samarkadian
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दिल को समझाने वाली बात होती तों मान ली जाती सर, धुर्विकर्ण गैर जाटो का मुख्य मुद्दा है न की जाट किस पाले में गए ! चौटाला पार्टी पिच्छले दस साल से एक विकल्प के रूप में खतम हों चुकी है ! उन्होंने छतीस जात की पार्टी बनाने के चक्कर में अपना मुख्य जाट वोटर खो दिया है ! जाट आरक्षण के मुद्दे पर वो एक तटस्थ पार्टी बने रहे !
सच बात तो ये है कि बीजेपी का जाट-गैर जाट को धुर्वीकरण तो धरा रह जाता अगर जाटो ने एकतरफा किसी एक पार्टी को ही समर्थन दिया होता|
सबसे ज्यादा निराशाजनक तो inld को दरकिनार करना रहा| ना तो जाट चौटाला के हो सके ना कांग्रेस के और ना ही बीजेपी के| अब अगर गैर जाट मुख्यमंत्री है तो इसकी वजह जाटो का बिखराव है ना कि धुर्वीकरण|
धुर्वीकरण तो दिल को समझाने वाली बात है| ज्यादा नहीं अगर बीजेपी को ही ढंग से सपोर्ट कर दिया होता और उसके 20 से ज्यादा जाट विधायक होते तो कम से कम किसी गैर जाट को मुख्यमंत्री बनाने से पहले बीजेपी को दो बार सोचना पड़ता|
कोई नी अब और 4 साल दम साध के बैठे रहो| अगर किसी जाट को सूबे का मुखिया देखना है तो किसी एक के पाले में जाने में ही भलाई है|