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बागड़ के किस्से
यह भी पुरानी बात है । रोहतक जिले के रिवाड़ी-खेड़ा गांव के एक पहलवान की शादी महेन्द्रगढ़ जिले के एक गांव में हो गई । उस रेगिस्तानी इलाके को आम तौर पर 'बागड़' कहा जाता है ।
पहले ससुराल में बटेऊ कई-कई दिन रुकते थे । जब पहलवान साहब ससुराल गए तो पहले दिन शाम को उसके लिए खीर बनवाई गई । उसकी सास ने थाली आगे रख दी और बोली, "बेटा कितने ढींगे घालूं?" [बागड़ में लकड़ी के चम्मच ('डोऊ') को 'ढींगा' कहते हैं]
पहलवान ने सोचा 'ढींगा' तो किसी बड़े से बर्तन का नाम होगा, बोला - "बस, कुल दो ढींगे घाल दे" । पहलवान को सिर्फ दो चम्मच खीर नसीब हुई और रात भर भूख से तड़फता रहा ।
दूसरे दिन उसके लिए दलिया बनाया गया । सास दलिया की देगची उठा लाई और डोऊ को उसमें डालकर पूछने लगी - "बेटा कितने ढींगे घालूं?" पहलवान ने सोचा कि देगची में तो खीर होगी । फट जवाब दिया : "ईब तै दो सौ ढींगे घाल दे" !!
और फिर अगले टाइम कुछ मोटी-मोटी रोटियां मिली और साथ में सब्जी । पहलवान ने सब्जी की शक्ल देखी तो समझ में नहीं आया कि ये सब्जी है किस चीज की । पूछने पर सास ने जवाब दिया - "बेटा, यो तै खेल्लरां का साग सै" । (उस इलाके के लोग गर्मी में ककड़ी को काटकर सुखा लेते हैं और बाद में उसे सब्जी के तौर पर उबाल लेते हैं - सूखी हुई ककड़ी को ‘खेल्लर’ कहते हैं)
पहलवान ने जब " खेल्लरां का साग" खा कर देखा तो न्यूं बोल्या - "न्यूं लागै सै अक चिड़स (चमड़े की मशक) काट राखी सै" !!
*****
एक और किस्सा बागड़ का । एक मुसाफिर पैदल जा रहा था । प्यास लगी थी - रास्ते में देखा कि एक औरत कूंऐं पर पानी भर रही है। उसने जब पानी मांगा तो उस औरत ने रस्सी से बंधी बाल्टी कूंऐं में डालकर रस्सी का दूसरा सिरा उस मुसाफिर को पकड़ा दिया और उससे रस्सी पकड़कर आगे चलने को कह दिया । वहां कूंऐं का पानी बहुत गहराई पर होता है । मुसाफिर चलता-चलता जब कोई 100 गज दूर पहुंच गया तब कहीं पानी की बाल्टी ऊपर आई । औरत ने पुकारा - उल्टे आ जाओ, पानी पी लो । मुसाफिर बोला - " ईब तै आगले गाम में जा कै ए पी ल्यूंगा ।" !!!
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बागड़ के किस्से
यह भी पुरानी बात है । रोहतक जिले के रिवाड़ी-खेड़ा गांव के एक पहलवान की शादी महेन्द्रगढ़ जिले के एक गांव में हो गई । उस रेगिस्तानी इलाके को आम तौर पर 'बागड़' कहा जाता है ।
पहले ससुराल में बटेऊ कई-कई दिन रुकते थे । जब पहलवान साहब ससुराल गए तो पहले दिन शाम को उसके लिए खीर बनवाई गई । उसकी सास ने थाली आगे रख दी और बोली, "बेटा कितने ढींगे घालूं?" [बागड़ में लकड़ी के चम्मच ('डोऊ') को 'ढींगा' कहते हैं]
पहलवान ने सोचा 'ढींगा' तो किसी बड़े से बर्तन का नाम होगा, बोला - "बस, कुल दो ढींगे घाल दे" । पहलवान को सिर्फ दो चम्मच खीर नसीब हुई और रात भर भूख से तड़फता रहा ।
दूसरे दिन उसके लिए दलिया बनाया गया । सास दलिया की देगची उठा लाई और डोऊ को उसमें डालकर पूछने लगी - "बेटा कितने ढींगे घालूं?" पहलवान ने सोचा कि देगची में तो खीर होगी । फट जवाब दिया : "ईब तै दो सौ ढींगे घाल दे" !!
और फिर अगले टाइम कुछ मोटी-मोटी रोटियां मिली और साथ में सब्जी । पहलवान ने सब्जी की शक्ल देखी तो समझ में नहीं आया कि ये सब्जी है किस चीज की । पूछने पर सास ने जवाब दिया - "बेटा, यो तै खेल्लरां का साग सै" । (उस इलाके के लोग गर्मी में ककड़ी को काटकर सुखा लेते हैं और बाद में उसे सब्जी के तौर पर उबाल लेते हैं - सूखी हुई ककड़ी को ‘खेल्लर’ कहते हैं)
पहलवान ने जब " खेल्लरां का साग" खा कर देखा तो न्यूं बोल्या - "न्यूं लागै सै अक चिड़स (चमड़े की मशक) काट राखी सै" !!
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एक और किस्सा बागड़ का । एक मुसाफिर पैदल जा रहा था । प्यास लगी थी - रास्ते में देखा कि एक औरत कूंऐं पर पानी भर रही है। उसने जब पानी मांगा तो उस औरत ने रस्सी से बंधी बाल्टी कूंऐं में डालकर रस्सी का दूसरा सिरा उस मुसाफिर को पकड़ा दिया और उससे रस्सी पकड़कर आगे चलने को कह दिया । वहां कूंऐं का पानी बहुत गहराई पर होता है । मुसाफिर चलता-चलता जब कोई 100 गज दूर पहुंच गया तब कहीं पानी की बाल्टी ऊपर आई । औरत ने पुकारा - उल्टे आ जाओ, पानी पी लो । मुसाफिर बोला - " ईब तै आगले गाम में जा कै ए पी ल्यूंगा ।" !!!
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