न का उत्पादान य़ूरिया तथा अन्यान्य रासायनिक खादों पर आधारित है जो शरीर के लिए उपयुक्त नहीं है। संभवतः चना, यव और धान आदि कुछ ही अन्न हैं जो रासायनिक खादों से बचे हुए है। वैद्यों की प्रिय ‘मूँग’ आज समझदार वैद्य इसीलिए कम इस्तेमाल कर रहे है। इंजेक्शन लगा बड़ी-बड़ी लौकी तैयार हो रही है। दूध की जगह यूरिया का घोल मिल रहा है। आधुनिक विज्ञान जनवादी होते-होते कितना जनघाती हो गया है? तात्पर्य यह कि या तो हम आयुर्वैदिक औषधियों की मात्रा तत्काल लाभ के लिए बढ़ाए (यह रोगी की शारीरिक स्थिति पर निर्भर करेगा) या फिर रोगी का भोजन यूरिया मुक्त, कम से कम तब तक तो अवश्य हो जब तक वह स्वास्थ्य लाभ नहीं कर लेता।

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर कहते हैः ‘जो शिक्षा बीस-पच्चीस साल भी ब्रह्मचारी न रहनें दे, उस शिक्षा को कूड़े-कर्कट के ढ़ेर की तरह आग लगा देना ही अच्छा’। यह असंतुलित विहार ही है जिसके चलते मधुमेह जैसे रोग दिन प्रतिदिन बढ़्ते चले जा रहे है। मधुमेह वस्तुतः रोग नहीं घुन है जो शरीर को चाटता रहता है परिणामतः कालान्त्तर में य़क्षमा,कारबंकल,आई हैमरेज, ब्लड़्प्रेसर एवं हृदय रोग हो जाते है। ३० वर्ष के आस-पास जिसे मधुमेह होता है उसका साठ साल तक जिन्दा रहना मुश्किल हो जाता है। असंयमित और श्रम रहित जीवन ही मूल कारण है।

आयुर्वेद मात्र तीन शब्दों में व्याख्यायित किया गया हैः- ‘हित भुक’-‘ऋतु भुक’-‘मित भुक’। स्वयं (वात,पित्त,कफ़) की प्रकृति जानकर तदनुकूल जो हित कर है और जो उस ऋतु में उपलब्ध हो तथा जितनी भूख हो उससे कम खाय़ेँ और स्वस्थ्य रहें। धनवंतरि,चरक शुश्रुत आदि की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। आयुर्वेद एक समग्र एवं पूर्ण पद्धति है जिसका उद्देश्य जनता जनार्दन को तन मन से स्वस्थ्य एवं उपयोगी मनुष्य बनाना रहा है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति कार्य का उपचार करती है न कि कारण का और इसी कारण वह अभी भी प्रायोगिक अवस्था में है और आगे भी रहेगी।
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यशपाल की दो और अच्छी पुस्तकें : "तर्क का तूफ़ान", "पिंजरे की उड़ान "
 
बुद्धिमान, सुन्दर, स्वस्थ ऐसे बनो
Posted by डॉ राजेश कपूर on July 30, 2010 in स्वास्थ्य | 6 Comments

प्यारे बच्चो! मैं आपको कुछ उपयोगी बातें बतलाऊंगा जिनको अपनाकर आप अपनी स्मरण शक्ती बढा सकेंगे, कद लम्बा कर सकेंगे! इसके इलावा दांन्त-आखें सुन्दर, शरीर मजबूत बना सकेंगे! लड्कियों के बाल खूब लम्बे होसकेंगे! मन बडा प्रसन्न रख सकोगे! तो करना है न ये सब? करने में बडा आसान है!

*१. रोज रात को सोते समय अपनें पैरों के तलुओं की मालिश देसी घी, शुद्ध सरसों के तेल, जैतून के तेल या नारियल के तेल से करें(इन में से जो भी मिले)! नाक के अन्दर भी लगाएं और अपनी नाभी में भी लगायें! सर दर्द, नक्सीर(नाक से खून आना), दिमाग का भारीपन आदि सब ठीक हो जायेंगे!
*२. दो-तीन चम्मच मेथी-दाना लेकर रात भर पचास ग्राम पानी में भिगो दें! प्रातः पचास ग्राम कोई अच्छा तेल लें और मेथी, मेथी का पानी व तेल को किसी पीतल या लोहे के बर्तन में पकायें! जब मेथी के दाने काले होजायें तो तेल तैयार हो गया! अब इसको ठण्डा करके छानें और किसी कांच की शीशी में रखें! रात को सोते समय इसकी चार-पांच बूंदें कान में डालने से कुछ ही दिन में दिमाग तेज होगा, कैइ और रोग भी ठीक होंगे!
नाक-कान में तेल डालने से थोडा-थोडा जुकाम होकर दिमाग हलका और मन प्रसन्न होजायेगा! दांतों की दर्द गायब होने लगेगी!स्मरण शक्ती बढने लगेगी! इतना ही नहीं, आंखें भी सुन्दर बन जायेंगी!
*३. एक छोटीसी सच्ची कहानी सुनो! स्वामी जगदीश्वरानन्द जी किसी भक्त की बेटी की शादी में दिल्ली गये तो देखा कि शादी की सारी तैयारी और धूम-धाम तो जैसी होती है वैसी ही है पर दुल्हन तथा उसके माता-पिता कहीं नजर नहीं आरहे! पूछने पर पता चला कि ऊपर के कमरे में हैं, पर क्यों? किसी को पता नहीं था! स्वामी जी ऊपर के कमरे में गये तो देखा तीनो सर झुकाकर उदास बैठे हैं! लडकी दुलहन के कपडे पहने घुंघट में थी! प्रणाम आदी के बाद पूछा कि क्या बात है? पता चला कि लडकी को आई-फ़्लू हुआ है जिसका इलाज होनें में कई दिन लगेंगे! कोई बडे से बडा आधुनिक चिकित्सक तुरत-फ़ुरत आईफ़्लू का इलाज नहीं कर सकता! शादी में कैसे तो लडकी को मण्डप में बिठायें और कैसे मुंह दिखाई करें?
स्वामी जी ने कहा कि चिंता न करो, बेटी अभी ठीक होजायेगी! और स्वामी जग्दीश्वरानन्द जी ने ये चमत्कार करदिया, लड्की पांच-छः घण्टों में ठीक होगई! प्रातः फ़ेरों के समय उसे देखकर पता ही नहिं चलता था कि उसे कभी आईफ़्लू हुआ भी था! स्वामी जी का यह जादू आप भी सीख सकते हैं, सीखोगे?
स्वामीजी ने असली मेंहदी पानी में आटे की तरह गूंधकर उसका एक लड्डु जैसा बनाकर लडकी के गुदा-स्थान (मल-स्थान, ऐनस) पर रखवा दिया! एक-एक घण्टे बाद उसे बदलते रहे और लडकी का आईफ़्लू गायब होगया. कितना आसान है न? पर ध्यान रखना कि मेंहदी बहुत ठण्डी होती है, अतः सर्दियों के मौसम में या ज्वर आदि में इसका प्रयोग न करें! उच्च-रक्तचाप, आखों की लाली भी इससे ठीक हो सकती है! इतना तो आप समझ ही गये होंगे कि प्रातः मल त्याग के बाद ठण्डे पानी से गुदा-स्थान को धोने से आंखें और दिमाग स्वस्थ रह्ते हैं! जो टायलेट-पेपर का प्रयोग करते हैं और फ़ोम की कुर्सी, गद्दियों पर अधिक बैठते हैं; उन्हें आंख,कान,दिमाग के रोग भी अधिक होते होंगे, है न?
*४. अमेरीका के प्रो. जे. मोर्गन (एम.डी) ने अपने साढे चार हजर मरीजों का इलाज बिना दवाओं के केवल ओम बुलवाकर कर दिया! हमने भी स्वयं अपने पर और कई बच्चों व रोगियों पर ओम का असर आजमाया है! वाकई बडी जल्दी व बडा अछा असर होता है! आप भी ओम का कमाल आजमाकर देखो! रोज प्रातः और सोते समय ओम का जाप पांच-दस मिनेट तक कुछदेर बोलकर और फ़िर कुछ देर बिना बोले (मानसिक) जाप करें! आप देखेंगे कि आपके सारे के सारे शारीरिक के और मानसिक रोग ठीक होते जा रहे हैं! बुद्धी व स्मरण-शक्ती, ताकत तथा उत्साह, प्रसन्नता बढती ही जायेगी! दस-बारह दिन में ही बडा अछा असर नजर आने लगता है!
*५. जर्मन, फ़्रांस, रूस, इटली आदि अनेक देशों के वैग्यानिकों ने खोज की है कि भारतीय गऊ के गोबर को जलाने से हैजा, प्लेग, टाईफ़ाईड, डायरिया, टी.बी. तक के रोगाणु मर जाते हैं! अगर गोबर के उपले के साथ थोडी सी दाख, मुनक्का, किशमिश या गुड जला दिया जाये तो असर और भी अधिक होता है! केवल आधे घण्टे में नब्बे प्रतिशत से अधिक रोगाणू-कीटाणू मर जाते हैं! यानी अगर हम अपने घर में गोबर का एक टुकडा (अपनी उंगली जितना लम्बा और मोटा), थोडा सा देसी घी लगाकर धूप की तरह रोज सुबह-शाम जलायें और उसके साथ दो- चार दाने मुनक्का, दाख, किशमिश या गुड जलायेंगे तो हमारे घर में कभी भी कोई कीटाणुजन्य रोग होगा ही नहीं! कोई रोग होगा भी तो कुछ दिन में ठीक होजाजायेगा! गोबर की बत्तियां बनाते समय अगर उसमें थोडा तगर,जीरा, जटामासी,बचा,ब्रह्मी आदि डालसकें तो और भी कई लाभ होंगे!
सबसे पहले आकलैंड के वैग्यानिकों ने यह खोज की थी कि संसार में दो तरह की गऊएं हैं! (१) जिनके दूध में बीटा कैसीन ’ए-१’ नामक प्रोटीन है वे सब कैंसर आदि रोग पैदा करती हैं! फ़्रेजियन, हलिस्टीन, रेड-डैनिश तथा अधिकांश जर्सी गऊएं ’ए-१’ प्रोटीन वाली हैं जिनके दूध से मधुमेह(डायबिटीज), कैंसर, आटिज्म, ह्रिदय रोग आदि असाध्य बीमारियां लगती हैं! इनका गोबर, गोमूत्र, दूध, स्पर्श आदी सबकुछ विशाक्त होता है! यही कारण है कि ब्राजील ने चालीस लाख से अधिक भारतीय गोवंश अपने देश में तैयार किया है! अमेरिका भी अब यही कर रहा है! (२) दूसरी वे गऊएं हैं जिनके दूध में ’ए-२’ नामक प्रोटीन होती है! ये दूध बल-बुद्धी वर्धक है और यह कैंसर रोधक है! हमारी सारी भारतीय गऊएं ’ए-२’ प्रोटीन वाली होती हैं! पर विदेशी लोग हमें यह बात बताते नहीं, हमसे छुपाते हैं! अतः हमें अपने इस स्वदेशी गोवंश की सुरक्षा करनी होगी और इसी के घी- दूध, गोबर, गोमूत्र का प्रयोग करना होगा!
*६. कुछ सावधानियां रखने, अपनाने की भी जरूरत है, फ़िर आपका स्वास्थ्य कमाल का होजायेगा! समझने और याद रखने की ये बात है कि बोतल और पैकिट में बन्द सभी खाने-पीने के आहार पदार्थों में कुछ ऐसे रसायन डाले जा रहे हैं जिससे हमारा शरीर और दिमाग कमजोर होजाते हैं! इनमें एक रसायन का नाम है ’मोनोसोडियम ग्लुटामेट’. इसके असर से स्नायुकोश मरने लगते हैं; लीवर, गुर्दे, ह्रिदय, आंतें आदि भी धीमी गति से बेकार होने लगते हैं! इस ग्लुटामेट से अफ़ीम की तरह इसकी आदत पड जाती है और इसके बिना रहना मुश्किल हो जाता है! इसके प्रभाव से कम स्वाद चीजें अधिक स्वाद लगती हैं और स्नायुतंत्र इस तरह से खराब होजाता है कि पेट भर जाने की सूचना दिमाग तक पहुंचनी बन्द हो जाती है! लीवर खराब होजाने के कारण भूख नहीं लगती पर कुरकुरे, चिप्स, चाकलेट, पिज्जा, बरगर, खूब खाए जाते हैं क्योंकि ग्लुट्मेट हमें इसके लिये मजबूर करता है!
इनके इलावा भी कई हानिकारक रसायनिक पदार्थ इन पैकिटों और बोतलों में होते हैं! अतः इनसे बचना चाहिये!
*८. अश्वगंधा, विधारा, शतावरी ५०-५० ग्राम लेकर पीस लें, अब इसमें १५० ग्राम मिश्री मिलाकर रोज प्रातः एक छ्म्मच चूर्ण पानी या गो के दूध से खाते रहें! खटाई कुछ्दिन नहीं खाएं और कब्ज न हो तो शरीर शक्तीशाली बन जायेगा.
*९. रोज सवेरे एक बताशे में ५-७ बूंदें बड के दूध की डालकर खाने से लडके, लडकियों, बडे, बूढों के मूत्र रोग टीक होजाते हैं और शरीर सुन्दर व शक्तीशाली बनता है!
*१०. सर में शैम्पू लगाने से बाल, आखें, स्मरणशक्ती व चेहरा ख्राब होने लगते हैं क्योंकि इनमें कई हानिकारक रसायनों का प्रयोग हुआ होता है! साधू-सन्तों और अयुर्वेद के नाम पर बने जितने भी शैम्पू हमें बाजार में मिले, सभी हानिकारक थे! इसलिये शैम्पू की जगह कुछ और प्रयोग करना होगा! रीठा, निम्बू, दही, मेंहदी व नरोल साबुन का प्रयोग करके देखें!
*११. आपने देखा होगा कि आजकल के बच्चों के दांत सफ़ेद-सुन्दर नहीं होते. जानते हैं क्यों ? टुथपेस्ट में डले हुए फ़्लोराईड से दान्त और हमारे शरीर की हड्डियां गलने, खराब होने लगती हैं. इसपर अनेक शोध होचुके हैं. अतः पेस्ट के स्थान पर किसी मन्जन का प्रयोग करना चाहिये. क्भी-कभी दातुन भी करते रहें. मल-मूत्र त्याग के समय दान्त दबाकर बैठें और बाद में कुल्ला कर लें. इससे भी दान्त मजबूत बनते हैं. असल में मल-मूत्र त्याग के समय हमारे दन्तों की जडों में कुछ तेजाबी पदार्थ एकत्रित होकर उनकी जडों को कमजोर बना देते हैं. कुल्ला करने से ये तेजाबी तत्व निकल जाते हैं. हमारे पूर्वज तभी तो मल-मूत्र त्याग के बाद सदा कुल्ला किया करते थे.
*१२. अन्त में एक बात और कि सोने से पहले रात को वही सोचकर और पढकर सोना जो आप बनना चाह्ते हैं! सवेरे उठकर भी कुछ्देर तक वही सोचना और ईश्वर से क्रिपा मंगना! केवल एक साल में आपको नजर आने लगेगा कि आपने जो मांगा था आप वही बनते जा रहे हो, हालात उसी के अनुसार बन रहे हैं!
अगर कोई समस्या हो, कोई प्रश्न हो तो ई-मेल पर भेजना; समाधान पत्र या ई-मेल से भेजेंगे! ई-मेल के लिये जरुरत हो तो अपने अध्यापक, माता या पिता की मदद लेना! अगर ई मेल नहीं भेज सकते तो पत्र लिखना, पता है-
“सुधाम, सपरून, सोलन-१७३२११ (हि.प्र.)
ई-मेल :dr.rk.solan@gmail.comhttp://www.janokti.com/health-tips-स्वास्थ्य/बुद्धिमान-सुन्दर-स्वस्थ/
 
लिखे हुए शब्दों के प्रति श्रद्धा
--प्रवीण गार्गव

जीवन का पहला निबंध जो स्कूल के कोर्स में नहीं था, वह पिताजी के एक विद्वान घनिष्ठ मित्र के कहने पर लिखा था- "मैं इंजिनियर बनाना चाहता हूँ" इस विषय पर। संकोचवश वह निबंध किसी को बताया नहीं, परन्तु सम्हाल कर रखा। चार वर्ष बाद जब अभियाँत्रिकीय महाविद्यालय में प्रवेश मिला तो सहज ही इन लिखे शब्दों के प्रति श्रद्धा का भाव जाग्रत हो गया। किसी की प्रेरणा से लिखे हुए शब्द जीवन की प्रतिश्रुति बन गए, मंजिल बन गए। दरअसल लिखते समय हम वो नहीं रहते, जो हम बोलते समय रहते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि हम यह मानते हैं कि जो लिखा हुआ है वह हमेशा रहेगा और बोला हुआ तो खो जाएगा। लिखते समय अगर हम ईमानदार नहीं है तो मन पर बोझ अधिक होता है। सच्चाई से लिखा है, तो श्रद्धा बन जाता है, विश्वास बन जाता है। यही विश्वास कार्य पूर्ण करने में सहायक हो जाता है और यही श्रद्धा विश्व चेतना को हमारे लक्ष्य प्राप्ति में सहायक बनने को मजबूर करती है। भविष्य का हर क्षण अप्रत्याशित, अनापेक्षित, अज्ञात हमारे सामने रहता है, हमारे साथ जो कुछ भी होता है वह हमारी श्रद्धा की तीव्रता और पवित्रता पर निर्भर करता है। जीवन में जब सत्य अवतरित हो जाता है और व्यक्ति जब अनजाने में भी झूठ नहीं बोलता, तब वह दशा आ जाती है कि वह व्यक्ति अगर भविष्य के बारे में कुछ कह देता है, तो वह भी सत्य हो जाता है। यानी सच बोलते-बोलते सच्चा भविष्य बताने की सिद्धी सहज ही प्राप्त हो जाती है।

लिखना हमारे विचारों को न केवल व्यवस्थित करता है, बल्कि उन्हें परिपूर्ण भी बनाता है। जीवन की कई समस्याएँ जो हमें बहुत उलझी सी लगती हैं या बहुत अधिक लगती हैं, जब कागज़ पर उतरती हैं तो अपने आप कम और आसान हो जाती हैं। लिखे हुए शब्द हमारा और हमसे जुड़े व्यक्तियों का जीवन भी सँवार सकते हैं। लिखे हुए शब्द बोले हुए शब्दों कि तुलना में "सौ सुनार कि एक लुहार की" का कार्य करते हैं। आज पत्रों का स्थान एस.एम.एस. और ई-मेल ने ले लिया है। इनका प्रभाव उतना नहीं हो सकता जो हाथ से लिखे हुए संदेशों या पत्रों का होता था। अच्छे विचारोत्तेजक एस.एम.एस. भी समय के साथ डिलीट हो जाते हैं। पर पत्र बरसों सम्हाले जाते थे। जो भावनाएँ हाथ से लिखे शब्दों से सम्प्रेषित होती है, वह टाइप किए हुए शब्दों से कभी नहीं हो सकती। हालाँकि उनका प्रभाव बोले हुए शब्दों से अधिक हो सकता है। अमेरिका की सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तक "सीक्रेट" में भी इच्छओं को पूर्ण करने के लिए लिखने के माध्यम का उपयोग करने की बात कही है। नेहरू जी द्वारा अपनी पुत्री को लिखे पत्रों ने इंदिराजी के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला था। श्री अरविंद अपने शिष्यों के योग और व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं का पत्रों के द्वारा उत्तर देते थे, आज उन पत्रों का संग्रह अमूल्य निधि है। इसी तरह गायत्री परिवार के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा द्वारा अपने शिष्यों को लिखे पत्र आज भी कई साधकों के लिए मार्गदर्शक बन जाते हैं।

पुरानी पीढ़ी के लोग इस विद्या का उपयोग सही समय पर करते थे। यह घटना पन्द्रह वर्ष पूर्व की है, मेरे भांजे को बारहवीं के पश्चात प्रतियोगी परिक्षा में सफलता नहीं मिली और वह बहुत निराश हो गया। दीदी ने फोन किया उसके नानाजी को कि आप उसे समझाएँ, मैं उसे आपके पास भेजा रही हूँ। नानाजी ने कहा भेजने की आवश्यकता नहीं है, मैं उसके नाम पत्र भेज रहा हूँ, उसे दे देना। पत्र प्राप्त होने के बाद उस बालक को उन लिखे शब्दों ने अदभुत शक्ति प्रदान की और उसने दुगने उत्साह से दूसरे क्षेत्र में प्रयास किए। आज वह एक सफल प्रबंधक है। वह चिट्ठी अभी तक उसके पास उसकी अमूल्य निधियों की तरह है। कई बातें जो हम किसी के समक्ष कह नहीं पाते लिखकर व्यक्त कर सकते हैं। सामान्यत: जब हम बातचीत करते हैं तो हम सुनने के बजाय हम जो कहना चाहते हैं, उस पर ध्यान देते हैं। संवाद होते हुए भी उद्देश्य पूरा नहीं होता। लिखे हुए शब्द जब हम पढते हैं तो उस समय प्रेषक समक्ष नहीं होता और हम तत्काल प्रतिक्रिया नहीं कर पाते। प्रतिक्रिया में बरता यही संयम रिश्तों को और समस्याओं को समझने का नया आयाम देता है। नैराश्य में डूबा व्यक्ति अपनों से बोलकर जितना अपने मन का बोझ कम कर सकता हैं, उससे अधिक लिख कर कर सकता हैं, फिर किसी और को लिखने की भी आवश्कता नहीं है। हम केवल अपने लिए लिख सकते हैं। खामोशी के साथ एकांत में लिखना विद्वता कहलाती है और बोलना पागलपन।


लिखने की आदत युवावस्था में संयमित जीवन के प्रशिक्षण के लिए भी कारगर है। बाहरवीं कक्षा पास करने के बाद घर से बहुत दूर पढ़ने जाना पड़ा। आर्थिक हालत बहुत अच्छे नहीं थे। जब मैंने पिता से प्रतिमाह कितने पैसे खर्चे के
लिए मिलेंगे यह प्रश्न किया, तो भावुक होकर उन्होंने कहा की कोई सीमा तय नहीं है परन्तु जितना खर्च करो उसे पूरी ईमानदारी से अपनी डायरी में प्रतिदिन लिखना, केवल अपने लिए, मुझे भी बताना आवश्यक नहीं है। उनके द्वारा दिए गया निर्देश आसान लगा पर जब भी कुछ खर्च करने का समय आता, तब यह भी ध्यान आ जाता की इसे लिखना भी होगा। बस सोच-समझकर खर्च करने की आदत अनजाने में लग गई। बिना किसी बड़े बंधन के और भाषण के इस तरह भी संस्कार डाले जा सकते हैं।

बोले हुए शब्द जहाँ हमारी ऊर्जा क्षय करते हैं, वहीं लिखे हुए शब्द हमारे विचारों को व्यवस्थित करते हैं और हमें उर्जित करते हैं। लिख कर आप अपने अनुभव दूसरों के साथ अपनी अनुपस्थिति में भी बाँट सकते हैं। लिखना-पढ़ना अकेलेपन के साथी हैं। खामोशी से जन्मे शब्द हैं। आज संवाद और संचार तो आसान हो गए हैं, लेकिन मन की दूरियाँ बढ़ गयी हैं। पहले हम पत्र की लिखावट से समझ लेते थे कि लिखने वाला किस भाव से पत्र लिख रहा है। बुकर अवार्ड विजेता किरण देसाई कहती हैं की "जब मैं लिखती हूँ तो घंटे चेतना की अवस्था में गुजर जाते हैं, मुझे लगता है, लोग ध्यान में भी यही अनुभव करते होंगे।" यह चिंता किए बगैर लिखे की यह गद्य है या पद्य, कहानी है या निबंध। यह भी सोचकर न लिखे कि लोग क्या कहेगे, मेरा लिखा हुआ प्रकाशित होगा या नहीं। श्री अरविंद का सावित्री महाकाव्य उनके जीवन काल में प्रकाशित नहीं हुआ। जबकि श्री अरविंद स्वयं उसे अपना सबसे बड़ा कार्य मानते थे।

हम संतुष्टि ढूढते हैं व्यवसाय में, नौकरी में, लेकिन वह वहाँ संभव नहीं है, क्योकि वहाँ स्वतंत्रता नहीं है। यह स्वतंत्रता ही हमें अध्यात्म और अपने आप से जोड़ती है। पुलित्जर पुरूस्कार विजेता गीता आनंद कहती हैं। "अपनी डायरी में लिखकर और अपनी डायरी के जरिए अपने अध्यात्मिक पक्ष से जुडती हूँ। " लेखन एक उत्कृष्ट सर्जन है, लेकिन किसी भी लेखक का यह दावा कि मेरे विचार पूर्णत: मौलिक हैं। स्वीकार्य नहीं है। दरअसल चेतना के विभिन्न स्तरों पर विचार इस वैश्व चेतना में व्याप्त हैं। लेखक जब उनके सम्पर्क में आता है तो वे विचार कागज़ पर आते हैं या यूं कहा जाए तो साहित्यिक स्वरूप लेखक द्वारा दिया जाता है। श्रीअरविंद की दृष्टी में तो विचार अंदर से नहीं बल्कि बाह्यजगत से भी आते है। बस निर्भर करता है कि लेखक चेतना के किस स्तर से जुड़ा है। थिओसोफीस्ट तो ये मानते हैं की सत्य उन्हें एलिअन गुरुदेव या मास्टर्स से प्राप्त हुए थे, जो महान आत्माएँ थी। उनसे प्राप्त सन्देश को ही थियोसोफिस्ट लेखकों ने शब्द प्रदान किए हैं। श्रीमाँ कहती हैं " विचारों का जगत सबका है। बौद्धिक शक्ति वैश्व शक्ति है। जो कहते हैं कि यह विचार मेरे हैं और यह सोचते हैं कि वे औरों को इसका लाभ उठाने देते हैं, यह उनकी भूल है। हाँ यह सच है कि कुछ लोग विचारों के क्षेत्र के साथ नाता जोड़ने और उसे सचेतन मस्तिष्क द्वारा प्रगट करने में ज्यादा समर्थ होते है। सर्जन के क्षेत्र में सौ प्रतिशत मौलिकता का आग्रह उचित नहीं है। हाँलाकि शाब्दिक अभिव्यक्ति की देन अपेक्षाकृत दुर्लभ होती है। कई सच ऐसे होते हैं, जो आदमी स्वयं से भी नहीं बोल पाता। रचनाशील प्रतिभा और मन: व्याधियों के बीच भी सुस्पष्ट सम्बन्ध है। उन्मादी अवसाद के समय ऊर्जा का अतिरिक्त संचार विचार प्रक्रिया को सघन बनाता है। उस समय रचनाकार की रचानाशीलता प्रखर हो सकती है, जबकि औसत व्यक्ति को यह सीमित बनाती है या आत्महंता।

लेखक का मौलिकता का दंभ और यह दावा कि मेरे लिखे हुए से समाज में क्रान्ति आ जाएगी दोनों ही बाते उसके लेखन के परिष्कृत होने के मार्ग में बाधा है। विख्यात साहित्यकार नरेंद्र कोहली कहते हैं कि "लेखक का लिखा हुआ राजा का आदेश नहीं है कि आज जारी हुआ और कल समाज बदल गया। साहित्य तो केवल संस्कार देता है और वह संस्कार ध्वनि की तरह वायुमंडल में गूँजते हैं। जब समाज को उसकी आवश्यकता होती हैं, वह उसे ग्रहण करता है, और समाज के लिए लागू करता है।" निबंधकार श्री नर्मदाप्रसाद उपाध्याय भी कहते हैं कि " अतिरंजना या अतिश्योक्ति तब होती है, जब शब्द नवीन से जुड़े न हों, जब रचनाकार यह मान लेता है कि जो कुछ भी उसने रचा है वह शाश्वत है, अनश्वर है। जब रचनाकार यह मान लेता है कि भले ही इस लोक से उसका संवाद न हो पर वह इसके परिमार्जन के उपाय सुझाएगा। इतिहास गवाह है कि इस तरह के रचनाकार समय के प्रवाह में विलीन हो जाया करते हैं। एक रचनाकार की सबसे बड़ी कसौटी उसकी विनम्रता है। कोइ सृजन, कोइ रचना धर्मिता तभी विकसित हो सकती है, जब उसके बीज रूप में कहीं न कहीं विनम्रता हो।"

हमारे जीवन में आई प्रत्येक मशीनी टेक्नोलॉजी हमारी कोई न कोई शारीरिक क्षमता कम कर देती है, टीवी, मोबाईल, कम्प्यूटर का उपयोग अवश्य करें पर अपने विचारों को, भावनाओं को, क्रोध को, खुशी को, यादों को बाहर लाने के लिए कोई न कोई तरीका अवश्य खोजें। आज आपकी सुनने कि किसी को फुर्सत नहीं है। इसलिए जुड़ जाए किसी सर्जन से। लेखन सबसे सुलभ सर्जन है। कहीं भी, कभी भी, जब भी कोई अच्छा विचार आप से होता हुए गुजरे, उसे सहेज लें। बस आपके पास होना चाहिए एक पेन और डायरी। लिखें और सर्वश्रेष्ठ लिखें ऐसा कि आप स्वयं अपने लिखे पर मोहित हो जाएँ। लिखें बिना किसी संकोच के, बिना किसी अहम के, बिना किसी अपेक्षा के, विनम्रता के साथ, सच्चाई के साथ क्योंकि यह सर्वश्रेष्ठ केथार्सिस भी है और स्वान्तः सुखाय भी
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