History of Marwar in Rajasthan Part I

मध्यकालीन राजस्थान में जाट जनपद

सात प्रमुख जाट जनपद

भूतपूर्व बीकानेर राज्य की स्थापना से पहले इस भूभाग में जाटों के सात गणराज्य थे. दयालदास के अनुसार विक्रम की 16 वीं शताब्दी पूर्वार्ध में इन जनपदों (राज्य) की स्थिति इस प्रकार अंगरेजी के समान सन्दर्भ अंक शब्द के अंत में कुछ ऊपर थी. [1] [2]

अनुक्रमांक नाम जनपद नाममुखिया गाँवों की संख्या राजधानी
3. सोहुवा अमरा 84 घाणसिया

गाँवों की कुल संख्या 2024
इस तरह दयालदास के अनुसार उस समय जाटों के अधीन गाँवों की संख्या 2040 थी. जबकि कर्नल टाड ने जोहियों को भी जाट मानते हुए जाट राज्यों के गाँवों की संख्या 2200 बताई है जो इस प्रकार है[3]-

अनुक्रमांक नाम जनपद नाममुखिया गाँवों की संख्या राजधानी

3. जोहिया शेरसिंह 600 घाणसिया

गाँवों की कुल संख्या 2200[4]

इनसे अलग ठाकुर देशराज ने जाटों के अधीन गाँवों की कुल संख्या 2660 बताई है[5] -
अनुक्रमांक नाम जनपद नाममुखिया गाँवों की संख्या राजधानी

3. जोहिया शेरसिंह 600 भुरूपाल

Burdak sir, the quotes in RED seems contradictory...... first 84 villeges, than 600 and a different ruler and than same ruler but a different Capital Or Maybe i didn't get it correctly.

Please explain it so that it can be understood properly ?

Regards
 
Hi vijay,

The differencein numbers and places has been explained in the text ,please see -

"जाटों की इन शाखाओं के अलावा ठाकुर देशराज ने जाटों की कुछ अन्य शाखाओं और उनके राज्यों का उल्लेख किया है जिसमें सुहाग, भादू, भूकर, चाहर, जाखड़ और नैन मुख्य हैं [6] [7]इस तरह इतिहासकारों द्वारा दी गयी संख्या में पर्याप्त अन्तर है. मुंशी सोहन लाल ने भूतपूर्व बीकानेर रियासत का कुल एरिया 23500 वर्गमील और गाँवों की संख्या 1739 दी है. [8]जबकि जाटों का अधिकार पूर्व बीकानेर रियासत के एक हिस्से पर ही था. ऐसा लगता है की इन प्रमुख जाट पट्टियों में जाटों की दूसरी शाखाओं व अन्य जातियों के गाँव भी मिले हुए थे. कभी-कभी एक शाखा के गाँव एक स्थान पर न होकर अलग-अलग भी होते थे. जैसे सीधमुख तहसील राजगढ़ में कसवां जाटों का आधिपत्य था और चुरू तथा चुरू तहसील के अनेक गाँवों पर भी उनका अधिकार था, किंतु इन दोनों स्थानों के बीच लूद्दी में पूनिया जाटों का तथा ददरेवा में चौहान राजपूतों के ठिकाने थे. इस तरह एक गाँव के विभिन्न भागों को विभिन्न जाट शाखाओं में जोड़ने से व अलग-अलग गिनने से जाट राज्यों के अधीन इन गाँवों की संख्या आई होगी.[9] [10]"

Regards,
 
Vllage names corrections

Certain Vllage names need corrections and verifications. Different authors have spelt some villages differently. For ex

घाणसिया (Ghanasia) or धानसिया (Dhansia)

Ghangu (घांघू ) or Dhandhu (धान्धू)

If some body has first hanf info kindly indicate the correct names.

Regards,
 
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The fall of Jat rule in Jangal Desh

मलकीसर बीकानेर जिले की लूणकरणसर तहसील में गाँव बसा है. भाड़ंग चुरू जिले की तारानगर तहसील में चुरू से लगभग 40 मील उत्तर में बसा था. पृथ्वीराज चौहान के बाद अर्थार्त चौहान शक्ति के पतन के बाद भाड़ंग पर किसी समय जाटों का आधिपत्य स्थापित हो गया था. जो 16 वीं शताब्दी में राठोडों के इस भू-भाग में आने तक बना रहा. पहले यहाँ सोहुआ जाटों का अधिकार था और बाद में सारण जाटों ने छीन लिया. जब 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में राठोड इस एरिया में आए, उस समय पूला सारण यहाँ का शासक था और उसके अधीन 360 गाँव थे. इसी ने अपने नाम पर पूलासर (तहसील सरदारशहर) बसाया था जिसे बाद में सारण जाटों के पुरोहित पारीक ब्राह्मणों को दे दिया गया. पूला की पत्नी का नाम मलकी था, जिसको लेकर बाद में गोदारा व सारणों के बीच युद्ध हुआ. [1] मलकी के नाम पर ही बीकानेर जिले की लूणकरणसर तहसील में मलकीसर गाँव बसाया गया था.[2]

मलकी का मामला और लाघड़िया युद्ध

उस समय पूला सारण भाड़ंग का शासक था और उसके अधीन 360 गाँव थे. पूला की पत्नी का नाम मलकी था जो बेनीवाल जाट सरदार रायसल की पुत्री थी. उधर लाघड़िया में पांडू गोदारा राज करता था. वह बड़ा दातार था. एक बार विक्रम संवत 1544 (वर्ष 1487) के लगभग लाघड़िया के सरदार पांडू गोदारा के यहाँ एक ढाढी गया, जिसकी पांडू ने अच्छी आवभगत की तथा खूब दान दिया. उसके बाद जब वही ढाढी भाड़ंग के सरदार पूला सारण के दरबार में गया तो पूला ने भी अच्छा दान दिया. लेकिन जब पूला अपने महल गया तो उसकी स्त्री मलकी ने व्यंग्य में कहा "चौधरी ढाढी को ऐसा दान देना था जिससे गोदारा सरदार पांडू से भी अधिक तुम्हारा यश होता. [3]इस सम्बन्ध में एक लोक प्रचलित दोहा है -

धजा बाँध बरसे गोदारा, छत भाड़ंग की भीजै ।

ज्यूं-ज्यूं पांडू गोदारा बगसे, पूलो मन में छीज ।।[4]


सरदार पूला मद में छका हुआ था. उसने छड़ी से अपनी पत्नी को पीटते हुए कहा यदि तू पांडू पर रीझी है तो उसी के पास चली जा. पति की इस हरकत से मलकी मन में बड़ी नाराज हुई और उसने चौधरी से बोलना बंद कर दिया. मलकी ने अपने अनुचर के मध्यम से पांडू गोदारा को सारी हकीकत कहलवाई और आग्रह किया कि वह आकर उसे ले जाए. इस प्रकार छः माह बीत गए. एक दिन सब सारण जाट चौधरी और चौधराईन के बीच मेल-मिलाप कराने के लिए इकट्ठे हुए जिस पर गोठ हुई. इधर तो गोठ हो रही थी और उधर पांडू गोदारे का पुत्र नकोदर 150 ऊँट सवारों के साथ भाड़ंग आया और मलकी को गुप्त रूप से ले गया. [5] पांडू वृद्ध हो गया था फ़िर भी उसने मलकी को अपने घर रख लिया. परन्तु नकोदर की माँ, पांडू की पहली पत्नी, से उसकी खटपट हो गयी इसलिए वह गाँव गोपलाणा में जाकर रहने लगी. बाद में उसने अपने नाम पर मलकीसर बसाया. [6]

पूला ने सलाह व सहायता करने के लिए अन्य जाट सरदारों को इकठ्ठा किया. इसमें सीधमुख का कुंवरपाल कसवां, घाणसिया का अमरा सोहुआ, सूई का चोखा सियाग, लूद्दी का कान्हा पूनिया और पूला सारण स्वयं उपस्थित हुए. गोदारा जाटों के राठोड़ों के सहायक हो जाने के कारण उनकी हिम्मत उन पर चढाई करने की नहीं हुई. ऐसी स्थिति में वे सब मिलकर सिवानी के तंवर सरदार नरसिंह जाट के पास गए [7] और नजर भेंट करने का लालच देकर उसे अपनी सहायता के लिए चढा लाए. [8]

तंवर नरसिंह जाट बड़ा वीर था. वह अपनी सेना सहित आया और उसने पांडू के ठिकाने लाघड़िया पर आक्रमण किया. उसके साथ सारण, पूनिया, बेनीवाल, कसवां, सोहुआ और सिहाग सरदार थे. उन्होंने लाघड़िया को जलाकर नष्ट कर दिया. लाघड़िया राजधानी जलने के बाद गोदारों ने अपनी नई राजधानी लूणकरणसर के गाँव शेखसर में बना ली. [9] युद्ध में अनेक गोदारा चौधरी व सैनिक मारे गए, परन्तु पांडू तथा उसका पुत्र नकोदर किसी प्रकार बच निकले. नरसिंह जाट विजय प्राप्त कर वापिस रवाना हो गया. [10]

ढाका का युद्ध (1488) और जाट गणराज्यों का पतन

इधर गोदारों की और से पांडू का बेटा नकोदर राव बीका व कान्धल राठोड़ के पास पुकार लेकर गया जो उस समय सीधमुख को लूटने गए हुए थे. नकोदर ने उनके पास पहुँच कर कहा कि तंवर नरसिह जाट आपके गोदारा जाटों को मारकर निकला जा रहा है. उसने लाघड़िया राजधानी के बरबाद होने की बात कही और रक्षा की प्रार्थना की. इसपर बीका व कान्धल ने सेना सहित आधी रात तक नरसिंह का पीछा किया. नरसिंह उस समय सीधमुख से ६ मील दूर ढाका नमक गाँव में एक तालाब के किनारे अपने आदमियों सहित डेरा डाले सो रहा था. रास्ते में कुछ जाट जो पूला सारण से असंतुष्ट थे, ने कान्धल व बीका से कहा की पूला को हटाकर हमारी इच्छानुसार दूसरा मुखिया बना दे तो हम नरसिंह जाट का स्थान बता देंगे. राव बीका द्वारा उनकी शर्त स्वीकार करने पर उक्त जाट उन्हें सिधमुख से ६ मील दूरी पर उस तालाब के पास ले गए, जहाँ नरसिंह जाट अपने सैनिकों सहित सोया हुआ था.[11] [12]

राव कान्धल ने रात में ही नरसिंह जाट को युद्ध की चुनोती दी. नरसिंह चौंक कर नींद से उठा. उसने तुरंत कान्धल पर वार किया जो खाली गया. कान्धल ने नरसिंह को रोका और और बीका ने उसे मार गिराया. [13] घमासान युद्ध में नरसिंह जाट सहित अन्य जाट सरदारों कि बुरी तरह पराजय हुई. दोनों और के अनेक सैनिक मरे गए. कान्धल ने नरसिह जाट के सहायक किशोर जाट को भी मार गिराया. इस तरह अपने सरदारों के मारे जाने से नरसिह जाट के साथी अन्य जाट सरदार भाग निकले. भागती सेना को राठोड़ों ने खूब लूटा. इस लड़ाई में पराजय होने के बाद इस एरिया के सभी जाट गणराज्यों के मुखियाओं ने बिना आगे युद्ध किए राठोड़ों की अधीनता स्वीकार कर ली और इस तरह अपनी स्वतंत्रता समाप्त करली. फ़िर वहाँ से राव बीका ने सिधमुख में डेरा किया. वहां दासू बेनीवाल राठोड़ बीका के पास आया. सुहरानी खेड़े के सोहर जाट से उसकी शत्रुता थी. दासू ने बीका का आधिपत्य स्वीकार किया और अपने शत्रु को राठोड़ों से मरवा दिया. [14] इस तरह जाटों की आपसी फूट व वैर भाव उनके पतन का कारण बना.[15]
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लेखक: Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क

Note - This aicle is also available on Jatlabd Wiki at URL

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सन्दर्भ

1. ↑ दयालदास ख्यात, देशदर्पण, पेज 20
2. ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
3. ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 208
4. ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 208
5. ↑ नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 202
6. ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
7. ↑ दयालदास री ख्यात , पेज 9
8. ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
9. ↑ डॉ दशरथ शर्मा री ख्यात, अनूप संस्कृत पुस्तकालय, बीकानेर, संवत 2005, पेज 7
10. ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
11. ↑ नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 203
12. ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
13. ↑ नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 203
14. ↑ नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 203
15. ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 210
 
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