Hindi Kavita

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बड़ा भोला बड़ा सादा बड़ा सच्चा है।
तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है॥

वहां मैं मेरे बाप के नाम से जाना जाता हूँ।
और यहाँ मकान नंबर से पहचाना जाता हूँ॥

वहां फटे कपड़ो में भी तन को ढापा जाता है।
यहाँ खुले बदन पे टैटू छापा जाता है॥

यहाँ कोठी है बंगले है और कार है।
वहां परिवार है और संस्कार है॥

यहाँ चीखो की आवाजे दीवारों से टकराती है।
वहां दुसरो की सिसकिया भी सुनी जाती है॥

यहाँ शोर शराबे में मैं कही खो जाता हूँ।
वहां टूटी खटिया पर भी आराम से सो जाता हूँ॥

मत समझो कम हमें की हम गाँव से आये है।
तेरे शहर के बाज़ार मेरे गाँव ने ही सजाये है॥

वह इज्जत में सर सूरज की तरह ढलते है।
चल आज हम उसी गाँव में चलते है.....
........ उसी गाँव में चलते॥
 
शहरीकरण के भूत ने, मंहगाई की भूख ने, सरकार की लूट ने
सांचा बदल दिया...
हँसते-डोलते गाँव का ढांचा बदल दिया।

आह! वो उल्लास के दिन, तंगी में भी बेहद उन्माद के दिन, वो मिलना-मिलाना
भाईचारा सदभाव का रस....
कठिन परिश्रम, शांति और प्रेम में
डूबा रहता था गाँव बरबस

अब याद आता है, रह-रह के वो बचपन
जब आस पड़ोस से निकलता था चुल्हे का धुंआ
मां देती थी उपला, और कहती चाची से, जरा सी आग लेके आ।
पड़ोस की दादी भी आती, कहती, दुल्हन जरा सा देना धनिया।

तब पूरा गाँव एक परिवार होता था, अलग ही रास होता था
गाँव मैं बधुत्व था, आपसी सहयोग का वास होता था।

नौजवान भागे शहर कमाने को
पेट में दाना, घर मैं सुख -धन लाने को
कभी कहा जाता रहा होगा, भारत गाँवों को देश
अब सरकार ने भी बदल दिया यह अभिलेख
संयुक्त परिवार का क्या कहे भाई
अब तो परदेशी हो गया माँ का सपूत
वाह रे शहरीकरण का भूत॥
 
Last edited:
तुम मुझे दुख-दर्द की सारी विकलता सौंप देना,
मैं घने अवसाद में अपनी सफलता खोज लूँगा!

मैं सफ़र में चल पड़ा हूँ,
दूर जाऊँगा समझ लो।
व्यर्थ है आवाज़ देना,
आ न पाऊँगा समझ लो।
जोगियों से मन लगाना,
छोड़ दो मुझको बुलाना।
राह में दुश्वारियाँ हो. . . मैं सरलता खोज लूँगा,
मैं घने अवसाद में अपनी सफलता खोज लूँगा!

एक रचनाकार हूँ,
निर्माण करने में लगा हूँ।
मैं व्यथा का सोलहों-
सिंगार करने में लगा हूँ।
यह कठिन है काम लेकिन,
श्रम अथक अविराम लेकिन।
इस थकन में ही सृजन की मैं सबलता खोज लूँगा।
मैं घने अवसाद में अपनी सफलता खोज लूँगा!

फूल की पंखुड़ियों पर,
चैन से तुम सो न पाए।
जग तुम्हारा हो गया पर,
तुम किसी के हो न पाए।
तुम अधर की प्यास दे दो,
या सुलगती आस दे दो।
मैं हृदय की फाँस में अपनी तरलता खोज लूँगा,
मैं घने अवसाद में अपनी सफलता खोज लूँगा!

रात काली है मगर यह,
और गहरी हो न जाए।
फिर तुम्हारी चेतनायें,
शून्य होकर खो न जाए।
इसलिए मैं फिर खड़ा हूँ,
स्याह रातों से लड़ा हूँ।
मैं तिमिर में ही कहीं, सूरज निकलता खोज लूँगा।
मैं घने अवसाद में अपनी सफलता खोज लूँगा!
 
एक आदमी ने धरती से किया प्रस्थान
यमराज के कक्ष में घड़ियाँ देखकर रह गया हैरान
हर देश की अलग घड़ी थी, कोई छोटी कोई बड़ी थी
कोई दौड़ रही, कोई थी बंद, कोई तेज, कोई थी मंद
उनकी अलग अलग रफ़्तार देखकर आदमी चकराया
उसने कारण पूछा, तो यमराज ने बताया
हर घडी की उसी हिसाब से है रफ़्तार
जिस हिसाब से हो रहा है उस देश में भ्रष्टाचार
आदमी ने चारो तरफ नज़र दौड़ायी
लेकिन भारत की घडी कहीं भी नज़र नहीं आयी
आदमी मुस्कुराया, यमराज के कान में फुस्फुसाया
भारत वाले भ्रष्टाचार यहाँ भी ले आये
सच - सच बताओ, घडी न रखने के कितने पैसे खाए
यमराज बोले, तेरे शक की सुई तो बिना बात उछल रही है
मेरे बेडरूम में जाकर देखो, पंखे की जगह भारत की घडी चल रही है

(Copied)
 
गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है ।


कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ, तुम मिल गई
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ,
राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है ।



जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी
आशा निराशा से घिरा,
हँसता कभी रोता कभी
गति-मति न हो अवरूद्ध,
इसका ध्यान आठो याम है,
चलना हमारा काम है ।



इस विशद विश्व-प्रहार में
किसको नहीं बहना पडा
सुख-दुख हमारी ही तरह,
किसको नहीं सहना पडा
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ,
मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है ।



मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोडा अटकता ही रहा
निराशा क्यों मुझे?
जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है ।



साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
गति न जीवन की रूकी
जो गिर गए सो गिर गए
रहे हर दम,
उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है ।



फकत यह जानता
जो मिट गया वह जी गया
मूंदकर पलकें सहज
दो घूँट हँसकर पी गया
सुधा-मिक्ष्रित गरल,
वह साकिया का जाम है,
चलना हमारा काम है ।

----- शिवमंगल सिंह 'सुमन'
 
kal kuchh frnd mere dharmik vishwaso par ungli utha rahe the .tab unhe ye kavita sunayi thi..hope karta hu ki aap sabko bhi achi lagegi..


मैं कभी मंदिर न जाता
और न चन्दन लगाता,
मंदिरों-से लोग मिल जाते जहां पर
बस वहीं पर सिर झुकाता
देर थोड़ी बैठ जाता
मुस्कुराता, गुनगुनाता, गीत गाता |

जिनके होठों पर हमेशा
प्रेम के हैं फूल खिलते
देख जिनको हैं हृदय में
प्रार्थना के दीप जलते
स्नेह, करुणा से भरी जो आत्मा
हैं हमारे वास्ते परमात्मा
मैं कभी गीता न पढता
और न ही श्लोक रटता
कृष्ण-से कुछ लोग मिल जाते जहां पर
बस वहीँ पर सिर झुकाता
देर थोड़ी बैठ जाता
मुस्कुराता,गुनगुनाता, गीत गाता |

जिनकी आहट से सदा
मिलती हमें ताजी हवा
दृष्टि जिनकी उलझनों के
मर्ज की प्यारी दवा,
इंसान के दिल में जहाँ
इंसान का सम्मान है
सच कहूँ मेरे लिए
वह दृश्य चरों धाम हैं,
मैं न रामायण ही पढता
और न धुनी रमाता
राम-से कुछ लोग
मिल जाते जहाँ पर
बस वहीं पर सिर झुकाता
देर थोड़ी बैठ जाता
मुस्कुराता, गुनगुनाता, गीत गाता |


वेद की बातें समझ में हैं नहीं आतीं
चर्चा पुराणों की तसल्ली दे नहीं पातीं
देश –दुनिया के लिए जो जिंदगी
बस उन्ही के ही लिए ये बंदगी
मैं कभी काशी न जाता
और न गंगा नहाता
लोग गंगाजल सदृश मिलते जहाँ पर
बस वहीं पर सिर झुकाता
देर थोडी बैठ जाता
शब्द-गंगा में नहाता
मुस्कुराता, गुनगुनाता, गीत गाता |
 
मैं कहता हूँ चीज पुरानी घर के अंदर मत रखो
वो कहती है कौन जानता बादल कब घिर आ जाये |

कभी तो बूढी माँ बन जाती, डाट-डपट भी करती है
छोटी बहन कभी बन जाती, छीन-झपट भी करती है
कभी मित्र बन बातें करती, हँसती और हँसाती है
कभी बहाने कोई ढूढकर रोती और रुलाती है

मैं कहता हूँ बात पुरानी मन के अंदर मत रखो
वो कहती है कौन जानता, काम वक्त पर आ जाये |

दो युग बीत गये हैं उनके साथ-साथ चलते-चलते
कितने दिन और कितनी रातें साथ बात करते-करते
मस्त रहा हूँ मैं चलनी में पानी बस भरते-भरते
मगन रही है वो चावल में कंकड कुछ चुनते-चुनते

मैं कहता हूँ दर्द पुराना तन के अंदर मत रखो
वो कहती है कौन जानता दर्द दवा ही बन जाये |

हाय, नहीं पहचान सके हम एक दूसरे को अब भी
कभी-कभी सोचा करता हूँ बैठ अकेले में अब भी
जीवन के सारे दुःख-सुख का जोड़ शून्य ही होता है
पता नहीं फिर क्यों मानव अपनी किस्मत पर रोता है

मैं कहता हूँ दृष्टि पुरानी अपने अंदर मत रखो
वो कहती है कौन जानता कब क्या किसको भा जाये |
 
मेरी प्यारी गुडिया

तेरी प्यारी बाते सुनके
मिट जाती मेरी थकान |
मेरी प्यारी गुडिया तू है
अपने पापा कि जान ||
छोटी -२ उंगलियों से
पकड़ के मेरा हाथ |
मुझसे कहती पापा तुम
मुझे भी ले चलो साथ ||
रोज मेरे आने पर
भाग कर दरवाजा खोलती |
आँखों से कर लेती बाते
मुह से कुछ ना बोलती ||
रोज मुझसे कहती
पापा ऑफिस क्यों जाते हो |
जब आप चले जाते हो तो
मुझे याद बहुत आते हो ||
नन्हे नन्हे पैरो से
सारे घर मे वो भागे |
तुझे पकड़ने को दोडू
पर तू रहे हमेशा आगे ||
रोज तू मुझसे पूछे
ना जाने कितने सवाल |
जवाब देते देते मेरा भी
हो जाता है बुरा हाल ||
बाय करे मुझसे ओर कहे
पापा जल्दी आना |
पर आते हुए आप मेरी
चोकलेट जरुर ले आना ||
कभी अगर हो उदास तू
घर मे सन्नाटा छा जाए |
सब कुछ लगे सूना सूना
किसी को कुछ ना भाए ||
तेरे मासूम से चेहरे पर
सदा खिली रहे मुस्कान |
मेरी प्यारी गुडिया तू है
अपने पापा कि जान ||
-संदीप
 
[h=5]अब मैं राशन की कतारों में नजर आता हूँ
अपने खेतो से बिछड़ने की सजा पाता हूँ

इतनी महंगाई में बाज़ार से कुछ लाता हूँ
अपने बच्चों में उसे बाँट के शर्माता हूँ

अपनी नींदों का लहू पोंछने की कोशिश में
जागते जागते थक जाता हूँ सो जाता हूँ

कोई चादर समझ के खींच न ले फिर से कहीं
मैं कफ़न ओड़ के फुटपाथ पे सो जाता हूँ ...

लहलहाते खेतो में चमकता था जुगनु की तरह
अब मैं बुझे चिराग सा नजर आताहूँ ...

[/h]
 
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।
तुम एम. ए. फ़र्स्ट डिवीजन हो, मैं हुआ मैट्रिक फ़ेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम फौजी अफ़्सर की बेटी, मैं तो किसान का बेटा हूँ ।
तुम रबडी खीर मलाई हो, मैं सत्तू सपरेटा हूँ ।
तुम ए. सी. घर में रहती हो, मैं पेड के नीचे लेटा हूँ।
तुम नयी मारूती लगती हो, मैं स्कूटर लम्बरेटा हूँ।
इस कदर अगर हम छुप-छुप कर, आपस मे प्रेम बढायेंगे ।
तो एक रोज़ तेरे डैडी अमरीश पुरी बनजायेंगे ।
सब हड्डी पसली तोड मुझे, भिजवा देंगे वो जेलप्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम अरब देश की घोडी हो, मैं हूँ गदहे की नाल प्रिये ।
तुम दीवली क बोनस हो, मैं भूखों की हडताल प्रिये ।
तुम हीरे जडी तश्तरी हो, मैं एल्मुनिअम का थाल प्रिये ।
तुम चिकेन-सूप बिरयानी हो, मैन कंकड वाली दाल प्रिये ।
तुम हिरन-चौकडी भरती हो, मैं हूँ कछुए की चाल प्रिये ।
तुम चन्दन-वन की लकडी हो, मैं हूँ बबूल की चाल प्रिये ।
मैं पके आम सा लटका हूँ, मत मार मुझे गुलेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

मैं शनि-देव जैसा कुरूप, तुम कोमल कन्चन काया हो ।
मैं तन-से मन-से कांशी राम, तुम महा चन्चला माया हो ।
तुम हो पूनम का ताजमहल, मैं काली गुफ़ा अजन्ता की ।
तुम हो वरदान विधाता का, मैं गलती हूँ भगवन्ता की ।
तुम जेट विमान की शोभा हो, मैं बस की ठेलम-ठेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेलप्रिये ।

तुम नयी विदेशी मिक्सी हो, मैं पत्थर का सिलबट्टा हूँ ।
तुम ए. के.-४७ जैसी, मैं तो इक देसी कट्टा हूँ।
तुम चतुर राबडी देवी सी, मैं भोला-भाला लालू हूँ ।
तुम मुक्त शेरनी जंगल की, मैं चिडियाघर का भालू हूँ ।
तुम व्यस्त सोनिया गाँधी सी, मैं वी. पी.सिंह सा खाली हूँ ।
तुम हँसी माधुरी दीक्षित की, मैं पुलिसमैन की गाली हूँ ।
कल जेल अगर हो जाये तो, दिलवा देन तुम बेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

मैं ढाबे के ढाँचे जैसा, तुम पाँच सितारा होटल हो ।
मैं महुए का देसी ठर्रा, तुम रेड-लेबल की बोतल हो ।
तुम चित्रहार का मधुर गीत, मैं कॄषि-दर्शन की झाडी हूँ ।
तुम विश्व-सुन्दरी सी कमाल, मैं तेलिया छाप कबाडी हूँ ।
तुम सोनी का मोबाइल हो, मैं टेलीफोन वाला हूँ चोंगा ।
तुम मछली मानसरोवर की, मैं सागर तट का हूँ घोंघा ।
दस मन्ज़िल से गिर जाउँगा, मत आगे मुझे ढकेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।

तुम सत्ता की महरानी हो, मैं विपक्ष की लाचारी हूँ ।
तुम हो ममता-जयललिता सी, मैं क्वारा अटल-बिहारी हूँ ।
तुम तेन्दुलकर का शतक प्रिये, मैं फ़ॉलो-ऑन की पारी हूँ ।
तुम गेट्ज़, मटीज़, कोरोला हो, मैं लेलैन्ड की लॉरी हूँ ।
मुझको रेफ़री ही रहने दो, मत खेलो मुझसे खेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ।
मैं सोच रहा कि रहे हैं कब से, श्रोता मुझको झेल प्रिये ।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये।

(डा सुनील जोगी )
 
Last edited:
" दोस्ती "

आकर बिना मिले जाना तेरा
पल में उजाला पल में अँधेरा
एक वो भी दौर था दोस्ती में
जब क्या तेरा और क्या मेरा
तेरी आँखें तो वो आईना थी
जिनमे संवरता था ये चेहरा
तुझको यूँ मोती सा रखता
कि ज़ज्बा है सागर सा गहरा
सुन ! यूँ ही हम दोस्त बने
कि तू कुछ-कुछ मुझसा ठहरा
जब से तू खामोश हुआ है
सारा जग लगे बहरा-बहरा
मुझ से दूर नही हो पायेगा
कि पगले मैं हूँ साया तेरा ,,
 
कोई टोपी तो कोई अपनी पगड़ी बेच देताहै,
मिले गर भाव अच्छा जज भी कुर्सी बेच देता है,
तवायफ फिर भी अच्छी है के वो सीमित है कोठे तक,
पुलिस वाला तो चौराहे पे वर्दी बेच देता है,
जला दी जाती है ससुराल में अक्सर वहीबेटी,
जिस बेटी की खातिर बाप किडनी बेच देता है,
कोई मासूम लड़की प्यार में कुर्बान है जिस पर,
बना कर विडियो उसकी वो प्रेमी बेचदेता है,
ये कलयुग है कोई भी चीज नामुमकिन नहीं इसमें,
कलि, फल, पेड़, पौधे, फूल माली बेच देता है,
जुए में बिक गया हु मैं तो हैरत क्यों है लोगो को,
युधिष्ठर तो जुए में अपनी पत्नी बेच देता है ।
 
" दोस्ती "

आकर बिना मिले जाना तेरा
पल में उजाला पल में अँधेरा
एक वो भी दौर था दोस्ती में
जब क्या तेरा और क्या मेरा
तेरी आँखें तो वो आईना थी
जिनमे संवरता था ये चेहरा
तुझको यूँ मोती सा रखता
कि ज़ज्बा है सागर सा गहरा
सुन ! यूँ ही हम दोस्त बने
कि तू कुछ-कुछ मुझसा ठहरा
जब से तू खामोश हुआ है
सारा जग लगे बहरा-बहरा
मुझ से दूर नही हो पायेगा
कि पगले मैं हूँ साया तेरा ,,


Aati Sunder !!!!
 
Ek pagal pagal si ladki…
dil toornay se darti thi…….
har pal har lamha khud se woh jhagarti thi…
ansoo kiun aye kisi ankh main
mujrim khud ko samujhti thi…
ghuut ghuut k jeeti rehti thi…
har sans ulajhti rehti thi…
soo baar kaha aaay nadan larki..!!!
dunya ko dekhna choor day…
khud se ulajhna choor day…
pal pal bikherna choor day..
yahan HAASSASS DIl to koi nahi….
yahan NAZUKi say kaam na lay…
yahan pather banna parta hai…
yahan rehumdilli say kaam na lay…
soo barr kaha par kaisay nasamjhi…. !!!
dunya ko sub samujhti thi…
phir wohi hoa jo hona tha…..
dil toota uska jiska ussay roona tha…
BHAROSAY ki deewar girri …
SARD LEHJI haar baar mili….
phir simat gaye apni zaat main…
tamaam dukhon ko samaitay anchal main…
ankhon main jazbaat nahi..
pahlay say halaaat nahi…
Farq srif itna hoa…
khud apni zaaat ko TOOR dia…
tanhayeyoun se rishta jorr dia..
phir tanha tanha rehni lagi…
phir khud ko PATHEr kahnay lagi…
WOH IK PAGAL PAGAL SI LARKI….
JO DIL TOORNAY SE DARTI THI …
 
Khudi ko kar buland itna ke har taqder se pehle
Khuda bande se ye poche bata teri raza kia hai

Khudi ko kar buland itna ke har taqder se pehle
Khuda bande se ye poche bata teri raza kia hai

Sitaron se age jahan aur bhi hai aur bhi hai
Abhi ishq ke Imtehan aur bhi hai aur bhi hai
Sitaron se age jahan aur bhi hai aur bhi hai
Abhi ishq ke Imtehan aur bhi hai aur bhi hai

Khudi ko kar buland itna ke har taqder se pehle
Khuda bande se ye poche bata teri raza kia hai

Tu shaheen hai, Tu shaheen hai, Tu shaheen hai
Tu shaheen hai, Tu shaheen hai Parvaz hai kam tera kam tera
Tere samne Aasman aur bhi hai
Tu shaheen he Basera kar Paharon ki chatano per
Tu shaheen hai tu Shaheen hai tu shaheen hai

Khudi ko kar buland itna ke har taqder se pehle
Khuda bande se ye poche bata teri raza kia hai

Khudi ko kar buland itna ke har taqder se pehle
Khuda bande se ye poche bata teri raza kia hai
bata teri raza kia hai
bata teri raza kia hai!!

By : Allana Iqbal
 
मै रोया यहां दूर देस वहां भीग गया तेरा आंचल
तू रात को सोती उठ बैठी हुई तेरे दिल में हलचल

जो इतनी दूर चला आया ये कैसा प्यार तेरा है मां
सब ग़म ऐसे दूर हुए तेरा सर पर हाथ फिरा है मां

जीवन का कैसा खेल है ये मां तुझसे दूर हुआ हूं मै
वक़्त के हाथों की कठपुतली कैसा मजबूर हुआ हूं मै

जब भी मै तन्हा होता हूँ, मां तुझको गले लगाना है
भीड़ बहुत है दुनिया में तेरी बाहों में आना है

जब भी मै ठोकर खाता था मां तूने मुझे उठाया है
थक कर हार नहीं मानूं ये तूने ही समझाया है

मै आज जहां भी पहुंचा हूँ मां तेरे प्यार की शक्ति है
पर पहुंचा मै कितना दूर तू मेरी राहें तकती है

छोती छोटी बातों पर मां मुझको ध्यान तू करती है
चौखट की हर आहट पर मुझको पहचान तू करती है

कैसे बंधन में जकड़ा हूँ दो-चार दिनों आ पाता हूँ
बस देखती रहती है मुझको आँखों में नहीं समाता हूँ

तू चाहती है मुझको रोके मुझे सदा पास रखे अपने
पर भेजती है तू ये कह के जा पूरे कर अपने सपने

अपने सपने भूल के मां तू मेरे सपने जीती है
होठों से मुस्काती है दूरी के आंसू पीती है

बस एक बार तू कह दे मां मै पास तेरे रुक जाऊंगा
गोद में तेरी सर होगा मै वापस कभी ना जाऊंगा
 
तमाम जिस्म ही घायल था, घाव ऐसा था
कोई न जान सका, रख-रखाव ऐसा था !!

बस इक कहानी हुई ये पड़ाव ऐसा था
मेरी चिता का भी मंज़र अलाव ऐसा था !!

वो हमको देखता रहता था, हम तरसते थे
हमारी छत से वहाँ तक दिखाव ऐसा था !!

कुछ ऐसी साँसें भी लेनी पड़ीं जो बोझल थीं
हवा का चारों तरफ से दबाव ऐसा था !!

ख़रीदते तो ख़रीदार ख़ुद ही बिक जाते
तपे हुए खरे सोने का भाव ऐसा था !!

हैं दायरे में क़दम ये न हो सका महसूस
रहे-हयात में यारो घुमाव ऐसा था !!

कोई ठहर न सका मौत के समन्दर तक
हयात ऐसी नदी थी, बहाव ऐसा था !!

बस उसकी मांग में सिंदूर भर के लौट आए
हमारा अगले जनम का चुनाव ऐसा था !!

फिर उसके बाद झुके तो झुके ख़ुदा की तरफ़
तुम्हारी सिम्त हमारा झुकाव ऐसा था !!

वो जिसका ख़ून था वो भी शिनाख्त कर न सका
हथेलियों पे लहू का रचाव ऐसा था !!

ज़बां से कुछ न कहूंगा, ग़ज़ल ये हाज़िर है
दिमाग़ में कई दिन से तनाव ऐसा था !!

फ़रेब दे ही गया ‘नूर’ उस नज़र का ख़ुलूस
फ़रेब खा ही गया मैं, सुभाव ऐसा
था !!
 
A subtle satire on so called Growth. B'ful depiction by a Jat friend of mine, really impressive!


ग्रोथ - अनुराधा बेनीवाल

सर-जी कौनसी ग्रोथ की आप बात करते हैं,
चार बड़े लोगो से जान-पहचान,
कुछ बड़ी पार्टियों मैं दुआ-सलाम?

बड़े लोगो की जी हजूरी,
छोटो पे कसे लगाम?

नीले गगन से परे एक चारदीवारी,
नया नवेला फर्निचर, कुछ हरे काग़ज़?

खुले क्षतिज़ के बदले ये धुँए के बादल,
और ये खोखली नकली हँसी?

एक चपरासी की बेटी बीमार,
दिल पत्थर, गले मैं सोने का हार?

एक साहिब की कुर्सी,
एक दब्बु ले खिसियाई हँसी?

करे मॅनेजरी डाँट फटकार,
उपर लगाए मखन, नीचे सुखी रोटी आचार?

हो गयी बड़ी नालेज हुमको,
दो ओर दो आठ भी जान गये,

छोटे-बड़े, तेरे-मेरे का फ़र्क भी सीखा
बस थोड़ी-सी इंसानियत भूल गये,

बेच रहे हैं दीवानगी को अपनी,
लोहे के सुरक्षा क्वॅच के बदले,

के लाल ईंटों ने खरीदा है मेरी जवानी को,
के हिसाब करना सीखे हैं अब!

ना ना ना ये ग्रोथ, अपने पास ही रखो,
हमारा गुज़ारा है इसके बिना.

हैं कुछ चिंगारिया,
जिनको बचा के रखा था, तेरे बर्फ़ीले तूफ़ानो से.

हैं कुछ चमकीले सपने, सफेद मोती जो सहेजे थे,
हैं कुछ खवाब तेरी नींदो के परे,

के हमने चुपके से फेक दी थी,
तेरी बेहोशी की दवा!!

बिन लीबाज़ के आए थे,
बहुत कुछ जोड़ लिया....
है दो आने की रोटी, चार आने की दाल

कहने को दो गज़ ज़मीन काफ़ी थी,
अभी तो दो दो घर पे क़ब्ज़ा है!

Cheers
Jit
 
मै रोया यहां दूर देस वहां भीग गया तेरा आंचल
तू रात को सोती उठ बैठी हुई तेरे दिल में हलचल

जो इतनी दूर चला आया ये कैसा प्यार तेरा है मां
सब ग़म ऐसे दूर हुए तेरा सर पर हाथ फिरा है मां

जीवन का कैसा खेल है ये मां तुझसे दूर हुआ हूं मै
वक़्त के हाथों की कठपुतली कैसा मजबूर हुआ हूं मै

जब भी मै तन्हा होता हूँ, मां तुझको गले लगाना है
भीड़ बहुत है दुनिया में तेरी बाहों में आना है

जब भी मै ठोकर खाता था मां तूने मुझे उठाया है
थक कर हार नहीं मानूं ये तूने ही समझाया है

मै आज जहां भी पहुंचा हूँ मां तेरे प्यार की शक्ति है
पर पहुंचा मै कितना दूर तू मेरी राहें तकती है

छोती छोटी बातों पर मां मुझको ध्यान तू करती है
चौखट की हर आहट पर मुझको पहचान तू करती है

कैसे बंधन में जकड़ा हूँ दो-चार दिनों आ पाता हूँ
बस देखती रहती है मुझको आँखों में नहीं समाता हूँ

तू चाहती है मुझको रोके मुझे सदा पास रखे अपने
पर भेजती है तू ये कह के जा पूरे कर अपने सपने

अपने सपने भूल के मां तू मेरे सपने जीती है
होठों से मुस्काती है दूरी के आंसू पीती है

बस एक बार तू कह दे मां मै पास तेरे रुक जाऊंगा
गोद में तेरी सर होगा मै वापस कभी ना जाऊंगा

उत्तम अति उत्तम। दिल की छू गयी।
 
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