Hindi Kavita

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जब कोई आदमी
करता है किसी से
सच्चा प्यार
तो सब कुछ बताना चाहता है

आसमान का रंग
इस समय कैसा है
कैसी हो रही है बारिश
अचानक उसके शहर में
कितनी उल्लसित हैं तरंगें
समुद्र में
कितना-कितना गर्जन
कितनी गहरी है रात
कितनी उदासी

वह अपनी हर ख़ुशी
बताना चाहता है
जब उड़ी आसमान पर पतंगें उसकी
तो वह इस ख़ुशी को फ़ौरन
एक संदेश की तरह चाहता है भेजना
यहाँ तक कि उसके घर के सामने
तार पर बैठी हो कोई चिड़िया
तो वह भी बताना चाहता है
चाहता है यह भी बताना
आज उसके आँगन में एक फूल खिला है
धूप निकली है बहुत दिनों के बाद
पार्क में

हालाँकि कुछ लोग यह भी
कहते हैं इसमें बताना क्या है
क्या नहीं है उसे मालूम
पर जब आदमी करता है
किसी से सच्चा प्यार
तो आटे दाल और
सब्ज़ियों के दाम भी
चाहता है बताना
किस तरह बढ़ गई है महंगाई
और प्याज के भाव
चढ़ गए आसमान पर

उफ! यह ट्रैफ़िक जाम
किस तरह झर रहा है पलस्तर
दीवार पर चल रही है
एक छिपकली
किस तरह जर्जर हो गया है
यह मकान
बढ़ गया है कितना
किराया
और स्कूल की फ़ीस

वह खाने के स्वाद
पानी का रंग
मिट्टी की सोंधी सोंधी खुशबू
भी बताना चाहता है
अपने समय की राजनीति
और दुष्चक्र तो ज़रूर ही
झूठ और सच के भेद को भी
फ़रेब को भी
बताना चाहता है

बताना चाहता है
कोई गाना
किस तरह उसके दिल को छू गया एक दिन
पर यह भी बताना चाहता है
नौकरी करता किस तरह घुट-घुटकर
इन दिनों
और नहीं मिल पा रही
समय पर
तनख़्वाह....

वह यह भी बताना चाहता है
उसके मन में है
किस तरह की है गुत्थियाँ
किस तरह की उलझनें
किस तरह से विचलन-आकर्षण
वह अपनी कमज़ोरी या कमी को बताए
बताए अपने लालच
यह घृणा को
तो समझिए
वाकई वह प्यार करता है
आपसे सच्चा

अगर वह आदमी
नहीं बताना चाहता है
तो समझो वह कुछ
छिपा रहा है
सच्चा प्यार
करना है
तो किसी को
अपने पुण्य और पाप भी बताने चाहिए

प्यार में कुछ भी नहीं छिपाना चाहिए
अगर वह किसी और से प्यार करने लगा है
तो यह बात उसे सबसे पहले बतानी चाहिए
जितना पारदर्शी होगा प्यार
उतना ही होगा वह
मज़बूत
और तूफ़ान में भी वह टिकेगा
हरदम

कोई ताक़त
नहीं हिला सकती उसे ।
 
हरिवंशराय बच्चन

गुण तो नि:संशय देश तुम्*हारे गाएगा,
तुम-सा सदियों के बाद कहीं फिर पाएगा,
पर जिन आदर्शों को तुम लेकर तुम जिए-मरे, कितना उनको कल का भारत अपनाएगा?
बाएँ था सागर औ' दाएँ था दावानल,
तुम चले बीच दोनों के, साधक, सम्*हल-सम्*हल,
तुम खड्गधार-सा पंथ प्रेम का छोड़ गए, लेकिन उस पर पाँवों को कौन बढ़ाएगा?
जो पहन चुनौती पशुता को दी थी तुमने,
जो पहन दनुज से कुश्*ती ली थी तुमने,
तुम मानवता का महाकवच तो छोड़ गए, लेकिन उसके बोझे को कौन उठाएगा?
शासन-सम्राट डरे जिसकी टंकारों से,
घबराई फ़*िरकेवारी जिसके वारों से,
तुम सत्*य-अहिंसा का अजगव तो छोड़ गए, लेकिन उस पर प्रत्*यंचा कौन चढ़एगा?
 
इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी
बारिश सा शोर न था उसमें, सागर की तरह वो बहती थी
कोई उस को पढ़ न पाया, न कोई उसको समझा तब
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

शख़्स जो अक़्सर दिखता था, उस दिल के झरोखे में
दर्द कई वो देता था, रखता था उसको धोखे में
जितने पल रुकता था आकर, वो उस में सिमटी रहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

इक दिन ऐसा भी आया, वो आया पर दर नहीं खुला
दरवाज़े पर हँसता था जो, इक चेहरा उस को नहीं मिला
आँसू के हर्फ़ वहाँ थे, और था वफ़ा का किस्सा भी
तब जान गये आख़िर, सब कैसे वो टूटी, कहाँ मिटी

समझा तब लोगों ने उसको, कैसे वो ताने सहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी


बाद उसके ख़त भी मिले, जिनमें कई प्यार की बातें थी
सौगातें थी पाक दुआ की, भेजी चाँदनी रातें थी
लिखा था उसने, सम्हल के रहना, इतना भी मत गुस्सा करना
अब और कोई न सीखेगा, तुम से जीना, तुम पर मरना
अब वो पागल लड़की नहीं रही, जो तुम को खूब समझती थी
हर गुस्से को हर चुप को, आसानी से जो पढ़ती थी

समझा वो भी अब जाकर, क्या उसकी आँखें कहती थी
था प्यार बला का उससे ही, वो जिसके ताने सहती थी
इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी
 
अर्पित तुमको मेरी आशा, और निराशा, और पिपासा.

पंख उगे थे मेरे जिस दिन तुमने कन्धे सहलाए थे,
जिस-जिस दिशि-पथ पर मैं विहरा एक तुम्हारे बतलाये थे,
विचरण को सौ ठौर, बसेरे को केवल गल्बांह तुम्हारी,
अर्पित तुमको मेरी आशा, और निराशा, और पिपासा.

ऊँचे-ऊँचे लक्ष्य बनाकर जब-जब उनको छू कर आता,
हर्ष तुम्हारे मन का मेरे, मन का प्रतिद्वन्दी बन जाता.
और जहाँ मेरी असफलता मेरी विव्हलता बन जाती,
वहाँ तुम्हारा ही दिल बनता मेरे दिल का एक दिलासा.
अर्पित तुमको मेरी आशा, और निराशा, और पिपासा.

नाम तुम्हारा ले लूँ, मेरे स्वप्नों की नामावली पूरी,
तुम जिससे सम्बद्ध नहीं वह काम अधूरा, बात अधूरी,
तुम जिसमे डोले वह जीवन, तुम जिसमे बोले वह वाणी,
मुर्दा-मूक नहीं तो मेरे सब अरमान, सभी अभिलाषा.
अर्पित तुमको मेरी आशा, और निराशा, और पिपासा.

तुमसे क्या पाने को तरसा करता हूँ कैसे बतलाऊँ,
तुमको क्या देने को आतुर रहता हूँ कैसे जतलाऊँ,
यह चमड़े की जीभ पकड़ कब पाती है मेरे भावों को,
इन गीतों में पंगु स्वर्ग में नर्तन करने वाली भाषा.
अर्पित तुमको मेरी आशा, और निराशा, और पिपासा.
 
पतझड़ के पीले पत्तों ने
प्रिय देखा था मधुमास कभी;
जो कहलाता है आज रुदन,
वह कहलाया था हास कभी;
आँखों के मोती बन-बनकर
जो टूट चुके हैं अभी-अभी
सच कहता हूँ, उन सपनों में
भी था मुझको विश्वास कभी ।

आलोक दिया हँसकर प्रातः
अस्ताचल पर के दिनकर ने;
जल बरसाया था आज अनल
बरसाने वाले अम्बर ने;
जिसको सुनकर भय-शंका से
भावुक जग उठता काँप यहाँ;
सच कहता-हैं कितने रसमय
संगीत रचे मेरे स्वर ने ।

तुम हो जाती हो सजल नयन
लखकर यह पागलपन मेरा;
मैं हँस देता हूँ यह कहकर
"लो टूट चुका बन्धन मेरा!"
ये ज्ञान और भ्रम की बातें-
तुम क्या जानो, मैं क्या जानूँ ?
है एक विवशता से प्रेरित
जीवन सबका, जीवन मेरा !

कितने ही रस से भरे हृदय,
कितने ही उन्मद-मदिर-नयन,
संसृति ने बेसुध यहाँ रचे
कितने ही कोमल आलिंगन;
फिर एक अकेली तुम ही क्यों
मेरे जीवन में भार बनीं ?
जिसने तोड़ा प्रिय उसने ही
था दिया प्रेम का यह बन्धन !

कब तुमने मेरे मानस में
था स्पन्दन का संचार किया ?
कब मैंने प्राण तुम्हारा निज
प्राणों से था अभिसार किया ?
हम-तुमको कोई और यहाँ
ले आया-जाया करता है;
मैं पूछ रहा हूँ आज अरे
किसने कब किससे प्यार किया ?

जिस सागर से मधु निकला है,
विष भी था उसके अन्तर में,
प्राणों की व्याकुल हूक-भरी
कोयल के उस पंचम स्वर में;
जिसको जग मिटना कहता है,
उसमें ही बनने का क्रम है;
तुम क्या जानो कितना वैभव
है मेरे इस उजड़े घर में ?

मेरी आँखों की दो बूँदों
में लहरें उठतीं लहर-लहर;
मेरी सूनी-सी आहों में
अम्बर उठता है मौन सिहर,
निज में लय कर ब्रह्माण्ड निखिल
मैं एकाकी बन चुका यहाँ,
संसृति का युग बन चुका अरे
मेरे वियोग का प्रथम प्रहर !

कल तक जो विवश तुम्हारा था,
वह आज स्वयं हूँ मैं अपना;
सीमा का बन्धन जो कि बना,
मैं तोड़ चुका हूँ वह सपना;
पैरों पर गति के अंगारे,
सर पर जीवन की ज्वाला है;
वह एक हँसी का खेल जिसे
तुम रोकर कह देती 'तपना'।

मैं बढ़ता जाता हूँ प्रतिपल,
गति है नीचे गति है ऊपर;
भ्रमती ही रहती है पृथ्वी,
भ्रमता ही रहता है अम्बर !
इस भ्रम में भ्रमकर ही भ्रम के
जग में मैंने पाया तुमको;
जग नश्वर है, तुम नश्वर हो,
बस मैं हूँ केवल एक अमर !
 
An inspiring poem by Gopaldas Neeraj-

भूल गया है तू अपना पथ,
और नहीं पंखों में भी गति,
किंतु लौटना पीछे पथ पर अरे, मौत से भी है बदतर ।
खग ! उडते रेहना जीवन भर !


मत डर प्रलय झकोरों से तू,
बढ आशा हलकोरों से तू,
क्षण में यह अरि-दल मिट जायेगा तेरे पंखों से पिस कर ।
खग ! उडते रेहना जीवन भर !


यदि तू लौट पडेगा थक कर,
अंधड काल बवंडर से डर,
प्यार तुझे करने वाले ही देखेंगे तुझ को हँस-हँस कर ।
खग ! उडते रेहना जीवन भर !


और मिट गया चलते चलते,
मंजिल पथ तय करते करते,
तेरी खाक चढाएगा जग उन्नत भाल और आखों पर ।
खग ! उडते रेहना जीवन भर !
 
A beautiful poem by Atal ji-

टूटे हुए तारों से फूटे वासन्ती स्वर,
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर,

झरे सब पीले पात,
कोयल की कुहुक रात,

प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूँ

गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी?
अन्तर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी

हार नहीं मानूँगा,
रार नई ठानूँगा,

काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ
 
Nice One...

इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी
बारिश सा शोर न था उसमें, सागर की तरह वो बहती थी
कोई उस को पढ़ न पाया, न कोई उसको समझा तब
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

शख़्स जो अक़्सर दिखता था, उस दिल के झरोखे में
दर्द कई वो देता था, रखता था उसको धोखे में
जितने पल रुकता था आकर, वो उस में सिमटी रहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

इक दिन ऐसा भी आया, वो आया पर दर नहीं खुला
दरवाज़े पर हँसता था जो, इक चेहरा उस को नहीं मिला
आँसू के हर्फ़ वहाँ थे, और था वफ़ा का किस्सा भी
तब जान गये आख़िर, सब कैसे वो टूटी, कहाँ मिटी

समझा तब लोगों ने उसको, कैसे वो ताने सहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी


बाद उसके ख़त भी मिले, जिनमें कई प्यार की बातें थी
सौगातें थी पाक दुआ की, भेजी चाँदनी रातें थी
लिखा था उसने, सम्हल के रहना, इतना भी मत गुस्सा करना
अब और कोई न सीखेगा, तुम से जीना, तुम पर मरना
अब वो पागल लड़की नहीं रही, जो तुम को खूब समझती थी
हर गुस्से को हर चुप को, आसानी से जो पढ़ती थी

समझा वो भी अब जाकर, क्या उसकी आँखें कहती थी
था प्यार बला का उससे ही, वो जिसके ताने सहती थी
इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी
 
रसोईघरों में तीन सौ साठ अंशों की व्यस्तता के फलक में
हर लम्हा-हर एक छोटे से कोण में मौजूद दिखतीं स्त्रियाँ
नमक-मिर्च, शक्कर, हल्दी-धनिया और
मसालों की खुशबुओं का अनुपात चुटकियों में
अपने अंदाज से साधती
वह भी गुनगुनाते हुए बदस्तूर
चाहे बच्चों की भूख-प्यास का समय हो या
मर्दों की तलब या बुज़ुर्गों के खाँसने में छुपे हुए इशारे
इन सबके अर्थ समाहित थे उनके अंदाजों की दिव्य-दृष्टि में
सारी स्त्रियों के अंदर
अंदाज की मशीन हमेशा ठीक-ठाक काम करती रही
और तो और उसमें लगातार संसाधित होते रहे
चूल्हे की आँच के तापमान से लेकर
मौसमों के पूर्वानुमान तक के आँकड़े
इस तरह तय समय पर आते रहे
एक के बाद एक वसंत इस धरती पर
और धीरे-धीरे भरता गया आकाश स्त्रियों के अंदाज से बने रंगों के इंद्रधनुष से
कई-कई बार तो हैरानी होती
कैसे कभी थर्मामीटर और माइक्रोवेव-ओवन जैसे कई उपकरण भी हुए फेल
परदे के पीछे रहकर महसूस करके अंदाज लगा लेने के उस नायाब हुनर के आगे
जो गुँजाता था व्योम में सधे हुए हाथ के करिश्मे का गान
कहना मुश्किल कहाँ से प्रवेश करती थी सटीक अंदाजों की अजस्र धारा अपने-आप
सास-माँ से लेकर तो बहू-बेटी तक की देहों के भीतर अनंत काल से
दुनिया के बारे में
कोई कहती नज़र से पहचानती हैं हम सबको
कोई कहती आवाज़ के लहज़े से
कोई कहती चाल-ढाल से
कोई कहती पता नहीं कैसे मगर हाँ
अपने-आप हो जाता है अंदाजा
यही आख़िरी बात
जो समीकरण है
अपने-आप लग जाने वाले अंदाजों के गणित का
इसी में दुनिया के ख़ूबसूरत बने होने का राज़ छुपा हुआ है ।
 
हंसी की इक
फिजूल सी कोशिश में
कई बार मैं
उसके चेहरे को टटोलती
जालों को उतारने की
नाकाम कोशिश में
बादबनखोलती
पर हवायें
और मुखालिफ़ हो जातीं
इर्द-गिर्द के घेरे
और कस जाते...

आँखें
एक लम्हे के लिए
आस की लौ में
चमक उठतीं
और दूसरे ही पल
तेज धूप की आंच लिए
बेमौसम की बरसात में
बोझल हो जातीं...

इक नक्श उभरता
चेहरा टूटता
जख्म हंसते
आसमां फिर एक
झूठी कहानी गढने लगता...

मैं...
पढने की कोशिश करती
मुझे यकीन था
वो लड़खडा़येगा
सख्त चट्टानों से टकराकर
सच उसके चेहरे पर
छलक आयेगा...

मैं पूछती
तुम्हें याद है....
इक बार जब तुम गिर पडे़ थे...
ऊपरी सीढी़ से....?
उसने कहा...
नहीं..
मुझे कुछ याद नहीं..
मैं कभी नहीं गिरा..
मैं गिरना नहीं जानता
मैं निरंतर चलना जानता हूँ
आखिरी सीढी़ तक...

मैंने फिर कहा...
जानते हो यह तुम्हारे
चेहरे पर का जख्म.....?
नहीं.......
मै किसी अतीत से नहीं बँधा
गिरना और चोट लगना
एक स्वभाविक क्रिया है
न वह अतीत है
न वर्तमान...
ज़िंदगी एक गहरी नदी है
मुझे इस पानी में उतरना है
मेरे लिए हवाओं का साथ
मायने नहीं रखता...

मैंने
फिर एक कोशिश की...
कहा...
कुछ बोझ मुझे दे दो
हम साथ-साथ चलेंगें तो
हवायें सिसकेंगी नहीं...!

हुँह...!
तुम्हारी यही तो त्रासदी है
ज़िंदगी भर
गिरने का रोना...
खोने का रोना...
पाने का रोना...
दर्द का रोना...
रोना और सिर्फ रोना...

मैंने देखा
उसके चेहरे के निशान
कुछ और गहरे हो गए थे
अब कमरे में घुटन साँसे लेने लगी थी
मुझे अजीब सी कोफ्त होने लगी
खिड़की अगर बंद हो तो
अंधेरे और सन्नाटे
और सिमट आते हैं
मैंने उठकर
बंद खिड़की खोल दी
सामने देखा...
धूप की हल्की सी किरण में
मकडी़ इक नया जाल
बुन रही थी
 
गुलज़ार

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने
काले घर में सूरज रख क़े,
तुमने शायद सोचा था, मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे,
मैंने एक चिराग़ जला कर,
अपना रस्ता खोल लिया

तुमने एक समन्दर हाथ में ले कर, मुझ पर ठेल दिया
मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख दी
काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा
मैंने काल को तोड़ क़े लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया

मेरी ख़ुदी को तुमने चन्द चमत्कारों से मारना चाहा,
मेरे इक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया -

मौत की शह दे कर तुमने समझा अब तो मात हुई,
मैंने जिस्म का ख़ोल उतार क़े सौंप दिया
और रूह बचा ली

पूरे-का-पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाज़ी
 
आओ चलें - अपने गाँव
जहाँ है बचपन की ठंडी छाँव

गाँव के उस पुराने प्राइमरी स्कूल की तरफ
जिसके नाम के भी मिट गए थे हरफ
जहाँ हर रोज सुबह हम घर से लाते थे
और अपने हाथों से बिछाते थे
एक लम्बी सी दरी
स्याही के धब्बों से भरी
उस बूढ़े पीपल के पेड़ के नीचे
दीवार पर रंगे ब्लैक बोर्ड के पीछे
और फिर शुरू हो जाती थी पाठशाला
रोज का मिर्च मसाला
मास्टरजी के हाथ में छड़ी का लहराना
और हमारा जोर जोर से चिल्लाना
दो एकम दो......दो दूनी चार .......
दो तीये छः.....दो चौके आठ ....

थोड़ी दूर और चलें
चल कर मिलें
जोहड़ से गाँव की
मचलते पाँव की
जहाँ लगाते थे छलांग
होती हवा में टाँग
पास ही बनी मुंडेर से
इंटों के बने घेर से
हमेशा यही फ़िराक
की बनना है तैराक
बिना किसी सोच के
बिना किसी कोच के

और वो नीम का घना दरख़्त
अन्दर से नर्म बाहर से सख्त
कडवाहट के बीच लगती थी
पीली हो पकती थी
मीठी निमोली
भर भर के झोली
जिसका कोई मोल नहीं था
जिसका कोई तोल नहीं था
आज नहीं मिलती किसी शहरी बाज़ार में
रुपैये, डॉलर या पौंड के व्यवहार में

और वहीँ पास में वो पुराना शिवाला
जिसके पीछे थी गौशाला
जिसकी आरती में हम बैठते थे
आँखे बंद कर भक्ति में पैठते थे
भगवान से ज्यादा पुजारी के लिए
मखानों और बताशों की रोजगारी के लिए

और शाम को वो घर को लौटना
नंगे पावँ मिटटी में लोटना
कभी भैंसों की पीठ पर
कभी ऊंटों की रीढ़ पर
कभी बछड़ों की पूँछ पकड़ कर
कभी पिल्लों को बाँहों में जकड कर
मिटटी से भरे बालों को खुजलाते
टूटी फूटी भाषा में कुछ न कुछ गाते

वो दृश्य यादों से न जाते हैं
वो दिन कितने याद आते हैं
आओ फिर एक बार चले गाँव
और ढूंढें अपना ठांव
 
A touching poem that describes well .. the loneliness of self in overcrowded lifeless city, B'ful!


शहर के एकांत में - यश मालवीय

भीड़ ,केवल
भीड़ मिलती
शहर के एकांत में
रूह के संग
देह छिलती
शहर के एकांत में

साइबर कैफ़े
हमारी बात
कह पाते नहीं
हम स्वयं से
बिना बोले
तनिक रह पाते नहीं
एक पत्ती
नहीं हिलती
शहर के एकांत में

टूट जाता है
भरोसा
टूट जाते आइने
गिनतियों के
शोर में कोई
किसी को क्या गिने
धूप खुलकर
नहीं खिलती
शहर के एकांत में

चूर हो
लहरें बिखरती
और शक्लें जागतीं
ट्रेन के पीछे
गठरियाँ लिए
अपनी भागतीं
याद,गहरे
जख्म सिलती
शहर के एकांत में ! ..



Cheers
Jit
 
[h=1]अंशु मालवीय[/h]कर्ज़ की हमको दवा बताई
कर्ज़ ही थी बीमारी
साधो !
करमन की गति न्यारी ।

गेहूँ उगे शेयर नगरी में
खेतों में बस भूख उग रही
मूल्य सूचकांक पे चिड़िया
गाँव शहर की प्यास चुग रही
करखानों में हाथ कट रहे
मक़तल में त्यौहारी
साधो !
करमन की गति न्यारी ।


बढ़ती महंगाई की रस्सी
ग्रोथ रेट बैलेन्स बनाए
घट-बढ़ के सर्कस के बाहर
भूखों के दल खेल दिखाए
मेहनत-क़िस्मत-बरकत बेचें
सरकारी व्योपारी
साधो !
करमन की गति न्यारी ।


शहर-शहर में बरतन मांजे
भारत माता ग्रामवासिनी
फिर भी राशनकार्ड न पाए
हर-हर गंगे पापनाशिनी
ग्लोबल गाँव हुई दुनिया में
प्लास्टिक की तरकारी
साधो !
करमन की गति न्यारी !

 
[h=1]कृष्णमोहन झा[/h]
मैं उन कहावतों और दंतकथाओं को नहीं मानता
कि अपनी अंतिम यात्रा में आदमी
कुछ भी नहीं ले जाता अपने साथ

बड़े जतन से जो पृथ्वी
उसे गढकर बनाती है आदमी
जो नदियाँ उसे सजल करती है
जो समय
उसकी देह पर नक्काशी करता है दिन-रात
वह कैसे जाने दे सकता है उसे
एकदम अकेला?

जब पूरी दुनिया
नींद के मेले में रहती है व्यस्त
पृथ्वी का एक कण
चुपके से हो लेता है आदमी के साथ
जब सारी नदियाँ
असीम से मिलने को आतुर रहती हैं
एक अक्षत बूँद
धारा से चुपचाप अलग हो जाती है
जब लोग समझते हैं
कि समय
कहीं और गया होगा किसी को रेतने
अदृश्य रूप से एक मूर्तिकार खड़ा रहता है
आदमी की प्रतीक्षा में।

हरेक आदमी ले जाता है अपने साथ
साँस भर ताप और जीभ भर स्वाद
ओस के गिरने की आहट जितना स्वर
दूब की एक पत्ती की हरियाली जितनी गंध
बिटिया की तुतलाहट सुनने का सुख
जीवन की कुछ खरोंचें,थोड़े दुःख
आदमी ज़रूर ले जाता है अपने साथ-साथ।

मैं भी ले जाऊँगा अपने साथ
कलम की निब भर धूप
आँख भर जल
नाखून भर मिट्टी और हथेली भर आकाश
अन्यथा मेरे पास वह कौन सी चीज़ बची रहेगी
कि दूसरी दुनिया मुझे पृथ्वी की संतति कहेगी!
 
मुलाकातों से डरता हू
मूलाकाते सिलसिलों में उलझाती है
उलझने वाक्यातों से पहचानी जाती है |

वाक्यातों से मुश्किलों की डोर किची चली आती है -

डरता हूँ !

कही ये डोर टूट न जाए,
कही मुलाकातों और मुश्किलों में उलझन की गाँट न पद जाए ||

डरता हू!
...........मुलाकातों से,
...........................मुलाकातों से डरता हूँ ||



 
मत मंसूबे बाँध बटोही, सफर बड़ा बेढंगा है।
जिससे मदद मांगता है तू, वह ख़ुद ही भिखमंगा है।

ऊपर फर्राटा भरती हैं, मोटर कारें नई - नई,
पुल के नीचे रहता, पूरा कुनबा भूखा नंगा है.

नुक्कड़ के जिस चबूतरे पर, भीख मांगती है चुनिया,
राष्ट्र पर्व पर वहीं फहरता, विजई विश्व तिरंगा है.

कला और तहजीबों वाले, अफसानें, बेमानी हैं ,
शहरों की पहचान, वहां पर होनें वाला दंगा है।

मुजरिम भी सरकारी निकले, पुलिस खैर सरकारी थी,
अन्धा तो फिर भी अच्छा था, अब कानून लफंगा है।

शहर समझता उसके सारे पाप, स्वयं धुल जायेंगे
एक किनारे बहती जमुना, एक किनारे गंगा है.

यहाँ कुछ लोग चाहते, पैदा होना सौ-सौ बार
जहाँ फरिस्ते भी डरते हों, मूर्ख वहां पर चंगा है।
 
अंधेरा, वीरान सफ़र
हालात की तपिश ने बना दिया है मुझे एक खौलता लावा,
झुलस न जाना कहीं राह में आकर, ऐ खिलते फूलो!
राह बदलना इस दहकती आग की नहीं होती है फितरत,
तुम्हीं को करना होगा जतन बचने का, ये मत भूलो!
मुझे तो होता है अफ़सोस बहुत, जब झुलसते हैं गुलाब,
तुम्हीं क्यों नहीं करते कुछ उपाय, ऐ डाल में लगे शूलो!
न जाने कहां अंत होगा मेरे इस अंधेरे, वीरान सफ़र का,
तुम दो ख़ुशी अपनी गोद में बैठी प्यारी को, ऐ बाग़ के झूलो.
-उपेन्द्र सिंह
 
ये अरमान अभी बाकी है
अंतर्मन की खामोश बदहवासी अभी बाकी है,
बहुत से अनसुलझे सवालात अभी बाकी हैं.
सोचा था अब ख़त्म हो गया आजमाइशों का दौर
मगर पुराने जख्मों के निशानात अभी बाकी हैं,
अंधेरों से निकल, मुड़ना चाहा जो उजालों की तरफ
पाया कि वहां पहले जैसे हालात अभी बाकी हैं

खुद में रहते हैं खोए, लोग समझने लगे हैं दीवाना
खुद से खुद की ही पहचान अभी बाकी है
बेचारगी के इनाम में मिलने लगी है मोहब्बत भी अब तो
मेरी रूह पर ये नए अहसान अभी बाकी हैं
उम्मीद तो पूरी है कि पा ही लेंगे मंजिल एक दिन
जिन्हें करना है पार, वे भयावह श्मशान अभी बाकी हैं

मेरी राह के चिरागों, कैसे करूं शुक्रिया अदा तुम्हारा
आ सकूं तुम्हारे किसी काम, ये अरमान अभी बाकी है
-उपेन्द्र सिंह
 
हम दीवानों की क्या हस्ती,

आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उड़ाते जहाँ चले

आए बनकर उल्लास कभी,
आँसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए,
अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले

किस ओर चले? मत ये पूछो,
बस चलना है इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले

दो बात कहीं, दो बात सुनी,
कुछ हँसे और फिर कुछ रोए
छक कर सुख दुःख के घूँटों को,
हम एक भाव से पिए चले

हम भिखमंगों की दुनिया में,
स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी उर पर,
ले असफलता का भार चले

हम मान रहित, अपमान रहित,
जी भर कर खुलकर खेल चुके
हम हँसते हँसते आज यहाँ,
प्राणों की बाजी हार चले

अब अपना और पराया क्या,
आबाद रहें रुकने वाले
हम स्वयं बंधे थे, और स्वयं,
हम अपने बन्धन तोड़ चले

-भगवती चरण वर्मा
 
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