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बुझा बुझा सा है,
मेरा रंगीन बगीचा.
मानो लाल पीला नीला,
Daisy और hydangea ,
सब बदल गए मुरझाए सफ़ेद में.

तुम आओ,
मुस्काओ,
बगीचे में रंग भर दो.

हे मेरी तुम,
अपने रस से,
मुझे फिर से जीवित कर दो..
 
Hum nazuk nazuk dil walay bas

aisay hi hotay hain,

kabhi hanstatay hain kabhi rotay hain,

kabhi dil mian khawab protay hain,

kabhi mehfil mehfil phirtay hain

kabhi zaat main tanha hotay hain,

kabhi chup ki mohar sajatay hain,

kabhi geet laboon par laatay hain,

kabhi sub ka dil behlatay hain,

kabhi khud main tanha hotay hain

kabhi shub bhar jaagtay rehtay hain,

kabhi lambi taan kay sotay hain,

hum nazuk nazuk dil walay

bus aisay hi to hotay hain...

 
[h=1][/h]आओ चलें,
भोर के उमंग-भरे द्रष्टा,
बेतार से जुड़े उन अमानचित्रित रास्तों पर
उस हरे घड़ियाल को आज़ाद कराने
जिसे तुम इतना प्यार करते हो ।

आओ चलें,
अपने माथों से
--जिन पर छिटके हैं दुर्दम बाग़ी नक्षत्र--
अपमानों को तहस--नहस करते हुए ।

वचन देते हैं
हम विजयी होंगे या मौत का सामना करेंगे ।
जब पहले ही धमाके की गूँज से
जाग उठेगा सारा जंगल
एक क्वाँरे, दहशत-भरे, विस्मय में
तब हम होंगे वहाँ,
सौम्य अविचलित योद्धाओ,
तुम्हारे बराबर मुस्तैदी से डटे हुए ।

जब चारों दिशाओं में फैल जाएगी
तुम्हारी आवाज़ :
कृषि-सुधार, न्याय, रोटी, स्वाधीनता,
तब वहीं होंगे हम, तुम्हारी बग़ल में,
उसी स्वर में बोलते ।

और जब दिन ख़त्म होने पर
निरंकुश तानाशाह के विरुद्ध फ़ौजी कार्रवाई
पहुँचेगी अपने अन्तिम छोर तक,
तब वहाँ तुम्हारे साथ-साथ,
आख़िरी भिड़न्त की प्रतीक्षा में
हम होंगे, तैयार ।

जिस दिन वह हिंस्र पशु
क्यूबाई जनता के बरछों से आहत हो कर
अपनी ज़ख़्मी पसलियाँ चाट रहा होगा,
हम वहाँ तुम्हारी बग़ल में होंगे,
गर्व-भरे दिलों के साथ ।

यह कभी मत सोचना कि
उपहारों से लदे और
शाही शान-शौकत से लैस वे पिस्सू
हमारी एकता और सच्चाई को चूस पाएँगे ।
हम उनकी बन्दूकें, उनकी गोलियाँ और
एक चट्टान चाहते हैं । बस,
और कुछ नहीं ।

और अगर हमारी राह में बाधक हो इस्पात
तो हमें क्यूबाई आँसुओं का सिर्फ़ एक
कफ़न चाहिए
जिससे ढँक सकें हम अपनी छापामार हड्डियाँ,
अमरीकी इतिहास के इस मुक़ाम पर ।
और कुछ नहीं ।


[h=1]चे ग्वेवारा[/h]
 
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पर्वत के सीने से,
झरता है झरना
हमको भी आता है, भीड़ से
गुज़रना ।

कुछ पत्थर, कुछ रोड़े
कुछ हंसों के जोड़े
नींदों के घाट लगे
कब दरियाई घोड़े

मैना की पाँखें हैं
बच्चों की आँखें हैं
प्यारी है नींद, मगर शर्त है
उबरना ।

खेतों से, मेड़ों से
साखू के पेड़ों से
कुछ ध्वनियाँ आती हैं
नदी के थपेड़ों से

वर्दी में, सादे में
बाढ़ के इरादे में
आगे-पीछे पानी, देख के
उतरना ।

गूँगी है, बहरी है
काठ की गिलहरी है
आड़ में मदरसे हैं
सामने कचहरी है

बँधे-खुले अँगों से
भर पाया रंगों से
डालों के सेव हैं, सँभाल के
कुतरना ।


 
dil mein ho tum aankho mein tum
bolo tumhe kaise chaahu

puja karu,
sajada karu,
... jaise kahu
vaise chaahu
jaanu,
mere jaanu,
jaane jaana jaanu
akela hu mein akela,
tumhe phir dil ne pukaara
tumhari yaadein sataye yahi hai koyi hamaara

tumhara saath mila hai,
jara main dil ko sambhalu
najar lage na kahi meri tumhe mein dil mein chhupalu

suhaane sapane dikhaaye hamaare naina deewaane
gale se abb toh lagaalo,
milan ke aaye jamaane

hamesha dekha yahi hai milan ke sang hai judaayi
shaayad vo hoga deewaana chaahat ye jisane banaayi
har dum yahi dar hai mujhe tumase juda ho na jaau

dil mein ho tum aankho mein tum bolo tumhe kaise chaahu -
puja karu,
sajada karu,
jaise kahu vaise chaahu

jaanu, mere jaanu, jaane jaana jaanu

Song by majnu for laila just 300years back and repeated in pic satya mev jayte
 
तस्वीर कुछ न कह कर भी
बहुत कुछ कह डालती हैं

उनमें दिखाई नहीं पड़ती
मन की उलझनें, चेहरे की लकीरें
फिर भी वे सहेजी जाती हैं
एक अविस्मरणीय दस्तावेज़ के रूप में

ऐसी ही तुम्हारी एक तस्वीर
सहेज रखी है मैंने
मैं चाहता हूँ उभर आएँ उस पर
तुम्हारे मन की उलझनें, चेहरे की लकीरें
ताकि
तस्वीर की जगह
सहेज सकूँ उन्हें

और
तुम नज़र आओ
उस निश्छल बच्चे की तरह
जिस के मुँह पर
दूध की कुछ बूंदे
अब भी बाक़ी हैं।
 
चंदा जब आँचल सरकाए, याद तुम्हारी आती है।
कोयल जब पंचम में गाए, याद तुम्हारी आती है।

रजनी का आँचल जब–जब खोकर अपनी स्याही को,
ऊषा के रंग में रंग जाए याद तुम्हारी आती है।

घर, बाहर व दफ्तर के इस रपटीले जीवन में,
एक पल जब सुकून का आए, याद तुम्हारी आती है।

संत्रासों, सघर्षों के जंगल में जब कभी – कभी,
मलय पवन का झोंका आए, याद तुम्हारी आती है।

छल–प्रपंच के चक्रव्यूह में फंस कर टूट रहा हो मन,
और कोई हौसला बढ़ाए, याद तुम्हारी आती है।

किसी पार्क का कोना हो हम हों और तनहाई हो,
हंसों का जोड़ा दिख जाए याद तुम्हारी आती है।
 
When the world says, "Give up," Hope whispers, "Try it one more time". A lovely poem by Hare Ram Sameep-

आस न छोड़ो
मुश्किल आई है
तो क्या है
यह भी जल्दी हट जाएगी

घुप्प अँधेरे कमरे में यों
मुश्किल ओढ़े
अवसादों से
घिरे हुए तुम
घबराए-से
क्यों बैठे हो

ज़रा टटोलो
दीवारों को
उम्मीदों की अँगुलियों के
कोमल ज़िंदा इन पोरों से
आहिस्ता-आहिस्ता खोजो
हाथों से दीवार न छोड़ो

कमरे की इन दीवारों में
कोई खिड़की निश्चित होगी
जिसके बाहर
बाँह पसारे स्वागत करने
नई रोशनी मिल जाएगी
जुगनू होंगे, दीपक होगा
चाँद–सितारे कुछ तो होंगे
सूरज भी आ ही जाएगा
आस न छोड़ो

मुश्किल में तुम
आस न छोड़ो
 
जगदीश गुप्त

सच हम नहीं सच तुम नहीं
सच है सतत संघर्ष ही ।


संघर्ष से हट कर जिए तो क्या जिए हम या कि तुम।
जो नत हुआ वह मृत हुआ ज्यों वृन्त से झर कर कुसुम।


जो पंथ भूल रुका नहीं,
जो हार देखा झुका नहीं,


जिसने मरण को भी लिया हो जीत, है जीवन वही।

सच हम नहीं सच तुम नहीं।

ऐसा करो जिससे न प्राणों में कहीं जड़ता रहे।
जो है जहाँ चुपचाप अपने आपसे लड़ता रहे।


जो भी परिस्थितियाँ मिलें,
काँटें चुभें, कलियाँ खिलें,

टूटे नहीं इन्सान, बस सन्देश यौवन का यही।

सच हम नहीं सच तुम नहीं।

हमने रचा आओ हमीं अब तोड़ दें इस प्यार को।
यह क्या मिलन, मिलना वही जो मोड़ दे मँझधार को।


जो साथ कूलों के चले,
जो ढाल पाते ही ढले,

यह ज़िन्दगी क्या ज़िन्दगी जो सिर्फ़ पानी-सी बही।

सच हम नहीं सच तुम नहीं।

अपने हृदय का सत्य अपने आप हमको खोजना।
अपने नयन का नीर अपने आप हमको पोंछना।


आकाश सुख देगा नहीं,
धरती पसीजी है कहीं,

हर एक राही को भटक कर ही दिशा मिलती रही

सच हम नहीं सच तुम नहीं।

बेकार है मुस्कान से ढकना हृदय की खिन्नता।
आदर्श हो सकती नहीं तन और मन की भिन्नता।


जब तक बंधी है चेतना,
जब तक प्रणय दुख से घना,

तब तक न मानूँगा कभी इस राह को ही मैं सही।

सच हम नहीं सच तुम नहीं।
 
Last edited:
किसान --- मैथिलीशरण गुप्त




हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है
हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ
आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है कांपना हेमंत में

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा
देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है
तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है
मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है
 
कितनी द्रुपदा के बाल खुले, कितनी कलियों का अंत हुआ ? ?
कह हरदम खेल गुजरता यहाँ , कितने दिन ज्वाल -वसंत हुआ ? ?

तू पूछ ... अवध से राम कहा ? वृंदा , बोलो घनश्याम कहा ?
ओ मगध , कहा तेरे अशोक ? वो चन्द्रगुप्त बलधाम कहा ?
रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ , जाने दे उसको स्वर्ग धीर
पर फिर हमे गांडीव गदा , लौटा दे, अर्जुन भीम वीर ....

कह दे शंकर से आज कर, वे " प्रलय - नृत्य " फिर एक बार ,
सरे भारत में गूंज उठे हर - हर , बम बम का मंत्रोच्चार ! !
 
चाँदनी की नदी में नहाऊँ कभी,
बादलों की पतंगें उड़ाऊँ कभी,
तुम मुझे जो खुला एक आकाश दो
तो परिन्दे-सा उड़कर दिखाऊँ अभी ।

फूलों पर नाचती तितलियाँ देख कर,
मेरा मन जा रहा हाथों से छूट कर,
सोचता हूँ हवाओं के कंधे पर चढ़
सारी दुनिया का चक्कर लगाऊँ कभी ।

एक सपना था कल रात आया मुझे,
पर्वतों ने हो जैसे बुलाया मुझे,
दोस्त हों मेरी जो बर्फ़ की चोटियाँ
लौटकर अपने घर फिर न आऊँ कभी ।

ख़ूबसूरत है दुनिया ये कहते हैं सब,
चैन से पर कहाँ इसमें रहते हैं सब,
एक पल की भी फुरसत किसी को नहीं
मन की बातें ये किसको सुनाऊँ अभी ?
 
अगर बहारें पतझड़ जैसा रूप बना उपवन में आएँ
माली तुम्हीं फैसला कर दो, हम किसको दोषी ठहराएँ ?

वातावरण आज उपवन का अजब घुटन से भरा हुआ है
कलियाँ हैं भयभीत फूल से, फूल शूल से डरा हुआ है
सोचो तो तुम, क्या कारण है दिल, दिल के नज़दीक नहीं है
जीवन की सुविधाओं का बँटवारा शायद ठीक नहीं है
उपवन में यदि बिना खिले ही कलियाँ मुरझाने लग जाएँ
माली तुम्हीं फैसला कर दो, हम किसको दोषी ठहराएँ ?


यह अपनी-अपनी क़िस्मत है कुछ कलियाँ खिलती हैं ऊपर
और दूसरी मुरझा जातीं झुके-झुके जीवन भर भू पर
माना बदक़िस्मत हैं लेकिन, क्या वे महक नहीं सकती हैं
अगर मिले अवसर, अंगारे-सी क्या दहक नहीं सकती हैं ?
धूप रोशनी अगर चमन में ऊपर-ऊपर ही बँट जाएँ
माली तुम्हीं फैसला कर दो, हम किसको दोषी ठहराएँ ?


काँटे उपवन के रखवाले अब से नहीं, ज़माने से हैं
लेकिन उनके मुँह पर ताले अब से नहीं, ज़माने से हैं
ये मुँह बंद, उपेक्षित काँटे अपनी कथा कहें तो किससे?
माली उलझे हैं फूलों से अपनी व्यथा कहें तो किससे?
इसी प्रश्न को लेकर काँटे यदि फूलों को ही चुभ जाएँ
माली तुम्हीं फैसला कर दो, हम किसको दोषी ठहराएँ ?


सुनते हैं पहले उपवन में हर ऋतु में बहार गाती थी
कलियों का तो कहना ही क्या, मिट्टी से ख़ुश्बू आती थी
यह भी ज्ञात हमें उपवन में कुछ ऐसे भौंरे आए थे
सारा चमन कर दिया मरघट, अपने साथ ज़हर लाए थे
लेकिन अगर चमन वाले ही भौंरों के रंग-ढंग अपनाएँ
माली तुम्हीं फैसला कर दो, हम किसको दोषी ठहराएँ ?


बुलबुल की क्या है बुलबुल तो जो देखेगी, सो गाएगी
उसकी वाणी तो दर्पण है असली सूरत दिखलाएगी
चूँकि आज बुलबुल पर गाने को रस डूबा गीत नहीं है
सारा चमन बना है दुश्मन कोई उसका मीत नहीं है
गाते-गाते यदि बुलबुल के गीत आँसुओं से भर जाएँ
माली तुम्हीं फैसला कर दो, हम किसको दोषी ठहराएँ ?
 
from FB

अब मुझे भी एक घोटाला करना है

अपना स्विस एकाउन्ट भरना है

क्या रखा है इस देशभक्ति मेँ
...
आखिर सबको एक दिन मरना है

अब मुझे भी एक घोटाला करना है

हमारा पेशा तो पहले से ही बदनाम है

रिश्वतखोरी तस्करी हाँथ जोड़ना यही हमारा काम है

कौन रखता याद देशभक्तोँ को एक वक्त गुजर जाने के बाद

जहाँ देखो वहाँ हम नेताओँ का ही फोटो और नाम है

इस दुनिया अपना नाम अमर करना है

अब मुझे भी एक घोटाला करना है

मेरे साथ पले बड़े राजा कलमाड़ी निकल गये बहुत आगे

कर ना सके हम उनका पीछा वो बहुत तेज भागे

पवार को देखकर लगता है कोई कुबेर हो जैसे

और मुझे मिलते सिर्फ वेतन और भत्ते के पैसे

मुझे भी अपनी सात पीढ़ियोँ का इन्तजाम करना है

अब मुझे भी एक घोटाला करना है

हमारी सरकार आई फिर भी न कर सके एक भी एक भी घोटाला

इन लोगोँ ने तो 7 सालोँ मेँ ही कर दिया देश को खोखला

काँग्रेस का नियम है "भ्रष्टाचार करेँ, 10 जनपथ पूँजेँ फिर बिल्कुल न डरेँ"

अब हमारी पार्टी मेँ कोई 10 जनपथ ही नहीँ तो हम भ्रष्टाचार कैसे करेँ

अब मुझे भी काँग्रेस ज्वॉइन करना है

अब मुझे भी एक घोटाला करना है

---एक BJP नेता की व्यथा___Created by अंकित बाबा
 
लौटा दो मेरा बचपन
उसके बदले क्या लोगे?
माँ की थपकी माँ का चुबंन
उसके बदले क्या लोगे?

जिसके आँचल की छाया में
मैंने घुटनों चलना सीखा
वो कच्चा-सा टूटा आंगन
उसके बदले क्या लोगे?


सुबह-सुबह जगना रोकर
स्कूल चले बस मुँह धोकर
वही नाश्ता रोज़ सुबह
बासी रोटी, ताज़ा मक्खन
उसके बदले क्या लोगे?


हाथों में तख्ती और खड़िया
बस्ते में स्याही की पुड़िया
पट्टी पर सिमटा-सा बैठा
बूढ़ा भारत नन्हा बचपन
उसके बदले क्या लोगे?


दिन भर रटते फिरना पोथी
गहरी बातें और कुछ थोथी
फिर छह ऋतुओं बाद दिखे
जाता पतझड़ आता सावन
उसके बदलें क्या लोगे?


रस्ते भर करना मस्ती
गूंजे चौराहा, हर बस्ती
लटक पेड़ो से ले भगना
कच्ची अमिया पक्के जामुन
उसके बदले क्या लोगे?


गिट्टे, कंचे, गुल्ली, डंडा
भगना-छिपना लेना पंगा
गुड्डे-गुड़ियों के खेलों में
बिन दहेज ले आना दुल्हन
उसके बदले क्या लोगे?


फिर थके बदन घर की खटिया
इक परीलोक नन्हीं दुनिया
लोरी गाते चंदा-तारे
बुनता सपने बिखरा जीवन
उसके बदले क्या लोगे?
 
श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-सोए पकड़े जाना - बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
... पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ने लग जाना - बुरा तो है
भींचकर जबड़े बस वक्*त काट लेना - बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
​
 
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