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तिल में किसने ताड़ छिपाया?

छिपा हुआ था जो कोने में,

शंका थी जिसके होने में,
वह बादल का टुकड़ा फैला, फैल समग्र गगन में छाया।
तिल में किसने ताड़ छिपाया?

पलकों के सहसा गिरने पर

धीमे से जो बिन्दु गए झर,
मैंने कब समझा था उनके अंदर सारा सिंधु समाया।
तिल में किसने ताड़ छिपाया?

कर बैठा था जो अनजाने,

या कि करा दी थी सृष्टा ने,
उस ग़लती ने मेरे सारे जीवन का इतिहास बनाया।
तिल में किसने ताड़ छिपाया?

---

हरिवंशराय बच्चन
 
bachpan mai padhi thi ye poem.achi lagti hai.

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला
सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ
आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही को भाड़े का
बच्चे की सुन बात, कहा माता ने 'अरे सलोने`
कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने
जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ
कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा
घटता-बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है
अब तू ही ये बता, नाप तेरी किस रोज लिवायें
सी दे एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आये!
 
A spiritual poem

खुशियों के श्रोत का उदगम बता दो,
जीवन में आनंद का संगम करा दो.
देह के आत्मा को तृप्त कर दे जो,
उस मूल्यवान वस्तु से मिलन करा दो.

तलाश में जिसके संतो के भक्ति लीन,

दार्शनिको के विचार जिस आस्था में विलीन.
कृष्ण राधा के प्रेम संबंधो का यकीन,
उनके बीच का वो अमर बंधन हसीन.

अरस्तु के चमत्कारिक ज्ञान का भंडार,

आइन्स्टीन के काया पलट खोजो का अम्बार.
मायकल एंजलो की प्रतिभाशाली कला,
महात्मा बुद्ध को जिस शक्ति से ज्ञान मिला.

क्रिस्त्लर की मधुर वो वायलिन की तान,

कबीर के गूढ़ रहस्यवादी दोहो की शान.
सेक्सपीअर की जग प्रसिद्ध कविताये,
वो प्रेरणा जिससे लिखी महान रचनाये.

खुशियों के श्रोत का उदगम बता दो,

जीवन में आनंद का संगम करा दो.
देह के आत्मा को तृप्त कर दे जो,
उस मूल्यवान वस्तु से मिलन करा दो
 
रात पर दीवा जलाना कब मना है ----हरिवंशराय बच्च

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था,
भावना के हाथ ने जिसमें वितानो को तना था,
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगो से, रसों से जो सना था,
ढह गया वह, तो जुटा कर ईंट, पत्थर, कंकडों को,
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है?
है अन्धेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?


बादलों के अश्रु से धोया गया नभनील नीलम,

का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम,
प्रथम ऊषा की नवेली लालिमा-सी लाल मदिरा,
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम,
वह अगर टूटा, हथेली हाथ की दोनो मिला कर,
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है?
है अन्धेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?


क्या घड़ी थी एक भी चिंता नहीं थी पास आई,

कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई,
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती,
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई,
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार माना,
पर अथिरता की समय पर मुस्कुराना कब मना है?
है अन्धेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?


हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा,

वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान मांगा
एक अंतर से ध्वनित हो दूसरे में जो निरन्तर,
भर दिया अंबर अवनि को मत्तता के गीत गा-गा,
अंत उनका हो गया, तो मन बहलाने के लिये ही,
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है?
है अन्धेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय, वे साथी की चुम्बक लौह से जो पास आए,

पास क्या आए, कि ह्र्दय के बीच ही गोया समाए,
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर,
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए,
वे गए, तो सोच कर ये लौटने वाले नहीं वे,
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है?
है अन्धेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?


क्या हवाएँ थी कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना,

कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना,
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका?
किंतु ऎ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना,
जो बसे हैं वे उजडते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजडे हुए को फिर बसाना कब मना है?
है अन्धेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?
 
Last edited:
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।
दीप, स्वयं बन गया शलभ अब जलते-जलते,
मंजिल ही बन गया मुसाफिर चलते-चलते,
गाते गाते गेय हो गया गायक ही खुद
सत्य स्वप्न ही हुआ स्वयं को छलते छलते,
डूबे जहां कहीं भी तरी वहीं अब तट है,
अब चाहे हर लहर बने मंझधार मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब पंछी को नहीं बसेरे की है आशा,

और बागबां को न बहारों की अभिलाषा,
अब हर दूरी पास, दूर है हर समीपता,
एक मुझे लगती अब सुख दुःख की परिभाषा,
अब न ओठ पर हंसी, न आंखों में हैं आंसू,
अब तुम फेंको मुझ पर रोज अंगार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब मेरी आवाज मुझे टेरा करती है,

अब मेरी दुनियां मेरे पीछे फिरती है,
देखा करती है, मेरी तस्वीर मुझे अब,
मेरी ही चिर प्यास अमृत मुझ पर झरती है,
अब मैं खुद को पूज, पूज तुमको लेता हूं,
बन्द रखो अब तुम मंदिर के द्वार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब हर एक नजर पहचानी सी लगती है,

अब हर एक डगर कुछ जानी सी लगती है,
बात किया करता है, अब सूनापन मुझसे,
टूट रही हर सांस कहानी सी लगती है,
अब मेरी परछाई तक मुझसे न अलग है,
अब तुम चाहे करो घृणा या प्यार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।
 
क्या क़ीमत है आज़ादी की
हमने कब यह जाना है
अधिकारों की ही चिन्ता है
फर्ज़ कहाँ पहचाना है

आज़ादी का अर्थ हो गया
अब केवल घोटाला है
हमने आज़ादी का मतलब
भ्रष्टाचार निकाला है

आज़ादी में खा जाते हम
पशुओं तक के चारे अब
‘हर्षद’ और ‘हवाला’ हमको
आज़ादी से प्यारे अब

आज़ादी के खेल को खेलो
फ़िक्सिंग वाले बल्लों से
हार के बदले धन पाओगे
‘सटटेबाज़ों’ दल्लों से

आज़ादी में वैमनस्य के
पहलु ख़ूब उभारो तुम
आज़ादी इसको कहते हैं?
अपनों को ही मारो तुम
आज़ादी का मतलब अब तो
द्वेष, घृणा फैलाना है ॥

आज़ादी में काश्मीर की
घाटी पूरी घायल है
लेकिन भारत का हर नेता
शान्ति-सुलह का कायल है
आज़ादी में लाल चौक पर
झण्डे फाड़े जाते हैं
आज़ादी में माँ के तन पर
चाक़ू गाड़े जाते है

आज़ादी में आज हमारा
राष्ट्र गान शर्मिन्दा है
आज़ादी में माँ को गाली
देने वाला ज़ीन्दा है

आज़ादी मे धवल हिमालय
हमने काला कर डाला
आज़ादी मे माँ का आँचल
हमने दुख से भर डाला

आज़ादी में कठमुल्लों को
शीश झुकाया जाता है
आज़ादी मे देश-द्रोह का
पर्व मनाया जाता है

आज़ादी में निज गौरव को
कितना और भुलाना है ?

देखो! आज़ादी का मतलब
हिन्दुस्तान हमारा है
 
तुम अपनी हो, जग अपना है
किसका किस पर अधिकार प्रिये
फिर दुविधा का क्या काम यहाँ
इस पार या कि उस पार प्रिये ।


देखो वियोग की शिशिर रात
आँसू का हिमजल छोड़ चली
ज्योत्स्ना की वह ठण्डी उसाँस
दिन का रक्तांचल छोड़ चली ।


चलना है सबको छोड़ यहाँ
अपने सुख-दुख का भार प्रिये,
करना है कर लो आज उसे
कल पर किसका अधिकार प्रिये ।


है आज शीत से झुलस रहे
ये कोमल अरुण कपोल प्रिये
अभिलाषा की मादकता से
कर लो निज छवि का मोल प्रिये ।


इस लेन-देन की दुनिया में
निज को देकर सुख को ले लो,
तुम एक खिलौना बनो स्वयं
फिर जी भर कर सुख से खेलो ।


पल-भर जीवन, फिर सूनापन
पल-भर तो लो हँस-बोल प्रिये
कर लो निज प्यासे अधरों से
प्यासे अधरों का मोल प्रिये ।


सिहरा तन, सिहरा व्याकुल मन,
सिहरा मानस का गान प्रिये
मेरे अस्थिर जग को दे दो
तुम प्राणों का वरदान प्रिये ।


भर-भरकर सूनी निःश्वासें
देखो, सिहरा-सा आज पवन
है ढूँढ़ रहा अविकल गति से
मधु से पूरित मधुमय मधुवन ।


यौवन की इस मधुशाला में
है प्यासों का ही स्थान प्रिये
फिर किसका भय? उन्मत्त बनो
है प्यास यहाँ वरदान प्रिये ।


देखो प्रकाश की रेखा ने
वह तम में किया प्रवेश प्रिये
तुम एक किरण बन, दे जाओ
नव-आशा का सन्देश प्रिये ।


अनिमेष दृगों से देख रहा
हूँ आज तुम्हारी राह प्रिये
है विकल साधना उमड़ पड़ी
होंठों पर बन कर चाह प्रिये ।


मिटनेवाला है सिसक रहा
उसकी ममता है शेष प्रिये
निज में लय कर उसको दे दो
तुम जीवन का सन्देश प्रिये ।


---- भगवतीचरण वर्मा
 
कल सहसा यह सन्देश मिला
सूने-से युग के बाद मुझे
कुछ रोकर, कुछ क्रोधित हो कर
तुम कर लेती हो याद मुझे ।


गिरने की गति में मिलकर
गतिमय होकर गतिहीन हुआ
एकाकीपन से आया था
अब सूनेपन में लीन हुआ ।


यह ममता का वरदान सुमुखि
है अब केवल अपवाद मुझे
मैं तो अपने को भूल रहा,
तुम कर लेती हो याद मुझे ।


पुलकित सपनों का क्रय करने
मैं आया अपने प्राणों से
लेकर अपनी कोमलताओं को
मैं टकराया पाषाणों से ।


मिट-मिटकर मैंने देखा है
मिट जानेवाला प्यार यहाँ
सुकुमार भावना को अपनी
बन जाते देखा भार यहाँ ।


उत्तप्त मरूस्थल बना चुका
विस्मृति का विषम विषाद मुझे
किस आशा से छवि की प्रतिमा !
तुम कर लेती हो याद मुझे ?


हँस-हँसकर कब से मसल रहा
हूँ मैं अपने विश्वासों को
पागल बनकर मैं फेंक रहा
हूँ कब से उलटे पाँसों को ।


पशुता से तिल-तिल हार रहा
हूँ मानवता का दाँव अरे
निर्दय व्यंगों में बदल रहे
मेरे ये पल अनुराग-भरे ।


बन गया एक अस्तित्व अमिट
मिट जाने का अवसाद मुझे
फिर किस अभिलाषा से रूपसि !
तुम कर लेती हो याद मुझे ?


यह अपना-अपना भाग्य, मिला
अभिशाप मुझे, वरदान तुम्हें
जग की लघुता का ज्ञान मुझे,
अपनी गुरुता का ज्ञान तुम्हें ।


जिस विधि ने था संयोग रचा,
उसने ही रचा वियोग प्रिये
मुझको रोने का रोग मिला,
तुमको हँसने का भोग प्रिये ।


सुख की तन्मयता तुम्हें मिली,
पीड़ा का मिला प्रमाद मुझे
फिर एक कसक बनकर अब क्यों
तुम कर लेती हो याद मुझे ?

--------- भगवतीचरण वर्मा
 
जम और जमाई ------ काका हाथरसी

बड़ा भयंकर जीव है , इस जग में दामाद
सास - ससुर को चूस कर, कर देता बरबाद
कर देता बरबाद , आप कुछ पियो न खाओ
मेहनत करो , कमाओ , इसको देते जाओ
कहॅं ‘ काका ' कविराय , सासरे पहुँची लाली
भेजो प्रति त्यौहार , मिठाई भर- भर थाली

लल्ला हो इनके यहाँ , देना पड़े दहेज

लल्ली हो अपने यहाँ , तब भी कुछ तो भेज
तब भी कुछ तो भेज , हमारे चाचा मरते
रोने की एक्टिंग दिखा , कुछ लेकर टरते
‘ काका ' स्वर्ग प्रयाण करे , बिटिया की सासू
चलो दक्षिणा देउ और टपकाओ आँसू

जीवन भर देते रहो , भरे न इनका पेट

जब मिल जायें कुँवर जी , तभी करो कुछ भेंट
तभी करो कुछ भेंट , जँवाई घर हो शादी
भेजो लड्डू , कपड़े, बर्तन, सोना - चाँदी
कहॅं ‘ काका ', हो अपने यहाँ विवाह किसी का
तब भी इनको देउ , करो मस्तक पर टीका

कितना भी दे दीजिये , तृप्त न हो यह शख़्श

तो फिर यह दामाद है अथवा लैटर बक्स ?
अथवा लैटर बक्स , मुसीबत गले लगा ली
नित्य डालते रहो , किंतु ख़ाली का ख़ाली
कहँ ‘ काका ' कवि , ससुर नर्क में सीधा जाता
मृत्यु - समय यदि दर्शन दे जाये जमाता

और अंत में तथ्य यह कैसे जायें भूल

आया हिंदू कोड बिल , इनको ही अनुकूल
इनको ही अनुकूल , मार कानूनी घिस्सा
छीन पिता की संपत्ति से , पुत्री का हिस्सा
‘ काका ' एक समान लगें , जम और जमाई
फिर भी इनसे बचने की कुछ युक्ति न पाई
 
जब शब्द पत्थर से हुए, आवाज़ कैसे दूँ तुम्हे ?

उम्र ढोने के लिए

कुछ साँस की सौगात ले
सुर्ख सूखी रेत बैठे
चिन्ह से जज़्बात ले
मैं जिया हूँ किस तरह ये राज़ कैसे दूँ तुम्हे ?
जब शब्द पत्थर से हुए, आवाज़ कैसे दूँ तुम्हे ?

मौन हो कुछ बात हो,

वाचालता से क्षुब्ध हूँ
डर नहीं है साँझ का
मैं भोर से विक्षुब्ध हूँ
बिफरते आकाश में परवाज कैसे दूँ तुम्हे ?
जब शब्द पत्थर से हुए, आवाज़ कैसे दूँ तुम्हे ?

मैं वही हूँ किन्तु मेरा,

वो नहीं चेहरा रहा,
दस्तकों पर दस्तकें थी,
किन्तु मैं बहरा रहा,
दहकते माहौल का अन्दाज़ कैसे दूँ तुम्हे ?
जब शब्द पत्थर से हुए, आवाज़ कैसे दूँ तुम्हे ?

कौन जाने किस तरह से,

तय हुआ अब तक सफर,
कौन-सा वह आइना था,
जिसका मैं था रहगुज़र
द्वंद्व से व्याकुल समय का साज़ कैसे दूँ तुम्हे ?
जब शब्द पत्थर से हुए, आवाज़ क़ैसे दूँ तुम्हे ?

प्यास से व्याकुल नदी के,

कुछ मुहाने पास है,
या समझ लो मेरे जग का
अनकहा इतिहास है,
कल तो कल है, कल का क्या? मैं 'आज' कैसे दूँ तुम्हे?
जब शब्द पत्थर से हुए, आवाज़ कैसे दूँ तुम्हे ?



-----बुलाकी दास बावरा
 
एक सुनील जोशी जी की कविता है ....

मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम एम. ए. फ़र्स्ट डिवीजन हो, मैं हुआ मैट्रिक फ़ेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम फौजी अफ़्सर की बेटी, मैं तो किसान का बेटा हूँ ।
तुम रबडी खीर मलाई हो, मैं सत्तू सपरेटा हूँ ।
तुम ए. सी. घर में रहती हो, मैं पेड के नीचे लेटा हूँ ।
तुम नयी मारूती लगती हो, मैं स्कूटर लम्बरेटा हूँ ।
इस कदर अगर हम छुप-छुप कर, आपस मे प्रेम बढायेंगे ।
तो एक रोज़ तेरे डैडी अमरीश पुरी बन जायेंगे ।
सब हड्डी पसली तोड मुझे, भिजवा देंगे वो जेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम अरब देश की घोडी हो, मैं हूँ गदहे की नाल प्रिये ।
तुम दीवली क बोनस हो, मैं भूखों की हडताल प्रिये ।
तुम हीरे जडी तश्तरी हो, मैं एल्मुनिअम का थाल प्रिये ।
तुम चिकेन-सूप बिरयानी हो, मैन कंकड वाली दाल प्रिये ।
तुम हिरन-चौकडी भरती हो, मैं हूँ कछुए की चाल प्रिये ।
तुम चन्दन-वन की लकडी हो, मैं हूँ बबूल की चाल प्रिये ।
मैं पके आम सा लटका हूँ, मत मार मुझे गुलेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

मैं शनि-देव जैसा कुरूप, तुम कोमल कन्चन काया हो ।
मैं तन-से मन-से कांशी राम, तुम महा चन्चला माया हो ।
तुम निर्मल पावन गंगा हो, मैं जलता हुआ पतंगा हूँ ।
तुम राज घाट का शान्ति मार्च, मैं हिन्दू-मुस्लिम दन्गा हूँ ।
तुम हो पूनम का ताजमहल, मैं काली गुफ़ा अजन्ता की ।
तुम हो वरदान विधाता का, मैं गलती हूँ भगवन्ता की ।
तुम जेट विमान की शोभा हो, मैं बस की ठेलम-ठेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम नयी विदेशी मिक्सी हो, मैं पत्थर का सिलबट्टा हूँ ।
तुम ए. के.-४७ जैसी, मैं तो इक देसी कट्टा हूँ ।
तुम चतुर राबडी देवी सी, मैं भोला-भाला लालू हूँ ।
तुम मुक्त शेरनी जंगल की, मैं चिडियाघर का भालू हूँ ।
तुम व्यस्त सोनिया गाँधी सी, मैं वी. पी. सिंह सा खाली हूँ ।
तुम हँसी माधुरी दीक्षित की, मैं पुलिसमैन की गाली हूँ ।
कल जेल अगर हो जाये तो, दिलवा देन तुम बेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

मैं ढाबे के ढाँचे जैसा, तुम पाँच सितारा होटल हो ।
मैं महुए का देसी ठर्रा, तुम रेड-लेबल की बोतल हो ।
तुम चित्रहार का मधुर गीत, मैं कॄषि-दर्शन की झाडी हूँ ।
तुम विश्व-सुन्दरी सी कमाल, मैं तेलिया छाप कबाडी हूँ ।
तुम सोनी का मोबाइल हो, मैं टेलीफोन वाला हूँ चोंगा ।
तुम मछली मानसरोवर की, मैं सागर तट का हूँ घोंघा ।
दस मन्ज़िल से गिर जाउँगा, मत आगे मुझे ढकेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम सत्ता की महरानी हो, मैं विपक्ष की लाचारी हूँ ।
तुम हो ममता-जयललिता सी, मैं क्वारा अटल-बिहारी हूँ ।
तुम तेन्दुलकर का शतक प्रिये, मैं फ़ॉलो-ऑन की पारी हूँ ।
तुम गेट्ज़, मटीज़, कोरोला हो, मैं लेलैन्ड की लॉरी हूँ ।
मुझको रेफ़री ही रहने दो, मत खेलो मुझसे खेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

मैं सोच रहा कि रहे हैं कब से, श्रोता मुझको झेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।
 
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Gulzar's deep touching poem that focuses on emotional importance of the Books n' nostalgia attached with and also depicts how computer is killin' the Books n' their Beauty. Simply awesome! ..



किताबें - गुलज़ार

किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें इनकी सोहबत में कटा करती थी
अब अकसर ..
गुजर जाती है कंप्यूटर के परदे पर

बड़ी बैचेन रहती हैं किताबें
इन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गयी है
बड़ी हसरत से तकती हैं

जो कदरें वो सुनाती थीं
की जिन के सेल कभी मरते नहीं थे
वो कदरें अब नज़र आती नहीं घर में
जो रिश्ते सुनाती थीं
वोह सारे उधडे उधडे हैं

कोई सफहा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के माने गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे तुंड लगते हैं वो सब अलफ़ाज़

जिन पर अब कोई माने नहीं उगते
बहुत सी इस्तलाहें हैं
जो मिट्टी के सिकोरों की तरह बिखरी पडी हैं
गिलासों ने उन्हें मतरूक कर डाला

जुबां पर जाइका आता था जो सफ़हे पलटने का
अब उंगली क्लिक करने से बस इक
झपकी गुजरती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर

किताबो से जो जाती राबता था, कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे
कभी गोदी में ले लेते
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बना कर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छुते थे ज़बीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबो में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
क़िताबे मांगने, गिरने, उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा ?
वो शायद अब नहीं होंगे ..


For the vdo of recite by himself, click - http://www.youtube.com/watch?v=tfJdEtiLZ5c




Cheers
Jit
 
Bachpan bahut hi naughty hota hai.1-1 baat yaad rahti hai bachpan ki.enjoy this poem.1` baar fir se unhi dino mai kho jaoge.


पुरानी शिला के नीचे से निकल आती
बिच्छू-सी
अवचेतन में मारती हुई डंक
स्मृतियाँ बार-बार लौटती हैं
टहलते हुए निकल जाते हैं उनमें
दोहराते हुए घटनाओं को
बहुत सारा समय
थोड़ी देर में घूम जाता है भीतर

बचपन का वह मसूम चेहरा
पीछे छिपा शरारत भरा दिमाग़
फ़ज़ीहत रास्ते चलतों की
मनोरंजन हुआ करती हमारे लिए
तैर आती हैं घटनाएँ
अपनी शरारतों पर
बचपन की हँसी चेहरे के परदे पीछे

श्रेणियाँ हुआ करती थीं हमारी
जो तय होती थीं कारस्तानियों की बिना पर
अध्यापकों की छड़ियाँ
जानती थीं हमारे हाथों का स्वाद
उन छड़ियों का स्वाद
हमारे सभ्य होने के पीछे खड़ा है

स्मृतियाँ पीछा नहीं छोड़तीं
पड़ जाती हैं छड़ी लेकर पीछे
और हमें करनी पड़ती है याद
पहाड़ों, प्रश्नोत्तरों की तरह आज भी
वे बना लेती हैं जगह

स्मृति में माफ़ करते हैं
बचपन की शैतानियों को
कचोटने लगती हैं
इस समय की ऎसी घटनाएँ
जो तैयार होती हैं समझ के घालमेल से
स्मृतियाँ हैं ये भी
जिन्हें भुलाना हमारे वश का नहीं होता

हमारे भीतर स्मृतियों के लिए होती है बहुत सारी जगह।
 
तुम हो मेरे पास निरंतर फिर यह अंतर क्या है?
जो न मुझे मिलने देता तुमसे जीवन-भर क्या है?

यद्यपि मन में मुस्काते हो

सम्मुख कभी नहीं आते हो
मुझे निरंतर भटकाते हो
जिस सुषमा के मोहजाल में बाहर-बाहर क्या है?

कभी रात के शेष प्रहर में
लगता है आये तुम घर में
कहो न चाहे कुछ उत्तर में
किन्तु स्पर्श-सा लगता जो अंगों में थर-थर क्या है?

एक लक्ष्य है, एक किनारा
कब होता पर मिलन हमारा!
मैं बहता जल हूँ तुम धारा
प्राणों का सम्बन्ध हमारा कुछ तो है पर क्या है?

तुम हो मेरे पास निरंतर फिर यह अंतर क्या है?

जो न मुझे मिलने देता तुमसे जीवन-भर क्या है?
 
सबके अपने अपने दुःख हैं सबकी अपनी एक सफाई
जिसके मन के छाले फूटे वो ही समझे पीर पराई

आँखे फेर ली लहजा बदला दामन झटका भाग लिए

यारों खुद से खुद लड़ना है अपने खातिर आप लड़ाई

पथरीली धरती भी अपनी सपनीला आकाश भी अपना

जख्म भी अपने मरहम अपना खुद की खुद के पास दवाई

बाजू अपने गर्दन अपनी मुद्दे अपने कूवत अपनी

गीत भी अपने दर्द भी अपना भीड़ भरी अपनी तनहाई

बढ़ा शिखर पर मारी ठोकर पायदान को तोड़ दिया

जीवन की शतरंज में उसने कभी आज तक मात न खाई

खत्म करो ये किस्सा गोई, ये लफ्फाजी बंद करो

किसने चैन दिनों का खोया किसने अपनी नींद गवाई
 
मेरे अंदर कुछ है ------ मोहन कुमार डहेरिया

मेरे अन्दर कुछ है
चुभता फाँस-सा करता अस्थिर, बेचैन


कुछ यात्राएँ अधूरी उकसाती बार-बार
जीवन से बाहर हो गया कोई मूल्य
खड़े होने की कोशिश कर रहा एक कुचला हुआ शब्द
गुँथ गये हैं आपस में विचार
या कैशोर्य में पहले प्रेम के पकड़े जाने पर
पिताजी की बेतों की मार
टीस-टीस उठती वह


मैं समझ नहीं पाता
क्या है मेरे अन्दर
जन्म से ही साथ-साथ
या अटक गया टूटे पत्ते-से आकर


जीवन के जिस पड़ाव पर हूँ फिलहाल
बढ़ती ही जा रही गालों की सुर्खी
शेयरों में सुरक्षित है भविष्य
ऐसे में अपने अन्दर कुछ होने की बात करना
बेशर्मी की हद नहीं तो क्या !
सुनाई देती हैं पर मुझे अजीब-सी आवाजें
जलने और न जलने की दुविधा में
खदबदा रही जैसे चूल्हे में लकड़ी गीली


होता नहीं मन में विश्वास
जिया मैंने तो इस तरह जीवन
रखता चीजों के तापमान पर नजर चौकन्नी
रहा हर जुलूस में पंक्तिबद्ध अनुशासित
त्रासदी हो कितनी ही दारुण
संयम, शालीनता के अन्दर रही करुणा
नहीं खोदी खन्दकें
न गुजारे शरणार्थी कैप्पों में दिन
बावजूद इसके हो रही ये कैसी गड़बड़
चलता हूँ तो लगता है
कर रहा कोई दबे पाँव पीछा
एक अज्ञात दिशा की तरफ बार-बार संकेत करते हाथ
जारी नहीं मेरे नाम पर जबकि कोई फतवा


कुछ-न-कुछ है मेरे अन्दर
भटक गया है भीतर के बीहड़ में कोई परिन्दा
बढ़ रही धीरे-धीरे ऊब की लकीर
कूट रहा स्मृतियों को शायद कोई मूसल
दे रही मौत अपना आभास
या प्रकाशमान हो उठा अन्दर साक्षात् ईश्वर
स्वीकारना चाह रही कुछ जिसके सामने आत्मा


खँगालता हूँ बार-बार सारे संस्कार
इतिहास में लगाता छलाँगें लम्बी
पता नहीं लग पाता कहाँ है दरअसल वह
आप भले ही कहें इस संवेदनशीलता की अतिरिक्तता
या जीवनबोध की विद्रूपता
महसूस नहीं होती दोस्तों से मिलने में ज़रा भी ऊष्मा
रखता हूँ जहाँ-जहाँ होंठ
खरोंचों से भर जाती पत्नी की देह
यहाँ तक आ पहुँचे अब तो हालात
अपनी विराटता में भी सन्तुष्ट नहीं कर पाती चीजें
मेरी प्यास के ऊपर से गुजर जाती है बरसात
मेरे विलाप को नहीं पहचानता मेरा दुख


कहीं ऐसा तो नहीं
उत्कर्ष पर पहुँच गयी हो मेरी द्वन्द्वात्मकता
कोई नये ढंग का शोर है यह
या हदों को पार कर जाता सन्नाटा
होता ऐसे ही मुखर


मैं जानता हूँ
नहीं होगा आपको विश्वास
होती है महान उड़ानों में जैसे-हल्की-सी लड़खड़ाहट
मेरे अन्दर भी कुछ है
 
veer ras ki bahut hi achi kavita hai..specialy highlighted lines.

प्राण अन्तर में लिये, पागल जवानी !
कौन कहता है कि तू
विधवा हुई, खो आज पानी?

चल रहीं घड़ियाँ,
चले नभ के सितारे,
चल रहीं नदियाँ,
चले हिम-खंड प्यारे;
चल रही है साँस,
फिर तू ठहर जाये?
दो सदी पीछे कि
तेरी लहर जाये?

पहन ले नर-मुंड-माला,
उठ, स्वमुंड सुमेस्र् कर ले;
भूमि-सा तू पहन बाना आज धानी
प्राण तेरे साथ हैं, उठ री जवानी!

द्वार बलि का खोल
चल, भूडोल कर दें,
एक हिम-गिरि एक सिर
का मोल कर दें
मसल कर, अपने
इरादों-सी, उठा कर,
दो हथेली हैं कि
पृथ्वी गोल कर दें?

रक्त है? या है नसों में क्षुद्र पानी!
जाँच कर, तू सीस दे-देकर जवानी?

वह कली के गर्भ से, फल-
रूप में, अरमान आया!
देख तो मीठा इरादा, किस
तरह, सिर तान आया!
डालियों ने भूमि स्र्ख लटका
दिये फल, देख आली !
मस्तकों को दे रही
संकेत कैसे, वृक्ष-डाली !

फल दिये? या सिर दिये?त तस्र् की कहानी-
गूँथकर युग में, बताती चल जवानी !

श्वान के सिर हो-
चरण तो चाटता है!
भोंक ले-क्या सिंह
को वह डाँटता है?
रोटियाँ खायीं कि
साहस खा चुका है,
प्राणि हो, पर प्राण से
वह जा चुका है।

तुम न खोलो ग्राम-सिंहों मे भवानी !
विश्व की अभिमन मस्तानी जवानी !

ये न मग हैं, तव
चरण की रखियाँ हैं,
बलि दिशा की अमर
देखा-देखियाँ हैं।
विश्व पर, पद से लिखे
कृति लेख हैं ये,
धरा तीर्थों की दिशा
की मेख हैं ये।

प्राण-रेखा खींच दे, उठ बोल रानी,
री मरण के मोल की चढ़ती जवानी।

टूटता-जुड़ता समय
`भूगोल' आया,
गोद में मणियाँ समेट
खगोल आया,
क्या जले बारूद?-
हिम के प्राण पाये!
क्या मिला? जो प्रलय
के सपने न आये।
धरा?- यह तरबूज
है दो फाँक कर दे,

चढ़ा दे स्वातन्त्रय-प्रभू पर अमर पानी।
विश्व माने-तू जवानी है, जवानी !

लाल चेहरा है नहीं-
फिर लाल किसके?
लाल खून नहीं?
अरे, कंकाल किसके?
प्रेरणा सोयी कि
आटा-दाल किसके?
सिर न चढ़ पाया
कि छाया-माल किसके?


वेद की वाणी कि हो आकाश-वाणी,
धूल है जो जग नहीं पायी जवानी।

विश्व है असि का?-
नहीं संकल्प का है;
हर प्रलय का कोण
काया-कल्प का है;
फूल गिरते, शूल
शिर ऊँचा लिये हैं;
रसों के अभिमान
को नीरस किये हैं।

खून हो जाये न तेरा देख, पानी,
मर का त्यौहार, जीवन की जवानी।



-----माखनलाल चतुर्वेदी
 
नित्यानन्द तुषार

1.
मैंने कुछ समझा नहीं था ,तुमने कुछ सोचा नहीं
वरना जो कुछ भी हुआ है ,वो कभी होता नहीं

उससे मैं यूँ ही मिला था सिर्फ मिलने के लिए

उससे मिलकर मैंने जाना, उससे कुछ अच्छा नहीं

आप मानें या न मानें मेरा अपना है यक़ीन

ख़ूबसूरत ख्व़ाब से बढ़कर कोई धोखा नहीं

जाने क्यूँ मैं सोचता हूँ उसको अब भी रात दिन

मेरी ख़ातिर जिसके दिल में प्यार का जज़्बा नहीं

मेरी नज़रों से जुदा वो मेरे दिल में है 'तुषार'

वो मेरा सब कुछ मैं जिसकी सोच का हिस्सा नहीं


2.
मेरा अपना ये अनुभव है इसे सबको बता देना
हिदायत से तो अच्छा है किसी को मशवरा देना

अभी हम हैं, हमारे बाद भी होगी, हमारी बात
कभी मुमकिन नहीं होता किसी को भी मिटा देना

नई दुनिया बनानी है, नई दुनिया बसाएँगे
सितम की उम्र छोटी है जरा उनको बता देना

अगर कुछ भी जले अपना बड़ी तकलीफ़ होती है
बहुत आसान होता है किसी का घर जला देना

मेरी हर बात पर कुछ देर तो वो चुप ही रहता है
मुझे मुश्किल में रखता है फिर उसका मुस्करा देना

'तुषार' अच्छा है अपनी बात को हम खुद़ ही निपटा लें
ज़माने की है आदत सिर्फ शोलों को हवा देना
 
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

नभ में घिरती मेघ-मालिका,
पनघट-पथ पर विरह गीत जब गाती कोई कृषक बालिका !
तब मैं भी अपने भावों के पिंजर खोल उड़ाता हूँ !
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

जब सावन की रिमझिम बूँदें,
आती है हरिताभ धरा पर, गीति है पलकों को मूंदे !
धूमिल मेघों में तब मैं पदचाप किसी की सुन पाता हूँ !
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

आँधी में उड़ जाता है मन,
पथिक-पिया के विरह-गीत से गुंजित होते शैल-शिखर-वन !
अपने गीतों की पंखुड़ियाँ, अन्तरिक्ष में छितराता हूँ !
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

चंदा के दर्पण में आकर,
निशा झाँकती है निज यौवन तारों का शृंगार सजाकर !
तब छंदों में बाँध गगन से, स्वप्न-कुमारों को लाता हूँ !
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

-----मनुज देपावत
 
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