Hindi Kavita

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As many of followers and contributors of this worthy thread are very disappointed with the Alligadiya lock. No doubt this is one of the best conclusive post as admitted by Samar Ji. Author of this thread also express her views in other post regarding reopening of "Hindi Kavita" thread.
A very found of hindi philosophical poems Jit Bhai also interested in reopening...so, to see the interest of our members and contributors let me take this initiative to reopen this thread.
 
Cheers !!!

Thanks a lot Bhaisaab ... Am really Happy to see the Thread alive again !! :)

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Warm wishes on diwali !

On the festival occasion of Diwali, I want to wish all of Jatlanders, their families and their beloved ones a Bright and Prosperous Diwali with this Beautiful Enchanting Poem !! .. :)

आज फ़िर दिवाली है - मानोशी चटर्जी

कतारों में ज़मीन पर
आई है आज उतर
तारों की बारात
जड़ने हीरे मोती
एक काली चादर पर
छुप गया है चाँद आज
अंधेरी गुफ़ा में बहुत दूर
अमावस का जामा पहन
और भेजा है चांदनी को
चुपके से अकेले तारों के संग
जब फुलझडियों की बरसात में
भीग रही काली ये रात
इठलाती खुशी फ़िर रही
सज-धज कर हर गली
झर रही उमंग
बिखर रहा रंग
कि रात एक जो काली है
आज बहुत सुंदर मगर
सितारों से जगमगाती
दीयों से खिलखिलाती
हाँ आज फ़िर दिवाली है ! ..

'HAPPY DIWALI TO ALL OF YOU !'


Rock on
Jit
 
Last edited:
jo beet gyi wo baat gyi...by Harivanshrai Bachchan

ye meri favourite poem hai....since the tym i was studying in class X...ye meri book 'Swati' mein thi nd i really liked the inspiring thoughts givn in this poem....

is poem ka zikr pehle hi is thread k first page par ho chuka h.....awesome poem...
 
Few rubaiya from Madhusala

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।
 
राग तेरी बांसुरी का बेसुरा हो जाएगा

सोचता हूँ जब मेरा बेटा बड़ा हो जाएगा
तो मेरी बैशाखियाँ ,माँ की दवा हो जाएगा
पेड़ यादों का यूँ ही बढ़ता क्या तो देखना
इस सफर की धुप में कुछ आसरा हो जाएगा
न्याये के दरबार मैं मुझको यहीं चिंता रही
मैं अगर सच कह गया तो जाने क्या हो जाएगा
सीख लूँगा मैं उसी से जिंदा रहने का हुनर
जब कभी जिन्दगी से सामना हो जाएगा
तेरे आने की उम्मीदों से साँस हैं
गीत के बिन जखम दिल का फिर हरा हो जाएगा
गोपियों को छोड़ देगा फिर कभी कान्हा तो सुन
राग तेरी बांसुरी का बेसुरा हो जाएगा
 
भ्रमर कोई कुमुद्नी पे मचल बैठा तो हंगामा !​
हमारे दिल में कोई ख़्वाब पल बैठा तो हंगामा !!​
अभी तक डूब के सुनते थे सब किस्सा मोहबत का !​
मैं किस्से को हक़ीकत में बदल बैठा तो हंगामा !!​
 
लोग कैसे कहते है की मेरा है भगवान अलग

लोगो ने दिये हैं तुम्हे बहुत नाम अलग
सब कहते है मेरा है भगवान् अलग
वो कहते है मेरा है रहमान अलग ,
ये कहते है मेरा है राम अलग …!!!!!
एक ने सजदा किया, एक ने झुकाया सर अलग
उनका है उनका है दरबार अलग,
दोनों का है रास्ता एक, पर बंदगी है अलग
एक ही है भगवान वो ही खुदा ना कोई अलग ...!!!!
राम के बिना कैसे हो रमजान अलग,
अली से ना हो कभी दिवाली अलग
लोग कैसे कहते है की मेरा है भगवान अलग
मेरा है कहना वही राम, वही रहमान
एक ही वो सिर्फ़ है उसके नाम अलग ..!!!!!!
 
1991 में पुरस्कृत बद्री नारायण की पर्सिद कवित&

प्रेत आएगा
किताब से निकल ले जाएगा प्रेम पत्र
गीध उसे पहाड़ पर नोच नोच खायेगा


चोर आएगा तो प्रेम पत्र ही चुराएगा
जुआरी प्रेम पत्र ही दांव पर लगायेगा
ऋषि आयेंगे तो दान में मांगेंगे प्रेम पत्र


बारिश आएगी तो प्रेम पत्र ही गलाएगी
आग आएगी तो जलाएगी प्रेम पत्र
बंदिशे प्रेम पत्र पर ही लगाए जायेंगी
​

सांप आएगा तो डसेगा प्रेम पत्र
झींगुर आयेंगे तो चाटेंगे प्रेम पत्र
कीडे प्रेम पत्र ही काटेंगे


प्रलये के दिनों में
सप्तरिशी, मछली और मनु
सब वेद बचायेंगे
कोई नही बचायेगा प्रेम पत्र
​

कोई रोम बचायेगा
कोई मदीना
कोई चंडी बचायगा,कोई सोना


मैं निपट अकेला
कैसे बचाऊंगा तुम्हारा प्रेम पत्र......
​

 
Life and Railway Station, very much resemble to each other; this beautiful thought provoking poem describes it really well. :)

छूट चुकी है रेलः - अज्ञात


जा चुके है सब और वही खामोशी छायी है,
पसरा है हर ओर सन्नाटा, तन्हाई मुस्कुराई है,

छूट चुकी है रेल ,
चंद लम्हों की तो बात थी,

क्या रौनक थी यहॉं,
जैसे सजी कोई महफिल खास थी,

अजनबी थे चेहरे सारे,
फिर भी उनसे मुलाक़ात थी,

भेजी थी किसी ने अपनाइयत,
सलाम मे वो क्या बात थी,

एक पल थे आप जैसे क़ौसर,
अब बची अकेली रात थी,

चलो अब लौट चलें यहॉं से,
छूट चुकी है रेल
ये अब गुज़री बात थी,

उङते काग़ज़, करते बयान्,
इनकी भी किसी से
दो पल पहले मुलाक़ात थी,

बढ़ चले क़दम,
कनारे उन पटरियों
कहानी जिनके रोज़ ये साथ थी,

फिर आएगी दूजी रेल,
फिर चीरेगी ये सन्नाटा
जैसे जिन्दगी से फिर मुलाक़ात थी,

फिर लौटेंगे और,
भारी क़दमों से,जैसे
कोई गहरी सी बात थी,

छूट चुकी है रेल,
अब सिर्फ काली स्याहा रात थी |

Rock on
Jit
 
Last edited:
प्रेत आएगा

किताब से निकल ले जाएगा प्रेम पत्र
गीध उसे पहाड़ पर नोच नोच खायेगा​

चोर आएगा तो प्रेम पत्र ही चुराएगा
जुआरी प्रेम पत्र ही दांव पर लगायेगा
ऋषि आयेंगे तो दान में मांगेंगे प्रेम पत्र​

बारिश आएगी तो प्रेम पत्र ही गलाएगी
आग आएगी तो जलाएगी प्रेम पत्र
बंदिशे प्रेम पत्र पर ही लगाए जायेंगी​

सांप आएगा तो डसेगा प्रेम पत्र
झींगुर आयेंगे तो चाटेंगे प्रेम पत्र
कीडे प्रेम पत्र ही काटेंगे​

प्रलये के दिनों में
सप्तरिशी, मछली और मनु
सब वेद बचायेंगे
कोई नही बचायेगा प्रेम पत्र​

कोई रोम बचायेगा
कोई मदीना
कोई चंडी बचायगा,कोई सोना​

मैं निपट अकेला
कैसे बचाऊंगा तुम्हारा प्रेम पत्र......​
बहुत ही अच्छी मीनाक्षी जी '' प्रेम पत्र ''
 
सब जीवन बीता जाता है


सब जीवन बीता जाता है
धुप छांह के खेल सदृश
सब जीवन बीता जाता है l


समय भागता प्रतिक्षण में
नव-अतीत्त के तुषार- कण में
हमें लगा कर भविष्य-रण में
आप कहाँ छिप जाता है


सब जीवन बीता जाता है l

बुल्ले नहर हवा के झोंके
मेघ और बिजली के टोंके
किसका साहस है कुछ रोके
जीवन का वह नाता है

सब जीवन बीता जाता है

वंशी को बस बज जाने दो
मीठी मीड़ों को आने दो
आँख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है l


सब जीवन बीता जाता है ll


श्री जयशंकर प्रसाद
 
so sweet anjali ji..

keep firing..


सब जीवन बीता जाता है
धुप छांह के खेल सदृश
सब जीवन बीता जाता है l


समय भागता प्रतिक्षण में
नव-अतीत्त के तुषार- कण में
हमें लगा कर भविष्य-रण में
आप कहाँ छिप जाता है


सब जीवन बीता जाता है l

बुल्ले नहर हवा के झोंके
मेघ और बिजली के टोंके
किसका साहस है कुछ रोके
जीवन का वह नाता है

सब जीवन बीता जाता है

वंशी को बस बज जाने दो
मीठी मीड़ों को आने दो
आँख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है l


सब जीवन बीता जाता है ll


श्री जयशंकर प्रसाद
 
खुली पाठशाला फूलों की
पुस्तक-कापी लिए हाथ में
फूल धूप की बस में आए l


कुरते में जँचते गुलाब तो
टाई लटकाए पलाश हैं
चंपा चुस्त पज़ामे में है
हैट लगाये अमलताश है l


सूरजमुखी मूखर है ज्यादा
किंतु मोंगर अभी मौन है
चपल चमेली है स्लेक्स में
पहचानो तो कौन- कौन हैं l


गैंदा नज़र नहीं आता है
जूही कंही छूप कर बैठी है
जाने किसने छेड़ दिया है
गुलमुहर ऐंठी- ऐंठी है

सबके अपने अलगे रंग हैं
सब हैं अपनी गंध लुटाए
फूल धुप की बस में आए
मुस्कानों के बैग सजाये



डा. तारादत्त निर्विरोध
 
Beautiful Poem, Thanks Anjaliji for sharing ! :)


सब जीवन बीता जाता है
धुप छांह के खेल सदृश
सब जीवन बीता जाता है l


समय भागता प्रतिक्षण में
नव-अतीत्त के तुषार- कण में
हमें लगा कर भविष्य-रण में
आप कहाँ छिप जाता है
सब जीवन बीता जाता है l
 
Dusk on the banks of River, creates a beautiful enchanting yet lil gloomy ambiance !! This nice poem describes that gloominess in touching words. :)


खुल गई नाव - अज्ञेय

खुल गई नाव
घिर आई संझा, सूरज
डूबा सागर-तीरे।


धुंधले पड़ते से जल-पंछी
भर धीरज से
मूक लगे मंडराने,

सूना तारा उगा
चमक कर
साथी लगा बुलाने।

तब फिर सिहरी हवा
लहरियाँ काँपीं
तब फिर मूर्छित
व्यथा विदा की
जागी धीरे-धीरे।


Rock on
Jit
 
Very beautiful,calm,soothing and touching poem Jit!

well as i have come in this thread i think it would not be right if i dont post any poem...though i am not much into hindi poems but i will share a composition from my college lecturer who is a poet too. Here it goes...

Wajood ki hadon se nikalkar dekhen
chalo saare aalam me bikharkar dekhen
mumkin hai dil ki raah bhi mil jaye
philhaal aankhon me utarkar dekhen
shayad ki jannat ki tamanna na rahe
ek baar gunaah-e-ishq bhi karke dekhen
ho sakta hai ki isi me zindgi ka hal ho
kyon na kisi shakhs par marke dekhen
kya pata wo kisi mod par bichhud jaye
ek din to usko ji bhar ke dekhen
husn-e-nigahe yaar ke aage bhi kaif
kuchh aur sanwar kar dekhen.
 
I have been going through the posts for the past one hour, and there still are a lot to cover..and not a single poem in the post can be left unread...Thank you Neelam ji for starting this thread..its a strong wave of nostalgia...


These are the lines from the Title song of the serial- "Bharat ek Khoj". Anyone knows who the poet is? Thanks
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Srushtee se pehle sat nahin thaa, asat bhi nahin
Antariksh bhi nahin, aakaash bhin nahin thaa
chhipaa thaa kyaa kahaan, kisne dekhaa thaa
us pal to agam, atal jal bhi kahaan thaa

Shushtee kaa kaun hain kartaa
Kartaa hain yeh vaa akartaa
Oonche aasmaan mein rahtaa
Sadaaa adhyaksh banaa rahtaa
Wohin sach much mein jaantaa..Yaa nahin bhi jaanataa
Hain kisi ko nahin pataa
Nahin pataa
 
Last edited:
Jit Ji,

Seema Kumar meri priya saheli hai.....unki kai kavitaein Hindi Yugam mein bhi prakashit ki gayi hai.....

हर लम्हा एक विस्मय - सीमा कुमार

ठहरा हुआ पानी
एक छोटा सा कंकड़
या एक हल्का सा स्पर्श
और उठी असंख्य, अनगिनत लहरें;
 
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