Is india a Democracy

Do you really think we are living in a democratic nation


  • Total voters
    46
Since you were yourself calling China a democracy through some curious and spurious logic.

Its not about you and me. There is no generally accepted definition of democracy. I have mentioned earlier, there can be 1000 types of democracy.

That was just to tell you that Chinease do say they have democracy contrary to your thought. The socialist have different viewpoint on democracy. Socialist party is supreme there.

As Arvind and others have mentioned rather than going in definition we should talk how liberal is our democracy, how free a common man is.

As far as I am concerned a true democracy is that where a common, poor man is not crushed , he is listened, he has a say (as its supposed to be people's rule). In our democracy, a poor girl is raped and threatned and they even dont file FIR. So for me neither china nor india has democracy. However, I do hope, one day we will have more liberal and true democracy.
 
I think we should also ask Kim-Jong 2 of North Korea whether his country is a democracy- maybe he'd call it a "military democracy". Actually this should end the debate here. All countries whose leaders call them as democracies are democracies. Indian leaders obv. call India a democracy. Hence, India is a democracy! QED!!

hahahahaha...Very True !!
 
I think we should also ask Kim-Jong 2 of North Korea whether his country is a democracy- maybe he'd call it a "military democracy". Actually this should end the debate here. All countries whose leaders call them as democracies are democracies. Indian leaders obv. call India a democracy. Hence, India is a democracy! QED!!

No no no... Kapil, you are wrong! For any country to be called a democracy, every citizen of that country has to give his/her consent.

In China, powerful chinese guy says they are democracy--> no ordinary chinese can say they are not democracy (if he/she does: he/she will be thrown into jail ala Liu Xiaobo) --> 100 % of chinese agree they are democracy (heck even many Indians seem to agree with the powerful chinese guy :D). Hence China is a democracy.

On the contrary, if Indian leaders say India is democracy--> Many of us disagree--> how can India be a democracy if some Indians disagree with their leaders and other fellow citizens?
Thus, India is not a democracy. [Definitely not better democracy than China; some x% less than chinese 100%] :)
 
Last edited:
धक्कासाही (धक्कातंत्र) कहते हैं इसको वि पि जी
रविंदर भाई कोए किसे गैल धक्का ना करदा आर ना कोए किसे के वोट छीन के गिरवाता I हमारे देश मै सरकार का चयन लोगों के मतों से ही किया जाता है I और हमारा चुनाव तंत्र भी एक स्वायत्त संस्था है न कि किसी एक पार्टी की कठपुतली I इसलिए धक्काशाही तो बिलकुल नहीं है I प्रजातंत्र को लोगों से अलग करके नहीं देखा जा सकता I जैसी प्रजा होगी वैसा ही उसका तंत्र होगा I किसी समाज या भू भाग मै जैसी उन्नत नागरिकों की सोच होती है उतनी ही उन्नत वहां की शाशन प्रणाली होती है I जिस देश मे लोग छोटी सोच और ईर्ष्या के कारण अलग अलग धडों में बंटे हुए हैं मजहब, जाति और गौत के नाम पर वहां इस कमजोरी का फायदा कुछ चालाक लोग उठाने मे सफल हो जाते हैं जिनको हम नेताओं के नाम से जानते हैं I बहुत सारे पढ़े लिखे, विद्वान और नौजवान लोग जो लोकतंत्र की बुराई करते नहीं थकते, वोट तक डालने की जहमत गवारा नहीं करते - समाज सुधार या क्रांतिकारी मुहीम में सक्रिय रूप से शामिल होना तो दूर की बात I चाय के प्याले मे तूफ़ान पैदा करने वालों की संख्या दुर्भागय से बहुत ज्यादा है इस देश मे I अगर कोई भूले भटके या गलती से सामाजिक विषमता, वंशानुगत राजनीति और भ्रष्टाचार उन्मूलन की बात छेड़ता है तो उस के हाथ पर एक लाल रंग की कातर बाँधने की एक सोची समझी और नापाक साजिश रचने में कुछ जले भुने litterati , समाज का संभ्रांत वर्ग और राजनैतिक पार्टियों से संबध मीडिया कोई कौर कसर नहीं छोड़ते I आम आदमी की बेवकूफी के कारण इस देश मैं गधे अंगूर खा रहे सें I वोट एक बहुत बड़ा हथियार होता है जो प्रजातंत्र में सबको बराबर का मिलता है परन्तु इसका इस्तेमाल अगर लोंगों को नहीं करना आये तो कोई क्या करे I इसीलिये तो मुहावरा बना है , नाच ना जाने आंगन टेढ़ा I बग्गी या बैलगाड़ी का के कसूर जब झोटा या बैल तुडाइये करण लाग ज्या आर किसे के हरे भरे गेहूं के खेत मै चरण लाग ज्या I यो तो मालिक (वोटर ) का फ़र्ज़ बनै सै आक इसे झोटे या मारने बैल के मुंह पै छींका आर हाथ मै डंडा राखे I
 
रविंदर भाई कोए किसे गैल धक्का ना करदा आर ना कोए किसे के वोट छीन के गिरवाता I हमारे देश मै सरकार का चयन लोगों के मतों से ही किया जाता है I और हमारा चुनाव तंत्र भी एक स्वायत्त संस्था है न कि किसी एक पार्टी की कठपुतली I इसलिए धक्काशाही तो बिलकुल नहीं है I प्रजातंत्र को लोगों से अलग करके नहीं देखा जा सकता I जैसी प्रजा होगी वैसा ही उसका तंत्र होगा I किसी समाज या भू भाग मै जैसी उन्नत नागरिकों की सोच होती है उतनी ही उन्नत वहां की शाशन प्रणाली होती है I जिस देश मे लोग छोटी सोच और ईर्ष्या के कारण अलग अलग धडों में बंटे हुए हैं मजहब, जाति और गौत के नाम पर वहां इस कमजोरी का फायदा कुछ चालाक लोग उठाने मे सफल हो जाते हैं जिनको हम नेताओं के नाम से जानते हैं I बहुत सारे पढ़े लिखे, विद्वान और नौजवान लोग जो लोकतंत्र की बुराई करते नहीं थकते, वोट तक डालने की जहमत गवारा नहीं करते - समाज सुधार या क्रांतिकारी मुहीम में सक्रिय रूप से शामिल होना तो दूर की बात I चाय के प्याले मे तूफ़ान पैदा करने वालों की संख्या दुर्भागय से बहुत ज्यादा है इस देश मे I अगर कोई भूले भटके या गलती से सामाजिक विषमता, वंशानुगत राजनीति और भ्रष्टाचार उन्मूलन की बात छेड़ता है तो उस के हाथ पर एक लाल रंग की कातर बाँधने की एक सोची समझी और नापाक साजिश रचने में कुछ जले भुने litterati , समाज का संभ्रांत वर्ग और राजनैतिक पार्टियों से संबध मीडिया कोई कौर कसर नहीं छोड़ते I आम आदमी की बेवकूफी के कारण इस देश मैं गधे अंगूर खा रहे सें I वोट एक बहुत बड़ा हथियार होता है जो प्रजातंत्र में सबको बराबर का मिलता है परन्तु इसका इस्तेमाल अगर लोंगों को नहीं करना आये तो कोई क्या करे I इसीलिये तो मुहावरा बना है , नाच ना जाने आंगन टेढ़ा I बग्गी या बैलगाड़ी का के कसूर जब झोटा या बैल तुडाइये करण लाग ज्या आर किसे के हरे भरे गेहूं के खेत मै चरण लाग ज्या I यो तो मालिक (वोटर ) का फ़र्ज़ बनै सै आक इसे झोटे या मारने बैल के मुंह पै छींका आर हाथ मै डंडा राखे I
आप की सारी बात सही सें ,इब्ब बुगी नु बाँदर हांके गा तो नु-ए होगा ,एर आपका हर वाक्य जो लिखा से उसका एक नकारात्मक पहलु भी स जिसके कारण में इसको धक्कातंत्र कहता हूँ ,आड़े ९०% नूण में १० % चून मिल्र्या स तो रोटियाँ में क्यूकर सूवाद आवेगा
 
If it is a dictatorship then why this corruption is so out in the public? Why don't we hear much of Chinese corruption even though they are pretty much same corrupt as we are.

If corruption is measurment of democracy than yes we can call democracy in India. Even earnings of corruption by the public, goes back to these goons by some means, directly or indirectly, Kindly read my post no 11 & re-think whether, we have democracy working.
 
Last edited:
९०% नूण में १० % चून मिल्र्या स तो रोटियाँ में क्यूकर सूवाद आवेगा

या तो म्हारे हाथ मै सै कितना नमक डालना चाहिए चून मैं. अगर चून गूंथन आली नै ऐ सूहर ना हो तो रोटी का के कसूर आर के चून का कसूर.
 
या तो म्हारे हाथ मै सै कितना नमक डालना चाहिए चून मैं. अगर चून गूंथन आली नै ऐ सूहर ना हो तो रोटी का के कसूर आर के चून का कसूर.

आपने तो जनता को कसूरवार ठहरा दिया | इब्ब जनता धोरे इसका के तोड़ स | आप के अनुसार नेताओं की कोई गलती नहीं | लोकतंत्र के अनुसार सब सही चल रहा हे |
जनता के पास और आप के पास कुन्सा ओपसन से | जब नेताओं पे कोए नियंत्रण नि स चुनाव जित्ते पाछे तो जनता के कर सके स | एर जब चुनाव खातर एक नागनाथ एर एक सांपनाथ हो तो के कार्या जा | जब आप के संविधान के अनुसार आप पर किसी को भी थोपा जा स तो के करिए | जब चून ओशनन आली ताहि आपने ९०% नूण एर १०% चून दे राख्या स तो ऊह ने कु बेशूरी बताओ सो | शाषक जब षड्यांतरकारी हो ग्या , एर ऊह पे चुनने वाले का कोई नियनतरण नहीं स तो या कमी लोक्तानातर की ना स तो किसकी स |
 
If corruption is measurment of democracy than yes we can call democracy in India. Even earnings of corruption by the public, goes back to these goons by some means, directly or indirectly, Kindly read my post no 11 & re-think whether, we have democracy working.

Democracy is a political form of government in which governing power is derived from the people or by means of elected representatives of the people.

Now I ask you, who elect these representatives. Citizens of other countries or Indian Citizens. If answer is Indian citizens then yes there is a democracy. As far as corrupt politicians is concerned, I do not see that Democracy has any role to make them corrupt.
 
आपने तो जनता को कसूरवार ठहरा दिया | इब्ब जनता धोरे इसका के तोड़ स | आप के अनुसार नेताओं की कोई गलती नहीं | लोकतंत्र के अनुसार सब सही चल रहा हे |
जनता के पास और आप के पास कुन्सा ओपसन से | जब नेताओं पे कोए नियंत्रण नि स चुनाव जित्ते पाछे तो जनता के कर सके स | एर जब चुनाव खातर एक नागनाथ एर एक सांपनाथ हो तो के कार्या जा | जब आप के संविधान के अनुसार आप पर किसी को भी थोपा जा स तो के करिए | जब चून ओशनन आली ताहि आपने ९०% नूण एर १०% चून दे राख्या स तो ऊह ने कु बेशूरी बताओ सो | शाषक जब षड्यांतरकारी हो ग्या , एर ऊह पे चुनने वाले का कोई नियनतरण नहीं स तो या कमी लोक्तानातर की ना स तो किसकी स |

Bhai bahar ke log aake elect karein hain ke corrupt politicians.
 
आपने तो जनता को कसूरवार ठहरा दिया | इब्ब जनता धोरे इसका के तोड़ स | आप के अनुसार नेताओं की कोई गलती नहीं | लोकतंत्र के अनुसार सब सही चल रहा हे |
जनता के पास और आप के पास कुन्सा ओपसन से | जब नेताओं पे कोए नियंत्रण नि स चुनाव जित्ते पाछे तो जनता के कर सके स | एर जब चुनाव खातर एक नागनाथ एर एक सांपनाथ हो तो के कार्या जा | जब आप के संविधान के अनुसार आप पर किसी को भी थोपा जा स तो के करिए | जब चून ओशनन आली ताहि आपने ९०% नूण एर १०% चून दे राख्या स तो ऊह ने कु बेशूरी बताओ सो | शाषक जब षड्यांतरकारी हो ग्या , एर ऊह पे चुनने वाले का कोई नियनतरण नहीं स तो या कमी लोक्तानातर की ना स तो किसकी स |
रविंदर भाई यह बात तो लगभग सभी मानते हैं की हिंदुस्तान में भ्रष्टाचार, बेईमानी, भाई भतीजावाद, गरीबी, बेरोज़गारी, और अशिक्षा जैसी बहुत सी समस्सायें है परन्तु इसके लिए अकेली शाशन प्रणाली जिम्मेवार नहीं, शाशक और उनसे भी कहीं अधिक उनको चुनने वाली जनता भी जिम्मेदार है. जो प्रणाली जनता को खुद शाशक बनने या अपना शाशक चुनने का पूरा हक़ देती हो उसे अगर प्रजातंत्र नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे, जरा आप ही बता दीजिये इस व्यवस्था को हम क्या नाम दें. प्रणाली तो एक मशीन की तरह से है जो एक निश्चित सिधांत पर काम करती है और जिसके उत्पाद की गुणवत्ता उस मशीन में उपयुक्त कच्चे माल की गुणवत्ता के अनुरूप ही होगी. जैसे चक्की में गेहूं डालोगे तो गेहूं का आटा और बाजरा डालोगे तो बाजरे का आटा बन जायेगा. गंडासे में बरसम डालोगे तो बरसम की सानी बनेगी और ज्वार डालोगे तो जवार की सानी बनेगी. प्रणाली कोई भी हो उसे चलाने वाले तो आखिर लोग ही होते हैं और अगर लोग चरित्रवान, उर्जावान और निष्ठावान नहीं होंगे तो चाहे आप कोई प्रणाली ले आओ सभी उपरोक्त समस्स्याएं जस की तस रहेंगी. आप इस बात को माने या ना माने, जनता का अपना चरित्र भी कोई बहुत ठीक-ठाक नहीं है और ऊपर से उनमे गौत-नात, जाति, धर्म, और संप्रदाय के नाम पर भारी फूट है और उसी फूट का फायदा कुछ शातिर लोग उठा रहे हैं. इसीलिए तो मुहावरा बना है; एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा. यानि एक तो जनता का अपना चरित्र अच्छा नहीं ऊपर से आपस की यह फूट, फिर तो यही होगा; अंधेर नगरी चौपट राजा. इसलिए प्रणाली से पहले हमें अपना चरित्र बदलने की आवश्यकता हैं.
 
Democracy is a political form of government in which governing power is derived from the people or by means of elected representatives of the people.

Now I ask you, who elect these representatives. Citizens of other countries or Indian Citizens. If answer is Indian citizens then yes there is a democracy. As far as corrupt politicians is concerned, I do not see that Democracy has any role to make them corrupt.

Brother, please read my all above posts on the subject, you will get the answer, secondly, I also know little bit about the toppic & what kind of governing system we have in India, thirdly, I never said that only leaders are responsible for the failing of democracy. Yes our public vote for the leaders, but do you know who select the candidates whom we all vote, does a democratic system followed to choose the candidate in any political party, are these elected leaders allowed to function democraticaly. I personally feel, even after so many years of adopting democratic system, we are not fit & our thinking has not changed. Though, I understand the diffichlties for democracy in India, the large area & population, different culture, different thinking, different way of life, religion, faith, languages, lack of education and no past experience of democracy & big problem is that our society is totally controlled by casteism, religionism, areaism, favouritism, goondaism and selfishness. Thus, the best form of governing system is facing lot of problems in functioning properly. regards
 
Last edited:
रविंदर भाई यह बात तो लगभग सभी मानते हैं की हिंदुस्तान में भ्रष्टाचार, बेईमानी, भाई भतीजावाद, गरीबी, बेरोज़गारी, और अशिक्षा जैसी बहुत सी समस्सायें है परन्तु इसके लिए अकेली शाशन प्रणाली जिम्मेवार नहीं, शाशक और उनसे भी कहीं अधिक उनको चुनने वाली जनता भी जिम्मेदार है. जो प्रणाली जनता को खुद शाशक बनने या अपना शाशक चुनने का पूरा हक़ देती हो उसे अगर प्रजातंत्र नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे, जरा आप ही बता दीजिये इस व्यवस्था को हम क्या नाम दें. प्रणाली तो एक मशीन की तरह से है जो एक निश्चित सिधांत पर काम करती है और जिसके उत्पाद की गुणवत्ता उस मशीन में उपयुक्त कच्चे माल की गुणवत्ता के अनुरूप ही होगी. जैसे चक्की में गेहूं डालोगे तो गेहूं का आटा और बाजरा डालोगे तो बाजरे का आटा बन जायेगा. गंडासे में बरसम डालोगे तो बरसम की सानी बनेगी और ज्वार डालोगे तो जवार की सानी बनेगी. प्रणाली कोई भी हो उसे चलाने वाले तो आखिर लोग ही होते हैं और अगर लोग चरित्रवान, उर्जावान और निष्ठावान नहीं होंगे तो चाहे आप कोई प्रणाली ले आओ सभी उपरोक्त समस्स्याएं जस की तस रहेंगी. आप इस बात को माने या ना माने, जनता का अपना चरित्र भी कोई बहुत ठीक-ठाक नहीं है और ऊपर से उनमे गौत-नात, जाति, धर्म, और संप्रदाय के नाम पर भारी फूट है और उसी फूट का फायदा कुछ शातिर लोग उठा रहे हैं. इसीलिए तो मुहावरा बना है; एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा. यानि एक तो जनता का अपना चरित्र अच्छा नहीं ऊपर से आपस की यह फूट, फिर तो यही होगा; अंधेर नगरी चौपट राजा. इसलिए प्रणाली से पहले हमें अपना चरित्र बदलने की आवश्यकता हैं.


This is the best reply so far. i hope Ravinder bhai eb te baat aap ki samajh me aa gayi hogi, ek rahagi koi kasar. India is totally democratic, the only thing lacking(lagging behind) is education & awareness, & i believe that is catching up at a very fast pace. India is right now in very dynamic state, some people here are interpreting what India may have been 10-15 years back. Every country has their problems, so does India, but India is moving in right direction. Common people r becoming more aware abt there rights.
 
Democracy ko ashok Chakrdhar ji ki ye kavita bahut ache se explain karti hai...

पार्क के कोने में
घास के बिछौने पर लेटे-लेटे
हम अपनी प्रेयसी से पूछ बैठे—
क्यों डियर !
डैमोक्रैसी क्या होती है ?
वो बोली—
तुम्हारे वादों जैसी होती है !
इंतज़ार में
बहुत तड़पाती है,
झूठ बोलती है
सताती है,
तुम तो आ भी जाते हो,
ये कभी नहीं आती है !

एक विद्वान से पूछा
वे बोले—

हमने राजनीति-शास्त्र
सारा पढ़ मारा,
डैमोक्रैसी का मतलब है—
आज़ादी, समानता और भाईचारा।

आज़ादी का मतलब
रामनाम की लूट है,
इसमें गधे और घास
दोनों को बराबर की छूट है।
घास आज़ाद है कि
चाहे जितनी बढ़े,
और गदहे स्वतंत्र हैं कि
लेटे-लेटे या खड़े-खड़े
कुछ भी करें,
जितना चाहें इस घास को चरें।

और समानता !
कौन है जो इसे नहीं मानता ?
हमारे यहां—
ग़रीबों और ग़रीबों में समानता है,
अमीरों और अमीरों में समानता है,
मंत्रियों और मंत्रियों में समानता है,
संत्रियों और संत्रियों में समानता है।
चोरी, डकैती, सेंधमारी, बटमारी
राहज़नी, आगज़नी, घूसख़ोरी, जेबकतरी
इन सबमें समानता है।
बताइए कहां असमनता है ?

और भाईचारा !
तो सुनो भाई !
यहां हर कोई
एक-दूसरे के आगे
चारा डालकर
भाईचारा बढ़ा रहा है।
जिसके पास
डालने को चारा नहीं है
उसका किसी से
भाईचारा नहीं है।
और अगर वो बेचारा है
तो इसका हमारे पास
कोई चारा नहीं है।

फिर हमने अपने
एक जेलर मित्र से पूछा—
आप ही बताइए मिस्टर नेगी।
वो बोले—
डैमोक्रैसी ?
आजकल ज़मानत पर रिहा है,
कल सींखचों के अंदर दिखाई देगी।

अंत में मिले हमारे मुसद्दीलाल,
उनसे भी कर डाला यही सवाल।
बोले—
डैमोक्रैसी ?
दफ़्तर के अफ़सर से लेकर
घर की अफ़सरा तक
पड़ती हुई फ़टकार है !
ज़बानों के कोड़ों की मार है
चीत्कार है, हाहाकार है।
इसमें लात की मार से कहीं तगड़ी
हालात की मार है।
अब मैं किसी से
ये नहीं कहता
कि मेरी ऐसी-तैसी हो गई है,
कहता हूं—
मेरी डैमोक्रैसी हो गई है !
 
Democracy ko ashok Chakrdhar ji ki ye kavita bahut ache se explain karti hai...

पार्क के कोने में
घास के बिछौने पर लेटे-लेटे
हम अपनी प्रेयसी से पूछ बैठे—
क्यों डियर !
डैमोक्रैसी क्या होती है ?
वो बोली—
तुम्हारे वादों जैसी होती है !
इंतज़ार में
बहुत तड़पाती है,
झूठ बोलती है
सताती है,
तुम तो आ भी जाते हो,
ये कभी नहीं आती है !

एक विद्वान से पूछा
वे बोले—

हमने राजनीति-शास्त्र
सारा पढ़ मारा,
डैमोक्रैसी का मतलब है—
आज़ादी, समानता और भाईचारा।

आज़ादी का मतलब
रामनाम की लूट है,
इसमें गधे और घास
दोनों को बराबर की छूट है।
घास आज़ाद है कि
चाहे जितनी बढ़े,
और गदहे स्वतंत्र हैं कि
लेटे-लेटे या खड़े-खड़े
कुछ भी करें,
जितना चाहें इस घास को चरें।

और समानता !
कौन है जो इसे नहीं मानता ?
हमारे यहां—
ग़रीबों और ग़रीबों में समानता है,
अमीरों और अमीरों में समानता है,
मंत्रियों और मंत्रियों में समानता है,
संत्रियों और संत्रियों में समानता है।
चोरी, डकैती, सेंधमारी, बटमारी
राहज़नी, आगज़नी, घूसख़ोरी, जेबकतरी
इन सबमें समानता है।
बताइए कहां असमनता है ?

और भाईचारा !
तो सुनो भाई !
यहां हर कोई
एक-दूसरे के आगे
चारा डालकर
भाईचारा बढ़ा रहा है।
जिसके पास
डालने को चारा नहीं है
उसका किसी से
भाईचारा नहीं है।
और अगर वो बेचारा है
तो इसका हमारे पास
कोई चारा नहीं है।

फिर हमने अपने
एक जेलर मित्र से पूछा—
आप ही बताइए मिस्टर नेगी।
वो बोले—
डैमोक्रैसी ?
आजकल ज़मानत पर रिहा है,
कल सींखचों के अंदर दिखाई देगी।

अंत में मिले हमारे मुसद्दीलाल,
उनसे भी कर डाला यही सवाल।
बोले—
डैमोक्रैसी ?
दफ़्तर के अफ़सर से लेकर
घर की अफ़सरा तक
पड़ती हुई फ़टकार है !
ज़बानों के कोड़ों की मार है
चीत्कार है, हाहाकार है।
इसमें लात की मार से कहीं तगड़ी
हालात की मार है।
अब मैं किसी से
ये नहीं कहता
कि मेरी ऐसी-तैसी हो गई है,
कहता हूं—
मेरी डैमोक्रैसी हो गई है !

Dear Brother, wonderful, All and specially those who are expert in interpertation of political science, must read this poem, but I hope, they understand the poem in hindi. regards
 
This is the democracy............

कालेधन के खातेदारों के नाम नहीं बताएगा केंद्र....
नई दिल्ली-विदेशी बैंकों में कालाधन जमा करने वालों के नामों का खुलासा न करने पर सरकार अभी भी अड़ी है। शुक्रवार को सरकार ने फिर सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह दोहरी कराधान संधि (डीटीएए) के चलते खातेदारों के नाम उजागर नहीं कर सकती। हालांकि उसे उन छह नामों को बताने में ऐतराज नहीं है जिनके खिलाफ मुकदमा शुरू किया गया है। सरकार की ओर से ये दलील सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम ने उस समय दी जब कोर्ट ने उनसे पूछा कि आखिर खातेदारों के नाम उजागर करने में उन्हें क्या दिक्कत है। वे किस कानून के तहत नाम न बताने की छूट मांग रहे हैं। सुब्रह्मण्यम ने अपनी दलील के समर्थन में वित्त मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव अनूप श्रीवास्तव का हलफनामा पेश किया। जिसमें डीटीएए के तहत नामों की जानकारी देने से इंकार किया गया था। जब पीठ ने कहा कि जर्मनी के साथ तो डीटीएए संधि नहीं है। इस पर सुब्रह्मण्यम कहना था कि उसके साथ भी डीटीएए अवधारणा के तहत ही सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। सुब्रह्मण्यम ने कहा कि सरकार को मिले 18 नामों में से 17 के खिलाफ जांच शुरू हो गई है और छह पर मुकदमा भी शुरू किया गया है। इसके साथ ही उन्होंने आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच रिपोर्ट सील बंद लिफाफों में कोर्ट को सौंपी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी व न्यायमूर्ति एसएस निज्जर की पीठ कर रही है। इससे पहले ईडी अधिकारी प्रभाकांत द्वारा आइआइटी प्रोफेसर एसके दुबे को धमकाने के मामले में कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त से कार्रवाई रिपोर्ट मांगी। पुलिस ने बताया कि रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू की गई है और दुबे की सुरक्षा का इंतजाम किया गया है। उधर प्रभाकांत की ओर से आरोपों का खंडन किया गया। उन्होंने पीएम को लिखे गए प्रोफेसर दुबे के पत्र में ईडी अधिकारियों पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों को भी गलत बताया। केंद्र ने भी उनकी दलीलों का समर्थन किया और कहा कि ऐसे आरोपों से जांच से जुड़े अधिकारी हतोत्साहित होते हैं। सुप्रीमकोर्ट में अफसरों के खिलाफ आरोप दुबे ने स्वयं नहीं लगाया है बल्कि आइपीएस अधिकारी जसवीर सिंह ने लगाया है। ऐसे में हकीकत जानने के लिए कोर्ट ने प्रोफेसर दुबे को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
sari desh ki jnta ar kannon ke thekedaro ko bhi pta hai ke ye kale dhan wale m***c***d hai to kyo naam nahi bta rahi hai sarkar ...............i think this is lootmarcracy.......

 
Yes, I also studied this A for apple, b for book, C for cat D for dog and so on but later on I came to know that it can be A for arrow, B for banana and so on. As it is said earlier, its not the question of theory or the definition but implementation. I will for Rinku Ji to tell us why did he ask this question.

Jakhar bhaisahab , you are right i also knew the meaning of democracy and read the same that INDIA is a democratic country but it is only when we vote not before and after that.

Election use to happen even when India was ruled by britishers then why people had problems??
Bhagat Singh once said , we dont want freedom where white people are replaced by black people and same thing happened.

Do you think, should it happen in a democracy, where the govt plays the mediator to corporate when they take land from farmer and that too not at the market rate.Nothing has started in the land that was taken for reliance SEZ ( this is one of the example)and rate of that land has gone five fold from the time it was taken from farmers.

Farmer simply get notice that there land will be taken, who ask for there opinion, why not if govt is for people and by the people? does there say count?
Why the rate of products produced by farmer is set by govt not for the steel,iron,n other things?

Chahe isse koi flawed mane ya kuch aur lekin meri najar mein ground pe democracy nahi hai.
 
Rinku well said. Even after few years of independance, our land was forcefully declared surplus and taken away.
 
Back
Top