iqbaal ke raam

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adityachoudhary

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लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द ।
सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द ।।
ये हिन्दियों के फिक्रे-फ़लक उसका है असर,
रिफ़अत में आस्माँ से भी ऊँचा है बामे-हिन्द ।
इस देश में हुए हैं हज़ारों मलक सरिश्त, मशहूर जिसके दम से है दुनिया में नामे-हिन्द ।
है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़,
अहले-नज़र समझते हैं उसको इमामे-हिन्द ।
एजाज़ इस चिराग़े-हिदायत का है यही
रोशन तिराज़ सहर ज़माने में शामे-हिन्द ।
तलवार का धनी था, शुजाअत में फ़र्द था,
पाकीज़गी में, जोशे-मुहब्बत में फ़र्द था

.... अल्लामा इक़बाल
 
Aditya nice poetry shared but how this is related to Social responsibility? Have you posted by mistake or this thread should be in time pass forum?
 
mujhe nahi lagta ki samprdaaik sadbhaw ki baat karna time paas karna hota hai. is poem ka mahattv isliye jyada ho jata mistakehai ki ise bhagwaan raam k baare me ek muslim kavi ne likha hai aur aaj ke time me hum jis tarah se ram ke nam par lad rahe hain wo sharmnaak hai. raam kewal hinduon ke nahi hain wo har insaan ke hain. sabhi unke jiwan se prerna le sakte hain aur raam kisi ki bapauti nahi hain. na hindu na na musalmaan ki na hi kisi rajnitik dal ki. iske bwajud agar ye poem social responsblty me nahi aati to mujhe tajjub hai..
 
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आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें

सच कह दूँ ऐ ब्रह्मन गर तू बुरा न माने
तेरे सनम कदों के बुत हो गये पुराने

अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा
जंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने

तंग आके आख़िर मैं ने दैर-ओ-हरम को छोड़ा
वाइज़ का वाज़ छोड़ा, छोड़े तेरे फ़साने

पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है

आ ग़ैरत के पर्दे इक बार फिर उठा दें
बिछड़ों को फिर मिला दें नक़्श-ए-दुई मिटा दें

सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें

दुनिया के तीरथों से ऊँचा हो अपना तीरथ
दामान-ए-आस्माँ से इस का कलस मिला दें

हर सुबह मिल के गायें मन्तर वो मीठे मीठे
सारे पुजारियों को मै प्रीत की पिला दें

शक्ति भी शांति भी भक्तों के गीत में है
धरती के वासियों की मुक्ति प्रीत में है

मोहम्मद इकबाल
 
लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द ।
सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द ।।
ये हिन्दियों के फिक्रे-फ़लक उसका है असर,
रिफ़अत में आस्माँ से भी ऊँचा है बामे-हिन्द ।
इस देश में हुए हैं हज़ारों मलक सरिश्त, मशहूर जिसके दम से है दुनिया में नामे-हिन्द ।
है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़,
अहले-नज़र समझते हैं उसको इमामे-हिन्द ।
एजाज़ इस चिराग़े-हिदायत का है यही
रोशन तिराज़ सहर ज़माने में शामे-हिन्द ।
तलवार का धनी था, शुजाअत में फ़र्द था,
पाकीज़गी में, जोशे-मुहब्बत में फ़र्द था

.... अल्लामा इक़बाल
Dear Aditya,
This is a masterpiece. I don't have that much of involvement in reading poetry but still got a chance to experience this wonderful creation of the great poet. I have a small request. Though i got the meaning of the poem in larger context, i find it difficult to comprehend the Urdu words.

It shall be vey nice of you if you could make it convenient to help me with the meaning of the urdu words in this poem.

Please take it as a humble request from someone who is not having the poetry IQ like yours.
 
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dear aditya,
this is a masterpiece. I don't have that much of involvement in reading poetry but still got a chance to experience this wonderful creation of the great poet. I have a small request. Though i got the meaning of the poem in larger context, i find it difficult to comprehend the urdu words.

It shall be vey nice of you if you could make it convenient to help me with the meaning of the urdu words in this poem.

Please take it as a humble request from someone who is not having the poetry iq like yours.

श्रीमान देव जी
मैंने कुछ कोशिश की है शायद आप के काम आ जाये

लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द । = हिन्द का प्याला सत्य की मदिरा से छलक रहा है।
सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द ।।= पूरब के सभी महान चिंतक हिन्द के राम हैं
फिक्रे-फ़लक=महान चिंतन
रिफ़अत=ऊँचाई
बामे-हिन्द=हिन्दी का गौरव या ज्ञान
मलक=देवता
सरिश्त=ऊँचे आसन पर
एजाज़=चमत्कार
चिराग़े-हिदायत=ज्ञान का दीपक
सहर=भरपूर रोशनी वाला सवेरा
शुजाअत=वीरता
फ़र्द=एकमात्र, अद्वितीय
पाकीज़गी= पवित्रता
 
श्रीमान देव जी
मैंने कुछ कोशिश की है शायद आप के काम आ जाये

लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द । = हिन्द का प्याला सत्य की मदिरा से छलक रहा है।
सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द ।।= पूरब के सभी महान चिंतक हिन्द के राम हैं
फिक्रे-फ़लक=महान चिंतन
रिफ़अत=ऊँचाई
बामे-हिन्द=हिन्दी का गौरव या ज्ञान
मलक=देवता
सरिश्त=ऊँचे आसन पर
एजाज़=चमत्कार
चिराग़े-हिदायत=ज्ञान का दीपक
सहर=भरपूर रोशनी वाला सवेरा
शुजाअत=वीरता
फ़र्द=एकमात्र, अद्वितीय
पाकीज़गी= पवित्रता

Thanx a ton Anjali. Now, when i know the meaning of these words, i can really appreciate the beauty of this poem.

Regards.......
 
श्रीमान देव जी
मैंने कुछ कोशिश की है शायद आप के काम आ जाये

लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द । = हिन्द का प्याला सत्य की मदिरा से छलक रहा है।
सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द ।।= पूरब के सभी महान चिंतक हिन्द के राम हैं
फिक्रे-फ़लक=महान चिंतन
रिफ़अत=ऊँचाई
बामे-हिन्द=हिन्दी का गौरव या ज्ञान
मलक=देवता
सरिश्त=ऊँचे आसन पर
एजाज़=चमत्कार
चिराग़े-हिदायत=ज्ञान का दीपक
सहर=भरपूर रोशनी वाला सवेरा
शुजाअत=वीरता
फ़र्द=एकमात्र, अद्वितीय
पाकीज़गी= पवित्रता


Dear Aditya and Anjali,

I have read many of the poems posted by both of you on various threads. I must appreciate that you always post very nice poems.

I have a request. Could you help me with some nice poem on the topic "Betiyan " i.e. daughters.

Regards........
 
घरों में यूँ सयानी बेटियाँ बेचैन रहती हैं

dear aditya and anjali,

i have read many of the poems posted by both of you on various threads. I must appreciate that you always post very nice poems.

I have a request. Could you help me with some nice poem on the topic "betiyan " i.e. Daughters.

Regards........

घरों में यूँ सयानी बेटियाँ बेचैन रहती हैं
कि जैसे साहिलों पर कश्तियाँ बेचैन रहती हैं

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती जुलती है

कहीं भी शाख़े—गुल देखे तो झूला डाल देती है

रो रहे थे सब तो मैं भी फूट कर रोने लगा

वरना मुझको बेटियों की रुख़सती अच्छी लगी

बड़ी होने को हैं ये मूरतें आँगन में मिट्टी की

बहुत से काम बाक़ी हैं सँभाला ले लिया जाये

तो फिर जाकर कहीँ माँ_बाप को कुछ चैन पड़ता है

कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है

ऐसा लगता है कि जैसे ख़त्म मेला हो गया

उड़ गईं आँगन से चिड़ियाँ घर अकेला हो गया




मुनव्वर राना
 
दिल में इक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी

शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में
कोई दीवार सी गिरी है अभी

कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नई है अभी

भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी

तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या
हम-सुख़न तेरी ख़ामोशी है अभी

याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी

शहर के बेचराग़ गलियों में
ज़िन्दगी तुझ को ढूँढती है अभी

सो गये लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी

तुम तो यारो अभी से उठ बैठे
शहर में रात जागती है अभी

वक़्त अच्छा भी आयेगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िन्दगी पड़ी है अभी

नासिर काज़मी
 
Bahut Khoob.
घरों में यूँ सयानी बेटियाँ बेचैन रहती हैं
कि जैसे साहिलों पर कश्तियाँ बेचैन रहती हैं

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती जुलती है

कहीं भी शाख़े—गुल देखे तो झूला डाल देती है

रो रहे थे सब तो मैं भी फूट कर रोने लगा

वरना मुझको बेटियों की रुख़सती अच्छी लगी

बड़ी होने को हैं ये मूरतें आँगन में मिट्टी की

बहुत से काम बाक़ी हैं सँभाला ले लिया जाये

तो फिर जाकर कहीँ माँ_बाप को कुछ चैन पड़ता है

कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है

ऐसा लगता है कि जैसे ख़त्म मेला हो गया

उड़ गईं आँगन से चिड़ियाँ घर अकेला हो गया




मुनव्वर राना
 
घरों में यूँ सयानी बेटियाँ बेचैन रहती हैं
कि जैसे साहिलों पर कश्तियाँ बेचैन रहती हैं

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती जुलती है
कहीं भी शाख़े—गुल देखे तो झूला डाल देती है

रो रहे थे सब तो मैं भी फूट कर रोने लगा
वरना मुझको बेटियों की रुख़सती अच्छी लगी

बड़ी होने को हैं ये मूरतें आँगन में मिट्टी की
बहुत से काम बाक़ी हैं सँभाला ले लिया जाये

तो फिर जाकर कहीँ माँ_बाप को कुछ चैन पड़ता है
कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है

ऐसा लगता है कि जैसे ख़त्म मेला हो गया
उड़ गईं आँगन से चिड़ियाँ घर अकेला हो गया




मुनव्वर राना
Dear anjali,

Its really nice.

I request you to explore a little more. Please write something sweet about their childhood that is full of life. Only sweet childhood when we mimick with our siblings, when we take pleasure in their moves, their smiles, their shararats. Childhood which is full of innocense and untouched by the worries of the world.

But please only for a very sweet daughter.

Best regards........
 
तितली निहारती बच्ची

देखती है बच्ची
तितली के रंग
दौड़ती संग-संग
एक टक निहारती
सुंदर पँख
कितने कितने रंग
जैसे इन्द्रधनुष
जैसे मोरपंख
उड़ती तितली पंख पसारती
समेटती फिर खोलती
धीरे-धीरे-धीरे
फूल-फूल पर बैठती।

मेरा सारा रंग एक-सा
रंग देती मैडम पूरा चेहरा
जब बनाती परी
फिर भी माँ कहती
मैं हूँ सब से सुंदर
तितली से भी
मुझे इतने रंग क्यूं नहीं दिए माँ।

बेटी, आकाश का रंग एक-सा
मिट्टी का रंग एक-सा

देखो, पानी का तो
कोई रंग ही नहीं
इसलिए तुम सबसे सुंदर
तितली से भी
झाँको तो सही अपने अंदर l

सुदर्शन वशिष्ठ



 
बेटियाँ

बेटियाँ-
शीतल हवाएँ हैं
जो पिता के घर बहुत दिन तक नहीं रहतीं
ये तरल जल की परातें हैं
लाज़ की उज़ली कनातें हैं
है पिता का घर हृदय-जैसा
ये हृदय की स्वच्छ बातें हैं
बेटियाँ -
पवन-ऋचाएँ हैं
बात जो दिल की, कभी खुलकर नहीं कहतीं
हैं चपलता तरल पारे की
और दृढता ध्रुव-सितारे की
कुछ दिनों इस पार हैं लेकिन
नाव हैं ये उस किनारे की
बेटियाँ-
ऐसी घटाएँ हैं
जो छलकती हैं, नदी बनकर नहीं बहतीं





कुँवर बेचैन


 
बेटियों की मुस्कान





बेटियों की मुस्कान –
जैसे गूँज उठा
भोर में साम -गान ,
जैसे वन में तिरती
बाँसुरी की तान ,
जैसे भरी दुपहरी में
बरगद की छाया
जैसे लू के बाद
बह उठी शीतल बयार ।
मत छीनो यह मुस्कान
इसके छिन जाने पर -
रूठ जाएँगी ॠचाएँ ,
डूब जाएँगे सातों स्वर ,
रूठ जाएगी शीतल छाया ,
बयार बनेगी
अंगारों की बौछार
झुलस जाएगी सारी सृष्टि ।








रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


 
घरों में यूँ सयानी बेटियाँ बेचैन रहती हैं
कि जैसे साहिलों पर कश्तियाँ बेचैन रहती हैं

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती जुलती है
कहीं भी शाख़े—गुल देखे तो झूला डाल देती है

रो रहे थे सब तो मैं भी फूट कर रोने लगा
वरना मुझको बेटियों की रुख़सती अच्छी लगी

बड़ी होने को हैं ये मूरतें आँगन में मिट्टी की
बहुत से काम बाक़ी हैं सँभाला ले लिया जाये

तो फिर जाकर कहीँ माँ_बाप को कुछ चैन पड़ता है
कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है

ऐसा लगता है कि जैसे ख़त्म मेला हो गया
उड़ गईं आँगन से चिड़ियाँ घर अकेला हो गया




मुनव्वर राना
Bahut hi badhiya Anjali ji.Betiyan hoti hi aisi hain.
A son is son till his bring him a wife. A daughter is daughter for life.
 
देखती है बच्ची
तितली के रंग
दौड़ती संग-संग
एक टक निहारती
सुंदर पँख
कितने कितने रंग
जैसे इन्द्रधनुष
जैसे मोरपंख
उड़ती तितली पंख पसारती
समेटती फिर खोलती
धीरे-धीरे-धीरे
फूल-फूल पर बैठती।

मेरा सारा रंग एक-सा
रंग देती मैडम पूरा चेहरा
जब बनाती परी
फिर भी माँ कहती
मैं हूँ सब से सुंदर
तितली से भी
मुझे इतने रंग क्यूं नहीं दिए माँ।

बेटी, आकाश का रंग एक-सा
मिट्टी का रंग एक-सा

देखो, पानी का तो
कोई रंग ही नहीं
इसलिए तुम सबसे सुंदर
तितली से भी
झाँको तो सही अपने अंदर l

सुदर्शन वशिष्ठ
Anjalii is ka to koi jawab hi nahi. baht achchha.
 
bahut hi badhiya anjali ji.betiyan hoti hi aisi hain.
A son is son till his bring him a wife. A daughter is daughter for life.

बेटियाँ अपने आँगन के खूबसूरत फूल हैं जिन्हें हम बड़े ही प्यार से पनपते हुए देखतें हैं.
 
Last edited:
bahut hi badhiya anjali ji.betiyan hoti hi aisi hain.
A son is son till his bring him a wife. A daughter is daughter for life.

बेटियाँ अपने आँगन के खूबसूरत फूल हैं जिन्हें हम बड़े ही प्यार से पनपते हुए देखतें हैं. फिर एक दिन कोई आता हैं और वो फूल तोड़कर ले जाता है और हम बेबस कुछ कर भी नहीं पाते. क्योंकि हमहीं तो सौंपते हैं उन्हें वो फूल अपने हाथों से ...


पर वो खुशबू फिर भी अपने इसी आँगन में महकती हुई छोड़ जाती हैं ताउम्र के लिए
 
बेटियाँ अपने आँगन के खूबसूरत फूल हैं जिन्हें हम बड़े ही प्यार से पनपते हुए देखतें हैं. फिर एक दिन कोई आता हैं और वो फूल तोड़कर ले जाता है और हम बेबस कुछ कर भी नहीं पाते. क्योंकि हमहीं तो सौंपते हैं उन्हें वो फूल अपने हाथों से ...


पर वो खुशबू फिर भी अपने इसी आँगन में महकती हुई छोड़ जाती हैं ताउम्र के लिए
bilkul theek kaha Anjali ji, aur khusboo kai pidiyio tak us ghar ko mahkati rahti hai. Ye khusboo lene ka sukh bare bhagya wale ko milta hai.
 
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