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अगर हम अपने दिल को ------ कुँअर बेचैन

अगर हम अपने दिल को अपना इक चाकर बना लेते

तो अपनी ज़िदंगी को और भी बेहतर बना लेते


ये काग़ज़ पर बनी चिड़िया भले ही उड़ नही पाती

मगर तुम कुछ तो उसके बाज़ुओं में पर बना लेते


अलग रहते हुए भी सबसे इतना दूर क्यों होते

अगर दिल में उठी दीवार में हम दर बना लेते


हमारा दिल जो नाज़ुक फूल था सबने मसल डाला

ज़माना कह रहा है दिल को हम पत्थर बना लेते


हम इतनी करके मेहनत शहर में फुटपाथ पर सोये

ये मेहनत गाँव में करते तो अपना घर बना लेते


'कुँअर' कुछ लोग हैं जो अपने धड़ पर सर नहीं रखते

अगर झुकना नहीं होता तो वो भी सर बना लेते
 
हम दीवानों की क्या हस्ती -----भगवतीचरण वर्मा

हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले



आए बनकर उल्लास कभी, आँसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए, अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले



किस ओर चले? मत ये पूछो, बस चलना है इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले, जग को अपना कुछ दिए चले



दो बात कहीं, दो बात सुनी, कुछ हँसे और फिर कुछ रोए
छक कर सुख दुःख के घूँटों को, हम एक भाव से पिए चले



हम भिखमंगों की दुनिया में, स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी उर पर, ले असफलता का भार चले



हम मान रहित, अपमान रहित, जी भर कर खुलकर खेल चुके
हम हँसते हँसते आज यहाँ, प्राणों की बाजी हार चले



अब अपना और पराया क्या, आबाद रहें रुकने वाले
हम स्वयं बंधे थे, और स्वयं, हम अपने बन्धन तोड़ चले
 
Last edited:
Bhai Tomar,

Just for information, I already posted this wonderful poem way back.

You can find it here -
http://www.jatland.com/forums/showthread.php?p=174721 post no #341

Could you please try to use *search* option of the thread as it'll eliminate the chance of repetition, I think it'll also be gud for the betterment of this splendid thread. :)

Thanks,

Rock on
Jit



हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले



आए बनकर उल्लास कभी, आँसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए, अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले



किस ओर चले? मत ये पूछो, बस चलना है इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले, जग को अपना कुछ दिए चले



दो बात कहीं, दो बात सुनी, कुछ हँसे और फिर कुछ रोए
छक कर सुख दुःख के घूँटों को, हम एक भाव से पिए चले



हम भिखमंगों की दुनिया में, स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी उर पर, ले असफलता का भार चले



हम मान रहित, अपमान रहित, जी भर कर खुलकर खेल चुके
हम हँसते हँसते आज यहाँ, प्राणों की बाजी हार चले



अब अपना और पराया क्या, आबाद रहें रुकने वाले
हम स्वयं बंधे थे, और स्वयं, हम अपने बन्धन तोड़ चले
 
Thanks Jit for your kind information.I will use that option in future...
Bhai Tomar,

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Thanks,

Rock on
Jit
 
मैंने उससे क्यों प्यार किया ? ------- शैलेन्द्र

जिसने छूकर मन का सितार,

कर झंकृत अनुपम प्रीत-गीत,

ख़ुद तोड़ दिया हर एक तार,

मैंने उससे क्यों प्यार किया ?


बरसा जीवन में ज्योतिधार,

जिसने बिखेर कर विविध रंग,

फिर ढाल दिया घन अंधकार,

मैंने उससे क्यों प्यार किया ?


मन को देकर निधियां हज़ार,

फिर छीन लिया जिसने सब कुछ,

कर दिया हीन चिर निराधार,

मैंने उससे क्यों प्यार किया ?


जिसने पहनाकर प्रेमहार,

बैठा मन के सिंहासन पर,

फिर स्वयं दिया सहसा उतार,

मैंने उससे क्यों प्यार किया ?
 
बसंत !

बस अंत करो इस सर्दी का, बसंत को अब आना है।
ऊनी वस्त्रों के अंबार को, लंबी छुट्टियों पर जाना है।

बस अंत करो छोटी रातों का, मेरे सूरज को अब आना है।
नन्हीं कलियों ने है खिलना, और भँवरों को भी गाना है।

बस अंत करो इस आलस का, अब खेलना और खिलाना है।
खिड़की दरवाज़े खोल सभी, स्वर्णिम किरणों को आना है।

बस अंत करो इस सन्नाटे का, चिड़ियों को अब चहचहाना है।
वो रात की रानी महकेगी, खेतों को भी जुत जाना है।

बस अंत करो इस अनभिज्ञता का, ऋतुएँ तो एक बहाना है।
कितने बसंत अब बीत गए, जीवन का कहाँ ठिकाना है?

बस अंत करो प्रतीक्षाओं का, बसंत को तो हर वर्ष आना है।
सुखी वही, समृद्ध वही, जिसने यह सच, सच में जाना है।

बस अंत करो, अब अंत करो, हर ऋतु का एक परवाना है।
तुम कर्म करो, बस कर्म करो, बसंत का रूप फिर, जानोगे और सुहाना है।

चलना है, मुझे चलते जाना है,
क्योंकि...यह तय है, बसंत को तो हर बार आना है।
बसंत ने तो हर बार आना है।

........अमरपाल सिंह
 
जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है|


अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है |

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है|

यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है |
 
Harender Ji....ati sunder:)
जिसने छूकर मन का सितार,

कर झंकृत अनुपम प्रीत-गीत,

ख़ुद तोड़ दिया हर एक तार,

मैंने उससे क्यों प्यार किया ?


बरसा जीवन में ज्योतिधार,

जिसने बिखेर कर विविध रंग,

फिर ढाल दिया घन अंधकार,

मैंने उससे क्यों प्यार किया ?


मन को देकर निधियां हज़ार,

फिर छीन लिया जिसने सब कुछ,

कर दिया हीन चिर निराधार,

मैंने उससे क्यों प्यार किया ?


जिसने पहनाकर प्रेमहार,

बैठा मन के सिंहासन पर,

फिर स्वयं दिया सहसा उतार,

मैंने उससे क्यों प्यार किया ?
 
मैं वहीं सब कुछ पाना चाहता हूँ-----बोधिसत्व

बड़ी अजीब बात है
जहाँ नहीं होता
मैं वहीं सब कुछ पाना चाहता हूँ,


वहीं पाना चाहता हूँ
मैं अपने सवालों का जवाब
जहाँ लोग वर्षों से चुप हैं


चुप हैं कि
उन्हें बोलने नहीं दिया गया
चुप हैं कि
क्या होगा बोल कर
चुप हैं कि
वे चुप्पीवादी हैं,


मैं उन्हीं आँखों में
अपने को खोजता हूँ
जिनमें कोई भी आकृति
नहीं उभरती


मैं उन्हीं आवाज़ों में
चाहता हूँ अपना नाम
जिनमें नहीं रखता मायने
नामों का होना न होना,


मैं उन्ही का साथ चाहता हूँ
जो भूल जाते हैं
मिलने के ठीक बाद
कि कभी मिले थे किसी से।


बड़ी अजीब बात है
जहाँ नहीं होता
मैं वहीं सब कुछ पाना चाहता हूँ,
 
Very nice lines...!!
क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है|
जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है|
 
मैं हँसना चाहता हूँ ------- रमा द्विवेदी

न तो मैं दीवाना हूं,
न तो मैं अफ़साना हूं,
मैं हूं एक आम इंसान,
इसलिए मैं हँसना चाहता हूं।,

जैसे चाट-पकौड़ी खा,
लोग करते हैं जायका परिवर्तन,
वैसे ही मन हँसने को करता है,
मगर हँसी का 'खोमचा',
नहीं लगता चौराहे पर,
बात अन्तर्मन की है,
कई दिनों से मन-,
कर रहा था हँसने को,
किन्तु-,
हँसी आती है मगर,
कितनी सतही? कितनी क्षणिक?,
अन्तस की हर कली के साथ,
मन तरस गया है हँसने को,
यूं तो हँसने के लिए,
नहीं कमी हालातों की,
किन्तु उन पर हँसना,
मुसीबत को दावत देना है।,

हँसने के लिए एक क्षेत्र-,
सुरक्षित है-,
आम आदमी की बेचारगी पर,
हँस सकते हैं,
किन्तु देखकर उसे,
हँसने की जगह रोना आता है।,

सोच समझ कर मैंने लिया निर्णय,
क्यों न हँसने की रिहर्सल की जाए?,
किन्तु प्रश्न था जगह का,
जहाँ कोई रिस्क न हो?,
आखिर में मैंने कहा,
अपने सहकर्मी से,
मैं आफिस के कमरे में,
हँसना चाहता हूं।,

सुनते ही वह बरस पड़ा,
आफिस में हँसना चाहते हो?,
क्या इसके लिए परमीशन ली है?,
तुरन्त मैंने परमीशन की अर्जी,
आगे भिजवा दी।,

कार्यालय में हंगामा हो गाया,
उच्चाधिकारी खफ़ा हो गया,
वे दौड़े-दौड़े आए और फ़रमाए,
अचानक आप को क्या हो गया है?,
आप क्यों हँसना चाहते हैं?,
मुसीबत में क्यों पड़ना चाहते हैं?,
और हमें भी मुसीबत में क्यों डालना चाहते हैं?,
मैंने सहजता से कहा-,
मुसीबत की क्या बात है?,
मैं तो सिर्फ हँसना चाहता हूं,
वे बोले यही तो मुसीबत है,
आप अधिकारी होकर हँसना चाहते हैं,,
यदि हँसेंगे आप-,
अन्य कर्मचारियों पर क्या पड़ेगा प्रभाव?,
सारा डेकोरम और डिसिप्लिन,
हो जायेगा बर्बाद ।,
मैंने कहा कुछ भी हो,
मैं हँसूंगा जरूर।,

वे बोले ठीक है, हँसने का फार्म,
दीजिए भर-,
और करिए प्रतीक्षा कुछ दिनों तक,
फार्म मंगवाया,गौर से पढ़ा,
नाम ,पद,श्रेणी,उचित कारण के साथ,,
हँसने का दिन ,समय, अवधि,
और लाभ बताना था।,

अंतिम कालम पर मैं ठिठक गया,
पिछली बार हँसने की तिथि भरनी थी,
मुझे याद नहीं ,
मैं पिछली बार कब हँसा था?,
शायद तब!,
जब मां ने गोद में ले,
दूध पिलाया था,या,
पिता ने उंगली पकड़ -,
चलना सिखाया था,
या प्रथम बार पाठ्शाला में जा,
नन्हे-नन्हे साथियों के साथ बैठ,
शायद ! अन्तस की हर कली के साथ-,
तब ही हँसा था।,
पश्चात ईर्ष्या,द्वेष,तनाव,
अंधी दौड़ के सिवा,कुछ याद नहीं,
पिछली बार हँसने की सही तिथि,
मुझे याद नहीं,
अत: मुझे हँसने की अनुमति,
मिल न सकी।,
अब आप ही बताएं,
मैं क्या करूं??क्योंकि-,
मैं हँसना चाहता हूं।,
मैं हँसना चाहता हूं॥,
 
न तो मैं दीवाना हूं,
---------
तब ही हँसा था।,
पश्चात ईर्ष्या,द्वेष,तनाव,
अंधी दौड़ के सिवा,कुछ याद नहीं,
पिछली बार हँसने की सही तिथि,
मुझे याद नहीं,

,

nice poem tomar, thanx
 
A fine precious gem from the treasure of Great poet Shiv Mangal Singh 'Suman' .. this deep touching describes the feeling of melancholy n loneliness which u often feel in the dusk period; dusky evening period often creates gloomy ambiance in which u feel lonesome n miss some of ur dear ones ..

सूनी साँझ - शिवमंगल सिंह 'सुमन'

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

पेड़ खड़े फैलाए बाँहें
लौट रहे घर को चरवाहे
यह गोधूली! साथ नहीं हो तुम
बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

कुलबुल कुलबुल नीड़-नीड़ में
चहचह चहचह मीड़-मीड़ में
धुन अलबेली, साथ नहीं हो तुम,
बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

जागी-जागी सोई-सोई
पास पड़ी है खोई-खोई
निशा लजीली, साथ नहीं हो तुम,
बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

ऊँचे स्वर से गाते निर्झर
उमड़ी धारा, जैसी मुझपर -
बीती झेली, साथ नहीं हो तुम
बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

यह कैसी होनी-अनहोनी
पुतली-पुतली आँखमिचौनी
खुलकर खेली, साथ नहीं हो तुम,
बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।


Rock on
Jit
 
मैं ढूँढता तुझे था---रामनरेश त्रिपाठी

मैं ढूँढता तुझे था, जब कुंज और वन में।
तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में॥



तू 'आह' बन किसी की, मुझको पुकारता था।
मैं था तुझे बुलाता, संगीत में भजन में॥



मेरे लिए खड़ा था, दुखियों के द्वार पर तू।
मैं बाट जोहता था, तेरी किसी चमन में॥



बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू।
आँखे लगी थी मेरी, तब मान और धन में॥



बाजे बजाबजा कर, मैं था तुझे रिझाता।
तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में॥



मैं था विरक्त तुझसे, जग की अनित्यता पर।
उत्थान भर रहा था, तब तू किसी पतन में॥



बेबस गिरे हुओं के, तू बीच में खड़ा था।
मैं स्वर्ग देखता था, झुकता कहाँ चरन में॥



तूने दिया अनेकों अवसर न मिल सका मैं।
तू कर्म में मगन था, मैं व्यस्त था कथन में॥



तेरा पता सिकंदर को, मैं समझ रहा था।
पर तू बसा हुआ था, फरहाद कोहकन में॥



क्रीसस की 'हाय' में था, करता विनोद तू ही।
तू अंत में हंसा था, महमुद के रुदन में॥



प्रहलाद जानता था, तेरा सही ठिकाना।
तू ही मचल रहा था, मंसूर की रटन में॥



आखिर चमक पड़ा तू गाँधी की हड्डियों में।
मैं था तुझे समझता, सुहराब पीले तन में।



कैसे तुझे मिलूँगा, जब भेद इस कदर है।
हैरान होके भगवन, आया हूँ मैं सरन में॥



तू रूप कै किरन में सौंदर्य है सुमन में।
तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में॥



तू ज्ञान हिन्दुओं में, ईमान मुस्लिमों में।
तू प्रेम क्रिश्चियन में, तू सत्य है सुजन में॥



हे दीनबंधु ऐसी, प्रतिभा प्रदान कर तू।
देखूँ तुझे दृगों में, मन में तथा वचन में॥



कठिनाइयों दुखों का, इतिहास ही सुयश है।
मुझको समर्थ कर तू, बस कष्ट के सहन में॥



दुख में न हार मानूँ, सुख में तुझे न भूलूँ।
ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में॥
 
hindi kavita



[ छूट चुकी है रेल]


जा चुके है सब और वही खामोशी छायी है,
पसरा है हर ओर सन्नाटा, तन्हाई मुस्कुराई है,
छूट चुकी है रेल ,
चंद लम्हों की तो बात थी,
क्या रौनक थी यहॉं,
जैसे सजी कोई महफिल खास थी,
अजनबी थे चेहरे सारे,
फिर भी उनसे मुलाक़ात थी,
भेजी थी किसी ने अपनाइयत,
सलाम मे वो क्या बात थी,
एक पल थे आप जैसे क़ौसर,
अब बची अकेली रात थी,
चलो अब लौट चलें यहॉं से,
छूट चुकी है रेल
ये अब गुज़री बात थी,
उङते काग़ज़, करते बयान्*,
इनकी भी किसी से
दो पल पहले मुलाक़ात थी,
बढ़ चले क़दम,
कनारे उन पटरियों
कहानी जिनके रोज़ ये साथ थी,
फिर आएगी दूजी रेल,
फिर चीरेगी ये सन्नाटा
जैसे जिन्दगी से फिर मुलाक़ात थी,
फिर लौटेंगे और,
भारी क़दमों से,जैसे
कोई गहरी सी बात थी,
छूट चुकी है रेल,
अब सिर्फ काली स्याहा रात थी |
​
 
Bhai, gud one but its already posted by me some times ago

http://www.jatland.com/forums/showpost.php?p=187286&postcount=450

keep contributing,




[ छूट चुकी है रेल]


जा चुके है सब और वही खामोशी छायी है,
पसरा है हर ओर सन्नाटा, तन्हाई मुस्कुराई है,
छूट चुकी है रेल ,
चंद लम्हों की तो बात थी,
क्या रौनक थी यहॉं,
जैसे सजी कोई महफिल खास थी,
अजनबी थे चेहरे सारे,
फिर भी उनसे मुलाक़ात थी,
भेजी थी किसी ने अपनाइयत,
सलाम मे वो क्या बात थी,
एक पल थे आप जैसे क़ौसर,
अब बची अकेली रात थी,
चलो अब लौट चलें यहॉं से,
छूट चुकी है रेल
ये अब गुज़री बात थी,
उङते काग़ज़, करते बयान्*,
इनकी भी किसी से
दो पल पहले मुलाक़ात थी,
बढ़ चले क़दम,
कनारे उन पटरियों
कहानी जिनके रोज़ ये साथ थी,
फिर आएगी दूजी रेल,
फिर चीरेगी ये सन्नाटा
जैसे जिन्दगी से फिर मुलाक़ात थी,
फिर लौटेंगे और,
भारी क़दमों से,जैसे
कोई गहरी सी बात थी,
छूट चुकी है रेल,
अब सिर्फ काली स्याहा रात थी |
​
 
मेरे सपने मुझे सोने नहीं देते

मेरे सपने मुझे सोने नहीं देते
कभी रात की चादर पर पड़ी
सलवटों से चुभते हैं
तो कभी दिन के आसमां से
जलती धूप से बरसते हैं

मैं अकसर रातों में उठकर
उन सलवटों को हटाता हूँ
और भरी दोपहर
काला चश्मा पहनकर निकलता हूँ।
यदि रात एक करवट में निकाल भी लूँ
तो पीठ का दर्द बनकर दिनभर सताते हैं
चश्मे से आँखें तो बचा ली
लेकिन बालों में चाँदी से चमचमाते हैं।

एक छोटी कैंची से
बालों में उग आए सपनों को काटता हूँ
और आइने के सामने फिर जवाँ हो जाता हूँ
पीठ का दर्द तो किसी को दिखाई नहीं देता
सो अकेले ही सहन कर जाता हूँ

मेरे सपने जो मुझे सोने नहीं देते
नींद की गोलियों से उन्हें भगाता हूँ
वो जब तक चले नहीं जाते
तब तक सोने का स्वाँग रचाता हूँ

वो जाते भी कहाँ हैं
कभी दराज़ में पुराने ख़त की तरह फड़फड़ाते हैं
तो कभी तकिए को गीला कर जाते हैं
और जब दुनिया से दूर
खुद को तन्हा पाता हूँ
तो मेरे सपने जो मुझे सोने नहीं देते
उन्हें अपने सिरहाने रखकर सो जाता हूँ।


"शेफाली नायिका"
 
""फिर भी हम खोजते-फिरते हैं प्यार""

तिनके की उम्मीद में आप करते हैं टेलिफ़ोन
तो सब बाथरूम में होते हैं

आप जेब में सिक्के टटोलते हैं

राज्य परिवहन की बस से बहुत दूर
दोपहर में जाते हैं उनसे मिलने
वे सो रहे होते हैं

बीस साल पुराना बचपन का दोस्त नौकरी से बरख़ास्त होकर

अपने पिता का इलाज कराने आपके घर आ जाता है

कविताएँ जीवन स्तर की तरह ही

निकृष्ट हो जाती हैं
(उदाहरणार्थ यही कविता)

दुर्दिनों में कहीं नहीं मिलता उधार

फिर भी हम खोजते-फिरते हैं प्यार
 
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जब भी रंग बदलता पानी

जब भी रंग बदलता पानी.
खुद को खुद से छलता पानी.

पृथ्वी का अनमोल खज़ाना,
उगती फसलें-चलता पानी.

कहीं त्रासदी-कहीं ज़िन्दगी,
मीलों-मील उछलता पानी.

दुनिया भर ऐसे पसमंज़र,
भूखे पेट-उबलता पानी.

उस की मर्जी दे या ना दे,
आंखें और छलकता पानी.




"योगेन्द्र मौदगिल"
 
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