Hindi Kavita

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Dear Bhabiji,

Its sucha pleasure to see u here.. :)

Thanks a lot for posting Rajesh Bhaisaab Poem.

Eyes become moist again reminding them!!

Warm Regards


Rock on
Jit


Here is another poem, a few lines,originally posted by my dear husband, Lt. Sh. Rajesh Kumar Rathee ji, on March 27th 2007. This forum was very dear to him and it took me 6 months to muster the courage to take up from where he left.I hope and pray that I will be able be to justice to it though I can be of no match to him.

Ek choti si koshish hai, umeed hai apka sahara milega.

---Mrs. Monica Rathee

Teri Yaad
aaj phir teri yaad ka ek moti, boond ban kar patto
par se phisalta hua,
palko tak aa kar ruk gaya, aakhon ke samne atka
raha,
jhilmilata hua, palko se chal kar gaalon ko sahlata
hua,
hoto ko chumta aage chala, meri hatheli par aa
betha,
tumhari yaad ka ek or moti, jhilmilata hua es tanhai
main
boond ban kar palkon par aa kar atak gaya, teri yaad
ban kar."
__________________
LIFE IS LIKE AN ICE CREAM, ENJOY BEFORE IT MELTS
user_offline.gif
 
Very Heart Touchin' poem Bhabiji!

This is what we Say Destiny's wild move!

But Life moves on...

Rock on
Jit


This poem might sound depressing to some but please bear with me.

Monica



कारवाँ गुज़र गया
स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!


- गोपालदास नीरज
leaf.jpg
 
read this poem from Nagarjuna during school time....

गुलाबी चूड़ियाँ

कवि:नागार्जुन
***********************

प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी

Really Sweet.
 
.

The earliest Hindi Kavita - by Amir Khusro !!​

मुकरियाँ
( अमीर खुसरो )​

रात समय वह मेरे आवे। भोर भये वह घर उठि जावे॥
यह अचरज है सबसे न्यारा। ऐ सखि साजन? ना सखि तारा॥​

नंगे पाँव फिरन नहिं देत। पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत॥
पाँव का चूमा लेत निपूता। ऐ सखि साजन? ना सखि जूता॥
- ​

Gajab!! Deshwal ji thanks for sharing. Anchalik touch bahut badhiya de rakhya hai hindi ke pahele kavi ne.
 
read this poem from Nagarjuna during school time....

गुलाबी चूड़ियाँ

कवि:नागार्जुन
***********************

प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी

Bahut dina pache yaad diva di bhai tanne ya badhiya kavita. Ke tun isne kanthasth kar rahya hai er kitab le ja rahya se hude bhi :)

Nice one indeed!!
 
माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरनचरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयननयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,
और हम अजानसे,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।​


- गोपालदास नीरज

leaf.jpg

Shareer mein sihran paida karne wali panktiyan hein ji ye to .... gajab likhi hein.
 
A poem I read in school

प्रयाण गीत


वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं।
सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो नहीं
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

-द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी(1916 - -1998)


Monica
 
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!


क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!
अनगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अनगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी सूनी घड़ियों को किन-किन से आबाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

याद सुखों की आंसू लाती,
दुख की, दिलभारी कर जाती,
दोष किसे दूं जब अपने से अपने दिन बर्बाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!
दोनों करकेपछताता हूं,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूं,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आज़ाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!


- बच्चन



Monica
 
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

याद सुखों की आंसू लाती,
दुख की, दिलभारी कर जाती,
दोष किसे दूं जब अपने से अपने दिन बर्बाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!
दोनों करकेपछताता हूं,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूं,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आज़ाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

- बच्चन
Monica

Really nice. One more from bacchan ji,

मानव पर जगती का शासन,
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधों में रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

हम क्या हैं जगती के सर में!
जगती क्या, संसृति सागर में!
एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

आओ, अपनी लघुता जानें,
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!
 
Bachhan.....sagar kei saman hai.......jab bhee hath badhaogai moti hei paogai.....
gud one above.....enjoying...

Welcome back Monika ji... gud to see you.
 
हिन्दी कविताओं का अद्भुत संकलन !!!!

This is the first time, I stumbled upon this thread....and believe me..i could not stop my self to read it from beginning till end....

Am Lovin' It!!!!!!!!!!!!!!!!! :):):)
 
Amir Khusro-II

.
पनघट (अमीर खुसरो)​

बहुत कठिन है डगर पनघट की ।
कैसे मैं भर लाऊं मधवा से मटकी
मेरे अच्छे निजाम पिया ।
पनिया भरन को मैं जो गई थी
छीन-झपट मोरी मटकी पटकी
बहुत कठिन है डगर पनघट की ।​

खुसरो निजाम के बल-बल जाइए
लाज राखी मेरे घूंघट पट की
कैसे मैं भर लाऊं मधवा से मटकी
बहुत कठिन है डगर पनघट की।​

पहेलियां (अमीर खुसरो)​

खडा भी लोटा पडा भी लोटा
है बैठा पर कहें हैं लोटा
खुसरो कहें समझ का टोटा
( लोटा)​

बीसों का सर काट लिया
ना मारा ना खून किया
( नाखून )​

एक थाल मोती से भरा
सब के सर पर औंधा धरा
चारों ओर वह थाली फिरे
मोती उससे एक न गिरे।
( आकाश )​

एक नार ने अचरज किया
सांप मार पिंजरे में दिया
ज्यों-ज्यों साँप ताल को खाए
ताल सूख सांप मर जाए
( दीया-बाती)​
.
 
Last edited:
.
पनघट (अमीर खुसरो)​

बहुत कठिन है डगर पनघट की ।
कैसे मैं भर लाऊं मधवा से मटकी
मेरे अच्छे निजाम पिया ।
पनिया भरन को मैं जो गई थी
छीन-झपट मोरी मटकी पटकी
बहुत कठिन है डगर पनघट की ।​

खुसरो निजाम के बल-बल जाइए
लाज राखी मेरे घूंघट पट की
कैसे मैं भर लाऊं मधवा से मटकी
बहुत कठिन है डगर पनघट की।​

पहेलियां (अमीर खुसरो)​

खडा भी लोटा पडा भी लोटा
है बैठा पर कहें हैं लोटा
खुसरो कहें समझ का टोटा
( लोटा)​

बीसों का सर काट लिया
ना मारा ना खून किया
( नाखून )​

एक थाल मोती से भरा
सब के सर पर औंधा धरा
चारों ओर वह थाली फिरे
मोती उससे एक न गिरे।
( आकाश )​

एक नार ने अचरज किया
सांप मार पिंजरे में दिया
ज्यों-ज्यों साँप ताल को खाए
ताल सूख सांप मर जाए
( दीया-बाती)​
.
i think it's like this perhaps
बहुत कठिन है डगर पनघट की ।
कैसे भर लाऊं मैं जमना से मटकी ​
 
amir khusro was successor of nizamuddin aulia. He lived in delhi. yamuna was nearby. like ganga was nearby aa me jo jat doob jata va hi khushnaseeb man jata.
 
haridwar me liya tha hanumanji ne jyotish vidya ka gyan. udde nne ek pakhand khandini pataka bhi phahrayee thi, swami ji ne:)
 
postmartam

from book chup chap chiddi ka baap - jagbeer rathee

trak aala gajab tar gaya
garib ke chore ne margya
postmartam karna padega
rupiya 200 bharna padega
rupiya udharan pe
yaaran pe pyaran pe
mangda rahya naat de rehye
atman uski kaatde rehye
sanjh tak anginat ghav the
jakhmi dil tha jakhmi panv the
divar tale beth ro liya
postmartam to ho liya
par kiska ?
balak ka ak uska ?
 
Dr. Rathee, keep writting...we are really enjoying ur kavita's.
vikasgulia said:
This is the first time, I stumbled upon this thread....and believe me..i could not stop my self to read it from beginning till end....

Am Lovin' It!!!!!!!!!!!!!!!!! :):):).

Thanks a Lot Guys.... ll try to keep adding some classics.
 
चंद्र गहना से लौटती बेर / केदारनाथ अग्रवाल

One more Classic !

चंद्र गहना से लौटती बेर / केदारनाथ अग्रवाल

देखा आया चंद्र गहना।
देखता हूँ दृश्य अब मैं
मेड़ पर इस खेत पर मैं बैठा अकेला।
एक बीते के बराबर
यह हरा ठिगना चना,
बाँधे मुरैठा शीश पर
छोटे गुलाबी फूल का,
सज कर खड़ा है।
पास ही मिल कर उगी है
बीच में आली हठीली
देह की पतली, कमर की है लचीली,
नीज फूले फूल को सिर पर चढ़ा कर
कह रही है, जो छूए यह,
दूँ हृदय का दान उसको।
और सरसों की न पूछो-
हो गई सबसे सयानी,
हाथ पीले कर लिए हैं
ब्याह-मंडप में पधारी
फाग गाता मास फागुन
आ गया है आज जैसे।
देखता हूँ मैं: स्वयंवर हो रहा है,
पकृति का अनुराग-अंचल हिल रहा है
इस विजन में,
दूर व्यापारिक नगर से
प्रेम की प्रिय भूमि उपजाऊ अधिक है।
और पैरों के तले हैं एक पोखर,
उठ रही है इसमें लहरियाँ,
नील तल में जो उगी है घास भूरी
ले रही वह भी लहरियाँ।
एक चाँदी का बड़ा-सा गोल खंभा
आँख को है चकमकाता।
हैं कईं पत्थर किनारे
पी रहे चुपचाप पानी,
प्यास जाने कब बुझेगी!
चुप खड़ा बगुला डुबाए टाँग जल में,
देखते ही मीन चंचल
ध्यान-निद्रा त्यागता है,
चट दबाकर चोंच में
नीचे गले के डालता है!
एक काले माथ वाली चतुर चिडि़या
श्वेत पंखों के झपाटे मार फौरन
टूट पड़ती है भरे जल के हृदय पर,
एक उजली चटुल मछली
चोंच पीली में दबा कर
दूर उड़ती है गगन में!
औ' यही से-
भूमी ऊँची है जहाँ से-
रेल की पटरी गई है।
चित्रकूट की अनगढ़ चौड़ी
कम ऊँची-ऊँची पहाडि़याँ
दूर दिशाओं तक फैली हैं।
बाँझ भूमि पर
इधर-उधर रिंवा के पेड़
काँटेदार कुरूप खड़े हैं
सुन पड़ता है
मीठा-मीठा रस टपकता
सुग्गे का स्वर
टें टें टें टें;
सुन पड़ता है
वनस्थली का हृदय चीरता
उठता-गिरता,
सारस का स्वर
टिरटों टिरटों;
मन होता है-
उड़ जाऊँ मैं
पर फैलाए सारस के संग
जहाँ जुगुल जोड़ी रहती है
हरे खेत में
सच्ची प्रेम-कहानी सुन लूँ
चुप्पे-चुप्पे।
 
Last edited:
well

bahut ache neelam jin kaveyo ko ham bhul jate h unko time time par
yad karte rahna chahiye
 
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