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A wonderful deep touching poem that does somewhat psychological analysis of poetry itself. Its true u always can relate urself with poems and they just ease ur pain n make u feel light ! :)


अनछुई - गौरव

भाव जब कविता बने,
कुछ झूठ आ मिले,
रिश्ता जोडा,
मूल बदल गया,
कविता का रुप वो न रहा,
कुछ था जो उभर नही पाया,
या कवि ने उभरने ना दिया,
सब ने दर्द छुपा रखे हैं,
अपनी अपनी कविता में,
तो क्यों न कहूं,
पिटारी भावों की,
सपनो की,
इसी कविता को।

जब भी खुली,
किसी और के हाथ,
उसने अपना ही चेहरा देखा,
किसी और की कविता में,
सब को अपनी सी लगी,
सब का दर्द एक,
असंतोष,
कभी अपनों से कभी गैरों से,
वो मिली मुझे,
बोली मेरा रुप लौटा दो मुझे,
झुठलाओ नही मुझे,
निकलने दो आंसुओं कि तरह,
प्राकृतिक और अनछुई,
मैं बदल जाउंगी,
तो मुझे दर्पण कौन कहेगा?
मेरा दर्प कहाँ रहेगा?
कविता ने दर्पण बन जाना चाहा,
मैंने बन जाने दिया,
सब को अपनी सी लगी,
प्राकृतिक और अनछुई |


Rock on
Jit
 
जीना चाहते हैं वह मर कर.

नाखुश इतने, नफरत कर कर.
रक्त पीपासा, उर में भर कर.
अपना नया ईश्वर रच कर,
जीना चाहते हैं वह मर कर.

हाथ नहीं हथियार हैं उनके,
मस्तक धड से अलग चले है.
ईच्छा और विवेक से अनबन,
आस्तीन में सांप पले हैं.
काम धर्म का मान लिया है.
जाने कौन किताब को पढ कर.

अपना नया, ईश्वर रच कर.
जीना चाहते, हैं वह मर कर.

खून और चीतकार का जिसने,
अर्थ बदल कर उन्हे बताया.
निर्दोशों को मौत का तौहफा,
दे कर जिसने रब रिझाया.
मां के खून को किया कलंकित,
झूंठे निज गौरव को गढ कर.

अपना नया ईश्वर रच कर.
जीना चाहते हैं वह मर कर.

बचपन की मुस्कान है जीवन,
कांश उन्हें भी कोई बताये.
रास रस उलास है जीवन,
कोई उनको यह समझाये.
क्यों खुद को आहूत कर रहे,
भ्रमित उस संसार में फंसकर.

अपना नया ईश्वर रच कर.
जीना चाहते हैं वह मर कर.


योगेश समदर्शी

 
भाषा उन्नति

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्लै है सोय।
लाख उपाय अनेक यों, भले करे किन कोय।।
इक भाषा इक जीव इक, मति सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात।
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।।
सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय।
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।।

Bhartendu
 
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्लै है सोय।
लाख उपाय अनेक यों, भले करे किन कोय।।
इक भाषा इक जीव इक, मति सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात।
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।।
सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय।
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।।

Bhartendu

Oh wow...wonderful poem.. we used to quote lines from this in school/college in language essays. Thanks for reminding n sharing.
 
लड़ते–लड़ते मन हार गया----डॉ रामसनेही लाल

यह जीवन है संग्राम प्रबल
लड़ना ही है प्रतिक्षण प्रतिपल

जिस ने मन में गीता गुनली वह हार–जीत के पार गया
वह हार गया रण में जिस का लड़ते–लड़ते मन हार गया

संख्या बल कभी नहीं लड़ता
लड़ते हैं सौ या पाँच कहाँ
सच के पथ पर निर्भीक बढ़ो
नहीं साँच को आँच यहाँ

जो चक्रव्यूह गढ़ते, उन के माथे पर लिखा मरण देखा
जो सुई नोंक भर भूमि न दें, उन का भी दीन क्षरण देखा
छल के साथ छली का तन, मन, चिंतन, अशुभ विचार गया
वह हार गया रण में जिस का लड़ते–लड़ते मन हार गया

संकल्पों से टकराने में
हर बार झिझकती झंझायें
झरने की तूफ़ानी गति को
कब रोक सकीं पथ–बाधायें

जो लड़ते हैं वे कल्पकथा बनकर जीते इतिहासों में
सदियों के माथे का चुंबन बनकर जीते अहसासों में
कवि का संवेदन विनत हुआ जब–जब भी उनके द्वार गया
वह हार गया रण में जिसका लड़ते–लड़ते मन हार गया
 
मेरी ज़िद -----कृष्ण वक्षी

तेरी कोशिश, चुप हो जाना,
मेरी ज़िद है, शंख बजाना ...

ये जो सोये, उनकी नीदें
सीमा से भी ज्यादा गहरी
अब तक जाग नहीं पाये वे
सर तक है आ गई दुपहरी;
कब से उन्हें, पुकार रहा हूँ
तुम भी कुछ, आवाज़ मिलाना...

तट की घेराबंदी करके
बैठे हैं सारे के सारे,
कोई मछली छूट न जाये
इसी दाँव में हैं मछुआरे.....
मैं उनको ललकार रहा हूँ,
तुम जल्दी से जाल हटाना.....

ये जो गलत दिशा अनुगामी
दौड़ रहे हैं, अंधी दौड़ें,
अच्छा हो कि हिम्मत करके
हम इनकी हठधर्मी तोड़ें.....
मैं आगे से रोक रहा हूँ -
तुम पीछे से हाँक लगाना ....
 
अब तो मजहब कोई, ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए

आग बहती है यहाँ, गंगा में, झेलम में भी
कोई बतलाए, कहाँ जाकर नहाया जाए

मेरा मकसद है के महफिल रहे रोशन यूँही
खून चाहे मेरा, दीपों में जलाया जाए

मेरे दुख-दर्द का, तुझपर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी ना खाया जाए

जिस्म दो होके भी, दिल एक हो अपने ऐसे
मेरा आँसू, तेरी पलकों से उठाया जाए

गीत गुमसुम है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में,‘नीरज’ को बुलाया जाए

नीरज
 
A nice poem to ponder upon ! ..


यह क्या कम है - विनोद निगम

इन चलते फिरते लोगों में, भीड़ भाड़ में
याद तुम्हारी आ जाती है, यह क्या कम है

कितनी हैं उलझनें यहाँ, रोटी पानी की
नहीं नशीले छन्द जिन्दगी रख सकते हैं
मौसम की रंगीनी, पेट नहीं भर सकती
और न ही ये सपने, तन को ढंक सकते हैं
इतनी उड़ती गर्द धूल में, अन्धकार में
छवि न तुम्हारी मिट पाती है, यह क्या कम है

कोई उत्सव नहीं, व्यर्थ की चहल पहल है
दौड़ रहे हैं लोग, नहीं फिर भी थकते हैं
छिड़ा हुआ संघर्ष, यहाँ आगे जाने का
गिर जाने की छूट, न लेकिन रुक सकते हैं
इतने शोर तमाशे में, इस कोलाहल में
हर ध्वनि तुमको गा जाती है, यह क्या कम है

आवागमन बहुत है लेकिन प्रगति नहीं है
अन्त और प्रारम्भ कि जैसे जुड़े हुए हैं
पहुँच रहे हैं लोग सभी बस एक बिन्दु पर
यों सारे पथ, जगह जगह पर मुड़े हुए हैं
इतनी कुंठाओं में, इतने बिखरेपन में
हवा तुम्हें दुहरा जाती है, यह क्या कम है

इन चलते फिरते लोगों में, भीड़ भाड़ में
याद तुम्हारी आ जाती है, यह क्या कम है |


Rock on
Jit
 
मन ने छाप लिया ----रवीन्द्र

आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।

रंग पंखुरी केसर टहनी नस-नस के सब ताने-बाने,
उनमें कोमल फूल बना जो, भोली आँख उसे ही जाने,
मन ने सौरभ के वातायन से--
असली रस भाँप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था
मन ने उसको छाप लिया।

छवि की गरिमा से मंडित, उस तन की मानक ऊँचाई को,
स्नेह-राग से उद्वेलित उस मन की विह्वल तरुणाई को,
आँखों ने छूना भर चाहा,
मन ने पूरा नाप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।

आँख पुजारी है, पूजा में भर अँजुरी नैवेद्य चढ़ाए,
वेणी गूँथे, रचे महावर, आभूषण ले अंग सजाए,
मन ने जीवन-मंदिर में-
उस प्रतिमा को ही थाप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।
 
बदले भला कहाँ सेहालात इस शहर के।।

वादे तुम्हारे सारे आँसू हुए मगर के।।




ऐसी पड़ी डकैती, चौपट हुई है खेती

केवल बची है रेती पैंदी में इस नहर के ।




घी-दूथ आसमाँ पर, पानीगया रसातल

बस, सामने हमारा प्याले बचे जहर के।




डूबी हमारी कश्ती, टूटी हमारी नावें

बहना पड़ेगा सबको अब साथ में लहर के।




सब जल गए हैं पत्ते, फल-फूल बिक चुके हैं

मौसम भला करे क्या इस बाग में ठहर के।




तूफान क्या उठ बस, ज्वालामुखी फटा है

संकेत हो रहे हैं, सब आखरी प्रहर के।
 
तुम कभी थे सूर्य-----चंद्रसेन

तुम कभी थे सूर्य लेकिन अब दियों तक आ गये।

थे कभी मुख्पृष्ठ पर अब हाशियों तक आ गये ॥


यवनिका बदली कि सारा दृष्य बदला मंच का ।

थे कभी दुल्हा स्वयं बारातियों तक आ गये ।।


वक्त का पहिया किसे कब कहां कुचले क्या पता ।

थे कभी रथवान अब बैसाखियों तक आ गये ।।


देख ली सत्ता किसी वारांगना से कम नहीं ।

जो कि अध्यादेश थे खुद अर्जियों तक आ गये ।।


देश के संदर्भ मे तुम बोल लेते खूब हो ।

बात ध्वज की थी चलाई कुर्सियों तक आ गये ।।


प्रेम के आख्यान मे तुम आत्मा से थे चले ।

घूम फिर कर देह की गोलाईयों तक आ गये ॥


कुछ बिके आलोचकों की मानकर ही गीत को ।

तुम ॠचाएं मानते थे गालियों तक आ गये ॥


सभ्यता के पंथ पर यह आदमी की यात्रा ।

देवताओं से शुरु की वहशियों तक आ गये ॥
 
हो गए जज्बात सब पत्थर मगर बोलूंगा मैं,

हो गए जज्बात सब पत्थर मगर बोलूंगा मैं,
है तुम्हारे हाथ में खंजर मगर बोलूंगा मैं|


तू समझ दीवानगी या और कोई नाम दे,
वो गया है बात ये कहकर मगर बोलूंगा मैं|


भीड़ से कोई अलहदा बात होनी चाहिए,
सब रहे खामोश बुत होकर मगर बोलूंगा मैं|


बेबसी हो मुफलिसी या दूसरी मजबूरियां,
रोकती हैं ये सभी अक्सर मगर बोलूंगा मैं|


बोलने की सजा जो यह हुआ माहौल है,
कत्लो-गारत लाश का मंजर मगर बोलूंगा मैं|





प्रताप सोमवंशी
 
ख्वाब तो देखे परी की तरफ नही देखा

ख्वाब तो देखे परी की तरफ नही देखा
जिसको सब देखें उसी की तरफ नहीं देखा


वो जो आकाश से लौटा है अब कहां जाए
शख्स जिसने की जमीं की तरफ नहीं देखा


एड़ियों से रगड़ के हमने निकाला पानी
खुद कमाया है नदी की तरफ नहीं देखा


तुमको लगता है उदासी तुम्हारे साथ ही है
दोस्त मैने भी खुशी की तरफ नहीं देखा


देख तो उसकी नजर भी कमाल है साहेब
खूबियां देखी कमी की तरफ नहीं देखा

प्रताप सोमवंशी

 
Last edited:
A beautiful inspiring poem that gives wonderful msg to keep up the HOPE even in troubled times. :)

आस न छोड़ो - हरे राम समीप

मुश्किल आई है
तो क्या है
यह भी जल्दी हट जाएगी

घुप्प अँधेरे कमरे में यों
मुश्किल ओढ़े
अवसादों से
घिरे हुए तुम
घबराए-से
क्यों बैठे हो

ज़रा टटोलो
दीवारों को
उम्मीदों की अँगुलियों के
कोमल ज़िंदा इन पोरों से
आहिस्ता-आहिस्ता खोजो
हाथों से दीवार न छोड़ो

कमरे की इन दीवारों में
कोई खिड़की निश्चित होगी
जिसके बाहर
बाँह पसारे स्वागत करने
नई रोशनी मिल जाएगी
जुगनू होंगे, दीपक होगा
चाँद–सितारे कुछ तो होंगे
सूरज भी आ ही जाएगा
आस न छोड़ो

मुश्किल में तुम
आस न छोड़ो ..


Rock on
Jit
 
माँ-बेटी

बरसों पहले नानी ने
माँ से कहा था
तुम फलांगना चाहती हो पहाड़
झाँकना चाहती हो बादलों के पार
पाना चाहती हो सागर के पानियों की थाह
मुई! तुझे कैसे समझाऊँ ?
आकाश से लटके रहते हैं कुछ उक़ाब
पलक झपकते ही पंजों में दबोच ले जाएँगे
पहाड़ों की खोहों में छिपे कुछ जिन्न
सूँघ लेंगे तुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू.
सागर के पानियों में बैठे हैं
कुछ घड़ियाल.
सच तो यह है कि पानी , पहाड़
आकाश किछ भी नहीं है
औरत के लिए.
उसे झूलने हैं केवल इन्द्रधनुषी झूले.
माँ ने अपनी नन्हीं -सी छाती में सहेज लिया था
यह कड़वा-सा सच.
बरसों बाद माँ ने अपनी
बेटी से कहा
तुझे फलाँगने हैं पहाड़
तुझे जाना है बादलों के पार
तुझे पानी है पानियों की थाह
तुझे नहीं झूलने इन्द्रधनुषी झूले.
तुझे लिखना है आकाश की छाती पर
अपने तर्जनी से एक इतिहास
तुझे पालना है सागर की कोख में
अनन्त विश्वास
तुझे फलाँगना है हिमालय का अभिमान
तुझे तोड़नी है मिथक
औरत की हर सफलता का रास्ता
जिस्म से हो कर नहीं गुज़रता.


सरोज परमार



 
Silence, describes all the colors of emotions, a wonderful deep touching poem to ponder upon hush ! :)


मौन का सागर - शशि पाधा

मौन का सागर बना अपार
मैं इस पार - तू उस पार

कहीं तो रोके अहं का कोहरा,
कहीं दर्प की खड़ी दीवार
शब्दों की नैया को बाँधे
खड़े रहे मंझधार ।

शाख मान की झुकी नहीं
बहती धारा रुकी नहीं
कुंठाओं के गहन भंवर में
छूट गई पतवार ..

सुनो पवन का मुखरित गान
अवसादों का हो अवसान
संग ले गई स्वप्न सुनहले
खामोशी पतझार ..

लहरें देती नम्र निमंत्रण
संध्या का स्नेहिल अनुमोदन
अस्ताचल का सूरज कहता
खोलो मन के द्वार ।


Rock on
Jit
 
बहुत ही सुंदर रचना लिखी है ज़नाब ज़ाहिर कुरैशी साहेब ने
भीड़ से अलग हटकर हमें सोचना होगा





अनैतिकता के चश्मों को बदलकर देखना होगा
गलत राहों पे वो कैसे गई ये सोचना होगा

कहाँ तक याद रखिए —खट्टी, मीठी, कड़वी बातों को

हमें आगत की खतिर भी विगत को भूलना होगा

विरोधी दोस्त भी है, रोज मिलता है, इसी कारण

विरोधी के इरादों को समझना —बूझना होगा

बहुत उन्मुक्त हो कर जिन्दगी जीना भी जोखिम है

नदी की धार को अनुशासनों में बाँधना होगा

लड़ाई में उतर कर, भागना तो का—पुरुषता है,

लड़ाई में उतर कर, जीतना या हारना होगा

मनोविज्ञान की भाषा में अपने मन की गाँठों को

अकेले बंद कमरे में किसी दिन खोलना होगा

बचाना है अगर इस मुल्क की उजली विरसत को

हमें अपनी जड़ों की ओर फिर से लौटना होगा
 
एक और बहुत ही सटीक रचना ज़हिर साहेब की कलम से

‘लिंग निर्धारण’ समस्या हो गई
कोख में ही कत्ल कन्या हो गई

लोग कर पाए नहीं खुल कर विरोध
सिर्फ अखबारों में निन्दा हो गई

चल रहा है माफिया —गुंडों का राज
इस कदर कमजोर सत्ता हो गई !

क्या पता किस वक्त अणुबम फट पड़े
ये हमारे युग की चिन्ता हो गई

साधु—संतों ने मचाया इतना शोर
भंग भक्तों की तपस्या हो गई

राज करने के लिए नेता हुए
वोट देने भर को जनता हो गई

मन में मिसरी की तरह घुलती नही
सिर्फ भाषा—जाल कविता हो गई
 
जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी

घिरी लंका के चारों ओर गहरा गूढ़ खाई थी
इन्हीं गड्ढों से महलों की गगनभेदी ऊँचाई थी
हज़ारों अस्मतों को लूटकर वह खिलखिलाता था
स्वयं सूरज तमस से तुप गया था, तिलमिलाता था


सभी भूखे थे नंगे थे, तबाही ही तबाही थी
मगर अन्याय का प्रतिरोध करने की मनाही थी
किसी ने न्याय माँगा तो समझ लो उसकी आफ़त थी
न जीने की इजाज़त थी न मरने की इजाज़त थी


धरा को क़ैद कर आराम से वह रह न सकता था
मनुज इस क्रूर शोषण को बहुत दिन सह न सकता था
स्वयं अन्याय ने पीड़ित दलित को ला जुटाया था
प्रवासी राम ने विद्रोह का बीड़ा उठाया था


नये संघर्ष की यह शक्ति धरती ने जगायी थी
किसी अवधेश या मिथिलेश की सेना न आयी थी
सुबह से शाम तक जो राक्षसी अन्याय सहते थे
जिन्हें सब जंगली हैवान बन्दर भालु कहते थे


नयी जनशक्ति की हर साँस से हुंकार उठती थी
प्रबल गतिरोध के विध्वंस की धधकार उठती थी
कि बर्बर राक्षसों का जंगली वीरों से पाला था
महीधर फाँद डाले थे समुन्दर बाँध डाला था


उधर थी संगठित सेना अनेकों यन्त्र दुर्धर थे
इधर हुंकारते हाथों में केवल पेड़-पत्थर थे
मगर था एक ही आदर्श जीने का जिलाने का
विगत जर्जर व्यवस्था को स्वयं मिटकर मिटाने का


नयी थी कामना, नवभावना, संदेश नूतन था
नयी थी प्रेरणा, नव कल्पना, परिवेश नूतन था
नया था मोल जीवन का विषमता ध्वंस करने का
नया था कौल मानव का, धरा को मुक्त करने का


चली क्या राम की सेना कि धरती बोल उठती थी
अखंडित शक्ति का भण्डार अपना खोल उठती थी
धरा की लाड़ली की जब अभय आशीष पायी थी
किसी हनुमान ने तब स्वर्ण की लंका जलायी थी


कँगूरे स्वर्ण-सौधों के धरा लुंठित दिखाते थे
नुकीले अस्त्र दुश्मन के निरे कुंठित दिखाते थे
अमन का शंख बजता था दमन की दाह होती थी
मनुज की दानवों को आज खुल करके चुनौती थी


विजय का बिगुल बजता था, अनय का नाश होता था
अँधेरा साँस गिनता था, सबेरा पास होता था
सिसकती रात के अंचल में रजनीचर बिलखते थे
उभरती उषा की गोदी में नव अंकुर किलकते थे


घड़ी अन्तिम समझ दनुकुल जले शोले गिराता था
प्रबल जनबल उन्हें फिर मोड़ उन पर ही फिराता था
नयी गंगा विषमता के कगारों को ढहाती थी
नयी धारा, नयी लहरें उसे समतल बनाती थी


युगों की साधना-सी राम ने जब शक्ति छोड़ी थी
किसी जर्जर व्यवस्था की विकट चट्टान तोड़ी थी
कटे सिर-सा पड़ा रावण धरा पर छटपटाता था
विगत युग मर्सिया गाता, नया युग गान गाता था


बहुत दिन बाद दलितों की हँसी की आज पारी थी
कि फिर से मुक्त था मानव कि फिर से मुक्त नारी थी
बँधी मुट्ठी दिखा जन-टोलियाँ जय-गान गाती थीं
कि नव निर्माण के जंगल में भी मंगल मनाती थी


धरा की लाड़ली प्रिय से लिपटने को ललकती थी
नयी कोंपल के होठों से, नयी कलिका किलकती थी
चपल चपला-सी आँखों में नयी आभा झलकती थी
सुधा के युगकटोरों से मदिर छलकन छलकती थी


सबेरे का भटकता शाम को घर लौट आया था
नयी उन्मुक्त जनता ने नया उत्सव मनाया था
छिनी धरती मिली फिर से नये सपने सँजोए थे
सभी ने खेत जोते थे सभी ने बीज बोए थे


घिरा काली घटाएँ थीं अमा की रात काली थी
मगर मानव-धरा के सम्मिलन की बात ही ऐसी निराली थी


अयोध्या में नये युग को बुलाने की बेहाली थी
कि जिसके साज स्वागत में सजी पहली दिवाली थी
धरा की लाड़ली ने स्वयं जिसकी ज्योति बाली थी
विकल सूखे हुए अधरों में नव मुस्कान ढाली थी


कि अस्त-व्यस्त तारों में नयी स्वर तान ढाली थी
धरा में स्वर्ग से बढ़कर सरसता थी, खुशहाली थी
वही पहला जनोत्सव था वही पहली दिवाली थी


लहलहाती जब धरा थी, शस्य-श्यामल
गुनगुनाती जब गिरा थी गीत कल-कल
छलछलाते स्नेह से जब पात्र छ्लछल
झलमलाते जब प्रभा के पर्व पल-पल


आज तुम दुहरा रहे हो प्रथा केवल
आज घर-घर में नहीं है स्नेह सम्बल
आज जन-जन में नहीं है ज्योति का बल
आज सूखी वर्त्तिका का सुलगता गुल
दीप बुझते जा रहे हैं विवश ढुल-ढुल


शेष खण्डहर में विगत युग की निशानी
सुन रहे हो स्वपन में जैसे कहानी
बन गई हो जिस तरह अपनी बिरानी


किंतु जन-जागृति धधकती जा रही है
जल उठेगी फिर नयी बाती सुहानी
जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी


शिवमंगल सिंह 'सुमन'
 
Ardh Satya, A wonderful thought provoking poem by Dilip Chitre that inspired many even filmmakers to make truly classy epic movie of same name. Poem leaves a deep impact on the inner soul. Read n think bout it ! ..


अर्ध सत्य - दिलीप चित्रे

चक्रव्यूह में घुसने से पहले,
कौन था में और कैसा था,
यह मुझे याद ही ना रहेगा .

चक्रव्यूह में घुसने के बाद,
मेरे और चक्रव्यूह के बीच,
सिर्फ़ एक जानलेवा निकटता थी,
इसका मुझे पता ही ना चलेगा .

चक्रव्यूह से निकलने के बाद,
मैं मुक्त हो जाऊं भले ही,
फिर भी चक्रव्यूह की रचना में,
फ़र्क ही ना पड़ेगा .

मरुँ या मारूँ ,
मारा जाऊँ या जान से मार दूं,
इसका फैसला कभी ना हो पायेगा .

सोया हुआ आदमी जब,
नींद से उठकर चलना शुरू करता है,
तब सपनों का संसार उसे,
दोबारा दिख ही ना पायेगा .

उस रौशनी में जो निर्णय की रौशनी है,
सब कुछ सामान होगा क्या?
एक पलड़े में नपुंसकता,
एक पलड़े में पौरुष,
और ठीक तराजू के कांटे पर,
अर्ध सत्य !!


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Jit
 
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