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स्वतंत्रता का सच
देश को आजाद हुए साठ साल होने को हैं – जश्न की तैयारियां हो रहीं हैं । बाद में सब भूल जायेंगे और अपने काम-धंधे में मस्त हो जायेंगे । आज बहुत थोड़े से ही बूढ़े लोग बचे हैं जिन्होंने 1947 से पहले की घटनाओं को अपनी आंखों से देखा है । कहते हैं कि जो लोग इतिहास को भूल जाते हैं, इतिहास उन्हें माफ नहीं करता । इतिहास के पन्ने पूछेंगे कि बीसवीं सदी के आरंभ वाला वह भारत कहां है जिसमे आज के पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और बर्मा शामिल थे । रावी के तट पर देश को आजाद कराने की शपथ ली गई थी । आज लंडन की थेम्स नदी शायद रावी को मुस्करा कर कह रही है – मेरे बेटों ने तुम्हारे बेटों को मात दे दी, वे व्यापारी बन कर तुम्हारे देश में गए थे और एक मालिक की तरह तुम्हारे कई टुकड़े कर के वापस आ गए । आज एक जमीन के टुकड़ा ही तो तुम्हारे पास बचा है, बाकी तो सब मेरा है – भाषा, लिबास, चाल-चलन, व्यवहार – सब कुछ । आज हमें मजबूरन ही सही, यह सच्चाई तो मंजूर करनी ही पड़ रही है – इतिहास इसका गवाह है और पाकिस्तान, बंगलादेश इसके नमूने हैं । इतिहास का यह पन्ना पता नहीं कितनी पीढ़ियों को अपना सिर झुकाने पर मजबूर करता रहेगा । गांधी ने कहा था कि देश के टुकड़े करने से पहले मेरे शरीर के टुकड़े करने पड़ेंगे, विभाजन मेरी लाश पर होगा । फिर भी ऐसा हुआ । गांधी जी ने नेहरू को कहा भी – “बेटे जवाहरलाल, तुम तो कहते थे कि पाकिस्तान की मांग और देश के बंटवारे की बातें बेहूदा हैं, लेकिन अब तो उस बेहूदगी ने अपना असली रूप ले लिया – तुम्हारी समझ को अब क्या हुआ, अब उसे लकवा क्यों मार गया ?”
देश अंग्रेजों का गुलाम क्यूं बना, इसके कारणों को भी खंगालना चाहिये और उन कमियों को दूर करने की कौशिश करनी चाहिये । जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में कदम रखे तो देश की स्थिति दुर्दशापूर्ण थी । इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने लिखा है : “देश अपनी रक्षा में समर्थ नहीं था, शाही राज बुरी तरह भ्रष्ट, चरित्रहीन और जड़बुद्धि था, कुलीन जन स्वार्थी और संकुचित दृष्टि के थे । भ्रष्टाचार, अयोग्यता और विश्वासघात सार्वजनिक सेवा की प्रत्येक शाखा में फैला था । पतन और भ्रम के बीच हमारे साहित्य, कला और यहां तक कि धर्म तक को नुकसान उठाना पड़ा ।” उस समय पतन इस हद तक हो चुका था कि 1739 में नादिरशाह ने और अहमदशाह ने 1757 में दिल्ली को आसानी से जीत लिया था और सारी संपत्ति लूट ले गए थे । नादिरशाह ने एक ही दिन में बीस हजार लोगों का कत्ले-आम करवा दिया था ।
दो साल पहले जगमोहन की पुस्तक “Soul and Structure of Governance in India” छपी थी । उसमे ब्रिटिश राज के कुछ अच्छे और बुरे पहलूओं पर नजर डाली गई है । शुरू में अंग्रेजों ने प्रशासन का एक मजबूत ढ़ांचा बनाया, इंडियन सिविल सर्विसेज के साथ एक नियंत्रित प्रशासनिक तंत्र बनाया । इससे शान्ति भी हुई और सड़क, रेलवे, डाकखानों का एक नेटवर्क भी बना । कुछ सिंचाई की परियोजनायें स्थापित हुईं और नहरों का भी जाल बिछा । कुछ मायनों में अंग्रेजों के कुछ काम सलामी के काबिल थे, इसलिए हमारे बुजुर्ग कई बार कह देते हैं कि अंग्रेजी राज अच्छा था । लेकिन नकारात्मक पहलू भी कम नहीं थे । 17वीं और 18वीं शताब्दी में भारत खेती में अग्रणी था और कपड़ा और स्टील उद्योग में भी दुनियां में नम्बर-वन था । अंग्रेजों ने कच्चे माल को सस्ती कीमत पर बाहर भेजा और यहां अंग्रेजी माल को डंप किया । बनारस के खादी उद्योग को लगभग खत्म कर दिया जिसका माल पहले सारे यूरोप में जाता था । देश को भारी अकालों का भी सामना करना पड़ा । ब्रिटिश रिकार्ड ही बताते हैं कि 1800 से 1825 के बीच दस लाख, 1825-1850 में चालीस लाख, 1850-1875 में पचास लाख और 1875-1900 में ड़ेढ करोड़ लोग अकाल की भेंट चढ़ गए – यानी सौ साल में ढ़ाई करोड़ लोग अकाल का शिकार हुए । 1942-44 के बंगाल के अकाल में सबसे ज्यादा लोग मरे थे – अनाज की कमी से नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों के कारण । उस समय बंगाल में सबसे ज्यादा चावल की उपज होती थी, अनाज गोदामों में पड़ा सड़ता रहा पर लोगों तक नहीं पहुंचा ।
अंग्रेजी राज्य की चादर में और भी धब्बे हैं । 13 अप्रैल 1919 को ब्रिगेडियर जनरल ओ-डायर ने जलियांवाला बाग में निहत्थे और निर्दोष लोगों पर गोलियां चलवाईं । फयरिंग कुल दस मिनट चली और इसमें करीब चार सौ लोग मारे गए और 1200 जख्मी हुए । इस अकेली करतूत ने लोगों का विश्वास खो दिया और शासन की निष्पक्षता को तार-तार कर दिया । अंग्रेज चाहते तो पाकिस्तान के बनने को रोक सकते थे । पर उन्होंने उल्टे इस आग को हवा दी ।
गांधी-इरविन बातचीत में भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी ने देने की बात भी शामिल थी । इरविन ने साफ मना कर दिया । कांग्रेस और गांधी ने यह मुद्दा छोड़ ही दिया । 23 मार्च 1931 को भगतसिंह को फांसी दे दी गई और इसके छ: दिन बाद कराची में कांग्रेस अधिवेशन में गांधी और कांग्रेस को लेने के देने पड़ गए । असल में उस वक्त भगत सिंह गांधी से ज्यादा लोकप्रिय थे ।
अगस्त का महीना 1942 की ‘अगस्त क्रांति’ के लिए भी मशहूर है जिसको बहुत से क्रांतिकारियों ने अंजाम दिया था पर बाद में कांग्रेस ने झूठे ही उसका सेहरा अपने पर सजा लिया । 15 अगस्त 1947 पर नेहरू की यह घोषणा “अब हम अपने भाग्य से भेंट करेंगे”(Tryst with destiny) लाल किले से टकरा कर रह गई । हम अंग्रेजों की गुलामी से तो मुक्त हो गए पर कुछ खानदानों की गुलामी में फंस गए जो आज तक राज करते आ रहे हैं । आजादी से पहले नेता जितनी सादगी से रहते थे, आज के नेताओं के ठाठ-बाट देखो तो हैरानी होती है । आज देश के करोड़ों लोग रेल का रिजर्वेशन भी नहीं करवा सकते जबकि उन के द्वारा चुने गए कस्बाई नेता भी विमान से सफर करते हैं । एक मामूली एम.पी. जितने बड़े सरकारी बंगले में नई दिल्ली के इलाके में रहता है, शायद रतन टाटा भी उससे ईर्ष्या करे । एक आम आदमी पीने का पानी चाहता है, पर नहीं मिलता । इलाज करवाना चाहता है, पर उसे नसीब नहीं होता । न रहने को मकान मिलता है और न रोजगार । तब से आज तक बच्चों की कई पीढ़ियां जवान हो गईं किन्तु चाहतें पूरी नहीं हुईं । उसने कौशिश तो बहुत की – आंदोलन किये, वोट देकर सरकारें बदलीं पर कामयाबी नहीं मिली । सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे निकले ।
एक बार एक बार एक पत्रकार ने जेल में भगतसिंह से पूछा था कि क्या भारत को आजादी मिलने से अंग्रेजी जुबान और अंग्रेजी 'कल्चर' से भारतीयों को मुक्ति मिल जायेगी । सरदार भगत सिंह ने 'ना' कहकर सिर हिला दिया था - उसे शायद मालूम था कि देसी काले अंग्रेजों का राज तो इन गोरों से भी बुरा होगा । महसूस होता है कि शायद हम आज भी गुलाम हैं । आजादी की लड़ाई में जाटों और सिखों के योगदान के बारे में हमारे बच्चों को कुछ भी पढ़ाया नहीं जा रहा । दूसरे महायुद्ध ने अंग्रेजों की कमर तोड़ कर रख दी थी और उन्होंने 1945 में ही भारत छोड़ने का मन बना लिया था । आखिरी दो साल उन्होंने इस बात को सोचने में लगाये कि जाने से पहले यहां के टुकड़े कैसे किये जायें ताकि यह देश दुबारा से जगतगुरु न बनने पाये।
अंग्रेज आज भी हम पर हमलावर हैं । अमरीकन कहो या अंग्रेज – बात एक ही है - उनकी कंपनियां भारत में अपने लिए नया राष्ट्र बना रही है । विदेशी पूंजी और तकनीक के साथ विदेशी संस्कृति और सभ्यता भी भारत के घर भीतर तक घुस आई है। ‘एड्स’ रोग का हव्वा दिखाकर स्कूलों में “यौन शिक्षा” देने की तैयारी की जा रही है । सौ करोड़ से ज्यादा आबादी वाला भारत उनके लिए एक “बड़ी मार्केट” है, और कुछ नहीं । देशभक्ति, संस्कृति आदि फालतू बातें हैं ! “यौन शिक्षा” और कुछ नहीं, इस बाजार को फैलाने की नीति का एक अंग है, जिसे अभी हम समझ नहीं पा रहे । इलेक्ट्रानिक तरंगें हमलावर हैं, गीत और संगीत में उद्दीपन और उत्तेजना है। बच्चे “झलक दिखला जा” गाते नाच रहे है । पश्चिम के विद्वानों ने काम सुख को भोग बनाया, भारत ने काम ऊर्जा में दिव्यता देखी और काम को भी देवता बनाया । भारतीय दर्शन में काम सर्वव्यापक है । भारत ने काम से राम की यात्रा की, लेकिन पश्चिम ने काम से दाम की । भारत में काम की लिप्सा वासना है और काम की सर्जना शक्ति ही प्रार्थना है । वासना की परिणिति भोग है, प्रार्थना की परिणिति योग है । काम ऊर्जा एक सीढ़ी है, ऊपर को चढ़े तो प्रार्थना, नीचे को उतरे तो वासना । प्राचीन भारत में सुविकसित शिक्षा व्यवस्था थी । विद्यार्थी ब्रह्मचारी कहलाता था । अध्यापक आचार्य थे । तब सामान्य ज्ञान भी उन्मुक्त ऐंद्रियगामी के लिए वर्जित था । तब वर्जनारहित पारदर्शी समाज था, लेकिन उस दौर में भी यौन शिक्षा/ काम ज्ञान जैसा विषय बच्चों के लिए नहीं था, क्योंकि यौन मानव जीवन की सहज प्रवृत्ति है । बड़ों के लिए यह ज्ञान सुलभ था - कामसूत्र जैसे ग्रंथ प्राचीन काल में ही लिखे गए । पश्चिम के देश भारत का यही तत्वज्ञान नहीं समझ पाए । यहां यौन शिक्षा नहीं, योग शिक्षा चाहिए।
स्वतंत्रता की वर्षगांठ मनाते समय भगवान हमें सदबुद्धि दे ताकि हम मानसिक गुलामी से भी मुक्ति पा सकें ।
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स्वतंत्रता का सच
देश को आजाद हुए साठ साल होने को हैं – जश्न की तैयारियां हो रहीं हैं । बाद में सब भूल जायेंगे और अपने काम-धंधे में मस्त हो जायेंगे । आज बहुत थोड़े से ही बूढ़े लोग बचे हैं जिन्होंने 1947 से पहले की घटनाओं को अपनी आंखों से देखा है । कहते हैं कि जो लोग इतिहास को भूल जाते हैं, इतिहास उन्हें माफ नहीं करता । इतिहास के पन्ने पूछेंगे कि बीसवीं सदी के आरंभ वाला वह भारत कहां है जिसमे आज के पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और बर्मा शामिल थे । रावी के तट पर देश को आजाद कराने की शपथ ली गई थी । आज लंडन की थेम्स नदी शायद रावी को मुस्करा कर कह रही है – मेरे बेटों ने तुम्हारे बेटों को मात दे दी, वे व्यापारी बन कर तुम्हारे देश में गए थे और एक मालिक की तरह तुम्हारे कई टुकड़े कर के वापस आ गए । आज एक जमीन के टुकड़ा ही तो तुम्हारे पास बचा है, बाकी तो सब मेरा है – भाषा, लिबास, चाल-चलन, व्यवहार – सब कुछ । आज हमें मजबूरन ही सही, यह सच्चाई तो मंजूर करनी ही पड़ रही है – इतिहास इसका गवाह है और पाकिस्तान, बंगलादेश इसके नमूने हैं । इतिहास का यह पन्ना पता नहीं कितनी पीढ़ियों को अपना सिर झुकाने पर मजबूर करता रहेगा । गांधी ने कहा था कि देश के टुकड़े करने से पहले मेरे शरीर के टुकड़े करने पड़ेंगे, विभाजन मेरी लाश पर होगा । फिर भी ऐसा हुआ । गांधी जी ने नेहरू को कहा भी – “बेटे जवाहरलाल, तुम तो कहते थे कि पाकिस्तान की मांग और देश के बंटवारे की बातें बेहूदा हैं, लेकिन अब तो उस बेहूदगी ने अपना असली रूप ले लिया – तुम्हारी समझ को अब क्या हुआ, अब उसे लकवा क्यों मार गया ?”
देश अंग्रेजों का गुलाम क्यूं बना, इसके कारणों को भी खंगालना चाहिये और उन कमियों को दूर करने की कौशिश करनी चाहिये । जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में कदम रखे तो देश की स्थिति दुर्दशापूर्ण थी । इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने लिखा है : “देश अपनी रक्षा में समर्थ नहीं था, शाही राज बुरी तरह भ्रष्ट, चरित्रहीन और जड़बुद्धि था, कुलीन जन स्वार्थी और संकुचित दृष्टि के थे । भ्रष्टाचार, अयोग्यता और विश्वासघात सार्वजनिक सेवा की प्रत्येक शाखा में फैला था । पतन और भ्रम के बीच हमारे साहित्य, कला और यहां तक कि धर्म तक को नुकसान उठाना पड़ा ।” उस समय पतन इस हद तक हो चुका था कि 1739 में नादिरशाह ने और अहमदशाह ने 1757 में दिल्ली को आसानी से जीत लिया था और सारी संपत्ति लूट ले गए थे । नादिरशाह ने एक ही दिन में बीस हजार लोगों का कत्ले-आम करवा दिया था ।
दो साल पहले जगमोहन की पुस्तक “Soul and Structure of Governance in India” छपी थी । उसमे ब्रिटिश राज के कुछ अच्छे और बुरे पहलूओं पर नजर डाली गई है । शुरू में अंग्रेजों ने प्रशासन का एक मजबूत ढ़ांचा बनाया, इंडियन सिविल सर्विसेज के साथ एक नियंत्रित प्रशासनिक तंत्र बनाया । इससे शान्ति भी हुई और सड़क, रेलवे, डाकखानों का एक नेटवर्क भी बना । कुछ सिंचाई की परियोजनायें स्थापित हुईं और नहरों का भी जाल बिछा । कुछ मायनों में अंग्रेजों के कुछ काम सलामी के काबिल थे, इसलिए हमारे बुजुर्ग कई बार कह देते हैं कि अंग्रेजी राज अच्छा था । लेकिन नकारात्मक पहलू भी कम नहीं थे । 17वीं और 18वीं शताब्दी में भारत खेती में अग्रणी था और कपड़ा और स्टील उद्योग में भी दुनियां में नम्बर-वन था । अंग्रेजों ने कच्चे माल को सस्ती कीमत पर बाहर भेजा और यहां अंग्रेजी माल को डंप किया । बनारस के खादी उद्योग को लगभग खत्म कर दिया जिसका माल पहले सारे यूरोप में जाता था । देश को भारी अकालों का भी सामना करना पड़ा । ब्रिटिश रिकार्ड ही बताते हैं कि 1800 से 1825 के बीच दस लाख, 1825-1850 में चालीस लाख, 1850-1875 में पचास लाख और 1875-1900 में ड़ेढ करोड़ लोग अकाल की भेंट चढ़ गए – यानी सौ साल में ढ़ाई करोड़ लोग अकाल का शिकार हुए । 1942-44 के बंगाल के अकाल में सबसे ज्यादा लोग मरे थे – अनाज की कमी से नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों के कारण । उस समय बंगाल में सबसे ज्यादा चावल की उपज होती थी, अनाज गोदामों में पड़ा सड़ता रहा पर लोगों तक नहीं पहुंचा ।
अंग्रेजी राज्य की चादर में और भी धब्बे हैं । 13 अप्रैल 1919 को ब्रिगेडियर जनरल ओ-डायर ने जलियांवाला बाग में निहत्थे और निर्दोष लोगों पर गोलियां चलवाईं । फयरिंग कुल दस मिनट चली और इसमें करीब चार सौ लोग मारे गए और 1200 जख्मी हुए । इस अकेली करतूत ने लोगों का विश्वास खो दिया और शासन की निष्पक्षता को तार-तार कर दिया । अंग्रेज चाहते तो पाकिस्तान के बनने को रोक सकते थे । पर उन्होंने उल्टे इस आग को हवा दी ।
गांधी-इरविन बातचीत में भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी ने देने की बात भी शामिल थी । इरविन ने साफ मना कर दिया । कांग्रेस और गांधी ने यह मुद्दा छोड़ ही दिया । 23 मार्च 1931 को भगतसिंह को फांसी दे दी गई और इसके छ: दिन बाद कराची में कांग्रेस अधिवेशन में गांधी और कांग्रेस को लेने के देने पड़ गए । असल में उस वक्त भगत सिंह गांधी से ज्यादा लोकप्रिय थे ।
अगस्त का महीना 1942 की ‘अगस्त क्रांति’ के लिए भी मशहूर है जिसको बहुत से क्रांतिकारियों ने अंजाम दिया था पर बाद में कांग्रेस ने झूठे ही उसका सेहरा अपने पर सजा लिया । 15 अगस्त 1947 पर नेहरू की यह घोषणा “अब हम अपने भाग्य से भेंट करेंगे”(Tryst with destiny) लाल किले से टकरा कर रह गई । हम अंग्रेजों की गुलामी से तो मुक्त हो गए पर कुछ खानदानों की गुलामी में फंस गए जो आज तक राज करते आ रहे हैं । आजादी से पहले नेता जितनी सादगी से रहते थे, आज के नेताओं के ठाठ-बाट देखो तो हैरानी होती है । आज देश के करोड़ों लोग रेल का रिजर्वेशन भी नहीं करवा सकते जबकि उन के द्वारा चुने गए कस्बाई नेता भी विमान से सफर करते हैं । एक मामूली एम.पी. जितने बड़े सरकारी बंगले में नई दिल्ली के इलाके में रहता है, शायद रतन टाटा भी उससे ईर्ष्या करे । एक आम आदमी पीने का पानी चाहता है, पर नहीं मिलता । इलाज करवाना चाहता है, पर उसे नसीब नहीं होता । न रहने को मकान मिलता है और न रोजगार । तब से आज तक बच्चों की कई पीढ़ियां जवान हो गईं किन्तु चाहतें पूरी नहीं हुईं । उसने कौशिश तो बहुत की – आंदोलन किये, वोट देकर सरकारें बदलीं पर कामयाबी नहीं मिली । सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे निकले ।
एक बार एक बार एक पत्रकार ने जेल में भगतसिंह से पूछा था कि क्या भारत को आजादी मिलने से अंग्रेजी जुबान और अंग्रेजी 'कल्चर' से भारतीयों को मुक्ति मिल जायेगी । सरदार भगत सिंह ने 'ना' कहकर सिर हिला दिया था - उसे शायद मालूम था कि देसी काले अंग्रेजों का राज तो इन गोरों से भी बुरा होगा । महसूस होता है कि शायद हम आज भी गुलाम हैं । आजादी की लड़ाई में जाटों और सिखों के योगदान के बारे में हमारे बच्चों को कुछ भी पढ़ाया नहीं जा रहा । दूसरे महायुद्ध ने अंग्रेजों की कमर तोड़ कर रख दी थी और उन्होंने 1945 में ही भारत छोड़ने का मन बना लिया था । आखिरी दो साल उन्होंने इस बात को सोचने में लगाये कि जाने से पहले यहां के टुकड़े कैसे किये जायें ताकि यह देश दुबारा से जगतगुरु न बनने पाये।
अंग्रेज आज भी हम पर हमलावर हैं । अमरीकन कहो या अंग्रेज – बात एक ही है - उनकी कंपनियां भारत में अपने लिए नया राष्ट्र बना रही है । विदेशी पूंजी और तकनीक के साथ विदेशी संस्कृति और सभ्यता भी भारत के घर भीतर तक घुस आई है। ‘एड्स’ रोग का हव्वा दिखाकर स्कूलों में “यौन शिक्षा” देने की तैयारी की जा रही है । सौ करोड़ से ज्यादा आबादी वाला भारत उनके लिए एक “बड़ी मार्केट” है, और कुछ नहीं । देशभक्ति, संस्कृति आदि फालतू बातें हैं ! “यौन शिक्षा” और कुछ नहीं, इस बाजार को फैलाने की नीति का एक अंग है, जिसे अभी हम समझ नहीं पा रहे । इलेक्ट्रानिक तरंगें हमलावर हैं, गीत और संगीत में उद्दीपन और उत्तेजना है। बच्चे “झलक दिखला जा” गाते नाच रहे है । पश्चिम के विद्वानों ने काम सुख को भोग बनाया, भारत ने काम ऊर्जा में दिव्यता देखी और काम को भी देवता बनाया । भारतीय दर्शन में काम सर्वव्यापक है । भारत ने काम से राम की यात्रा की, लेकिन पश्चिम ने काम से दाम की । भारत में काम की लिप्सा वासना है और काम की सर्जना शक्ति ही प्रार्थना है । वासना की परिणिति भोग है, प्रार्थना की परिणिति योग है । काम ऊर्जा एक सीढ़ी है, ऊपर को चढ़े तो प्रार्थना, नीचे को उतरे तो वासना । प्राचीन भारत में सुविकसित शिक्षा व्यवस्था थी । विद्यार्थी ब्रह्मचारी कहलाता था । अध्यापक आचार्य थे । तब सामान्य ज्ञान भी उन्मुक्त ऐंद्रियगामी के लिए वर्जित था । तब वर्जनारहित पारदर्शी समाज था, लेकिन उस दौर में भी यौन शिक्षा/ काम ज्ञान जैसा विषय बच्चों के लिए नहीं था, क्योंकि यौन मानव जीवन की सहज प्रवृत्ति है । बड़ों के लिए यह ज्ञान सुलभ था - कामसूत्र जैसे ग्रंथ प्राचीन काल में ही लिखे गए । पश्चिम के देश भारत का यही तत्वज्ञान नहीं समझ पाए । यहां यौन शिक्षा नहीं, योग शिक्षा चाहिए।
स्वतंत्रता की वर्षगांठ मनाते समय भगवान हमें सदबुद्धि दे ताकि हम मानसिक गुलामी से भी मुक्ति पा सकें ।
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