Inspirational stories

घने वीरान जंगल से गुजरती हुई सड़क के किनारे एक ज्ञानी गुरु अपने चेले के साथ एक साइनबोर्ड लगाकर बैठे हुए थे, जिस पर लिखा था -
“ठहरिये … आपका अंत निकट है ! इससे पहले कि बहुत देर हो जाये , रुकिए ! … हम आपका जीवन बचा सकते हैं !”
एक कार फर्राटा भरते हुए वहाँ से गुजरी. चेले ने ड्राईवर को बोर्ड पढ़ने के लिए इशारा किया …
ड्राईवर ने बोर्ड की ओर देखकर भद्दी सी गाली दी और चेले से यह कहता हुआ निकल गया – “तुम लोग बियाबान जंगल में भी धंधा कर रहे हो ! शर्म आनी चाहिए !”
चेले ने असहाय नज़रों से गुरूजी की ओर देखा. गुरूजी बोले – “जैसे प्रभु की इच्छा !”
कुछ ही पल बाद कार के ब्रेकों के चीखने की आवाज आई और एक जोरदार धमाका हुआ.
कुछ देर बाद एक मिनी-ट्रक निकला. उसका ड्राईवर भी चेले को दुत्कारते हुए बिना रुके आगे चला गया.
कुछ ही पल बाद फिर ब्रेकों के चीखने की आवाज़ और फिर धड़ाम …. !
गुरूजी फिर बोले – “जैसी प्रभु की इच्छा !”
अब चेले से नहीं रहा गया. बोला – “गुरूजी, प्रभु की इच्छा तो ठीक है पर कैसा रहे यदि हम इस बोर्ड पर सीधे-सीधे लिख दें कि -
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‘आगे पुलिया टूटी हुई है.
 
बहुत समय पहले की बात है
जब राजा महाराजा अपने मंत्रियों से काफी प्रभावित रहते थे। जैसे राजा अकबर और राजा कृष्णराय और तेनालीरामा ऐसे ही एक राजा के पास मंत्री था वो कभी भी झूठ नहीं बोलता था। राजा एक दिन उस मंत्री की परीक्षा लेने की सोची। और भरे दरबार में सम्राट ने अपने हाथ के पंजे में एक पक्षी को लिया और मंत्री से पूछा - बताओ, पक्षी जिंदा है या मृत ? मंत्री के सन्मुख यह नई तथा विचित्र परीक्षा की घड़ी थी। यदि वह कहता है कि पक्षी जिंदा है तो सम्राट पंजा दबा कर उसे मार देगा और यदि वह कहता है कि पक्षी मृत है, तो सम्राट पंजा खोलकर उसे उड़ा देगा। मंत्री के दोनों ही उत्तर झूठे ठहराये जाने की पूरी संभावना थी। आखिर मंत्री ने फैसला किया यदि मेरे एक झूठ से पक्षी के प्राण बच सकते है, तो झूठ भी मुझे मंजूर है।
मंत्री ने कहा - हे सम्राट, आपके पंजे में जो पक्षी है, वह मृत है। ऐसा सुनते ही सम्राट ने पंजा खोल दिया और पक्षी उड़ गया। सम्राट ने कहा - आज तो तुमने झूठ बोल दिया। मंत्री ने जवाब दिया - महाराज, यदि मेरे इस झूठ से इस निर्दोष पक्षी की जान बच गयी है, तो यह झूठ बोलकर भी मैं विजयी ही हूँ , हारकर भी विजयी हूँ।
इस उत्तर से सम्राट बहुत खुश हुआ और भरे दरबार में उसकी तारीफ करने को विवश हो गया। कल्याण के लिए बोला गया झूठ, कई बार सत्य से भी बढ़कर होता है। सत्य लचीला होता है, वह व्यक्ति, समय, स्थान और परिस्थिति को परखकर निर्धारित होता है। एक व्यक्ति के सम्बन्ध में जो झूठ है, वही दूसरे के सम्बन्ध में कल्याणकारी हो सकता है।
सीख - किसी मासूम की जान बचाने ने लिए बोला गया झूठ, झूठ नहीं पर वो कल्याणकारी होता है।
 
are aap to bahut khubsurat hai

एक‬महिला घर पर अकेली थी , तभी दरवाजे पर दस्तक हुई!उसने जैसे ही दरवाजा खोला तोएक अनजान आदमी खड़ा था !......देखते ही बोला ! अरे , आप तो बहुत ही खूबसूरत हैं?......महिला घबरा कर दरवाजा बंदकरदेती है !......अगले तीन चार दिन तक ऐसा ही चलता रहता है, तो सभ्य महिला ने तँग आकर यह बात अपने पति को बताई!.......पति बोला तुम चिंता मत करो आज जब वो आएगा तो मैं घर पर ही रहुंगा और दरवाजे के पीछेखड़ा रहूँगा , तुम उससे बोल देना " हाँ मैं, सुन्दर हूँ , तुम्हे क्या ? " फिर मैं उसकोमज़ा चखाता हूँ!.......दूसरे दिन जैसे ही वो आदमी आता है, पति दरवाजे के पीछे छिपा रहता हैआदमी बोलताहै ” अरे ! आप तो बेहद खूबसूरत हैं ?महिला :- हाँ , मैं खूबसूरत हूँ , लेकिन तुम चार दिन से क्या चाह रहे हो?........................................आदमीविनम्रता के साथ हाथ जोड़ कर बोला :- बहन जी , यही विश्वास और अहसास , आप अपने पति के अंदर जागृत कीजिये न ,ताकि वोमेरी बीबी का पीछा करना छोड़ दे !
 
एक सौदागर राजा के महल में
दो गायों को लेकर आया - दोनों ही स्वस्थ,
सुंदर व दिखने में लगभग एक जैसी थीं।
सौदागर ने राजा से कहा "महाराज - ये गायें
माँ - बेटी हैं परन्तु मुझे यह
नहीं पता कि माँ कौन है व बेटी कौन -
क्योंकि दोनों में खास अंतर नहीं है।
मैंने अनेक जगह पर लोगों से यह पूछा किंतु
कोई भी इन दोनों में माँ - बेटी की पहचान
नहीं कर पाया - बाद में मुझे किसी ने यह
कहा कि आपका बुजुर्ग मंत्री बेहद
कुशाग्रबुद्धि का है और यहाँ पर मुझे अवश्य
मेरे प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा इसलिए मैं
यहाँ पर चला आया -
कृपया मेरी समस्या का समाधान किया जाए।"
यह सुनकर सभी दरबारी मंत्री की ओर देखने
लगे -
मंत्री अपने स्थान से उठकर गायों की तरफ
गया। उसने दोनों का बारीकी से निरीक्षण
किया किंतु वह भी नहीं पहचान
पाया कि वास्तव में कौन मां है और कौन
बेटी ... ?
अब मंत्री बड़ी दुविधा में फंस गया, उसने
सौदागर से एक दिन की मोहलत मांगी।
घर आने पर वह बेहद परेशान रहा -
उसकी पत्नी इस बात को समझ गई।
उसने जब मंत्री से परेशानी का कारण
पूछा तो उसने सौदागर की बात बता दी।
यह सुनकर पत्नी मुस्कराते हुए बोली 'अरे !
बस इतनी सी बात है - यह तो मैं
भी बता सकती हूँ ।'
अगले दिन मंत्री अपनी पत्नी को वहाँ ले
गया जहाँ गायें बंधी थीं।
मंत्री की पत्नी ने दोनों गायों के आगे
अच्छा भोजन रखा - कुछ ही देर बाद उसने
माँ व बेटी में अंतर बता दिया - लोग चकित रह
गए।
मंत्री की पत्नी बोली "पहली गाय जल्दी -
जल्दी खाने के बाद दूसरी गाय के भोजन में
मुंह मारने लगी और दूसरी वाली ने
पहली वाली के लिए अपना भोजन छोड़ दिया,
ऐसा केवल एक मां ही कर सकती है -
यानि दूसरी वाली माँ है।
माँ ही बच्चे कैे लिए भूखी रह सकती है - माँ में
ही त्याग, करुणा,वात्सल्य, ममत्व के गुण
विद्यमान होते है।
 
एक बार एक अजनबी किसी के घर गया।
वह अंदर गया और मेहमान कक्ष मे बैठ
गया। वह खाली हाथ आया था तो उसने
सोचा कि कुछ उपहार
देना अच्छा रहेगा।
तो उसने वहा टंगी एक पेन्टिंग
उतारी और जब घर का मालिक आया,
उसने पेन्टिंग देते हुए कहा, यह मै आपके
लिए लाया हुँ।
घर का मालिक, जिसे पता था कि यह
मेरी चीज मुझे हि भेंट दे रहा है, सन्न
रह गया।
अब आप ही बताएं कि क्या वह भेंट
पा कर, जो कि पहले से हि उसका है, उस
आदमी को खुश होना चाहिए..?
मेरे ख्याल से नहीं।
लेकिन यही चीज हम भगवान के साथ
भी करते है। हम उनहे फूल, फल और हर
चीज जो उनकी हि बनाई है, उनहें भेंट
करते हैं और सोचते हैं ...
कि ईश्वर खुश हो जाएगें।
हम यह नहीं समझते कि उनको इन सब
चीजो कि जरुरत नही।...
अगर आप सच मे उन्हे कुछ देना चाहते हैं
तो उन्हें अपना प्रेम दिजिए उन्हें अपने
हर एक श्वास मे याद रखिये।
उनका नाम लीजिये। उनकी बनाई हुई
इस दुनिया में किसी को कोई
हानि नही पहुचाइए अगर आप
ऐसा करते है तो विश्वास मानिए प्रभु
जरुर खुशहोंगे...
 
बहुत समय पहले की बात है , एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किये । वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे , और राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे। राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी व्यक्ति को नियुक्त कर दिया। जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन बनाया और उस जगह पहुँच गए जहाँ उन्हें पाला जा रहा था। राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार लग रहे थे । राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे व्यक्ति से कहा, ” मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूँ, तुम इन्हे उड़ने का इशारा करो ।"


व्यक्ति ने ऐसा ही किया। इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे , पर जहाँ एक बाज आकाश की ऊंचाइयों को छू रहा था , वहीँ दूसरा , कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था। ये देख, राजा को कुछ विचित्र लगा। "क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है वहीँ ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा ?” राजा ने प्रश्न किया।
”जी हुजूर , इस बाज के साथ आरम्भ से यही समस्या है , वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं।” राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे , और वो दूसरे बाज को भी उसी तरह उड़ना देखना चाहते थे। अगले दिन पूरे राज्य में घोषणा करा दिया गया कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊँचा उड़ाने में सफल होगा उसे ढेरों पुरस्कार दिया जाएगा।


फिर क्या था , एक से एक विद्वान आये और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे पर हफ़्तों व्यतीत जाने के पश्चात भी बाज का वही हाल था, वो थोडा सा उड़ता और वापस डाल पर आकर बैठ जाता।
फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ, राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आकाश में उड़ रहे हैं। उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था। वह व्यक्ति एक किसान था। अगले दिन वह दरबार में उपस्थित हुआ। उसे पुरस्कार में स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के पश्चात राजा ने कहा , ” मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान् नहीं कर पाये वो तुमने कैसे कर दिखाया।"


“महाराजाधिराज ! मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ , मैं ज्ञान की अधिक बातें नहीं जानता , मैंने तो बस वो डाल काट दी जिस पर बैठने का बाज आदि हो चुका था, और जब वो डाल ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा।“

मित्रों ! हम सभी ऊँचा उड़ने के लिए ही बने हैं। परन्तु कई बार हम जो कर रहे होते हैं उसके इतने आदि हो जाते हैं कि अपनी ऊँची उड़ान भरने की , कुछ बड़ा करने की योग्यता को भूल जाते हैं। यदि आप भी वर्षों से किसी ऐसे ही काम में लगे हैं जो आपके सही potential के अनुसार नहीं है तो एक बार अवश्य सोचिये कि कहीं आपको भी उस डाल को काटने की आवश्यकता तो नहीं जिसपर आप बैठे हैं?


"Luck is what happens when preparation meets opportunity."
 
Last edited:
शादी की पहली रात को नवविवाहित जोड़े ने तय किया की वो सुबह कोई भी बिना कारण दरवाजा खटखटाएगा तो वो दरवाजा नहीं सुबह पति के माँ ने दरवाजा खटखटाया. दोनों ने एक दूसरे को देखा.और रात में जैसा तय किया था उस अनुसार उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला. थोड़ी देर बाद पत्नी के पिता ने दरवाजा खटखटाया. दोनों ने फिर एक दूसरे की और देखा. पत्नी के आँखों से आंसू बहने लगे और उसने रोना शुरू कर दिया. बोली "मैं अपने पिता को ऐसे ही दरवाज़ा खटखटाते नहीं छोड़ सकती, मैं पहले ही उन्हें हमेशा के लिए छोड़कर आयी हूँ, उन्हें कितना दुःख होगा अगर मैंने दरवाज़ा नहीं खोला तो." पति ने कुछ नहीं कहा, पत्नी ने दरवाजा खोल दिया. कई साल बीत गए,

इस युगल के 5 बच्चे हुए, जिनमे से पहले 4 लड़के थे और आख़िरी लड़की. जब लड़की ने जन्म लिया तो उस व्यक्ति को बहुत खुशी हुई, उसे ऐसा लगा जैसे उसे भगवान ने ज़िंदगी का सबसे बड़ा उपहार दिया है. उसने काफी बड़ा जश्न मनाया, और कई लोगो को बुलाया. जश्न के दौरान उससे एक व्यक्ति ने पूछा की क्यों वह बेटी होने के खुशी में इतना जश्न मना रहा है, जबकी किसी भी बेटे के जन्म पर उसने जश्न नहीं मनाया. उसने जवाब दिया : "ये बेटी ही है जो हमेशा मेरे लिए दरवाजा खोलेगी, बेटों का क्या भरोसा!"

इस कहानी को स्वयं वास्तविकता में परखिये, बेटे माता-पिता की अवहेलना कर सकते हैं, किन्तु बेटी नहीं !
 
बदकिस्मत कौन ?
एक बार यात्रियों से भरी एक बस कहीं जा रही थी। अचानक मौसम बदला धुलभरी आंधी के बाद बारिश की बूंदे गिरने लगी बारिश तेज होकर तूफान मे बदल चुकी थी घनघोर अंधेरा छा गया भयंकर बिजली चमकने लगी बिजली कडककर बस की तरफ आती और वापस चली जाती ऐसा कई बार हुआ सब की सांसे ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे। ड्राईवर ने आखिरकार बस को एक बडे से पेड से करीब पचास कदम की दूरी पर रोक दी और यात्रियों से कहा कि इस बस मे कोई ऐसा यात्री बैठा है जिसकी मौत आज निश्चित है उसके साथ साथ कहीं हमे भी अपनी जिन्दगी से हाथ न धोना पडे इसलिए सभी यात्री एक एक कर जाओ और उस पेड के हाथ लगाकर आओ जो भी बदकिस्मत होगा उस पर बिजली गिर जाएगी और बाकी सब बच जाएंगे। सबसे पहले जिसकी बारी थी उसको दो तीन यात्रियों ने जबरदस्ती धक्का देकर बस से नीचे उतारा वह धीरे धीरे पेड तक गया डरते डरते पेड के हाथ लगाया और भाग कर आकर बस मे बैठ गया। ऐसे ही एक एक कर सब जाते और भागकर आकर बस मे बैठ चैन की सांस लेते। अंत मे केवल एक आदमी बच गया उसने सोचा तेरी मौत तो आज निश्चित है सब उसे किसी अपराधी की तरह देख रहे थे जो आज उन्हे अपने साथ ले मरता उसे भी जबरदस्ती बस से नीचे उतारा गया वह भारी मन से पेड के पास पहुँचा और जैसे ही पेड के हाथ लगाया तेज आवाज से बिजली कडकी और बिजली बस पर गिर गयी बस धूं धूं कर जल उठी सब यात्री मारे गये सिर्फ उस एक को छोडकर जिसे सब बदकिस्मत मान रहे थे वो नही जानते थे कि उसकी वजह से ही सबकी जान बची हुई थी। "दोस्तो हम सब अपनी सफलता का श्रेय खुद लेना चाहते है जबकि क्या पता हमारे साथ रहने वाले की वजह से हमे यह हासिल हो पाया हो।
 
एक धनवान व्यक्ति था l उसके कई सारे मित्र थे, उउसमें एक मित्र जो काफी निर्धन था, वह धनवान व्यक्ति का विश्वास पात्र था l एक दिन धनवान अपने घर सभी मित्रों को खाने का आमंत्रण देता है, सभी मित्र धनवान के घर आते हैं l भोजन के पश्चात धनवान व्यक्ति को ध्यान आता है कि उसने एक उंगली मे मूल्यवान हीरे जडित अंगुठी पहनी हुई थी, थोड़ी ढीली होने के कारण कहीं गिर गई हैl सभी मित्र घर में अंगुठी खोजने मे सहायता करते हैं l परन्तु नहीं मिलती l एक मित्र कहता है "आप हम सभी की तलाशी ले सकते हैं l एक व्यक्ति के कारण से हम सभी सदैव के लिए आप की दृष्टि में सन्देह के घेरे में रहेंगे।" सभी मित्र तलाशी के लिये तैयार हो जाते हैं l सिवाए एक निर्धन व्यक्ति के, वो अपनी तलाशी लेने से मना कर देता है, सभी मित्र उसका अपमान करते हैं l धनवान व्यक्ति किसी की तलाशी ना लेकर सभी को विदा करता है l दूसरे दिन सुबह जब धनवान व्यक्ति अपनी कोट की जेब में हाथ डालता है तो अंगुठी मिल जाती है और वो निर्धन मित्र के घर आता है. और अपने मित्रों द्वारा किये अपमान के लिए क्षमा माँगता है. और अपनी तलाशी ना देने का कारण पूछता है l


निर्धन मित्र पलंग पर सोये हुये अपने बीमार पुत्र की ओर इशारा करते हुए कहता है "मैं जब आपके यहाँ आ रहा था, इस ने मिठाई खाने का हठ किया था, आप के यहाँ जब खाना खा रहा था तो मिठाई देखी तो मैनें वो ना खाकर अपने पुत्र के लिये जेब में रख ली थी l यदि तलाशी ली जाती तो अंगुठी की ना सही मिठ्ठाई चोरी का दोषारोपण अवश्य लगता। इसी लिये अपमान सहना ठीक समझा क्योंकि रात को सच बताता तो बीच में बेटे का नाम भी आता।


इस कहानी से सिद्ध होता है- माता-पिता अपनी संतान की छोटी- छोटी प्रसन्नता के लिये क्या- क्या नहीं सहन करते।
 
यह एक सूफी कथा है.
किसी गाँव में एक बहुत सरल स्वभाव का आदमी रहता था. वह लोगों को छोटी
-मोटी चीज़ें बेचता था. उस गाँव के सभी निवासी यह समझते थे कि उसमें निर्णय
करने, परखने और आंकनेकी क्षमता नहीं थी.इसीलिए बहुत से लोग उससे चीज़ें
खरीदकर उसे खोटे सिक्के दे दिया करते थे. वह उन सिक्कों को ख़ुशी-ख़ुशी ले लेता था.
किसी ने उसे कभी भी यह कहते नहीं सुना कि ‘यह सही है और यह गलत है’
. कभी-कभी तो उससे सामान लेनेवाले लोग उसे कह देते थे
कि उन्होंने दाम चुका दिया है, और वह उनसे पलटकर कभी नहीं कहता था कि
‘नहीं,तुमने पैसे नहीं दिए हैं’. वह सिर्फइतना ही कहता ‘ठीक है’, और उन्हें धन्यवाद देता.
दूसरे गाँवों से भी लोग आते और बिना कुछ दाम चुकाए उससे सामान
ले जाते या उसे खोटे पैसे दे देते. वह किसी से कोई शिकायत नहीं करता.
समय गुज़रते वह आदमी बूढ़ा हो गया और एक दिन उसकी मौत की घड़ी
भी आ गयी. कहते हैं कि मरते हुए ये उसके अंतिम शब्द थे: –
“मेरे खुदा, मैंने हमेशा ही सब तरह के सिक्के लिए, खोटे सिक्के भी लिए. मैं भी
एक खोटा सिक्का ही हूँ, मुझे मत परखना. मैंने तुम्हारे लोगों का फैसला नहीं किया,
तुम भी मेरा फैसला मत करना.”
ऐसे आदमी को भगवान कैसे परखता?
 
लोहे की एक छड़ का मूल्य होता है 250 रूपये.
इससे घोड़े की नाल बना दी जाये तो इसका मूल्य हो जाता है 1000 रूपये.

इससे सुईयां बना दी जायें तो इसका मूल्य हो जाता है 10,000 रूपये.
इससे घड़ियों के बैलेंस स्प्रिंग बना दिए जायें तो इसका मूल्य हो जाता है 1,00,000 रूपये...
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"आपका अपना मूल्य-- इससे निर्धारित नहीं होता कि आप क्या है ,
बल्कि इससे निर्धारित होता है कि आप में खुद को क्या बनाने की क्षमता है"!!!!


इतने छोटे बनिए कि ...
हर कोई आपके साथ बैठे,
ओर इतने बड़े बनिए कि ...आप खड़े हो तो, कोई बैठ न पाये।
 
एक बार एक लड़की कार चला रही थी और पास में उसके पिताजी बैठे थे।
राह में एक भयंकर तूफ़ान आया और लड़की ने पिता से पूछा -- "अब हम क्या करें?"
पिता ने जवाब दिया --"कार चलाते रहो।"

तूफ़ान में कार चलाना बहुत ही मुश्किल हो रहा था, तूफ़ान और भयंकर होता जा रहा था. "अब मैं क्या करूँ?" -- लड़की ने पुनः पूछा.
"कार चलाते रहो।"--पिता ने पुनः कहा।

थोड़ा आगे जाने पर लड़की ने देखा की राह में कई वाहन तूफ़ान की वजह से रुके हुए थे। उसने फिर अपने पिता से कहा -
"मुझे लगता है अब हमें कार रोक देनी चाहिए। मैं मुश्किल से देख पा रही हूँ। यह भयंकर है और प्रत्येक ने अपना वाहन रोक दिया है।"

उसके पिता ने फिर निर्देशित किया -- "कार रोकना नहीं. बस चलाते रहो।"

तूफ़ान ने बहुत ही भयंकर रूप धारण कर लिया था, किन्तु लड़की ने कार चलाना नहीं और अचानक ही उसने देखा कि कुछ साफ़ दिखने लगा है।
कुछ किलो मीटर आगे जाने के पश्चात लड़की ने देखा कि तूफ़ान थम गया और सूर्य निकल आया है।

तब उसके पिता ने कहा -- "अब तुम कार रोक सकती हो और बाहर आ सकती हो।"
लड़की ने पूछा -"पर अब क्यों?"

पिता ने कहा -- "जब तुम बाहर आओगी तो देखोगी कि जो राह में रुक गए थे, वे अभी भी तूफ़ान में फंसे हुए हैं। चूँकि तुमने कार चलाने का प्रयत्न नहीं छोड़ा, तुम तूफ़ान के बाहर हो।"

यह किस्सा उन लोगों के लिए एक प्रमाण है जो कठिन समय से गुजर रहे हैं।
मजबूत से मजबूत इंसान भी प्रयास छोड़ देते हैं, किन्तु प्रयास कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए।
निश्चित ही जिन्दगी का कठिन समय गुजर जायेंगे
और सुबह के सूर्य की भांति चमक आपके जीवन में पुनः आयेगी!!!!
 
एक प्राचीन रूसी कथा है। एक बड़े टोकरे में बहुत से मुर्गे आपस में लड़ रहे थे। नीचे वाला खुली हवा में सांस लेने के लिए अपने ऊपर वाले को गिराकर ऊपर आने के लिए फड़फड़ाता है। सब भूख—प्यास से व्याकुल हैं। इतने में कसाई छुरी लेकर आ जाता है, एक —एक मुर्गे की गर्दन पकड़कर टोकरे से बाहर खींचकर वापस काटकर फेंकता जाता है। कटे हुए मुर्गों के शरीर से गर्म लहू की धार फूटती है। भीतर के अन्य जिंदा मुर्गे अपने — अपने पेट की आग बुझाने के लिए उस पर टूट पड़ते हैं। इनकी जिंदा चोंचों की छीना— झपटी में मरा कटा मुर्गे का सिर गेंद की तरह उछलता—लुढ़कता है। कसाई लगातार टोकरे के मुर्गे काटता जाता है।

टोकरे के भीतर हिस्सा बांटने वालों की संख्या भी घटती जाती है। इस खुशी में बाकी बचे मुर्गों के बीच से एकाध की बांग भी सुनायी पड़ती है। अंत में टोकरा सारे कटे मुर्गों से भर जाता है। चारों ओर खामोशी है, कोई झगड़ा या शोर नहीं है। इस रूसी कथा का नाम है—जीवन।

ऐसा जीवन है। सब यहां मृत्यु की प्रतीक्षा में हैं। प्रतिपल किसी की गर्दन कट जाती है। लेकिन जिनकी गर्दन अभी तक नहीं कटी है, वे संघर्ष में रत हैं, वे प्रतिस्पर्धा में जुटे हैं। जितने दिन, जितने क्षण उनके हाथ में हैं, इनका उन्हें उपयोग कर लेना है। इस उपयोग का एक ही अर्थ है कि किसी तरह अपने जीवन को सुरक्षित कर लेना है, जो कि सुरक्षित हो ही नहीं सकता। मौत तो निश्चित है। मृत्यु तो आकर ही रहेगी। मृत्यु तो एक अर्थ में आ ही गयी है। क्यू में खड़े हैं हम। और प्रतिपल क्यू छोटा होता जाता है, हम करीब आते जाते हैं। मौत ने अपनी तलवार उठाकर ही रखी है, वह हमारी गर्दन पर ही लटक रही है, किसी भी क्षण गिर सकती है। लेकिन जब तक नहीं गिरी है, तब तक हम जीवन की आपाधापी में बड़े व्यस्त हैं—और बटोर लूं, और इकट्ठा कर लूं? और थोड़े बड़े पद पर पहुंच जाऊं, और थोड़ी प्रतिष्ठा हो जाए, और थोड़ा मान—मर्यादा मिल जाए। और अंत में सब मौत छीन लेगी।

जिन्हें मृत्यु का दर्शन हो गया, जिन्होंने ऐसा देख लिया कि मृत्यु सब छीन लेगी, उनके जीवन में संन्यास का पदार्पण होता है। उनके जीवन में एक क्रांति घटती है। इस क्रांति को बुद्ध ने एक विशिष्ट नाम दिया है, उसे वे कहते हैं—परावृत्ति.
 
एक प्राचीन रूसी कथा है। एक बड़े टोकरे में बहुत से मुर्गे आपस में लड़ रहे थे। नीचे वाला खुली हवा में सांस लेने के लिए अपने ऊपर वाले को गिराकर ऊपर आने के लिए फड़फड़ाता है। सब भूख—प्यास से व्याकुल हैं। इतने में कसाई छुरी लेकर आ जाता है, एक —एक मुर्गे की गर्दन पकड़कर टोकरे से बाहर खींचकर वापस काटकर फेंकता जाता है। कटे हुए मुर्गों के शरीर से गर्म लहू की धार फूटती है। भीतर के अन्य जिंदा मुर्गे अपने — अपने पेट की आग बुझाने के लिए उस पर टूट पड़ते हैं। इनकी जिंदा चोंचों की छीना— झपटी में मरा कटा मुर्गे का सिर गेंद की तरह उछलता—लुढ़कता है। कसाई लगातार टोकरे के मुर्गे काटता जाता है।

टोकरे के भीतर हिस्सा बांटने वालों की संख्या भी घटती जाती है। इस खुशी में बाकी बचे मुर्गों के बीच से एकाध की बांग भी सुनायी पड़ती है। अंत में टोकरा सारे कटे मुर्गों से भर जाता है। चारों ओर खामोशी है, कोई झगड़ा या शोर नहीं है। इस रूसी कथा का नाम है—जीवन।

ऐसा जीवन है। सब यहां मृत्यु की प्रतीक्षा में हैं। प्रतिपल किसी की गर्दन कट जाती है। लेकिन जिनकी गर्दन अभी तक नहीं कटी है, वे संघर्ष में रत हैं, वे प्रतिस्पर्धा में जुटे हैं। जितने दिन, जितने क्षण उनके हाथ में हैं, इनका उन्हें उपयोग कर लेना है। इस उपयोग का एक ही अर्थ है कि किसी तरह अपने जीवन को सुरक्षित कर लेना है, जो कि सुरक्षित हो ही नहीं सकता। मौत तो निश्चित है। मृत्यु तो आकर ही रहेगी। मृत्यु तो एक अर्थ में आ ही गयी है। क्यू में खड़े हैं हम। और प्रतिपल क्यू छोटा होता जाता है, हम करीब आते जाते हैं। मौत ने अपनी तलवार उठाकर ही रखी है, वह हमारी गर्दन पर ही लटक रही है, किसी भी क्षण गिर सकती है। लेकिन जब तक नहीं गिरी है, तब तक हम जीवन की आपाधापी में बड़े व्यस्त हैं—और बटोर लूं, और इकट्ठा कर लूं? और थोड़े बड़े पद पर पहुंच जाऊं, और थोड़ी प्रतिष्ठा हो जाए, और थोड़ा मान—मर्यादा मिल जाए। और अंत में सब मौत छीन लेगी।

जिन्हें मृत्यु का दर्शन हो गया, जिन्होंने ऐसा देख लिया कि मृत्यु सब छीन लेगी, उनके जीवन में संन्यास का पदार्पण होता है। उनके जीवन में एक क्रांति घटती है। इस क्रांति को बुद्ध ने एक विशिष्ट नाम दिया है, उसे वे कहते हैं—परावृत्ति.

इस कहानी का सार है “ईश्वर और मौत को हमेशा याद रखो”
यह सत्य है ओर रहेगा भी , क्योंकि सृष्टि की रचना मे ऐसे गुण विधमान है ओर रहेंगे भी | ऐसा सृष्टि को चलायमान रखने के लिए जरूरी भी है अन्यथा प्रकृति व सृष्टि की समस्त रचना नष्ट हो जायेगी जिससे सारी की सारी विध्यमान रचना शून्य मे समा जायेगी |
 
एक तालाब के किनारे एक बंदरी अपने बच्चे का साथ रहती थी | एक रात को अचानक भारी बरसात होने लगी | तालाब मे पानी भरने लगा | बंदरी के बैठने की जगह भी पानी का सतर बढ्ने लगा | जब पानी बंदरी की गोद में बैठे बच्चे तक आगया तो बंदरी ने बच्चे को कंधे पर बैठा लिया | बरसात का पानी बढ़ते बढ़ते बंदरी के कंधे पर बैठे बच्चे तक पहुँचा तो बंदरी बच्चे को गोद मे लेकर खड़ी हो गयी | पानी का सतर ओर बढ्ने पर बंदरी ने बच्चे को सिर पर बैठा लिया लेकिन बच्चे को गीला नहीं होने दिया | बंदरी में अपने बच्चे के लिए कितना मोह था ! पानी का सतर ओर बढ़ कर बंदरी की नाक तक पहुँच गया व बंदरी डूबने लगी | उसने बच्चे को सिर से उतार कर पाँव के नीचे रखा ओर बच्चे के ऊपर खड़ी हो गयी | मोह कितना शीघ्र स्वार्थ मे बदल गया | यही संसार है |

धन्यवाद |
 
एक बार देवताओं में चर्चा हो रहो थी, चर्चा का विषय था मनुष्य की हर मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गुप्त चमत्कारी शक्तियों को कहाँ छुपाया जाये। सभी देवताओं में इस पर बहुत वाद- विवाद हुआ। एक देवता ने अपना मत रखा और कहा कि इसे हम एक जंगल की गुफा में रख देते हैं। दूसरे देवता ने उसे टोकते हुए कहा नहीं- नहीं हम इसे पर्वत की चोटी पर छिपा देंगे। उस देवता की बात ठीक पूरी भी नहीं हुई थी कि कोई कहने लगा , “न तो हम इसे कहीं गुफा में छिपाएंगे और न ही इसे पर्वत की चोटी पर हम इसे समुद्र की गहराइयों में छिपा देते हैं यही स्थान इसके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।”
सबकी राय खत्म हो जाने के बाद एक बुद्धिमान देवता ने कहा क्यों न हम मानव की चमत्कारिक शक्तियों को मानव -मन की गहराइयों में छिपा दें। चूँकि बचपन से ही उसका मन इधर -उधर दौड़ता रहता है, मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकेगा कि ऐसी अदभुत और विलक्षण शक्तियां उसके भीतर छिपी हो सकती हैं । और वह इन्हें बाह्य जगत में खोजता रहेगा अतः इन बहुमूल्य शक्तियों को हम उसके मन की निचली तह में छिपा देंगे। बाकी सभी देवता भी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए। और ऐसा ही किया गया , मनुष्य के भीतर ही चमत्कारी शक्तियों का भण्डार छुपा दिया गया, इसलिए कहा जाता है मानव मवन में अद्भुत शक्तियां निहित हैं।
दोस्तों इस कहानी का सार यह है कि मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है। इंसान जो भी चाहे वो हासिल कर सकता है। मनुष्य के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। लेकिन बड़े दुःख की बात है उसे स्वयं ही विश्वास नहीं होता कि उसके भीतर इतनी शक्तियां विद्यमान हैं। अपने अंदर की शक्तियों को पहचानिये, उन्हें पर्वत, गुफा या समुद्र में मत ढूंढिए बल्कि अपने अंदर खोजिए और अपनी शक्तियों को निखारिए। हथेलियों से अपनी आँखों को ढंककर अंधकार होने का शिकायत मत कीजिये। आँखें खोलिए , अपने भीतर झांकिए और अपनी अपार शक्तियों का प्रयोग कर अपना हर एक सपना पूरा कर डालिये।
 
माँ की मृत्यु के बाद तीसरा दिन था। घर की परंपरा के अनुसार,
मृतक के वंशज उनकी स्मृति में अपनी प्रिय वस्तु का त्याग
किया करते थे।
मैंआज के बाद बैंगनी रंग नही पहनूँगा।” बड़ा बेटा बोला।वैसे
भी जिस ऊँचे ओहदे पर वो था, उसे बैंगनी रंग शायद
ही कभी पहनना पड़ता। फिर भी सभी ने तारीफें की।..
मँझला कहाँ पीछे रहता, “मैं ज़िदगी भर गुड़ नही खाऊँगा।”ये
जानते हुए भी कि उसे गुड़ की एलर्जी है, पिताने
सांत्वना की साँस छोड़ी।
अब सबकी निगाहें छोटे पर थी। वो स्तब्ध सा माँके चित्र को तके
जा रहा था। तीनो बेटों की व्यस्तता और अपने काम के
प्रति प्रतिबद्धता के चलते, माँ के अंतिम समयकोई नही पहुँच
पाया था। सब कुछ जब पिता कर चुके, तब बेटों के चरण घर से
लगे।“मेरे तीन बेटे और एक पति, चारों के कंधों पर चढ़कर श्माशान
जाऊँगी मैं।” माँ की ये लाड़ भरी गर्वोक्ति कितनी ही बार
सुनी थी उसने और आज उसका खोखलापन भी देख
लिया।“बोलिये समीर जी,” पंडितजी की आवाज़ से
उसकी तंद्रा भंग हुई।………
आप किस वस्तु का त्याग करेंगे
अपनी माता की स्मृति में?”बिना सोचे वो बोल
ही तो पड़ा था, “पंड़ितजी, मैं अपने थोड़े से काम का त्याग
करूंगा, थोड़ा समय बचाऊंगा और अपने पिताजी को अपने साथ ले
जाऊंगा।”और पिता ने लोकलाज त्यागकर बेटे की गोद में सिर दे
दिया था।
 
एक बार कुछ scientists ने एक बड़ा ही interesting experiment किया..


उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से cage में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..


जैसा की expected था, जैसे ही एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..


पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..


पर experimenters यहीं नहीं रुके,
उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..


बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..


पर वे कब तक बैठे रहते,
कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..


अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..


और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..


एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए...


थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ..


बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..


अब experimenters ने एक और interesting चीज़ की..


अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..


नया बन्दर वहां के rules क्या जाने..


वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..


पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..


उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..


ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..


इसके बाद experimenters ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..


इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!


experiment के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..


पर उनका behaviour भी पुराने बंदरों की तरह ही था..


वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..


Friends, हमारी society में भी ये behaviour देखा जा सकता है..


जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, business, राजनीती, समाजसेवा या किसी और field से related हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..


उसे failure का डर दिखाया जाता है..


और interesting बात ये है कि उसे रोकने वाले maximum log वो होते हैं जिन्होंने ख़ुद उस field में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..


इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों का opposition face करना पड़ रहा है तो थोड़ा संभल कर रहिये..


अपने logic और guts की सुनिए..
ख़ुद पर और अपने लक्ष्य पर विश्वास क़ायम रखिये..
और बढ़ते रहिये..


कुछ बंदरों की ज़िद्द के आगे आप भी बन्दर मत बन जाइए..


सभी साथियों को शुभकामनाएँ !
 
एक बार कुछ scientists ने एक बड़ा ही interesting experiment किया..


उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से cage में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..


जैसा की expected था, जैसे ही एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..


पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..


पर experimenters यहीं नहीं रुके,
उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..


बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..


पर वे कब तक बैठे रहते,
कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..


अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..


और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..


एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए...


थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ..


बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..


अब experimenters ने एक और interesting चीज़ की..


अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..


नया बन्दर वहां के rules क्या जाने..


वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..


पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..


उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..


ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..


इसके बाद experimenters ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..


इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!


experiment के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..


पर उनका behaviour भी पुराने बंदरों की तरह ही था..


वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..


Friends, हमारी society में भी ये behaviour देखा जा सकता है..


जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, business, राजनीती, समाजसेवा या किसी और field से related हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..


उसे failure का डर दिखाया जाता है..


और interesting बात ये है कि उसे रोकने वाले maximum log वो होते हैं जिन्होंने ख़ुद उस field में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..


इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों का opposition face करना पड़ रहा है तो थोड़ा संभल कर रहिये..


अपने logic और guts की सुनिए..
ख़ुद पर और अपने लक्ष्य पर विश्वास क़ायम रखिये..
और बढ़ते रहिये..


कुछ बंदरों की ज़िद्द के आगे आप भी बन्दर मत बन जाइए..


सभी साथियों को शुभकामनाएँ !

Good one.

यही बात जब PK फिल्म मैं दिखाई गई तो लोगों ने भरपूर विरोद किया। श्यायद भूतकाल मैं कभी ऐसी फिल्म बनी होगी जिसके बाद भारत मैं अकाल पड़ा होगा।
 
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